कहाँ से शुरु करूँः पद्मा मिश्रा

आज प्रिय शैल दी ने *लेखनी*के लिए संस्मरण-भेजने के लिए कहां तब से उलझन में हूं कि कहां से शुरू करूं, यादों का संसार तो विशाल है जीवन सागर में अनुभूतियों की सीपी की तरह,, और तब सबसे पहले बचपन ही याद आता है,, उम्र के इस पड़ाव पर जब जीवन की सांझ दस्तक देने लगी है,वो भूले बिसरे पल, सहेलियां खेल खिलौने मां पिताजी और न जाने क्या क्या,, बनारस की बेटी हूं, मेरे सपनों के शहर बनारस में बिताए अनगिनत यादों के इस सफर में अनुभूतियां भी है,हर्ष और विषाद के पल भी है, जिन्होंने बहुत कुछ सिखाया है मुझे,,

जीवन का हर पल परिवर्तित होता रूप -अपनी कैद में संजोता है यादें- कुछ भावुक पल , बचपन के साथी -सहेलियां,,और छोटे छोटे हाथों से आकाश थाम लेने का मजबूत हौसला – लगता ही नहीं था कि”हरा समुन्दर गोपी चन्दर -बोल मेरी मछली कितना पानी ?–कब -कहाँ खो जायेगी समुन्दर की सोन मछरिया ,,इंद्रधनुषी रंगों में ढले बचपन के सपने बिखर जायेंगे नीले नभ में -,,,हम ढूंढते रह जायेंगे उन्हें जो हमारे साथ साथ मीलों दूर तक चले,,,अक्षरों में खोजते रहे कल्पनाओं के सुनहले आकाश को,,अनजानी दुनियां में
पलते बढ़ते- नन्हे सपनो की बुनियाद को –,-,-और फिर हमने एक नई दुनिया बसा ली ,घर-आंगन -खुशियों की छाँह भी सजा ली,पर यादों में कैद मेरी सहेलियां आज भी याद आती हैं -वो खोया बचपन -वो किशोर उमंगें -धीरे धीरे युवा होते मन की सपनीली -भावभरी कहानियां!, , ,मेरी गुड़िया की शादी में बहाये सच्चे आंसू ,,,मन तो तब नहीं जानता था –मिलने बिछुड़ने की बातें ,हमे बिछुड़ना ही था क्योंकि बेटियां हैं हम –एक दिन अपनी दुनिया में हमे वापस जाना ही होता है -मायके की देहरी भी बस इन्तजार करती है ,फिर सब कुछ बदल जाता है ,हमारे नाम भी -पहचान भी –कैसे ढूँढू -ममता,कल्पना,साधना ,रागिनी,दुर्गेश,कहाँ होगी,उन स्मृतियों में संजोये पल-छिन , इस पड़ाव पर बहुत याद आते हैं -वो पल फिर नहीं मिले- अब तो इंटरनेट है -फेसबुक है,,,, लेकिन मुझे नहीं पता कि वे इस का हिस्सा हैं या नहीं -कहाँ हैं ?नहीं जानती –पर हर प्रेम-दिवस पर अपनी सहेलियों को याद करती हूं, रक्षाबंधन मेरे जीवन का अविस्मरणीय पर्व रहा है,,जब हमारे बाल मन में हजारों आंसू बरसते थे,******
कल रक्षा बंधन है –एक बार फिर इस त्यौहार की यादें पलकें –भिंगो रही हैं–और याद आता है -वो छोटा सा भाई जिसको राखी बांधने की कल्पना हमारे सपनो में बरसों से पल रही थी –हम दो बहनों का एकलौता भाई –हमारे जन्म से सात साल बाद आया था ,,न जाने कितनी प्रार्थनाएं ,की थी हमने माँ बागेश्वरी के मंदिर में –बाबा विश्वनाथ के दरबार में –‘हमे एक भाई दे दो – किसको राखी बांधेंगे ?। हर साल महेंद्र भैया ,विजय,अंजनी,अशोक,-अपने चचेरे भाइयों को राखी बांधते समय मन में ख़ुशी और स्नेह तो होता था ,लेकिन मन की गहराइयों में अपना वो छोटा सा भाई बहुत याद आता,,,,अंततः वो आया गोल-मटोल सांवला सा कृष्ण कन्हैया ,हमने राखी बांधी थी और हम दोनों बहनें नए कपड़े पहन,राजरानी बनी पूरे मोहल्ले में घूमती फिरीं थी ,-वह हमारा एकमात्र खिलौना बन गया था,,और राखी हमारा प्रिय त्यौहार –लेकिन जल्दी ही अपने हाथों से उसे सामने बैठकर राखी बांधने का सुख -अपनी गृहस्थी में डूब जाने के बाद एक सपना बन गया है,-कोई साल ऐसा नहीं आया,,,आज तक प्रतीक्षा कर रही हूँ,,अब तो बाजार से राखी खरीद ,लिफाफे में बंद कर भेज देती हूँ –पर हमारी भावनाएं -स्नेह कागज का संदेश-वाहक नहीं पहुंचा पाता ,,,अपने हाथों से मिठाई बनाकर खिलाना ,”रखिया बंधा ल भैया सावन आये,जीय तूँ लाख बरीस जी’,,,, गाते हुए उसे तिलक लगाना -बहुत याद आता है,,,, मायके की देहरी-बरसों दूर हो गई, अब तो वह भी अपने घर-परिवार में व्यस्त है, बेटियों का पिता ,बन उनका भविष्य संवारने की चिंता भी होगी,शायद -उस बचपन को वह भी याद करता होगा,,,, इस कमी को वह भी महसूस करता होगा –हाँ ,जरूर ,, करता होगा ,,,बेटियों का मायका माँ के बिना अधूरा होता है लेकिन भाई उसे सम्पूर्ण करता है,-प्रिय भाई—आज मेरी भेजी हुई राखी बांध -एक बार उस बचपन की राखी को जरूर याद करना,,जब हम एक साथ मिठाई खाते थे शर्त लगाकर –और नेग के पैसों के लिए झगड़ते थे –माँ के पकवानों को भी याद करलेना -आज भाभी से वही बनवा कर जरूर खाना — हमारे बदले -बेटियों को नेगदेना ,हमारे स्नेह-दुलार-आशीषों के साथ —तुम्हे आज आँचल भर आशीष भेजती हूँ — तुम जियो हजारों साल -****”””
कार्तिक स्नान की बनारस में पुरानी परंपरा रही है, पर मुझे विवाह के बाद गंगा स्नान का अवसर बहुत कम मिला है,, गंगा बनारस की संस्कृति है,,वो हमारी मां भी है,, परंतु अब तो,,,,,,,
–मन जहाँ रमे ,वहीँ गंगा है –मन चंगा तो कठौती में गंगा ,,मैंने भी बाल्टी में गंगोत्री और बनारस से लाये गंगा जल कि कुछ बूंदें डाल कर स्नान कर लिया —बचपन भी बहुत याद आया आज -जब मुंह अँधेरे -ललाइन चाची और सुकदेव कि मौसी के साथ ,हम बच्चे भी पैदल चलकर पंच गंगा घाट जाते थे ,-ठण्ड में दोनों हाथ बगलों में छिपाए ,चाची के गीत में स्वर मिलाने की असफल कोशिश करते सच्चे भक्त बने घाट पर पहुँच ही जाते थे -वहाँ पंडा जी से तिलक करवाते ,और लौटते समय कचौड़ी -जलेबी का नाश्ता भी करते थे –बाद में वो सिलसिला भी छूट गया ,शादी के बाद गंगा से नाता भी टूट गया -,वहाँ जाकर भी कभी समय नहीं मिला कि गंगा किनारे जा सकूँ –पर गंगा तो माँ है न –अलग थोड़े हो सकती है हमसे –ट्रेन कि खिड़कियों से झांकते हुए गंगा की लहरों में खोई माँ को , तलाशती हूँ –एक असफल कोशिश में उनका चेहरा भी कई बार नजर आया है ,तब मेरा अश्रुपूर्ण मौन नमनभी मेरी माँ -और -गंगा माँ के प्रति –मन कि गहराइयों में – -कहीं गुम – – – अब तो अस्सी घाट के समीप ही लंका में मेरा मायका हो गया है- वहा आते जाते समय भी ,नगवां, अस्सी ,लंका चौक ,ज्ञानवापी,मैदागिन कई बार जाना हुआ पर घाट नहीं जा पाई — टी वी में देव दीपावली और कार्तिक पूर्णिमा में नहाते भक्तों को देख कर कल्पनाएँ जरुर जगती हैं –काश मैं भी होती वहाँ–पर बेटियां मजबूर होती हैं -मायके की देहरी जैसेदुइज का चाँद –अबकी बनारस गई तो गंगा नहाने जरुर आउंगी गंगा -माँ ,,वादा रहा —
> –यादें कहाँ कि कहाँ लेजाती हैं —
बचपन में कवि नीरज की पंक्तियाँ अक्सर गुनगुनाती थी –”जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना ,अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाये,..लगे रौशनी की झड़ी झूम ऎसी,उषा जा न पाए, निशा आ न पाए” तब पिताजी ने उन पंक्तियों का सुन्दर अर्थ बताया था, पर बाल मन तब भी यह नहीं समझ पाया था कि -एक दीपक जलाकर पूरी धरा का अँधेरा कैसे दूर किया जा सकता है?….क्या है यह धरा का अँधेरा?…और आज भी यह प्रश्न यथावत है —दीप तो जलाये हैं हमने,,,रोशनी भी जगमगा रही है, ,,पर अँधेरा फिर भी नहीं गया ?…मन का ?..जीवन का ..आकांक्षाओं का , हमने तो बचपन में पिताजी ,जो स्वयं हिंदी के साहित्यकार थे , के मुख से जो अर्थ जाना समझा था,कि मिट्टी के दीपक हमारी धरती के ,प्रकृति के प्रतीक हैं,,,यह हमारी धरती आकाश की पूजा का भी पर्व है, मिटटी के दिए जलाकर चारो तरफ प्रकाश बिखेरना ,धरती से आकाश तक रोशनी ही रोशनी जैसी दिखाई दे रही है वैसे ही जो अशिक्षित हैं, बुरे काम करते हैं,जुआ खेलते हैं, वे भी अँधेरे में हैं,उनके मन में भी अँधेरा है अज्ञान का अँधेरा, उसे दूर करने के लिए हमें ज्ञान का दीप जलाना है, उस समय हम शायद कुछ समझे ,कुछ नहीं समझ पाए थे पर तब मिट्टी के 21 दिए भगवन गणेश लक्ष्मी के सम्मुख जलाकर माँ के साथ पूजा करते थे और आजभी, –”वक्र तुंड महाकाय ,कोटि सूर्य समप्रभः –निर्विघ्नं कुरु म देव ,सर्व कार्येशु सर्वदा” कह कर मिट्टी के दिए जरुर जलाती हूँ,
जब भी दीवाली आती है मेरे मन में ऐसी ही भावनाएं जगती हैं –बचपन की स्मृतियाँ जाग उठती हैं -पूजा -नए नए दीपकों का बहन भाई के साथ मिलकर जलाना बहुत याद आता है ,माँ के हाथों के गुलाबजामुन और लौकी की बर्फियां –आज भी जिन्दा हैं
उस दिन मेरे घर में भी माँ के सिखाये पारंपरिक पकवानों के साथ बच्चों की पसंद के व्यंजन और मिठाईयां भी बनती हैं , गरिष्ठ और तामसिक भोजन नहीं बनाती, बच्चों को हँसते खेलते ,देखना बहुत अच्छा लगता है ,हमारे घर में धुंए ,शोर करने वाले पटाखे नहीं बल्कि फुलझड़ियाँ जलाई जाती हैं,, मुझेफूलझड़ियाँ जलाकर प्रकाश की किरणों का बिखरते जाना –देखना पसंद है, ..दूसरे दिन गोवर्धन पूजा, पशुओं की पूजा जिसे गोकुल ,मथुरा आदि में गोवर्धन पर्वत की पूजा के रूप में भी मानते हैं गायों को सजाकर उनकी पूजा होती है, फिर तीसरे दिन भाई दूज –जब बहने अपने भाई के दीर्घजीवन की कामना हेतु व्रत रख गोधन की पूजा कर, साबुत चना ,मटर को आसन्न विपत्ति का प्रतीक मान कूटती है, भाई को मिठाई खिलती है, मै अपनी दोनों बेटियों के साथ ही घर पर इसकी पूजा करती हूँ, …पर दीपावली का सबसे रोचक पहलू है, जब दिवाली की भोर मेंमहिलाएं किसी पुराने सूप को पीटते हुए -”ईश्वर पईसे दरिद्दर निकसे ”कहते हुए दरिद्रता के प्रतीक सूप को बाहर फेंक आती हैं,ताकि दुःख,दारिद्रय घर में प्रवेश न कर सकें, ..दीपावली का स्वागत मै आज भी अज्ञानता का, विषमता का,नाश और मन व् जीवन की शांति,सुख,समृद्धि,सृजन,मांगल्य कामना हेतु करती हूँ
अपने बचपन में,जब टीवी नहीं था और न ज्यादा फिल्में देखने की अनुमति ही मिलती थी,,बस पढ़ाई, और स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भांग लेना ही अनिवार्य होता था,उस समय यह रेडियो ही एकमात्र हमारे मनोरंजन का साधन हुआ करता था,,बिनाका गीत माला,अमीन सायानी की गंभीर आवाज,, पुरानी फिल्मों के गीत,,,, छब्बीस जनवरी, पंद्रह अगस्त,दो अक्टूबर और रक्षाबंधन पर बजाये गये गीतों को सुनते हुए ही हम बड़े हुए थे,, जिसके बिना सुबह सुबह नहीं लगती थी,, पिताजी समाचार सुनते और मां अचार बनाने की विधि से लेकर स्वेटर बुनना और विवाह, और त्योहारो के पारंपरिक गीत,,वो एक अलग ही दुनिया थी,,,जब मेरा विवाह हूआ और पिताजी ने चार बैंड का रेडियो फिलिप्स दिया तो लगा कि मेरा बिछड़ा दौस्त साथ ही है,, समय के अंतराल में, टीवी ने जब जीवन में प्रवेश किया हमारी दुनिया हमारी सोच ही बदल दी,,हम स्टार पर्ल्स, जीटीवी,सोनी, चैनलों की बात करने लगे,,पुराना दोस्त रेडियो कहीं पीछे छूट गया,,, आज वर्षों बाद, मिश्रा जी के अवकाश लेने पर उनके विभाग के मित्रों जो अब पारिवारिक सदस्यों की तरह हो गये है ,, उनके द्वारा*एक रेडियो सेट कैरेवान *उपहार में दिया गया,, हमारी खुशियां लौट आई है जैसे,, पुराने गीतों की महक लौट आई है, समाचार भी है, और हमारा साथ भी,,जो टीवी के चैनलों और पारिवारिक जिम्मेदारियों से कम मिलता था,, और छोटे स्वस्तिक के टीवी कार्टूनो ने टीवी देखना लगभग बंद ही करा दिया,,था, मैं बहुत खुश हूं,,अब मैं आकाशवाणी से प्रसारित होने वाली अपनी कविताएं कहानियां भी सुन सकती हूं,,लग रहा है जैसे फिर वही दिन लौट आए हैं,,
स्मृतियो का संसार अथाह है,,,हरि अनन्त हरि कथा अनंता*की तरह यादें हैं कि घेर लेती है,,,, मेरे संस्मरण- आज भी भावुक और रोमांचित कर जाते हैं,,सादर समर्पित करतीं हूं अपनी सखी *लेखनी को,
धन्यवाद शैल दी।

—-पद्मामिश्रा जमशेदपुर
कवियत्री, कथाकार