अहा ! बचपनः दिलीप भाटिया

प्रार्थना,
तुम्हारी मम्मी से जब मैं स्मार्टफोन के फीचर्स सीख रहा था, तो तुम्हारी प्रतिक्रिया थी, ‘‘नानू, आपके माम डेड ने नहीं सिखाया था क्या ? ‘‘मेरे उत्तर‘‘ उस समय ये सब नहीं थे‘‘। पर तुम्हारी जिज्ञासा थी कि मेरा बचपन कैसा था ? तुम्हें होस्टल जाना था, इसलिए आज तुम्हें इस पत्र के माध्यम से अपने बचपन की एक झलक भर दिखलाने का प्रयास कर रहा हूँ।
माम को अम्मा, डेड को बाबूजी, सिस को दीदी, ब्रो को भैया, आंटी को मौसी चाचीजी, अंकल को ताऊजी चाचाजी, काम वाली बाई को काकी, नानू को नानाजी, दादू को दादाजी कहते थे। साइकिल से स्कूल जाते समय हेलमेट नहीं पहनना होता था, टी.वी. नहीं होने से अम्मा बाबूजी के पास हमारे लिए समय होता था, स्कूल से आने के पश्चात गली में साथियों के साथ खेलते थे, इसलिए हमें फेसबुक फ्रेन्डस की आवश्यकता नहीं थी। दादी की मठरी इतनी स्वादिष्ट होती थी कि हमें मेगी, पीजा की कमी महसूस नहीं होती थी। लालटेन की हल्की रोशनी में पढ़ने पर भी हमें चश्मा नहीं लगा, प्लेट भर चावल मिठाई खाने पर भी हमें मोटापे की बीमारी नहीं लगी, कुऐं नल का पानी भी हमें स्वस्थ रखता था। इसलिए हमें आरओ एवं मिनरल वाटर बोटल की आवश्यकता नहीं थी। दादाजी नानाजी के पास हमारी हर समस्या का समाधान था। इसलिए हमें गूगल सर्च की कमी नहीं खली, हमें हेल्थ सप्लीमेन्ट्स, बैटरी वाले खिलौने, ट्यूशन, कोचिंग की आवश्यकता नहीं थी।
हम अपने रिश्तों मित्रों के यहां कभी भी आ जा सकते थे, इसलिए हमें उनकी परमिशन के लिए मोबाइल की आवश्यकता नहीं थी। हमे बड़े भाई बहनों के छोटे हो गए कपड़ो से कोई परहेज नहीं था, अम्मा, दादीजी, भाभी, बुआजी को फेशियल, मेकअप, वेक्स की आवश्यकता नहीं थी। हम साधारण डॉक्टर की गोली या वैद्यजी की पुड़िया से ही ठीक हो जाते थे, इसलिए उस समय पेडीट्रेशियन नहीं होते थे, बर्थडे केक की क्रीम से हमें चेहरे को कार्टून नहीं बनाना होता था, दादीजी का जन्मदिन पर रोली चावल का तिलक ही हमारे मस्तक की शोभा होता था। महीने के आखिरी सप्ताह में अम्मा को सब्जी लाने के लिए हम खुशी से अपनी गुल्लक की अनमोल बचत दे दिया करते थे।
अम्मा बाबूजी का कहना ही हमारे लिए आदेश होता था, बहन से लड़ते थे, पर वही बहन हमें अम्मा की मार से भी बचाती थी। राखी पर हमने बहन को मोबाइल, कपड़े, रिंग कुछ नहीं दिया फिर भी वह हमें राखी बांधती थी। हमारे मित्र स्थायी थे, इसलिए हमें उन्हें हर साल फ्रेंडशिप बैंड नहीं बांधने होते थे।
अम्मा के बीमार होने पर ब्रेड नहीं लानी पड़ती थी। पड़ौस की चाची के यहां जाकर खाना खा लेते थे। पड़ौस की कमला ताईजी हमारे लिए केजुएलिटी की डॉक्टर थी। हमारी ही रसोई में से हीगं, अजवाइन लाकर हमें पानी से खिला देती थी। घाव पर हल्दी घी का छोंक लगाकर बांध देती थी। हमें न तो टिटनेस के इंजेक्शन, न ही ऐंटीबायोटिक की गोलियों की जरूरत थी। जुकाम तो अदरक तुलसी की चाय से ही ठीक हो जाता था। ताऊजी के अचानक आ जाने पर भी अम्मा को ड्रेस बदलने की चिन्ता नहीं होती थी, क्योंकि वे हमेशा साड़ी में ही रहती थी।
खूब पत्र लिखते थे, डाकिया चाचा हर रोज आता था, एस.एम.एस. ट्विटर की तरह कैरेक्टर्स की संख्या की सीमा नहीं थी। हाँ हमारे कैरेक्टर (चरित्र) पर घर की आंखों के अतिरिक्त पड़ौस की भाभी ताईजी की भी नज़र रहती थी, उन्हें भी हमें डांटने समझाने का पूरा अधिकार था। मदर्स डे, फादर्स डे, टीचर्स डे नहीं होते थे, हर दिन माता पिता गुरू के लिए समर्पित था। वर्तमान के शहर की प्रतिष्ठित कम्पनी के शीर्षस्थ अधिकारी से अधिक सम्मान हमारे पोस्टमास्टर बाबूजी को मिलता था। मेरे दादाजी की मृत्यु पर हमारे घर के सामने बोहरा मुस्लिम के होटल मालिक ने 13 दिन तक रेडियो बंद रखा था। डाकघर में सर्तकता अधिकारी नहीं था, पर हमारे बाबूजी को लिफाफे पोस्टकार्ड के पैसे पोस्ट ऑफिस में जमा कराने होते थे।
हमारी बहनें घर स्कूल दोनों जगह सुरक्षित थीं। दादाजी के मन्दिर के भगवान में इतनी श्रद्धा थी कि हमें किसी को गुरू महात्मा, स्वामी, संत बनाने मानने की आवश्यकता नहीं थी। शिक्षा में ज्ञान भी सम्मिलित था, इसलिए हमने किसी गुरू से दीक्षा नहीं ली। गर्मी में छत पर आंगन में सोते थे, इसलिए पंखे के लिए बिजली नहीं होने पर इनवर्टर की आवश्यकता नहीं थी। हिन्दी माध्यम के स्कूल में भी हमें रेन एंड मार्टिन की लाल किताब से जो सशक्त अंग्रेजी की ग्रामर पढ़ाई गई थी, वह आज भी एस.एम.एस. वाली अंग्रेजी के वाइरस से प्रभावित नहीं हुई। मैं आज भी एस.एम.एस. में उसी प्रकार सही अंग्रेजी लिखता हूँ, जो परीक्षा में लिखता था।
घर का खाना अमृत सदृश होता था। फ्लेट, मकान नहीं थे, पर दो कमरों का निवास भी घर था। पांचों भाई बहन एक ही चौकी पर पढ़ते थे, सुख-दुःख आते थे, पर प्यार, स्नेह, अपनापन इतना अधिक था कि दुःख जल्दी भाग जाता था। जीवन का गिलास कभी खाली नहीं रहा, भरा मात्र भी नहीं हमेशा छलकता ही रहा।
जीवन सरल, संतुष्ट, सार्थक था, जीवन संध्या में बचपन की वही सादगी, चरित्र, अनुशासन काम आ रहा है।
यह पत्र तुम्हें स्केन करके ई-मेल भी कर सकता था पर डाक से इसलिए भेज रहा हूँ कि पोस्टमेन अंकल होस्टल में तुम्हारे नाम का तुम्हारे जीवन का पहला लिखित पत्र लेकर आऐंगे तो तुम्हें वाट्स अप, एस.एम.एस., लाइक, कमेंट की अपेक्षा लिखित पत्र का महत्त्व महसूस होगा।
सस्नेह
शुभाकांक्षी
दिलीप

दिलीप भाटिया
मोबाइल-09461591498 ई-मेल dileepkailash@gmail.com
रावतभाटा 323307 राजस्थान