अपनी बातः यादो के उजाले में

आज पहली मई को अंक देते हुए श्रम की महत्ता का ध्यान आना स्वाभाविक है। माना कि श्रम दिवस मात्र एक प्रचलन है, एक और दिन की छुट्टी मनाने का बहाना ही है , परन्तु न जाने क्यों कई अनजाने, अनसुने चेहरे आँखों के आगे आ-जा रहे हैं जिन्होंने बिना किसी लालच या इनाम के जिन्दगी मानवता और हमारे सुख चैन के लिए न्योछावर कर दी।
हर उस रक्त बिन्दु और पसीने की धार को नमन करती हूँ जो मानवता के हित में बही, जिसने हमारी हर बरखा, आंधी से रक्षा की।
गरमी भरपूर चल रही है भारत में और यहाँ पर अभी भी ठंड ही है। बहुरंगी और बहुआयामी इस धरती और जिन्दगी में बहुत कुछ है जानने , समझने और बताने को। जिज्ञासु और पिपासु लेखिनी का अगला अंक पर्यटन पर है। रचनाएँ भेजने की अंतिम तिथि है 20 जून।
कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, इतनी अप्रत्याशित और असंभव कि न सिर्फ वे स्मृति पटल पर अंकित हो जाती हैं, अपितु उस समय हम क्या कर रहे थे , कहाँ बैठे थे आदि भी नहीं भूल पाते। 22 नवंबर 1963 और नौ सितंबर 2001 दो ऐसी ही तारीखें हैं, जिन्हें भूलना आसान नहीं किसी के लिए भी। फिर आया था वह 26 नवंबर 2008 जब मुंबई हिली थी। अधिकतर जो याद रहती हैं वह दुख की, हादसे की या खोने की ही यादें होती हैं । कुछ व्यक्तिगत तो कुछ इतनी भयानक जिनसे पूरी दुनिया पूरा समाज हिल जाता है। दुख शायद सुख से अधिक स्थाई और भारी प्रतीत होता है, इसकी एक यह वजह भी हो सकती है।
बशीर बद्र जी ने अपनी एक खूबसूरत और यादगार ग़ज़ल में कहा है यादों के उजारे साथ रखना, जाने कब जिन्दगी की शाम हो जाए। और हमने वही किया भी है-संस्मरण विशेषांक है यह। संस्मरण न सिर्फ वक्त के दस्तावेज हैं इनसे हम व्यक्ति और समाज की अंतर्रचना को भी समझ सकते हैं। इतिहास की तरह कहाँ चूके और क्या कमजोरी है जान सकते हैं। जब भी हम कुछ लिखते हैं तो वह मात्र लिखना नहीं होता। आत्मा की बेचैनी और ललकार होती है जो विवश करती है कुछ ऐसा कहने या लिखने को जिसे हम सीधा-सीधा स्पष्ट शब्दों में लिख या कह नहीं पाते या फिर उतने से ही संतुष्ट नहीं हो पातें, क्योंकि हम चाहते हैं कि खूब सारे लोगों तक बात पहुँचे, साझी हों लोग इसमें । लोग उससे कुछ सीखें या जानें…वह सुख या दुख, हार-जीत, राग-वैराग जिसे हमने भोगा , वह भी उसे जिएँ या उससे बचें । प्रेरित व प्रोत्साहित हों। आदमी एक सामाजिक प्राणी है और प्रायः हर क्रिया कलाप किसी न किसी रूप में समाज से जुड़ता ही है। उसी बड़ी श्रंखला की एक कणी है-सृजन भी। मूलतः तो सृजन आत्म संतोष या स्वांतः सुखाय ही किया जाता है, उद्देश्य से तो प्रवचन या कक्षा ही लग सकती है, ऐसा ही मानती हूँ। पर कारण से प्रकरण और प्रकरण से कारण पर ही तो यह समाज , जीवन श्रंखला बढ़ती और चलती है। अवचेतन मन में हमेशा कुछ कारण तो अवश्य ही होते होंगे हर आत्म बयानगी के भी…कलात्मक या अकाल्तमक। अकारण तो कोई कर्म होता ही नहीं। फिर यह बचाने की चाह तो प्रकृति तक में निरंतर है तभी तो पतझड़ या घोर से घोर सूखे में भी कुछ बहारों के बीज बचे ही रहते हैं, नष्ट नहीं होते।
शायद यही वजह रही होगी कि आदि काल से ही तरह तरह से अभिव्यक्त किया है मानव ने खुद को-भित्तिचित्र से लेकर लोकगीत और किस्से कहानियों तक में। कविता और कहानियाँ जीवन का तबसे सहारा रही हैं जबसे आदमी ने हंसना रोना शुरु किया होगा।

रोचकता और उपयोगिता एक और अनिवार्य शर्त है रचना की अमरता की। बतकही तक रोचक नहीं हो तो पल्ले नहीं पड़ती। बतकही जिसमें यादें और अंतर्मन शब्दों का लिबास पहन लेती हैं। किस्से कहानियों की शुरुवात शायद इन्ही बतकही से ही हुई होगी कभी और प्रार्थना व अभिलाषाओं की विनती और अभिव्यक्ति से कविताओं की। मेरी समझ से तो संस्मरण या यादें ही शायद आदि जननी हैं हर कलात्मक अभिव्यक्ति की, ललक और बेचैनी की। ये ही इनमें मौलिकता देती हैं और तीव्रता भी। क्योंकि हम सभी भिन्न हैं, हमारा जीवन भिन्न है। परिस्थितियाँ और पर्यावरणानुकूल यादें भी व्यक्तिगत अनुभव हैं। ये यादें ही हैं जिनमें कल्पना के नए-नए रंग भरकर नए नए रूप में कलाकार प्रस्तुत करता है। यादें नहीं तो कुछ भी नहीं, ना कला, ना ही जीवन के सुख-दुख। ये यादें या स्मृति ही तो है जो हमें एक दूसरे से भिन्न और विशिष्ट बनाती हैं, हंसाती-रुलाती हैं। वास्तव में कम्प्यूटर चिप है ये जीवन की। तो मित्रों,

सहेजी हैं कुछ किलकारियाँ
आंसू और यादें भिगोती-तड़पाती
मन की माटी पानी सी जो रिसरिस जातीं
खोलना, जानना और महसूसना इन्हें तुम
जब जब याद आऊं या दूर चली जाऊँ
धड़कते दिल से जीना फिर फिर हर पल
आनेवाली पीढ़ी को बतलाना समझाना
कैसे रहते और जीते थे हम
ताकि बचा रहे जीने का मर्म
प्यार और संसार तुम चाहो तो,
या वक्त हो जब भी तुम्हारे पास…

शैल अग्रवाल.