भव्य सौंदर्य की मिसाल राजस्थान की चित्रित हवेलियाँः जूली स्करडेनिस

बारह वर्ष पूर्व मैं पहली बार भारत आयी। तीन सप्ताह के उस छोटे झटपट दौरे ने मुझे देश के अनेक प्रमुख नगरों और स्थानों से परिचित करवाया था। लेकिन भारत के उत्तर पश्चिम छोर में बसे राजस्थान न मेरा सबसे अधिक मन लुभाया था। समय गुजरने के साथ राजस्थान की छवियां मेरे मष्तिष्क में उतनी ही तरोताजा बनी रहीं जैसी जब मैंने उन्हें पहली बार देखा था, उस कभी न अंत होने वाले मरुस्थल में बिखरे छोटे-छोटे गांव, विशाल मध्ययुगीन दुर्ग, हिन्दु मन्दिर, महाराजाओं के विलासमय प्रासाद और सदा की भांति शुष्क रगिस्तानी वातावरण के ठीक विपरीत चटख पीले, नारंगी और लाल रंग के परिधानों धारण किये राजस्थानी महिलाएँ।

मैन वापिस लौटने का स्वप्न संजोया था। और मेरा यह स्वप्न पूरा हुआ। यह मेरा उस क्षेत्र को पूरी तरह से खोजने का मौका था जिसके साथ मुझे अपनी पहली यात्रा के दौरान प्रेम हो गया था। मैने ऊँटों, दुर्गों और प्रासादों की अपेक्षा की थी और मुझे निराशा नहीं हुई। मुझे वे प्रचुर संख्या में मिले। लेकिन मैने शेखावाटी की अपेक्षा नहीं की थी जो राजस्थान के उत्तर पूर्व का एक क्षेत्र है जहां अपूर्व ढंग से चित्रित विशाल मकान हैं जिन्हें हवेलियां कहा जाता है। मैने “भव्य” शब्द को साधारण तौर पर नहीं प्रयुक्त किया है। शखावाटी को भारत के समृद्धतम कलात्मक और वास्तुशिल्पीय क्षेत्रों में एक कहा गया है।

मूलतः सैन्य तानाशाहों और बाद में राजपूत योद्धाओं द्वारा शाषित शेखावाटी इसलिए समृद्ध हुआ क्योंकि यह अरब सागर पर स्थित गुजरात को देश के भीतरी भागों से जोड़ने वाले कारवां मार्ग पर स्थित था। व्यापारियों ने इन कारवां मार्गों पर व्यापार केन्द्र स्थापित किये जो शीघ्र ही नगरों में बदल गये। जैसे जैसे वे धनवान हुए उन व्यापारियों ने अपनी संपदा हवलियों, मंदिरों, कुओ तथा व्यापारिक स्मृति स्थलों, जिन्हें छत्रियां कहा जाता था, पर लगा दी।

19वीं शताब्दी के आरंभ से मध्य काल तक ब्रिटिश शासन के कारण व्यापार बम्बई, कलकत्ता और मद्रास ( अब क्रमशः मुम्बई, कोलकता और चेन्नै) चला गया। चतुर शेखावाटी व्यापारी, जिन्हें मारवाड़ी कहा जाता था, अपने शेखावाटी गृह प्रदेशों को छोड़कर बड़े बन्दरगाह नगरों की ओर बढ़ चले। लेकिन कम से कम आगामी कुछ पीढ़ियों तक उनके परिवार पीछे रह गये जबकि धनाड्य व्यापारिओं ने अपने पूर्वजों के मकानों को चित्रों से अलंकृत करने में अपना धन लगा दिया। ये अलंकृत हवेलियां शेखावाटी की शान हैं।

ये हवेलियां जो अधिकांशतः 1800 और 1930 के मध्यकाल के दौरान निर्मित हुई थीं समस्त शेखावाटी में तब फली फूलीं जब व्यापारियों में विशालतम, सबसे अलंकृत हवेलियों के निर्माण के लिए होड़ लग गई। एक विशाल मुख्य प्रवेश द्वार जिससे एक छोटा प्रवेश द्वार निकलता है, भीतरी ड्योढ़ी में ले जाता है जिसे मरदाना कहते हैं और जहां आगंतुकों का बैठक में स्वागत किया जाता है। मरदाना वह स्थान है जहां घर के पुरुष अपना अधिकांश समय बिताते हैं।

मरदाना के बाद एक दीवार और छोटे गलियारे से अलग हुआ जनाना या भीतरी ड्योढ़ी होती है जहां पर घर की महिलाएँ रहती हैं। व्यापारी की धन-दौलत के अनुसार घर में अतिरिक्त ड्योढ़ियां भी हो सकती हैं। ड्योढ़ियों के चारो ओर बने कमरे आम तौर पर दो से तीन मंजिलों में होते हैं।

शेखावाटी हवेलियों में प्रचुर चित्रकारी की गयी होती है। भवनों के बाह्य भाग, ड्योढ़ियों की भीतरी दीवारें, कमरे, भीतरी छतें और महराबों पर भी चित्रकारी की गयी होती है। सतहों पर प्लास्टर लगाया जाता है और जब उसकी ऊपरी परत अभी गीली ही होती है उस पर रंग लगाया जाता है जिससे भित्ति चित्र बनते हैं। प्रयुक्त रंग चटख और शोख होते हैं। 19 वीं शताब्दी के अंत तक आते आते प्राकृतिक वनस्पति रंगों का स्थान धीरे धीरे कृतिम रंगों ने ले लिया था।

इन सतहों पर क्या चित्रित किया जाता था, लगभग हर कुछ-पुष्पीय और अरबी डिजाइन जिन पर मुगलों का प्रभाव पड़ा था, जिन्होंने अधिकांश उत्तर भारत पर लगभग 200 वर्षों (1526-1707) तक राज्य किया था, लोक कथाओं के दृश्य और हिन्दु पौराणिक प्रसंग या केवल साधारण चित्र। लेकिन इनमें वास्तव में अनूठे चित्र उन नयी खोजों के हैं जिनको ब्रिटिश लोग लेकर आये थे जैसे स्टीमशिप, ट्रेन, कारें, ग्रामोफोन और आरंभिक हवाई जहाज। इन्हें बड़ी संख्या में चित्रित किया गया है।

शेखावाटी के केन्द्रीय भाग में जो एक त्रिकोण के समान है और जिसके तीन सिरों पर जयपुर, दिल्ली व बीकानेर है -मांडवा है जो दिल्ली से 150 मील पश्चिम में एक व्यस्त भीड़ भाड़ वाला नगर है। मांडवा के केन्द्र में मांडवा किला है। 1755 में निर्मित यह एक सुदृढ़ किला है जिसमें एक प्रासाद होटल है जो इस नगर के संस्थापक नवल सिंह के वंशजों द्वारा चलाया जा रहा है। शेखावाटी के कुछ प्राचीनतम भित्ति चित्र-200 वर्षों से भी प्राचीन- इस दुर्ग के कक्ष की दीवारों को अलंकृत करते हैं।

मांडवा में दर्जनों चित्रित हवेलियां हैं। सीमित समय के लिए भी आए यात्री यहां कुछ उत्कृष्ट हवेलियां देख सकते हैं। यहां गोयनका हवेली (निर्मित 1890) है जिसके बाह्य भाग में हाथियों और घोड़ों के विशाल भित्ति चित्र हैं। गुलाब राय लाडिया( 1870) की हवेली के बाह्य भाग पर हाथी और ऊँट चित्रित हैं। नंदलाल मुरमुरिया ( 1935) की हवेली में भित्ति चित्रों का अजीबोगरीब संग्रह देखने को मिलता हैः घोड़े पर सवार नेहरू, इंगलैंड के सम्राट जार्ज पंचम और गंडोला के साथ वेनिस। बन्सीधर नेवटिया (1921) में घोड़ों और हाथियों के पारंपरिक भित्ति चित्रों के साथ फोन पर बात करता तरुण बालक, सुख सुविधाओं से सज्जित यात्रा वाहन और राइट ब्रदर्स का हवाई जहाज। मांडवा दुर्ग से पैदल यात्रा करके कई अन्य हवेलियों को देखा जा सकता है। यहां की सर्वाधिक जानी पहचानी हवेलियों को देखना अच्छा लगता है लेकिन इस छोटे से शहर के अनेक आनंदों में से एक है वैसे ही टहलना और अनायास छोटी मोटी खोजें करना। आप दोनों ही कर सकते हैं यदि आप कुछ दिन यहां ठहरें।

दक्षिण में पन्द्रह मील आगे नवलगढ़ है, शेखावाटी के सबसे महत्वपूर्ण चित्रित नगरों में से एक। ऐसा अनुमान है कि इस छोटे से नगर में 100 से अधिक चित्रित हवेलियां हैं। यदि आप कोई अन्य हवेली न देख पाये तो कम से कम आनंदीलाल पोद्दार हवेली ( 1920) देखिये जो एक भलीभांति संरक्षित हवेली है जिसकी बाहरी और भीतरी दीवारों पर सज्जित भित्ति चित्र शोख और सजीव हैं। पोद्दार परिवार मुंबई के एक धनाढ्य उद्योगपति हैं जो शेखावाटी और समस्त भारत में स्कूलों का निर्माण करवाने में सक्रिय हैं। कभी यह उनका घर हुआ करता था।

मांडवा और नवलगढ़ के बीच मुकुन्दगढ़ और डुंडलोड है जहां अनेक विशाल चित्रित हवेलियां हैं। डुंडलोड में 250 वर्ष पुराना किला है जिसमें मुगल और हिन्दु वास्तुशिल्पीय शैली का मेल देखने को मिलता है( अब एक होटल है)।

लगभग प्रत्येक शेखावाटी नगर में कम से कम एक चित्रित हवेली तो है ही लेकिन जिन नगरों में सर्वोत्तम अलंकृत हवेलियां देखने को मिलती हैं वे हैं फतेहपुर, झुंझनु और रायगढ़-सभी मांडवा के समीप हैं और हां नवलगढ़ व मांडवा भी इस सूची शामिल हैं।

हवलियों को देखने के लिये कुछ सुझावः

समय का पूरा पूरा उपभोग करने और जितनी अधिक संभव हो सकें उतनी हवेलियां देख पाने के लिए आपको एक गाइड कर लेना चाहिये जिससे आपउन हवेलियों को आसानी से ढूंढ सकें।

शेखावाटी भ्रमण तो मेरी भारत यात्रा का एक महत्वपूर्ण भाग था लेकिन दो सप्ताह के मेरे राजस्थान भ्रमण में और भी बहुत कुछ शामिल था। भारत के श्रेष्ठतम जैन मन्दिरों में गिने जाने वाले रणकपुर (जैनी पुनर्जन्म पर विश्वास करते हैं और शुद्ध शाकाहारी होते हैं): उदयपुर का भव्य सिटी पैलेस, जयपुर स्थित 300 वर्ष प्राचीन खगोलीय वैधशाला जन्तर-मंतर; विश्नोइयों के गांव जिसे हम रोहेत के राजकुमार सिद्धार्थ सिंह के साथ देखने गये थे; जैसलमेर और जोधपुर की गलियां जहां कारीगर और व्यापारीजन लगभग उसी प्रकार से अपने अपने व्यवसायों में व्यस्त हैं जैसा सैकड़ों वर्ष पूर्व हुआ करते थे।

इसके अलावा हमने अनेक भव्य किले भी देखेः बीकानेर का जूनागढ़, जैसलमेर, जोधपुर का मेहरानगढ़, जयपुर के उपनगरीय क्षेत्र में बना आमेर और मेरा पसंदीदा मध्ययुगीन उजाड़ पड़ा कुंभल गढ़ जो उदयपुर के उत्तर में पर्वतों में शान से खड़ा है।

राजस्थान से दिल्ली लौटते हुए हमने अपने पिछले भ्रमण के दो पसंदीदा स्थान देखे-16 वीं शताब्दी की अल्पकालीन मुगल राजधानी फतेहपुर सीकरी और भव्य ताजमहल।

इस उत्कृष्ट यात्रा को और भी अधिक यादगार बनाने के लिए हम जिन नौ होटलों में ठहरे थे उनमें से पांच पैलेस होटल थे। प्रत्येक होटल अद्भुत थाः मांडवा, बीकानेर के समीप गजनेर पैलेस, जोधपुर का उमेद भवन पैलेस, उदयपुर का शिव निवास पैलेस और जयपुर का राज विलास। इनमें प्रवास ने हमारी यात्रा के आनंद को और अधिक बढ़ा दिया। हम स्वयं को कम से कम कुछ दिनों तक तो महाराजा समझ सके थे।

जूली स्करडेनिस

( अमरीकी यात्रा लेखिका)