देवों की घाटीः कुल्लू मणिकरण यात्रा संस्मरणः सुधा भार्गव

आज के इस भौतिकवादी युग मेँ सुबह से शाम तक लक्ष्मी के पीछे भागना पड़ता है । जहां वह नहीं जा पाती वहाँ अपने प्रिय उल्लू को भेज देती है । उल्लू तो सबको उल्लू बनाता ही रहता है । इस स्थिति से कुछ दिनों छुटकारा पाने के लिए हम पति पत्नी ने प्रकृति की गोद मेँ जाने का निश्चय किया ।

गए तो जुलाई 1996 मेँ थे पर लगता है कल ही की तो बात है जब आरामदायक बस से कालका जी शिमला होते हुए व्यास नदी के किनारे –किनारे 1219 मीटर की ऊंचाई पर हिमालय की गोद मेँ बसे रमणीक स्थल कुल्लू पहुँच गए । एक ओर पहाड़ी पर हमारा होटल ,दूसरी ओर सड़क के पार गोल पत्थरों से टकराती जलधारा –मानो हर पत्थर के बीच से कविता फूट रही हो । नदी के किनारे बनी छोटे पर सुंदर होटल –बंगले ,आकाश को चूमती हुई बर्फीली चोटियाँ !सच देवों की घाटी मेँ पहुँच गई थी ।

दूसरे दिन पौ फटते ही ऊनी कपड़ों से अपने को ढके कमरे से बाहर निकल आई । वहाँ न इंसान के बनाए महल –म्यूजियम थे और न शानदार बाग बगीचे पर पूरी धरा प्राकृतिक सुषमा से माँग भरे नवदुलहन की तरह खड़ी मुस्कुरा रही थी । सफेट –गुलाबी फूलों की महक ,ओस से झुकी डालियाँ ,चहचहाती चिड़ियाँ ,ठंडी ठंडी हवा के सुखद स्पर्श से मैं निहाल हो उठी और हरी –हरी मखमली घास पर दौड़ लगाने लगी । मन ने कहा –संकोच न कर ,गहरी –गहरी सांस लेना शुरू कर दे फिर इतनी शुद्ध वायु मिले न मिले । परंतु मणिकरण जाने के लिए बस पकड़ने की जल्दी थी ,अत : यह मोह त्यागना पड़ा ।

करीब 11बजे हम मणिकरण पहुँच गए जो कुल्लू से 45 किलोमीटर दूर है ।

मणिकरण को शिव –पार्वती का निवास स्थान माना जाता है । इस शिवनगरी की नैसर्गिक सुषमा को आँखों मेँ बसाते हुए हजारों वर्ष पूर्व बने शिव –पार्वती के मंदिर मेँ जा पहुंचे । दरवाजे से बाहर काजू –बादाम 60)किलो और डाली का टूटा कच्चा ताजी बादाम 25)किलो बिकता देख हम तो दांतों तले उंगली दबा कर रह गए ।

जूते उतारकर मंदिर मेँ प्रवेश किया और अंदर सीढ़ी से नीचे उतरते ही देखा –सामने ही चट्टानों से उष्ण जल प्रपात बड़ी तेजी से बह रहा है और साथ मेँ भाप के बादलों से चारों ओर धुंध—धुआँ धुआँ छाया है । बाईं ओर बड़े से शिलाखंड पर मंदिर बना हुआ था । उसके पीछे से आती झरनों की कल –कल की आवाज शिव बंदना होने का एहसास करा रही थी । दिमाग बहुत तेजी से दौड़ लगाने लगा – गरम –गरम फौलादी चट्टानों को फोड़कर मंदिर का निर्माण साधारण मनुष्य के बलबूते के बाहर है । जरूर विश्वकरमा जैसा महान शिल्पकार व आविष्कर्ता रहा होगा जिसने अपनी यंत्र विद्या व नील सदृश्य इंजीनियर की सहायता से शिव नगरी बसाई होगी । उष्ण जल प्रपातों के कारण फर्श बहुत गर्म था इस कारण हम बड़े –बड़े तख्तों पर पैर रखकर उसके परिसर मेँ गए । वहाँ अनेक शिलालेखों पर नजर गई जिनसे पता चला कि यह वही कैलाश पर्वत है जहां पाशुपत अस्त्र प्राप्त करने के लिए अर्जुन तपस्या करने आए । पाशुपत आज का एटमबम था । अर्जुन को महावैज्ञानिक शंकर ने ध्वंसात्मक अस्त्र –शस्त्र की प्राप्ति के लिए अपनी प्रयोग शाला मेँ इसी स्थान पर शोध करने की अनुमति दी थी । परीक्षण करते समय शरीर पर भस्मलेप करने का निर्देश भी जाटाधारी शिव ने दिया था । आधुनिक वैज्ञानिकों का भी मानना है एटोमिक रेडियो विकिरण से बचाव का एकमात्र प्रतिषेधक है –भस्म ।

देवालय के आँगन में खौलते पानी के 3-4कुंड थे किसी में आलू उबल रहे थे ,किसी में मिट्टी की हांडी में दाल चावल चने पक रहे थे । कुछ लोग तो केथली में उबला पानी कुंड से भर कर ले जा रहे थे ताकि चाय बना सकें । यही गरम पानी पाइप के सहारे रसोई और स्नानागार में पहुंचाया जा रहा था

सार्वजनिक रूप से महिलाओं व पुरुषों के नहाने के लिए अलग अलग समुचित व्यवस्था मंदिर के परिसर में ही है । ये स्नानागार तालाब की तरह बड़े बड़े बने हैं । । कुछ आधुनिक शैली के प्राइवेट स्नानागार दरवाजे सहित बने हैं जिनमें केवल पति –पत्नी नहा सकते हैं । यहाँ पारिवारिक स्नानागार भी हैं । इनका टिकट लेना पड़ता है । प्राइवेट स्नानागार में स्नान करके हमने स्फूर्ति का अनुभव किया और गीले कपड़ों को तौलिये में लपेटकर सीढ़ियों पर ही बैठ गए ताकि प्रसाद पा सकें ।

प्रसाद हांडियों में पकने वाले भोज्य पदार्थों से ही तैयार किया गया था । प्रसाद खाते –खाते हम इस चमत्कारी दुनिया में उड़ रहे थे । तभी दायें तरफ कुछ लोगों को एक गुफा से निकलते देखा । हमने अंदाज लगाया –कोई मुनि अंदर तपस्या कर रहे हैं और उनके भक्त दर्शन करके बाहर निकले हैं । हम भी कन्दरा की तरफ बढ़े । जैसे ही उसे छूआ,दीवार गर्म लगी और पता लगा चट्टानों को काटकर अनेक गुफाएँ और विश्राम गृह बनाए गए हैं । अंदर पत्थर की बनी बैंच पर हम जाकर बैठ गैर पर वहाँ के ताप से हम कुछ मिनटों में ही पसीने से लथपथ हो गए । दूसरी बैंच पर लेता महिला से मैंने पूछा –आप यहाँ क्यों लेटी हैं ?

उसने मुसकाते हुए कहा –मैं यहाँ रोज आधा घंटा उठती बैठती हूँ । इससे मेरे जोड़ों का दर्द कम हो जाता है और संधि शोध के कष्ट से बच जाती हूँ । तापोचार प्रणाली को देखकर मैं स्तब्ध रह गई ।

इतने में आवाज आई –जड़ी बूटी ले लो –सालों की बीमारी मिनटों में छू मंतर। काश मेरी मुलाक़ात वनस्पति विभाग के विशेषज्ञ सुषेण देवता से हो जाती तो अवश्य कुछ जड़ी बूटियाँ भी खरीद लेती । उन्होंने ही तो लक्ष्मण की मूर्छा दूर करने को संजीवनी बूटी के बारे में बताया था ।

सूर्य की तरह तपत देने वाली गुफा के पास खड़े –खड़े प्यास से गला चटकने लगा ।चारों तरफ नदी में गिरते गर्म पानी के सोते ही नजर आ रहे थे ,चिंता चिपट गई कि अब गला कैसे तर होगा !

-भैया पीने को पानी चाहिए । यहाँ कोई ठंडे पानी का झरना भी होगा क्या?पास से गुजरते एक पहाड़ी भाई से पूछा ।

-है तो ,पर इतना ठंड कि पीया ही नहीं जाएगा ।

-कहीं ठंडे पानी का झरना तो कहीं गर्म पानी का ईशवर की माया भी अपरम्पार है ।

पहाड़ी ने एक नल की ओर इशारा करते हुए कहा—आप उस ओर चले जाओ । गर्म –ठंडा पानी को मिलाकर पेयजल की व्यवस्था की गई है ।

नल की ओर जाते हुए देखा कि कुछ शहरी बाबू ठंडे पानी के कुंड में कोक ,पेप्सी ,लिमका की बोतलें रख कर फ्रिज की कमी पूरी कर रहे हैं ।

अभी तक पुस्तकों में पढ़ा था कि ऋषि –मुनि हिम शिखरों पर तपस्या करके सात्विक व त्यागपूर्ण जीवन बिताते थे । मैं भी सोचती थी कि सर्दी में खुले आकाश के नीचे मौसम के थपेड़े खाते –खाते ज़्यादातर उपवास ही करते होंगे । पर मेरा तो यह भ्रम ही निकला ।

अर्वाचीन भारत में जो भी इन हिम शैलों का वासी होगा उसका जीवन बड़ा सुविधाजनक और चिंता रहित शांतिपूर्ण था । इसी कारण बुद्धिजीवी ,धुरंधर आचार्य लोककल्याण हेतु यहाँ रहकर बड़े –बड़े ग्रंथ लिखते,नए नए आविष्कार करते । एकाग्र चित्त होकर शिक्षा का आदान प्रदान होता । कड़कती ठंड में गर्म पानी ,गर्म कमरे व गर्म भोजन का आनन –फानन में इंतजाम । न राशन का झंझट ,न प्रदूषण की गड़बड़ न महंगाई की मार । आधुनिक गीजर ,फ्रिज माइक्रोवन,वातानुकूलित यंत्र –तंत्र जैसी सुविधाएं !वाह ,सभी तो प्रकृति प्रदत्त हैं वहाँ ।, । पौराणिक कथाओं में हमने पढ़ा है कि गुरुकुल में रहने वाले शिष्य जंगल में कंदमूल ढूँढने जाया करते थे । इन कंदमूल में आड़ू ,काजू बादाम ,खजूर,खूबानी भी शामिल हैं और ये वहाँ सरलता से पाये जाते हैं ।

मंदिर से पुल पर होकर हम गुरुद्वारे पहुंचे । चारों ओर शिव कृष्ण ,राम नानक ,हनुमान सीता के चित्र देखकर हैरत में पड़ गए । आज जबकि चारों ओर धार्मिक कट्टरता आग उगल रही है ,ऐसा भ्रातृत्व का संदेश देनेवाला ,दिल की आग बुझाने वाला स्थल भी हो सकता है !बहन लंगर लगा हुआ था । हमने भरपेट भोजन किया और सेवा भाव लिए उठ खड़े हुए ।

मणिकरण में उष्ण सोतों की भाप की वजह से लगता है मानो नीलांबर में बीच बीच में बादलों के टुकड़े श्वेत मोती की तरह टंके हैं । वैदिक युग में शैल खंडो पर निवास करने वाले हमारे पूर्वज जब अपने वाहनों पर बैठकर उड़ते थे तो धरवासियों को लगता था कि वे बादलों से घिरे आकाश से उन्हें दर्शन दे रहे हैं । मैंने तो अभी तक यह धार्मिक कथाओं में ही पढ़ा था पर अब लगने लगा कि यह कोरी कल्पना नहीं !हेलीकाप्टर का आविष्कार तो श्री मद भागवत गीता के समय ही हो चुका था जो आकाश –पृथ्वी –जल तीनों में चलता था (होवरक्राफ्ट उसी की नकल है)। तभी तो अर्जुन शिव के पास आ सके । कुवेर के पास तो स्वचालित पुष्पक विमान था । हाँ ,रूप अलग –अलग थे । किसी का वहाँ चूहे की तरह था ,किसी का गरुड की तरह । किसी का वाहन मोर की तरह था तो किसी का हंस की तरह । विज्ञान की दृष्टि से हमारा देश महान रहा है । यहाँ चारों ओर ज्ञान का अपरिमित भंडार बिखरा पड़ा है ।

इस यात्रा के दौरान प्राचीन भारत की उत्कर्ष गाथा कोरी भावुकता नहीं अपितु चिरंतन सत्य है ,इसीलिए तो बाइबिल कहती है –प्रकाश भारत से आया ।

सुधा भार्गव
जन्म 8 मार्च 1942 , अनूप शहर, उत्तर प्रदेश, भारत।
शिक्षा –बी ,ए.बी टी ,रेकी हीलरशिक्षण –बिरला हाई स्कूल कलकत्ता में २२ वर्षों तक हिन्दी भाषा का शिक्षण कार्य | साहित्य सृजन —विभिन्न विधाओं पर रचना संसार साहित्य संबन्धी संकलनों में तथा पत्रिकाओं में रचना प्रकाशन प्रकाशित पुस्तकें रोशनी की तलाश में –काव्य संग्रह बालकथा पुस्तकें—१ अंगूठा चूस २ अहंकारी राजा३ जितनी चादर उतने पैर —सम्मानित-राष्ट्रीय शिखर साहित्य सम्मान !
आकाश वाणी दिल्ली से कहानी कविताओ. का प्रसारण सम्मानित कृति–रोशनी की तलाश में सम्मान –डा .कमला रत्नम सम्मान पुरस्कार –राष्ट्र निर्माता पुरस्कार (प. बंगाल -१९९६)अभिरुचि –देश विदेश भ्रमण ,पेंटिंग .योगा,अभिनय ,वाक् प्रतियोगिता
वर्तमान लेखन का स्वरूप —
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