अमरता का अनहद नाद अमरकंटकः उमेश सिंह

रोम-रोम पुलकित हो उठा। अमरकंटक पहुंचते ही आंखों के सामने इतिहास और धर्म-अध्यात्म की किताबों के पन्ने फडफ़ड़ाने लगे। साधना की भूमि का चाक्षुश-स्पर्श हुआ और रोम-रोम से अध्यात्म का झरना फूट पड़ा। दो दिनी प्रवास में उन सभी जगहों पर गया, जिसे सुनते-पढ़ते देखने की इच्छा जगी थी। यहां मान्यताओं का अद्भुत संसार रचा-बसा हुआ है। साधना की इस शिखर भूमि में कपिल, दुर्वासा, कबीर, नानकदेव और गोरखनाथ से जुड़े स्थानों ने आध्यात्मिक- अभीप्साओं को और उदीप्त कर दिया। नर्मदा, सोन और जोहिला नदी की इस पैदाइशी भूमि में धर्म-अध्यात्म और नैसर्गिक सौंदर्य की त्रिवेणी बहने की अनुभूति हुई। भाव हो तो पाथर भी संवाद करने लगता है, अमरकंटक प्रवास में कुछ ऐसी ही अनुभूति हुई। यहां का जर्रा-जर्रा मौन संवाद कर रहा था,अपने समूचे विराट-वैभव के साथ। अमरता के अनहद-नाद की अंतध्र्वनियों की गूंज अमरकंटक में मौजूद है।

मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले की मैकाल पहाडिय़ों में स्थित मध्य भारत के विन्ध्य व सतपुड़ा पहाडिय़ों के संगम स्थल अमरकंटक में शिव-तत्व की मौजूदगी हर जगह है। टूरिस्ट गाइड नर्मदेश्वर पाठक ने यहां की महिमा का गान जैसे ही शुरू किया, हमने संत बर्फानी दादा के आश्रम पर जाने की इच्छा व्यक्त की। अयोध्या बर्फानी दादा की गुरूभूमि है और यहां पर उनकी ज्यादा उम्र को लेकर लोग कयास लगाते रहते हैं। अमरकंटक निवासी पचास वर्षीय नर्मदेश्वर ने उनकी ज्यादा उम्र होने की पुष्टि करते हुए कहा कि मेरे बाबा संस्कृत के उद्भट विद्वान थे। उन्होंने जैसा बताया था, बर्फानी दादा कमोवेश आज भी वैसे ही दिखते हंै।

नर्मदा कुंड के चतुर्दिक सफेद पत्थरों की फर्श और नर्मदा मंदिर के शिखर का रमणीक दृश्य वाकई नयनाभिराम है। नर्मदा कुंड में एक सर्प दिखाया गया, जिसके बारे में बताया गया कि सदियों से हर वक्त यहां एक सर्प रहता है जो मंदिर की सुरक्षा करता है। नर्मदा की उत्पत्ति शिव की जटाओं से मानी जाती है। यहां से नर्मदा उतरकर नीचे जहां गिरती है, उसे दूधधारा कहा जाता है। धारा बिल्कुल दूध की तरह सफेद है। नर्मदा कुंड से दूधधारा तक नदी के किनारे संतों की समाधियां क्रम से बनी हुई हैं। हजारों की संख्या में मौजूद इन समाधियों ने अमरकंटक को साधना की भूमि कहे जाने का एहसास कराया। लकड़ी के छोटे से अस्थाई पुल को पार करने पर पत्थरों को काटकर बनाई गई सीढिय़ों से उतर दूधधारा की ओर हम लोग गए। दूधधारा के दाहिने ओर एक गुफा में गजब की जीवंतता का एहसास हुआ। ऋषि दर्वासा ने यहां पर तपस्या की थी और उनकी मूर्ति में इतनी प्राण-उर्जा है कि मानों वाकई दुर्वासा ही ध्यान-मुद्रा में धूनी रमाए है। अमरकंटक की दर्वासा गुफा को देख अपने पैतृक गांव से तीस किमी. दूर आजमगढ़ जिले के तिवरियां गांव के पास तमसा और मझुई नदी के संगमपर स्थित दुर्वासा आश्रम की यादें जेंहन में कौंध उठी। दोनों में हमें अध्यात्मिक समरूपता दिखीं। सूरज बादलों में छिप गया था और अंधेरे का रंग चढ़ता जा रहा था। एक बुजुर्ग संत ने संकेत में कहा कि यहां रात को कोई नहीं ठहरता, ऊपर चले जाइए।

कलचुरी राजाओं के मंदिर स्थापत्य शैली का सौंदर्य नर्मदा कुंड के दक्षिण में दिखा। सुसज्जित परिसर में मंदिरों का समूह है, जिसकी रखवाली पुरातत्व विभाग करता है। बददिमागियों की लालच को देख मन विचलित हो उठा। यहां किसी भी मंदिर में मूर्ति नहीं है। चोरों ने भगवान पर भी हाथ लगा दिया। परिसर में पातालेश्वर मंदिर है जिसके बारे में बताया गया कि यहां पानी जमीन के अंदर से आता रहता है। माई का बाग में पेड़ों की घनी छांव है। नीरव शांति, पेड़ से पत्ते गिरे तो उसकी भी आवाज सुनाई पडऩे लगती थी। यह स्थल महत्वपूर्ण है। नर्मदेश्वर पाठक ने इसे उत्तर और दक्षिण की विभाजक रेखा बताया। यहां पर्यटकों को बैठने के लिए पत्थर की कई बेंच बनाई गई है। सोन नदी के उद्गम स्थल सोनमुदा के पास कई सिद्धसंतों की मूर्तियां इसके विराट अध्यात्मिक- वैभव को बखूबी से बयां कर रही हैं। यहां पर सोन नदी झरने के रूप में बहती है। सांख्य दर्शन की रचना भूमि अमरकंटक ही है। यहां कपिल मुनि का आश्रम है जिसने अपनी दिव्यता की अनुभूति कराई।

प्रकृति में जो भी है, वह निरंतर चलायमान है। चरैवेति-चरैवेति का संतों ने अपने जीवन में उतार लिया था। कबीर और नानकदेव ने जिस स्थल पर संवाद किया था, वह कबीर चबूतरा है। यहां कबीर झरना भी है। गोरखानाथ की स्मृतियां भी यहां भी मौजूद है। जैन धर्मावलंबी अमरकंटक में वैभवयुक्त मंदिर का निर्माण करा रहे है, जिसकी सम्मोहक सफेदी मंत्रमुग्ध कर दे रही थी। जोहिला नदी के उद्गम स्थल तक समयाभाव के कारण नहीं जा मिला। स्थानीय लोगों ने बताया कि शंकर ने यहां पर शिवलिंग स्थापित किया था।

-उमेश सिंह
पुत्र अवध बिहारी सिंह निवास-सद्भावना अश्विनीपुरम द्वितीय, देवकाली, फैजाबाद, उ.प्र.,भारत,पिन २२४००१

संपर्क-०९४१५३६८३९१

जन्म-१४ अप्रैल १९७५ फत्तेपुर, अंबेडकरनगर

शिक्षा-इलाहाबाद विश्वविद्यालय,परास्नातक हिंदी व इतिहास, अवध विवि से विधि स्नातक, संप्रति-स्वतंत्र लेखन मीडिया में, साहित्य व संस्कृति पर।)