अपनी बातः पंछी दरिया और पवन के झोंके…

जब हवाई जहाज और हेलीकौप्टर नहीं थे, पांच सितारा होटल से भी अधिक सुविधाजनक ये जलयान नहीं थे, तब भी पर्यटन और यायावरी होती थीं, हर देश और हर धर्म में । धर्म का उललेख इसलिए हुआ कि पुराने समय में यात्राओं का और धर्म-स्थलों का गहरा नाता था। अधिकांशतः धर्म के प्रचार प्रसार के लिए ही होती थीं यात्राएँ…चाहे वे क्रिश्चियन क्रूसेडर हों या बौद्ध भिक्षु। चाहे वह दान्ते का इनफर्नो हो या चौसर की कैंटरबरी टेल्स। अरेवियन नाइट हों या कालिदास का मेघदूत …तत्कालीन समय और संस्कृति के दर्पण ही तो हैं काल्पनिक जामा पहने ये स्थानीय जगहों के वर्णन। यदि उन दिनों जोखिम अधिक थे तो वे यात्री भी साधारण नहीं थे। अपनी ही आग से तपकर खरे सोने-से ये अन्वेषक थे जिन्हें नई दुनिया की तलाश थी, विचारक और प्रचारक थे जिनके लिए अपनी बात दूर देशों तक पहुँचना जिन्दगी से भी अधिक मुख्य था। चक्रवर्ती सम्राट और योद्धा थे, जो कण-कण को जीतने का सपना देखते थे।

आज भी तो निकल ही पड़ते हैं हम इन दुर्गम और जटिल यात्राओं पर…ज्ञान तलाशते, शांति तलाशते, जीवन का अर्थ, नए किनारे, नया देश खोजते। यह तलाश और यह भटकन तो सृष्टि की शुरुवात से है चाहे वह वास्कोडिगामा हो, कोलम्बस हो या फिर कल्पना लोक में विचरता एक कवि या लेखक। बिल्कुल यान पर उड़ते, जान की बाजी लगाते अंतरिक्ष यात्री की तरह ही उस पल में तो बेहद रोमांचक होती हैं ये दैनिक और साधारण से साधारण यात्राएँ भी।

कोलंबस की तरह जीना आसान नहीं है तो हैरी पौटर बन पाना भी तो आसान नहीं।

चांद की धरती पर वह पहला कदम हममें से किसको याद नहीं होगा पर सफर अभी खतम कहाँ? आगे मंगल और शनि जैसे कई-कई और लक्ष हैं अभी तो ढूंढने को, देखने को। बहाना चाहिए बस पंछी दरिया और पवन के झोंके से उन्मुक्त इस मन को जो पिंजरे में और पिंजरे को संग लेकर भी उड़ना चाहता है, उड़ना जानता है। निर्बाध गति से बहने के, दूर तक फैल जाने के अवसर ढूँढता है यह तो। बंदिशें , मुश्किलें , सरहदें तोड़ते इस मानव ने सुदूर देशों में विषम से विषम परिस्थिति में सिर्फ घोंसले ही नहीं बनाए, इतिहास तक रच डाला है। लहराती पताकाएँ गवाह हैं इसकी। नए की खोज, नए से सामंजस्य और सुविधानुसार अपनाना…यही तो उपलब्धि है इसकी, विकास यात्रा है गुफाओं से निकलकर आलीशान घरों में सिंहासन पर बैठे माटी के इस पुतले की। सोचिए अगर जिज्ञासा और कल्पना के पंख नहीं होते तो क्या पहुँच पाते हम उस मुकाम पर जहाँ आज खड़े हैं। पर, मंजिलें तो बहाना मात्र हैं जिज्ञासु मन की। एक ख्वाइश पूरी होती नहीं कि दूसरी जन्म ले लेती है और यही इसकी शायद सबसे बड़ी ताकत भी है और बेचारगी भी। असलियत तो यह है कि यह ख्वाइशों की जंजीरें कभी भारी नहीं लगीं हमें। सच्चाई यही है कि अभी ऐसे समंदर ही नहीं बने जो इस अदम्य आस और प्यास को बुझा पाएं।

दुर्गम, अपरिचित और अबूझ से खेलना, गुत्थियाँ सुलझाना , हर यात्रा का भी अभिन्न हिस्सा है और मानव के स्वभाव का भी। यह रास्ते की थकान और उड़ान, अपरिचित और अबूझ की पहली पहचान ही तो है जो खींचती है, थकने नहीं देती। लगातार प्रेरित करती रहती है, बारबार उठ खड़े होने को, फिर-फिरके चल पड़ने को। शायद एक नशा या लत है यह घुमक्कड़ी भी। यात्रा के इस रोमांच को जिसने भी एकबार चख लिया, दूर रह पाना उसके लिए संभव ही नहीं।

धनाढ्य, पाश्चात्य देशों में मान्यता है कि स्फूर्ति और उर्जा बनाए रखने के लिए वर्ष में कम-से-कम दो बार पर्यटन पर संभव हो तो हरेक को अवश्य जाना चाहिए। इससे न सिर्फ जीवन की एक रसता टूटती है, इन्सान तन और मन दोनों से ही नया हो जाता है और उँघने की बजाय अपने काम को दुगनी उर्जा से कर पाता है।

मां बाप के संग बचपन में घूमे उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों और विद्यार्थी जीवन में गर्मी की छुट्टियों में पहाड़ों की सैर ( मुख्यतः नैनीताल) को भूल जाऊं, ब्रिटेन के समुद्री किनारे, पहाणों और हरे भरे बाग-बगीचे और सरसों के खेत जिनके बीच रोज ही घूमे हैं, उन्हें ही क्यों, हर प्रिय नदी झरने के किनारे, रोमांचक जंगल और समुद्र की लहरें, सभी को भूल जाऊँ तो पहली यादगार यायावरी हुई स्कैंडिनेवियन देशों की जिसमें कई अनजान देश ( स्वीडेन, डेनमार्क, नौर्वे और फिनलैंड घूमे थे हम, उनके बीच में रहे थे। इसी यात्रा के दौरान जर्मनी के ब्लैक फौरेस्ट से भी गुजरना हुआ था जो अपने आप में एक यादगार और रोमांचकअनुभव था। इंगलैंड में तो रह ही रहे हैं,यूरोप और यूरोपियन संस्कृति का भी थोड़ा बहुत अनुभव हुआ , उसे थोड़ा बहुत जाना और समझा। जहाँ मेरे लिए कई चीजें नई थीं, यूरोपियन भी कभी हमारे खूबसूरत भारतीय परिधानों की तरफ आकर्षित होते तो कभी नाक की लौंग पर। जब संगम फिल्म देखी थी तो विश्वास नहीं हुआ था कि वाकई में इन्हें हम भारतीय लोग इतने अच्छे लगते हैं, बस इनकी नफरत की कहानियाँ ही सुनी थीं पर यूरोप घूमते विशेषकर स्वीडेन डेनमार्क और पैरिस में कई बार सुनने को मिला कि साडी कितनी सुंदर है, बाल कितने सुंदर है बिल्कुल मरमेड की तरह । और यह नाक की कील धूप में चमकती है तो बहुत ही सुंदर लगती है। क्या ऊपर से चिपकाई है , हम भी ट्राइ कर सकते हैं क्या…वगैरह वगैरह। तब सत्तर के शुरुवाती और मध्य के वर्षों में शायद इतने भारतीय नहीं दिखते थे इन्हें और दिखते भी थे तो कम ही, जिन्हें अपनी भारतीय संस्कृति की खूबसूरती पर पूरा विश्वास था और पूरे आत्म विश्वास के साथ इन्हें समझा सकते थे कि भारत सिर्फ भूखे-नंगों का ही देश नहीं।

कुछ परिवारों से मिलना-जुलना भी हुआ । अक्सर रात में नाइट क्लब और स्थानीय सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने का मन बन जाता था। एक ऐसा भी क्लब था जहाँ पांच साल से छोटे बच्चे के साथ जाने की अनुमति नहीं थी और तब ऐसे में हमें स्थानीय और विश्वशनीय परिवार में बेटी की निजी बेबी-सिटिंग करवानी पड़ी थी, जो कि उस मंहगे नाइट क्लब की टिटिट जितनी ही मंहगी थी पर सार्वजनिक क्रश में बेटी को छोड़ना पतिदेव को मंजूर नहीं था और बिना बेटी की सुरक्षा के प्रति पूर्णतः संतुष्ट हुए शो देख ही नहीं सकते थे। इन देशों के लोग भी उतने ही सहृदयता से बच्चों की देखभाल करते है जितने की हम आप। लौटे तो खिलौनों से लदी-फंदी बेटी ने हंसकर ही स्वागत किया था हमारा। शुरु में थोड़ा बहुत सहमी थी पर बाद में उसके हमउम्र बच्चों के साथ खुश-खुश खेलती रही थी। बच्चों की छटी इंद्रिय हम बड़ों से अधिक तीव्र होती है।

छोटे से कैंप और दो साल की बेटी को लेकर अकेले ही तो चल पड़े थे हम दोनों इस रोमांचक पर्यटन पर । घूमते-घूमते जहाँ भी मन रमता, वहीं रुक जाते थे। देखते-देखते तम्बू गड़ते ही, मिनटों में रैनबसेरा तैयार हो जाता था हमारा। शयनकक्ष और चौके के साथ दो भाग थे इसमें। जबतक सोने के बिस्तर आदि व्यवस्थित होते उसी तम्बू के आगे के हिस्से में जो मिनटों में चौके और बैठकी की शकल ले लेता था , झटपट कुछ हलका-फुलका गरम भारतीय मसालेदार खाना तैयार हो जाता जो दोपहर के बाहर के यूरोपियन खाने से कहीं अधिक स्वादिष्ट जान पड़ता हमारी पक्की भारतीय स्वाद ग्रंथियों को। पंद्रह उन बेफिक्र दिनों की करीब करीब हर शाम की ही यही ड्रिल थी, सिवाय चारो देशों की राजधानियों के जहाँ दो-दो रात रुके थे हम और जहाँ सौभाग्यवश हमें भारतीय रेस्तोरैंत भी मिल गए थे वहाँ पर वरना शाकाहारियों का गुजारा तो पनीर टमाटर और खीरे की सैंडविच और फल आदि खाकर ही होता था उन दिनों। ये यूरोप में बेहद आरामदेह और हर तरह की सुख-सुविधाओं से भरपूर पर्यटकों के लिए बने तम्बुओं के शहर हैं, जहाँ बजार भी हैं और क्लब भी। वाशेटेरिया नहाने और कपड़े धोने व सुखाने की हर सुविधा के साथ । बच्चों के लिए पार्क भी । इनकी तर्ज पर भारत में भी बन रहे हैं शिविर शहर पर्यटक स्थलों पर। परन्तु भारत में ये शिविर बेहद मंहगे हैं और सिर्फ अमीर ही इनका आनंद ले सकते हैं। जबकि यूरोप में ये शिविर उत्साही पर्यटकों के लिए हैं और हर रेंज के हैं ताकि अमीर-गरीब सभी इनका आनंद ले सकें। वह पहली यूरोप यात्रा की यादें आज भी रोमांचित करती हैं । तबसे अबतक लगातार ही घूमने जाते रहे हैं पर वे पहली दो यात्राएं जो पांचतारा होटल नहीं , तम्बुओं में एक पर्यटक सी घूमकर थोड़े रफ अन्दाज में की थीं । यह वे दिन थे जब यूरोप के कुछ देश जैसे बेलजियम फ्रांस आदि में लोग अंग्रेजी बोलने से कतराते थे और फ्रेंच न आने की वजह से हमें कई बार अभिनय करके इच्छित वस्तु और मार्ग के लिए पूछना पड़ता था। हद तो तब हुई थी जब ब्रसेल्स में पिस्सी बौय देखने जाना था और रास्ता भटके, थके पतिदेव उसी मुद्रा को करके वहाँ पहुँचने का रास्ता पूछने लगे थे। मैंने तो असमंजस और शरम से आँखें बन्द कर ली थीं, पर वह वयोवृद्ध सज्जन तुरंत ही समझ गया था और बहुत प्यार से प्रसिद्ध लैंडमार्क के रास्ते का मानचित्र खींचकर इन्हें दे दिया था, जिसके सहारे हम आराम से पहुँच भी गए थे। आज भी तो चित्र-सी ही स्पष्ट हैं वे मुस्कुराती-खिलखिलाती यादें ।

इन पाश्चात्य देशों से अभी भी पर्यटन और इसके विकास को लेकर बहुत कुछ सीखा व जाना जा सकता है। इनका सुनियोजित संचालन, साइन पोस्टिंग आदि कुछ ऐसी चीजें हैं जिनका हम भी पर्यटकों की सुविधा के लिए अनुकरण कर सकते हैं।

भारत में पर्यटन के नाम पर सिर्फ तीर्थ यात्राएं ही थीं अभीतक, जो कि हमारे ज्ञानी पूर्वजों ने बहुत सोच-समझकर चारो दिशाओं और दुर्गम प्राकृतिक क्षेत्रों में नियोजित की थीं ताकि धर्म के बहाने ही पूरा भारत भ्रमण किया जा सके । परन्तु आज विश्वग्राम के चलते स्थान-स्थान पर मनोरंजक पर्यटक स्थल बन चुके हैं , जहाँ आप धार्मिक ही नहीं, सांस्कृतिक और मनोरंजक यात्राएं भी कर सकते हैं। भारत के विभिन्न प्रांतों के भोजन और वेश भूषा आदि का आनंद ले सकते हैं। शहरी जिनके लिए ग्रामीण जन-जीवन एक अजूबा-सा है , चाहें तो उसका भी भरपूर आनंद ले सकते हैं। हाल ही की कच्छ की यात्रा और रान महोत्सव के शिविर में रहना एक ऐसा ही अनुभव था। यूँ तो शादी के बाद तीन दिन पहलगाम में भी तम्बू में रहे थे जो कि नदी के किनारे बहुत ही रम्य स्थान में थे और हर आधुनिक सुविधा से सज्ज थे। श्रीनगर में शिकारों में रहना भी अपने आप में एक सुखद अनुभव था। खिलन मर्ग और गुलमर्ग की कौटेज …वाकई अभी भी बहुत कुछ है कश्मीर में जो स्विटजरलैंड सा ही सुंदर है भारत में। कश्मीरी कपड़ों में सिर्फ फोटो ही नहीं खिंचवाई थी एक कश्मीरी परिवार जिससे पहलगांव क्लब में मुलाकात हुई थी उनके यहाँ भी उनके आमंत्रण पर एक ब्रिज की शाम और रात गुजारी थी हमने। मौरिशश के पांचसितारा होटल में भी एक दिन भारतीय रहन-सहन का आयोजन किया गया था। यूरोपियन के लिए मौरिशियन-भारतीय परिवार में एक दिन खाना-पीना और वक्त गुजारना निश्चय ही एक अच्छा अनुभव रहा होगा। हमने वहाँ अपना दिन वहीं समुद्र के किनारे होटल में ही गुजारा था। आधुनिक सुख-सुविधाओं के सभी साधन उपलब्ध हैं-बूढ़े-बच्चे, जवान सभी के लिए इन पर्यटक स्थलों पर और आप जब चाहो तभी किसी देश और प्रांत के भोजन का आनंद उठा सकते हो । कुछ भी दुनिया के किसी भी देश और कोने का खरीद सकते हो। और हो भी क्यों ना, पहले जहाँ सिर्फ साधु सन्यासी और ज्ञानी-ध्यानी जान की जोखिम उठाकर यात्राएँ करते थे, अब सभी करते हैं, कर सकते हैं अपनी रुचि और सामर्थ अनुसार। इंद्रलोक सी सुविधाओं से भरपूर नित नए पर्यटन के प्रचार और आमंत्रणों की वजह से माया लोक में खोए बच्चे से डूब जाते हैं हम इन यात्राओं में। क्या खोज रहे हैं और कहाँ जाना है जाने बगैर ही निकल पड़ते हैं अपनी बैटरी रिचार्ज करने। ऐसी ही कुछ यात्राओं की सुखद यादों को संजोया है हमने इस अंक में । उम्मीद है अंक आपको पसंद आएगा। पर एकबात तो निश्चित है कि खुली सड़क पर दौड़ते हुए चीते का सामने आ जाना जितना रोमांचित करता है, भय देता है, सफारी पार्क में वह अनुभूति नहीं। जैसाकि हमारे साथ रानीखेत से कसौली जाते वक्त हुआ था। पर मजे की बात यह थी कि हम चीते से डर रहे थे और चीता हमसे। कार की हेडलाइट पड़़ते ही यह जा वह जा लोमड़ी-सा ही तो भाग गया था वह।…
पुनश्चः लेखनी का अगला सितंबर अक्तूबर अंक लघुकथा विशेषांक है। भेजने की अंतिम तिथि 20 अगस्त।


शैल अग्रवाल