चांद परियाँ और तितलीः दो बाल कविताएँ- प्रभुदयाल श्रीवास्तव

ले गए पेड़ लुटेरे

मैं हूँ नन्हीं परी, बगल में,
पंख छुपे हैं मेरे।
आसमान से उड़कर आई,
बिलकुल सुबह सवेरे।
मंजन ब्रश मैं भूल आई हूँ,
दाँत घिसूँ मैं कैसे।
कैसे यह सामान खरीदूं,
नहीं जेब में पैसे।
नहीं अभी तक मुँह धो पाई,
इससे आलस घेरे।
कच्चे दाँत दूधवाले हैं,
कैसे मैं चमकाऊँ
सोच रही हूँ नीम वृक्ष से,
दातुन लेकर आऊँ।
नहीं दिख रहे नीम वृक्ष पर,
लगा लिए कई फेरे।
अगर नीम के पेड़ कहीं,
दो चार मुझे मिल जाते।
आसमान से रोज उतरकर,
दातुन लेने आते।
पता नहीं कब लूट यहाँ से,
ले गए पेड़ लुटेरे।

क्यों न रस्ता मुझे सुझातीं

सुबह -सुबह से चें -चें चूँ -चूँ,
खपरेलों पर शोर मचाती।
मुर्गों की तो याद नहीं है,
गौरैया ही मुझे जगाती।

चहंग -चंहंग छप्पर पर करती,
शोर मचाती थी आँगन में।
उसकी चपल चंचला चितवन,
अब तक बसी हुई जेहन में।
उठजा लल्ला ,उठजा पुतरा,
कह कह कर वह मुझे जगाती|
,

आँगन के दरवाजे से ही,
भीतर आती कूद -कूद कर।
ढूंढ -ढूंढ कर चुनके दाने,
मुंह में भरती झपट -झपट कर।
कभी मटकती कभी लपकती,
कत्थक जैसा नाच दिखाती।

आँखों में तुम बसी अभी तक,
पता नहीं कब वापस आओ।
मोबाइल पर बात करो या,
लेंड लाइन पर फोन लगाओ।
किसी कबूतर के हाथों से,
चिट्ठी भी तो नहीं भिजातीं ।

तुम्हीं बताओ अब गौरैया,
कैसे तुम वापस आओगी।
छत ,मुंडेर ,खपरैलों पर तुम,
फिर मीठे गाने गाओगी।
चुपके से कानों में आकर,
क्यों न रस्ता मुझे सुझातीं |

प्रभुदयाल श्रीवास्तव
12 शिवम् सुंदरम नगर छिंदवाड़ा म प्र