कहानी समकालीनः एकबार फिर-बिभा कुमारी

“आप अंदर जा सकती हैं”
चपरासी की आवाज़ सुनकर शालिनी की तंद्रा टूटी। नेमप्लेट पर “प्राचार्या शारदा देवी” लिखा देख कर वह अतीत में खो गई थी। वह धीरे से उठी और चार कदम की दूरी को चार मिनट में तय किया। पाँव उठ नहीं रहे थे, अंदर जाकर शारदा से आँखें मिलाने की हिम्मत नहीं हो रही थी, पर बिना मिले भी रहा नहीं जा रहा था अतः उस ने साहस जुटाकर धीरे से दरवाजा खोला, सामने कुर्सी पर शारदा मुस्कुराती दिखी, नजरें मिलते ही उसकी मुस्कान चौड़ी हो गई कुर्सी से उठकर उसने अपना दायाँ हाथ आगे बढ़ाया। शालिनी मुस्कुरा नहीं पाई, फिर भी हाथ आगे बढ़ाकर शारदा से हाथ मिलाया।
‘’बैठो’’ शारदा ने शालिनी से कहा और स्वयं भी बैठ गई।
शालिनी सामने की कुर्सी पर बैठ गई। शारदा ने चपरासी को बुलाने के लिए बेल दबाया। चपरासी के पहुँचते ही आदेश दिया “राजू पहले पानी लाओ, फिर कैंटीन से दो समोसे और दो कप अदरक वाली चाय मँगवाओ।” “औपचारिकता की कोई आवश्यकता नहीं है।” शालिनी ने धीरे से कहा।
“शालिनी हम पूरे चौंतीस साल बाद मिल रहे हैं। कुछ तो होना ही चाहिए।”
“शारदा, तुम्हें आज तक मेरी पसंद याद है, यह जानकर बहुत खुशी हुई लेकिन अब न मैं समोसे खाती हूँ और न ही अदरक वाली चाय पीती हूँ।“
“क्यों डॉक्टर ने मना किया है?”
“नहीं, लेकिन ज़िद मत कर प्लीज।“
“ठीक है, फिर दो ग्लास नींबू पानी ले आओ”
चपरासी के जाने के बाद शालिनी ने कहा-
“शारदा, समोसे और अदरक वाली चाय वास्तव में मेरी पसंद नहीं, बल्कि उसकी पसंद थी जिसे मैं पसंद करती थी, और इसलिए उसकी पसंद को मैं ने भी अपनी पसंद बना ली थी। आज मैं उससे नफरत करती हूँ और उन सभी चीज़ों से जो मुझे उसकी याद दिलाए।”
“रिलैक्स, शालू! जीवन में सबकुछ मनचाहा नहीं होता बहुत कुछ अनचाहा हो जाता है, जिन्हें हमें स्वीकार करना पड़ता है। वैसे, जब तक तू मुझे पूरी बात नहीं बताएगी, न मैं कुछ समझ पाऊँगी न समझा पाऊँगी लेकिन इतना पक्का है कि तुम बहुत दुखी हो। मैं तुझमें उस पुरानी चंचल शोख शालू को देखना चाहती हूँ।”
“पुरानी शालू मूर्ख थी, जिसने तेरे जैसे हीरे की कद्र नहीं की। काश! मैंने तेरी बात मानी होती।”
“शालू, तू हीं नहीं प्यार में हर इंसान दिमाग़ की बजाय दिल से सोचता है।”
इतने में किसी ने दरवाज़े पर दस्तक दी
– “आ जाओ” शारदा ने कहा।
कैंटीन वाला लड़का नींबू पानी के दो ग्लास रखकर चला गया।
शारदा ने एक ग्लास उठाकर शालिनी की तरफ़ बढ़ाया, शालिनी ने ग्लास लेकर पीना शुरू कर दिया।
शारदा ने दूसरा ग्लास उठाकर एक घूँट लिया और मुस्करा कर बोली- “शालू, तू आज भी उतनी हीं खूबसूरत लगती है। आज भी तुझे देख कर वही पहले वाली फीलिंग आ रही है कि मैं तेरे जैसी सुंदर क्यों नहीं।”
शालिनी ने गंभीरता से कहा-“और मैं आज वो फील कर रही हूँ जो पहले नहीं किया कि मैं तेरी तरह समझदार क्यों नहीं?”
“शालू, शाम को घर आओ, फिर ढेर सारी बातें करेंगे” कहकर शारदा ने अपना विजिटिंग कार्ड शालिनी की तरफ बढ़ाया। शालिनी को खड़ी देख शारदा ने उसके कंधे पर हाथ रख कर कहा-“सॉरी शालू, अभी मैं तुझे और समय नहीं दे सकती। दस बज गए हैं और मुझे अपने स्कूल के लिए कुछ टीचर्स का इंटरव्यू लेना है।”
“दरअसल, मैं भी विज्ञापन देख कर यहाँ इंटरव्यू देने आई थी। लेकिन जब यहाँ लगे हुए फ़ोटोग्राफ्स में तुम्हारी तस्वीर देखी और नेमप्लेट पर तुमहारा नाम तो अपने नाम की चिट चपरासी को देकर तुमसे मिलने की कोशिश की। मुझे नहीं पता था कि ये तुम्हारा स्कूल है और तुम खुद प्रिंसिपल हो। मैं तो इतनी अचंभित हो गई कि तुम्हें मुबारकबाद देना भी भूल गई। मुबारक हो शारदा! इतना बड़ा स्कूल स्थापित कर लिया-नर्सरी से बारहवीं तक और सी॰बी॰एस॰ई॰ से मान्यता भी दिलवा लिया।
तुम जीत गई शारदा। हो सके तो मेरी उन गलतियों को माफ़ कर देना जो मैंने तुम्हें तुच्छ और खुद को महान समझ कर कभी की है। शारदा! तुमने अपने नाम को सार्थक कर दिया। आज मुझे यह सोच कर स्वयं से घृणा हो रही है कि कभी मैंने तुम्हारे इस नाम का कितना मज़ाक उड़ाया है।“
“रिलैक्स शालू!” कहकर शारदा ने शालिनी के गाल थपथपा दिए।
“ऑल दि बेस्ट फॉर इंटरव्यू!” कहती हुई शारदा आगे बढ़ गई। इंटरव्यू के वक़्त शारदा का सामना करना मुश्किल होगा। वह कुछ जवाब नहीं दे पाएगी, शारदा उसकी मनःस्थिति को समझ भी लेगी लेकिन बाकी की दो मैडम जो शारदा के साथ भीतर गयी हैं वो तो यही समझेंगी कि इसे कुछ भी नहीं आता। वह इन्हीं उधेड़ बुन में लगी थी कि चपरासी ने आकर कहा-“मैम! सारे कैंडीडेट्स इंटरव्यू दे चुके हैं, अब तो आप अंदर जाइए।” भीतर से बैल की आवाज़ आई, जिसका तात्पर्य था-‘नेक्स्ट’
उसने दरवाज़े पर जाकर औपचारिकतावश कहा
-“मे आई कम इन?”
-“यू आर वेलकम” उन दोनों में से एक ने कहा।
शालिनी ने सोचा ये दोनों दो अलग-अलग स्कूलों की प्रिंसिपल होंगी, जिन्हें शारदा ने इंटरव्यू लेने के लिए बुलाया है। दोनों में से एक शालिनी का सी॰वी॰ गौर से पढ़ रही थीं; तभी उसने कहा- “शारदा मैम! यह तो आपकी क्लासमेट रही होंगी। कॉलेज और सत्र आपका ही है।
“सुप्रिया मैम, ये सिर्फ मेरी क्लासमेट ही नहीं, मेरी रूममेट रह चुकी हैं। इनसे मैं प्रश्न नहीं करूंगी क्योंकि मैं इन्हें स्वयं से ज़्यादा योग्य मानती हूँ। ये मेरी गुरू हैं। आज यदि मैं अंग्रेज़ी बोल सकती हूँ तो इनके कारण। इनसे मिलने से पहले मैं अंग्रेज़ी जानती थी किन्तु बोल नहीं सकती थी, इनकी प्रशंसा में क्या कहूँ- “ये हिन्दी-अंग्रेज़ी की विदुषी होने के साथ-साथ संगीत व नृत्य में भी निपुण हैं, चित्रकार हैं।”
इतना कहकर शारदा बाहर निकल गई। “सौम्या मैम! आप ही इनसे प्रश्न करें।“ कहकर सुप्रिया दुबारा शालिनी का सी॰वी॰ पढ़ने लगी।
“आप हमें ये बताएं कि आपका टीचिंग एक्सपीरिएन्स कितने सालों का है?”
“जी पंद्रह सालों का“
“वैरी गुड!”
“कृपया मुझे बताइये कि इन पंद्रह सालों में कौन-कौन सी कक्षाओं को और क्या-क्या पढ़ाया?”
-“शुरू के तीन साल एक पब्लिक स्कूल में क्लास वन टू टेन को स्पोकेन इंगलिश करवा रही थी। फ़िर दो साल एक केन्द्रीय विद्यालय में कोंट्रैक्ट बेसिस पर पी॰आर॰टी॰ रही और पिछले दस साल दूसरे केन्द्रीय विद्यालय में पी॰जी॰टी॰ (हिंदी) के रूप में कार्य किया।“
-“जब आपकी अंग्रेज़ी इतनी अच्छी थी तो आपने आगे हिन्दी क्यों लिया?”
-“ बारहवीं में इतने अंक नहीं ला पायी, पर जो हुआ अच्छा हुआ। मैम, कोई भी भाषा बोलना और उसमें पारंगत होना दो अलग बातें हैं। मैं अच्छी अंग्रेज़ी बोल सकती हूँ, लेकिन विनम्रता से स्वीकार करती हूँ कि आज मुझे अंग्रेज़ी की तुलना में हिन्दी अधिक प्रिय है और अधिक आती भी है। हमारे देश की यह त्रासदी रही है कि यहाँ अंग्रेज़ी को अधिक महत्व दिया जाता रहा है। परिणाम-स्वरूप अंग्रेज़ी-भाषी हिन्दी भाषियों को गँवार समझते हैं। पहले मैं भी उसी अंग्रेज़ी-भाषी समूह से सम्बद्ध थी। लेकिन, मैंने बाद में अनुभव किया कि हिन्दी-भाषी लोगों में भी बुद्धि व प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। जिस समय मैंने हिन्दी ऑनर्स लिया, या यूं कहूँ कि लेना पड़ा मुझे अपने ऊपर शर्म आती थी चूँकि मैं बारहवीं में इतने अंक नहीं जुटा पाई थी कि अंग्रेज़ी ऑनर्स मिल सके। बचपन में मैंने हिन्दी की उपेक्षा की लेकिन बी॰ए॰ में आकर जब सभी विषयों ने मुझसे पल्ला झाड़ लिया, तब हिन्दी ने ही मुझे शरण दी। तबसे मैं हिन्दी के साथ पूरी वफ़ादारी निभा रही हूँ।“
-“शालिनी जी, आपकी नम्रता, उदारता, और ईमानदारी से मैं बहुत प्रभावित हूँ। आपसे मिलकर हार्दिक प्रसन्नता हुई।“ कहकर सौम्या ने सिर हिलाकर संकेत किया कि अब आप जा सकती हैं।
शालिनी ने नम्रता से “धन्यवाद” कहा। मन ही मन कहा कि आज जिस शालिनी को आप देख रही हैं उसे शारदा ने गढ़ा है; और बाहर निकल गई। बाहर रखी कुर्सी पर बैठते ही अतीत में खो गई।
अच्छे कॉनवेंट से बारहवीं तक पढ़ने के कारण वह निहायत घमंडी हो गई थी, अपने आगे किसी को कुछ नहीं समझती थी। हिन्दी माध्यम से पढे लोगों को हेय दृष्टि से देखती थी।
जब बी॰ए॰ में उन्हीं हिन्दी माध्यम वालों की कतार में आ गई, तब थोड़ा घमंड टूटा। लेकिन अभी भी वह हिन्दी के बाकी छात्रों से स्वयं को श्रेष्ठ समझती थी। फ़र्स्ट ईयर में लैंगवेज का एक कंपलसरी पेपर होता था, जिसमें अंग्रेज़ी, हिन्दी, फ़्रेंच, जर्मन, आदि विकल्प थे। उसने अंग्रेज़ी रखी थी, उसका ख्याल था कि उस पेपर में वह सबकी छुट्टी कर देगी।
लैंग्वेज की फ़र्स्ट ट्यूटोरियल क्लास में मैम ने एक पाराग्राफ़ लिखकर दिखाने को कहा था, टॉपिक उन्होंने स्टूडेंट्स की च्वॉइस पर छोड़ा था। सारी शीट्स चेक करने के बाद उन्होंने एक शीट हाथ में लेकर कहा था-“दिस इज़ दि बेस्ट।”
वह भीतर ही भीतर खुशी से झूमने लगी थी कि निश्चित ही ये शीट उसकी होगी, तभी मैम ने कहा
-“शारदा देवी”
-“प्लीज़ कम टू मी बेटा, हरी अप!”
जब शारदा उनके निकट गई, उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा-“गॉड ब्लेस यू! रियली इट्स सरप्राइज़िंग! वैरी गुड! वेल डन माई चाईल्ड! यू हैव इम्प्रैस्ड मी!”
शालिनी को बहुत ईर्ष्या हुई। अगले ही पल शर्मिंदगी महसूस होने लगी कि उसने सदैव उसको कमतर आँका है। आज सुबह भी कॉलेज के लिए निकलने से पहले उसने उसके नाम का, उसके फुल स्लीव्स ढीले-ढाले कुर्ते का और तेल से सनी दो चोटियों का कितना मज़ाक उड़ाया था। लेकिन वो जरा भी नाराज़ नहीं हुई थी। इतना ही कहा था कि “क्या करूँ? आज तक किसी ने सलीका नहीं सिखाया। अब तू मिल गई है तो पक्का सुधर जाऊँगी।”
क्लासेज के बाद, शाम के वक्त दोनों सहेलियाँ कमरे में बैठी थीं। शालिनी ने कहा- “यार मुबारक हो। तूने तो बाजी मार ली, तेरी इंग्लिश इतनी अच्छी होगी, मैंने सपने में भी नहीं सोचा था। तू सच्ची छुपी रुस्तम निकली।”
शारदा ने कहा- “कभी-कभार तुक्के से निशाना लग जाता है।”
“नहीं शारदा, ये कोई ऑब्जेक्टिव आन्सर नहीं कि तुक्के से सही हो गया। यदि मैम ने तुम्हारी प्रशंसा की है तो जरूर उन्हें तुझमें कुछ बात लगी होगी। पर मुझे आश्चर्य हो रहा है कि इतने पिछड़े गाँव में रहकर, साधारण से स्कूल में पढ़कर तू ने इतनी अंग्रेज़ी सीखी कहाँ से?”
“दरअसल मेरे भैया ने शहर की लायब्रेरी की मेम्बरशिप ली हुई है, वहाँ से वे अच्छी किताबें लाकर खुद भी पढ़ते रहे हैं और मुझे भी पढ़ने को देते रहे हैं।”
-“यानि सेल्फस्टडी से तुमने इतना कुछ सीखा है। शारदा सेल्फस्टडी से इतना जान लेना असाधारण बात होती है। आज सुबह तक मैं तुम्हें बेकार और पिछड़ी समझती थी, लेकिन अब लग रहा है कि तुम असाधारण प्रतिभा की धनी हो।”
-“बहुत हो गया बस कर।” शारदा ने कहा।
-“कल तू शैम्पू कर लेना, बालों में तेल मत डालना। तुझे ब्यूटी-पार्लर ले चलूँगी, तू हेयर कट लेगी, और आइब्रो बनबाएगी, फिर देखना तू क्या लगेगी?” शालिनी ने शरारत से कहा।
-“शालू! हम गाँव की लड़कियाँ भले ही पढ़-लिख लें, लेकिन हमारे लिए रूढ़ियों को तोड़ना, लीक से हट कर चलना मुश्किल होता है। कभी समाज का डर तो कभी बुजुर्गों की फटकार का।”
-“लेकिन शारदा तेरे माता- पिता ने तो पढ़ने के लिए तुझे हॉस्टल भेज दिया है, इससे साफ पता चलता है कि वे खुले विचारों के हैं।“
-“पता नहीं शालू! मैं और मेरे माता-पिता, हमलोग किसी भी केटेगरी में फिट नहीं बैठते हैं।”
-“मतलब?”
-“मेरा बाल-विवाह करवाकर उन्होंने रूढ़ि का समर्थन किया, फिर मुझे स्कूल भेजकर अपनी गलती की क्षतिपूर्ति की, और अब मुझे उच्च शिक्षा के लिए भेजकर तथा गौने को पिछले पाँच-छह साल से टालकर खुले विचारों का समर्थन कर रहे हैं। दरअसल गाँव में बचपन में ब्याही कुछ लड़कियों को उनके पतियों ने अस्वीकार कर दिया, क्योंकि लड़के पढ़-लिख गए थे, और उनकी पत्नियाँ अनपढ़ रह गयी थीं। कुछ लड़कियाँ कम उम्र में माँ बनने के कारण मृत्यु का ग्रास बन गईं, तो कुछ सदा के लिए बीमार और कमजोर बन कर रह गईं। ये सब देखकर माँ-पिताजी की आँखें कुछ खुलीं, जब मैंने पढना शुरू किया तो शिक्षकों ने पिता के पास मेरी प्रशंसा के ऐसे पुल बाँधे कि उन्हें मुझे आगे पढ़ाने का हौसला हुआ। धीरे-धीरे पिताजी को यह भी समझ में आया कि यदि मैं पढ़-लिखकर कुछ बन जाती हूँ, तो मेरा पति पहली बात मुझे छोड़ेगा नहीं, और यदि छोड़ दे तो मैं बहुत निरीह नहीं रह जाऊँगी। मेरे बेहतर भविष्य के बारे में जागरूक होकर ही उन्होंने मेरा गौना पिछले पाँच-छह सालों से टाला है।”
-“ये सब क्या कह रही हो? आर यू मैरिड? आई कांट विलीब इट?”
शालिनी ने रुक-रुक कर कहा। वह शारदा को आश्चर्य से देख रही थी।
-“हाँ, मैं शादीशुदा हूँ, माँ ने सिखलाया कि बेटी सिर सूखा रखना अपशकुन होता है, हमेशा सिर में तेल और सिंदूर होना चाहिए।”
-“ये क्या बोल रही है तू?”
-“वही जो तू सुन रही है।”
-“अभी भी लगाया है सिंदूर?”
-“हाँ”
-“दिखा तो”
शारदा ने बाल खोलकर दिखलाया। बीच माँग में सिंदूर लगाकर उसने बाल को पलटकर साइड माँग निकालकर सिंदूर को ढक दिया था।
-“पर तू कब लगाती है सिंदूर? मैं ने कभी तुझे लगाते नहीं देखा?”
-“सुबह नहाकर आने के बाद। उसी वक्त तू भी तैयार हो रही होती है, तू खुद में इतनी डूबी होती है कि मेरी तरफ तेरा ध्यान ही नहीं जाता है।”
-“तू स्वीकार करती है इस शादी को?”
-“कभी सोचा नहीं, इस बारे में”
-“फिर ये सिंदूर?”
-“माँ की आज्ञा का पालन”
-“मान ले तेरा दूल्हा तुझे लिवाने आ जाए?”
-“चली जाऊँगी, बशर्ते वो मुझे पसंद आ जाए।”
-“और, अगर पसंद नहीं आया तो?”
-“तो नहीं जाऊँगी, शादी तोड़ दूँगी।”
-“यदि तू उसे पसंद नहीं आयी तो?”
-“फिर वो बैरंग लौट जाएगा।”
दोनों जोर-जोर से हँसने लगीं।
-“पर बचपन में क्यों कर दी गयी थी तेरी शादी” शालिनी ने कुरेदते हुये पूछा।
-“गाँवों में ऐसा ही होता है।”
-“तुम्हारी छोटी बहन दुर्गा भी शादी-शुदा है?”
-“नहीं वो बच गई है।”
-“और तेरे भैया?”
-“वो भी बच गए हैं”
-“तो तू कैसे फँस गई?”
“दरअसल ये इकलौते हैं, और इनके पिता भी अकेले हैं। इनकी दादी बहुत बीमार थीं, उन्होंने कहा-“मेरे पोते की शादी कर दो, बहू का मुँह दिखला दो।” फिर क्या था, किसी ने मेरे पिता से आकर कहा, पिताजी को तो जैसे मुँहमांगी मुराद मिल गई। सोच का वही ढर्रा-लड़के वाले कहलवा रहे हैं तो मैं तो धन्य ही हो गया। पिताजी गए, फिर उनके पिताजी आए, बात पक्की हुई और शादी हो गई।”
-“तुम्हें कुछ याद है?”
-“बहुत कुछ याद है, लड़की की विदाई आमतौर पर शादी में नहीं, गौने में होती है,पर दादी सास की जिद के कारण मेरी विदाई भी हुई थी। दादी सास ने सोने की चेन पहनाई थी, भारी लौकेट वाली। तब तो मुझे पता भी नहीं था कि ये सोने की है, मुझे तो वह भारी लग रही थी।”
“ससुर ने क्या दिया था?”
-“ढेर सारे सोने और चाँदी के जेवर”
-“सास ने?”
-“खानदानी कँगन पहनाया था,जो मेरे हाथों से गिर जाते थे।”
-“फिर?”
-“फिर ससुर जी ने कहा अभी रख दो, जब गौना होके आएगी, फिर पहना देना।”
-“और उन्होंने क्या दिया?”
“जब मैं वापस आ रही थी, मेरे निकट आकर कहा था-“मत जाओ, रुक जाओ”
-“फिर”
-मैंने कहा-“नहीं”
फिर उन्होंने एक डिब्बे से शीशे के पाँच कंचे निकालकर मेरे हाथ में देकर कहा-“इन्हें संभालकर रखना। जब मैं आऊँगा तुम्हारे साथ खेलुंगा।”
मैं ने कहा-“मुझे कंचे खेलना नहीं आता। उन्होंने हँस कर कहा था-“मैं सिखा दुंगा”
-“फिर तूने कंचे रखे थे?”
-“हाँ मैं ने अपने बक्से में रख लिया था।”
-“शारदा तूने सीधे मायके वापसी की बता दी, पहले सुहागरात का किस्सा तो बता?”
शालिनी ने शरारत से कहा तो शारदा ज़ोर से हँस पड़ी। फिर हँसते-हँसते बोली-
“मैं तो सास और दादी सास के बीच में सोई थी, वो पता नहीं कहाँ थे?”
अचानक कंधों पर किसी का स्पर्श पाकर शालिनी वर्तमान में लौटी। शारदा उसके दोनों कंधों को पकड़े उसके सामने खड़ी मुस्कुरा रही थी।
फिर बोली-
“शालू अभी दो घंटे मैं बहुत व्यस्त हूँ, फिर स्कूल के बाद एक मीटिंग के लिए रुकना है। मैं शाम में फ्री हूँ, तब घर आओ, फिर आराम से दोनों बातें करेंगे। तुम अपना पता दे दो, मैं ड्राईवर को भेज दूँगी वो तुम्हें गाड़ी में ले आएगा। अब शालिनी खुल कर हँस रही थी, फिर हँसते-हँसते अचानक गंभीर हो गई। उसने एक कागज़ पर अपना पता और फोन नंबर लिखकर शारदा के दाएँ हाथ पर रख दिया। उसे वो दिन याद आ रहा था- जब शलिनी ने अपने जन्मदिन की पार्टी में शारदा के लिए गाड़ी भेजी थी। शारदा ने आने पर कहा था-
“मैं बस से आ जाती, इतनी औपचारिकता क्यों की? पता है हमारे गाँव की लड़कियाँ अपनी विदाई के वक्त ही कार या जीप में बैठती हैं, सबकी किस्मत में तो यह भी नहीं। आज तेरी वजह से मैं ने गाँव में एक कीर्तिमान स्थापित कर दिया। इतनी शर्म आ रही थी, सब लोग मुझे ही देख रहे थे, चाची ने अम्माँ से कहा-
“दीदी, बिटिया का चुपचाप गौना कर रही हो क्या? पर रोने की आवाज नहीं आ रही।”
अम्माँ ने हँस कर कहा-
“बेटी की सहेली बहुत बड़े बाप की बेटी है। उसने अपने जन्मदिन की पार्टी में इसे बुलाने के लिए गाड़ी भेजी है।”
चाची ने आश्चर्य से कहा-
“अच्छा शालिनी, जिसकी बातें सारदा अक्सर करती है। बड़े लोगों की बड़ी बातें! एक तो लड़की, ऊपर से अठारह-बीस साल की? उसका जन्मदिन मना रहे हैं? सच्ची बड़े लोग हैं, यहाँ तो लोग बेटे का जन्मदिन मना भी लेते हैं, वो भी पाँच-छह साल तक।”
-“जमुना इसकी सहेली बड़े शहर में रहती है, सचमुच बहुत बड़े लोग हैं। जाने में तीन-चार घंटे लगेंगे, अब गाड़ी भेजी है, तो जाना ही पड़ेगा न।”
जब मैं सैंडल पहनने लगी, चाची अम्माँ के निकट आकर फुसफुसा कर कहने लगी-
“दीदी, मानती हूँ, जेठ जी की दुकान अच्छी चलती है, आपका बेटा भी जिले के हाई-स्कूल में मास्टर है, लेकिन आप आज भी गाँव में हैं। शहर वालों की देखादेखी मत करिये। लड़की पंछी बन कर आकाश में उड़ने लगे और बाप-दादा की पगड़ी उछाले उससे पहले इसके पंख कतर दीजिये।”
-“जमुना ऐसी बातें मत कर। गुड़िया सुन रही है, देख उसकी आखें भर गईं। मुझे अपनी गुड़िया पर पूरा भरोसा है। मैं इसे इसलिए पढ़ा रही हूँ कि शरद के साथ-साथ ये भी बाप-दादा का नाम रोशन करे।”
-“दीदी शादी-शुदा बेटी दूजे घर की हो चुकी है, कहाँ से बाप-दादा का नाम रोशन करेगी? ससुराल में रोटी पकाती और बच्चे पालती हुई बाप-दादा का नाम तक भूल जाएगी।”
-“जमुना चुप हो जा।”
-“दीदी ये गाड़ी जिसने भेजी है, वो सहेली की जगह सहेला भी तो हो सकता है? ये जन्मदिन की पार्टी घर से भागकर ब्याह रचाने का नाटक भी तो हो सकता है? दीदी, इतनी सीधी मत बनो कि कल को जेठ जी भी आपको दोष दें, ये नहीं जाएगी तो जन्म दिन नहीं मनेगा क्या?
-“अब अम्माँ चाची कि बातों में आ गई थी, उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और कहा- गुड़िया मत जा बेटा, देख वो बड़े लोग हैं, और मेरे पास इतने पैसे नहीं कि मैं उसकी हैसियत के लायक उपहार के पैसे तुझे दे सकूँ।
-अम्माँ उपहार के तौर पर मैं एक गीत गा दूँगी। उसे मेरा गाना बहुत पसंद है, उससे भी बड़ी बात वो मुझे देखकर ही खुश हो जाएगी। माँ उसे महँगा उपहार देने वाले बहुत लोग हैं, उसने मुझे इसलिए बुलाया है कि उसे मेरा आना अच्छा लगेगा।”
-“फिर तो जरूर खाना बनाने-परोसने और बर्तन माँजने के लिए बुलाया होगा। आजकल शहरों में कामवालियों के भाव बहुत बढ़ गए हैं, कोई नहीं मिली होगी तो सोचा होगा-शारदा को ही बुला लो। अरे, दोस्ती का तो बहाना है, कहीं देखा है अमीरों को गरीबों का भला करते? अरे वो तो गरीबों का खून चूसना जानते हैं, कभी गरमी से तो कभी नरमी से। दीदी एक दिन मुझे सारदा ने ही कहा था कि सालू को काम करने की आदत नहीं, ज्यादा काम मैं ही करती हूँ, कमरे की सफाई, नासता लाना, बरतन साफ करना।”
अब शारदा के आँसू तेजी से बहने लगे थे, बोली-“चाची घर में भी जब मैं होती हूँ तो दुर्गा कोई भी काम नहीं करती है, तो क्या मैं कामवाली हो गई? यदि दो बहनों में से एक काम कर लेती है, तो वो कामवाली हो जाती है?”
-“पर वो तेरी बहन नहीं है।”
-“हाँ चाची वो मेरी बहन नहीं, बहन से भी ज्यादा है।”
इतने में चाची अम्माँ के कान में कुछ कहने लगी, पर उनकी आवाज़ इतनी तेज थी कि शारदा सबकुछ सुन रही थी।
-“दीदी! मुझे तो कुछ दाल में काला लग रहा है।”
-“क्या मतलब?”
अम्माँ ने भोलेपन से कहा।
-“दीदी मैं ने सुना है कि आजकल लड़की-लड़की में भी यारी हुआ करती है। क्या तो कहते हैं? हाँ याद आया- लेसबियन, और जिस हॉस्टल में इसको भेजा है न, वहाँ तो ये सब आम बात है।”
-“री जमुना! तूने पहले क्यों नहीं बताया? यदि पहले बताया होता तो मैं इसे हॉस्टल कभी नहीं भेजती।”
-“दीदी, मुझे तो गुड़िया पर पूरा भरोसा था, इसलिए चुप थी। लेकिन दीदी अब इसके रंग-ढंग मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहे। आप इसकी लगाम कसना शुरू कर दो। मेरी मानो तो वापस बुला लो। पढ़ाई-लिखाई का नाटक बहुत हो गया। घर में रखो। काम-काज सिखलाओ। आजतक आपने इसे अचार, बड़ी, पापड़ बनाना नहीं सिखाया। सिलाई-बुनाई का इसे रत्ती भर शऊर नहीं। ससुराल जाकर आपकी नाक कटवाएगी। सास कहेगी कि अम्माँ ने कुछ नहीं सिखाया। पर उससे भी बड़ी चिंता यह है कि यदि इसने ज्यादा बदनामी कर ली तो ससुराल वाले रिश्ता ही तोड़ देंगे।”
पहले तो शारदा सुनती रही, फिर हिम्मत जुटा कर बोली
-“चाची मानती हूँ अखबार मिल जाए तो आप पढ़ सकती हो, और दुनियाँ में क्या हो रहा है, थोड़ा बहुत समझ लेती हो, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि सबसे ज्यादा समझ आपके ही पास है। अपने सिद्धांतों को अपने पास रखो। आपकी ये आधी-अधूरी जानकारियाँ उतनी ही खतरनाक हैं, जितना अधमरा साँप।”
-“दीदी देखो कैसा ज़माना आ गया, मैं तो इसकी भलाई चाह रही हूँ और ये मुझे ही गलत समझ रही है। लड़की अक्षर बाँच ले तो बहुत है। चिट्ठी-लिखवाने पढ़वाने के लिए मर्द का मुँह नहीं ताकना पड़ेगा। पूजा के समय पंडित पुरोहित न पहुंच सके, तो खुद से कथा पढ़ सकती है, आरती की किताब देखकर आरती गा सकती है। अपने-आप रामायण पढ़ सकती है।”
-“चाची मैं सिर्फ चिट्ठी पढ़ने-लिखने और आरती गाने के लिए नहीं पढ़ रही। उसके लिए तो आप ही काफी हो। मेरी सीधी-सादी माँ के विचारों को दूषित मत करो। उन्हें पढ़ने नहीं दिया गया था, इसमें उनका कोई दोष नहीं, लेकिन उनके विचार इतने उच्च हैं कि उन्होने सदैव मुझे और दुर्गा को आगे बढ़ाने की कोशिश की। आप तो पढ़ी-लिखी होकर भी दिन-रात आठ साल की बेटी को कोल्हू के बैल की तरह काम में जोत कर खुद बिस्तर पर पड़ी रहती हो।”
– “दीदी आप और जेठजी दोनों एक दिन पछताओगे और बिठाओ लाडो को सिर पर।” उन्होंने पैर पटक कर कहा और धम-धम करती हुई चली गईं।
तब शारदा ने माँ के निकट पहुँच कर कहा-
“अम्माँ मैं आपके भरोसे का वास्ता देकर पूछती हूँ कि मैं जाऊँ या नहीं?”
-“गुड़िया अब तक तो पार्टी खत्म हो गई होगी?”
-“नहीं अम्माँ, वो मेरा इंतजार ज़रूर करेगी। कम से कम गाड़ी के लौटने का, मैं नहीं भी गई तो गाड़ी तो वापस जाएगी ही।”
-“अम्माँ एक काम करो, आप मेरे साथ चलो।”
-“नहीं गुड़िया तूने मेरे भरोसे का वास्ता दिया है तो मेरा भरोसा और भी पक्का हो गया। मेरे भरोसे की सदा लाज रखेगी मेरी बच्ची।”
-“अम्माँ आप अपने माता-पिता की अच्छी बेटी थीं न?”
-“बिटिया तू तो जानती ही है कि मेरी माँ मेरे जन्म के समय ही चल बसी। फिर आई सौतेली माँ, उनकी मैं जितनी ही सेवा करती वो मुझे उतना ही सताती, और पिताजी भी पता नहीं उनसे इतना दबते क्यों थे? उनके सामने भी माँ मेरे साथ दुर्व्यवहार करतीं, तब भी वो विरोध नहीं करते थे।”
-“अम्माँ, मैं आप से वादा करती हूँ, दुनियाँ की सारी खुशियाँ लाकर आपके आँचल में भर दूँगी।”
-“जा गुड़िया, बहुत देर हो गई, और सुन वापसी में देर हो जाए तो आज रुक जाना, कल सुबह-सुबह आ जाना।”
-“लेकिन अम्माँ, चाची और पड़ोस की औरतें निंदा करेंगी।”
-“गुड़िया उनकी निंदा से कुछ नहीं बिगड़ने वाला, पर रास्ते में तुझे दिक्कत हुई तो?”
-“अम्माँ आप कितनी समझदार हैं। मुझे आप पर गर्व है।” कहकर शारदा माँ के गले से लगी और फुदकती हुई गाड़ी में जा बैठी। वहाँ पहुँचते ही शालिनी ने कहा-“आज तो तूने शराबी फिल्म की याद दिला दी। आज तो मेरे इंतजार की भी इंतहां हो गई।” शारदा मुस्कुराने लगी। दोनों सहेलियों ने कुछ ही दिन पहले एक साथ ये फिल्म देखी थी। शालिनी की माँ ने कहा-
“अब जल्दी से केक काट लो, सारे मेहमान उकता गए हैं।”
छुट्टी की घंटी बजने की जोरदार आवाज़ से शालिनी वर्तमान में लौट आई थी, तभी उसे ध्यान आया कि वह कॉरीडोर में लगी कुर्सी पर बहुत देर से बैठी है। उसे चिंता होने लगी- दोनों बेटियाँ इंतजार कर रही होंगी, वह तेज कदमों से गेट से बाहर निकल आई। जो सबसे पहला ऑटो मिला, उसी में बैठ गई, संयोग से ऑटो वाले ने उचित भाड़ा ही माँगा, जबकि शालिनी घर पहुँचने के लिए इतनी उतावली थी कि दस-बीस रुपए अतिरिक्त देने के लिए भी मानसिक रूप से तैयार थी।
घर पहुँचकर ज्योंही बेल बजाया, तुरंत दरवाजा खुला। ऋचा और कृति दोनों बेसब्री से मम्मी की प्रतीक्षा कर रही थीं।
-“थैंक गॉड! आप आ गईं। मैं तो अब उस स्कूल का फोन नंबर ढूँढ रही थी, ताकि आपके बारे में पता कर सकूँ। मम्मी वैसे सब ठीक है न! आप किसी मुसीबत में तो नहीं फँस गईं थीं न?” ऋचा ने शालिनी के हाथ में पानी का ग्लास थमाते हुए पूछा।
-“हाँ बेटा सब ठीक है” शालिनी ने कहा और मन ही मन सोचा कि बेटी अब मेरी माँ बन गई है, इस ख़्याल से उसके चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान आ गई। दोनों बहनों ने मम्मी के चेहरे पर मुस्कान देख चैन की साँस ली। ऋचा ने शालिनी से सटकर बैठते हुए कहा-
“मम्मा! मुझे आपसे एक जरूरी बात करनी है।
“कहो” शालिनी ने ऋचा का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा।
-मम्मा पहले आप फ्रेश हो लीजिये। फिर खाना खाते हुए बात करेंगे।”
-“तुमलोगों ने खाया नहीं अब तक। अब तो शाम हो गई है।”
-“आप का ही इंतजार कर रहे थे” कृति ने प्यार से कहा।
शालिनी मन ही मन हँस रही थी, क्योंकि वह अच्छी तरह समझ रही थी कि ऋचा क्या बात करना चाह रही है। वह ऋचा से पूर्ण सहमत थी, लेकिन आज से पहले ऋचा ने अपनी बात रखी ही नहीं थी तो ये अपनी सहमति कैसे व्यक्त करती? ऋचा के मन में डर था कि कहीं माँ इंकार न कर दे, इसलिए पूरी तसल्ली से बात करना चाह रही है ताकि वो अपना पक्ष भली-भाँति रख पाये। माँ का मूड अच्छा रहे इसलिए भरपूर प्यार भी जता रही है। दोनों बहनें सामान्यतः शालिनी को मम्मी कहती हैं, लेकिन जब ज्यादा प्यार जताना होता है, तब मम्मा कहती हैं।
शालिनी फ्रेश होकर गाउन का फीता बाँधती हुई बाथरूम से निकली ही थी कि ऋचा ने पास आकर धीरे से कहा-
“मम्मी आपकी किसी फ्रेंड ने आपको इनवाइट किया है?
“क्यों?”
-“आपकी फ्रेंड ने गाड़ी भेजी है, ड्रॉइंग रूम में ड्राइवर बैठा है।”
-“बेटा उन्हें चाय वगैरह दे दो और आप दोनों भी फटाफट तैयार हो जाओ।”
-“मम्मी आप जाईये।”
-“क्यों बेटा?”
-“आप तो वहाँ अपनी सहेली से बातें करेंगी, हम दोनों क्या करेंगे?”
-“आपलोग सुनना।”
-“लेकिन माँ, बेटियों के सामने आपलोग हर बात नहीं कर पाएँगी।”
– “बेटा आप दोनों भी मेरी बहुत अच्छी फ्रेंड्स हैं, आपलोगों के साथ मैं बिल्कुल कम्फ़र्टेबल हूँ, प्लीज़ चलो।”
-“नहीं मम्मा! हमें किसी के घर जाना अजीब लगता है।”
-“बेटा उसका कारण यह है कि आप कभी कहीं गए नहीं। घर-परिवार से वंचित आपकी माँ आपको ले भी कहाँ जा सकती थी? आज वर्षों बाद बिछड़ी सहेली मिली है, तो फिर क्यों न ले जाऊँ अपनी बच्चियों को उनकी मौसी के घर।”
-“कहाँ जाने का प्रोग्राम बन रहा है? कृति ने ऋचा के पास आकर पूछा।
-“आज माँ की पुरानी सहेली मिल गयी हैं, जिन्होंने गाड़ी भेजी है, उन्हीं के घर।”
-“दीदी! मम्मी को जाने दीजिये। चलिये हम चलकर रात का खाना बनाते हैं।”
-“बेटा खाना भी वहीं खाएँगे।”
-“उन्होंने खाने पे बुलाया है क्या?”
-“बेटा हम दोनों उतनी ही क्लोज़ हैं, जितनी आप दोनों बहनें आपस में हो। अब बताओ कल को आप एक-दूसरे के घर जाओगे तो क्या बिना खाना खाए लौट जाओगे?”
-“हाँ! मैं तो बस तभी खाऊँगी जब दीदी पहले से खाने का न्योता दे चुकी होगी।”
-“फिर तो तू खा चुकी मेरे घर। खाने का न्योता? हाँ खाना बनाने का न्योता जरूर मिल जाया करेगा। जब बनाओगी और बर्तन साफ करोगी तो मैं खाना खिलाकर ही भेजूँगी न।”
दोनों बहनें हँसने लगीं, शालिनी उन्हें देखकर मुस्कुराने लगी, उसे लगा जैसे दिल के घाव भरने लगे हैं। बोली-
“हमेशा ऐसे ही हँसती रहो दोनों।”
तभी कृति बोल पड़ी-
“मैं ने सुना था कि लड़के नौकरी की तलाश में जाते हैं और छोकरी मिल जाती है। आज पहली बार देख रही हूँ कि एक बूढ़ी नौकरी की तलाश में जाती है और दूसरी बूढ़ी मिल जाती है।”
ऋचा पहले हँसी, फिर बोली-
“कृति सुधर जा। ससुराल जाने लायक हो गई, और बोलना तक नहीं सीखा।”
-“दीदी! जब तक आप लाइन क्लियर नहीं करतीं, सीखने की क्या जल्दी है? जब वक्त आएगा तो सीखने की कोशिश करूँगी।”
-“बच्चों जल्दी करो” शालिनी ने पर्स टाँगते हुए कहा।
-“मम्मी खाने का बिल भी अदा करना है क्या? आप पर्स क्यों ले रही हैं?”
-“बस कर! अब जल्दी चल” शालिनी ने हल्के से डपट कर कहा।
गाड़ी में ऋचा ने पूछा-
“मम्मी आपकी सहेली भी इंटरव्यू देने आई थीं?”
-“नहीं बेटा! दरअसल स्कूल उसी का है”
-“अच्छा?” ऋचा ने आश्चर्य से कहा।
-“मम्मी आपकी नौकरी तो लग रही है न?”
-“बेटे अभी तक कोई इन्फोर्मेशन नहीं है।”
-“सहेली से पूछा नहीं?” कृति ने शरारत से कहा।
-“बेटा, मैं तो सोच रही हूँ, यहाँ नौकरी न करूँ। पहले पता होता कि शारदा का स्कूल है तो मैं इंटरव्यू के लिए ही नहीं आती।”
-“क्यों मम्मी?”
-“मुझे लगता रहेगा कि ये नौकरी मुझे योग्यता के कारण नहीं, बल्कि दोस्ती के कारण मिली है, और लोग तो हंड्रेड परसेंट ऐसा ही समझेंगे।”
-“मम्मी आप ने ही तो हमें सिखलाया है कि लोगों की परवाह नहीं करनी चाहिए, वे हर हाल में कुछ न कुछ कहते ही हैं। आप जैसी स्वयंसिद्धा महिला को यह सब सोचना शोभा नहीं देता। यदि आपको यहाँ नौकरी मिलती है तो आप जरूर करें। मेरे ख्याल से तो यहीं आपकी योग्यता की सच्ची कदर होगी।”
गाड़ी रुकने से बातचीत का क्रम बाधित हुआ ड्राइवर ने दरवाजा खोलकर कहा-
“आइये मैडम”
शालिनी ने कल्पना किया था कि शारदा का घर अति आलीशान होगा, लेकिन यह तो आलीशान भी नहीं था। लेकिन हाँ! घर छोटा भी नहीं था। तभी शारदा ने निकलकर कहा-“आओ, आओ।”
ऋचा और कृति ने एक साथ कहा-“नमस्ते मौसीजी!”
शारदा ने दोनों को अपने गले से लगा लिया। भीतर आकर शारदा ने इन लोगों को सोफ़े पर बैठाया और स्वयं पानी लेने चली गई।
तभी भीतर से एक युवक ने आकर शालिनी के चरण-स्पर्श कर लिए, फिर ऋचा और कृति की ओर देखकर कहा-“हलो” और सामने वाले सोफ़े पर बैठ गया। शालिनी को समझते देर नहीं लगी कि ये शारदा का बेटा है। उसकी खूबसूरती से उसने अंदाज़ा लगाया कि पिता पर गया है। शालिनी को शारदा की बात याद आ गई-
“सुनती हूँ कि वो बहुत खूबसूरत हैं।”
शालिनी ने पूछा था- “क्यों तुमने देखा नहीं? शादी के समय और फिर ससुराल में?”
-“देखा है, पर चेहरा याद नहीं, आज यदि वो मेरे सामने खड़े हो जाएँ तो भी मैं नहीं पहचान सकती।”
शारदा अंदर से पानी के साथ नमकीन-बिस्किट वगैरह ले आई।
-“शालू! ये मेरा छोटा बेटा ‘कुणाल’ है। अभी-अभी इसने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की है। इसके कई दोस्त विदेश जाने की योजना बना रहे हैं लेकिन इसका कहना है कि अपने देश में ही रहूँगा।”
-“आखिर तुम्हारा बेटा है। सिद्धान्त और आदर्श तो इसके खून में है।” शालिनी ने हँसते हुए कहा।
-“ये प्रशंसा है या निंदा?” शारदा ने भी हँसते हुए पूछा।
-“प्रशंसा” शालिनी ने मुस्कुरा कर कहा। फिर पूछा
-“जीजाजी दिखाई नहीं दे रहे हैं?”
-“टेबल-टेनिस खेलने गए हैं।”
-“ये तो बहुत अच्छी बात है। वैसे मैं समझती थी कि सिर्फ शहर के लोग ही टेबल-टेनिस खेलते हैं। ऐ….सच-सच बता कहीं गिल्ली-डंडा खेलने तो नहीं गए?”
शालिनी के इस मज़ाक पर शारदा हँसने लगी, लेकिन शालिनी को लगा कि मैं क्या बोल गयी? उफ़्फ़! वो अभी भी गाँव और शहर के झमेले से बाहर क्यों नहीं निकल पायी है? क्या अभी भी वह गाँव वालों को तुच्छ समझती है? या ऐसा तो नहीं कि गाँव वालों का उससे बहुत आगे निकल जाना उसे बर्दाश्त नहीं हो रहा है। तभी शारदा ने कहा-“ देशी-विदेशी, आउटडोर-इंडोर हर खेल में ये माहिर हैं, इन्हें खेलने का बेहद शौक है, और दूसरी तरफ मैं हूँ जिसका खेल से दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं। लो ये आ भी गए” शारदा ने दरवाजे से बाहर की तरफ देखते हुए शालिनी से कहा।
शारदा के पति ने ज्यों ही कमरे में प्रवेश किया, शालिनी और उसकी दोनों बेटियों ने एक साथ कहा- “नमस्ते” उन्होंने भी मुस्कुराते हुए कहा-“नमस्ते-नमस्ते! आप लोग बातें करें मैं जरा चेंज करके आता हूँ।
-“ठीक है”
शालिनी ने इत्मीनान से कहा।
तभी कुणाल भीतर से चाय लेकर आ गया। शालिनी ने आश्चर्य से कहा- “बेटे अभी तो आप यहीं थे, आप कब अंदर गए? मुझे तो पता भी नहीं चला, इतनी जल्दी चाय भी ले आए? बेटे आप तो बहुत ही अच्छे बच्चे हो।”
-“थैंक्स आंटी, लेकिन मैं ने कोई इतना बड़ा काम नहीं किया, जितनी आप तारीफ कर रही हैं।”
शालिनी ने टेबल पर खाना लगाते वक्त शारदा से पूछा था-“ जीजाजी भी अपने स्कूल में ही हैं?
तो शारदा ने बताया था कि नहीं, वो तो सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल हैं।
“प्राइमरी स्कूल के?” शालिनी ने दुबारा प्रश्न किया था।
-“नहीं, सीनियर सेकेन्डरी” शारदा ने हल्के से मुस्कुराकर कहा।
-“जीजाजी को क्यों नहीं शामिल किया इंटरव्यू-बोर्ड में?”
-“शालू पहली बात हम दोनों अपना-अपना काम करते हैं। दूसरी बात इंटरव्यू में पारदर्शिता बनी रहे इसलिए मैं अलग-अलग स्कूलों से सबजेक्ट एक्सपर्ट्स को बुलाती हूँ।”
-“शारदा तुमने सरकारी नौकरी के लिए प्रयास नहीं किया?”
-“बी. ए. की परीक्षा देकर घर वापस गयी तो पिताजी ने कहा कि बेटी तेरे ससुर जी गौने के लिए बहुत दबाब दे रहे हैं, कहा है अगले महीने तक गौना नहीं करवाया तो वो अपने बेटे का दूसरा ब्याह कर देंगे।”
“तो कर दें।” मैं ने बेफिक्री से कहा।
-“बेटी, फिर तेरा क्या होगा? अपने समाज में लड़के की शादी तो चौथी बार भी हो जाती है, लेकिन लड़की की तो एक बार ही बड़ी मुश्किल से हो पाती है, दूसरी बार तो सोची भी नहीं जा सकती है। मुझे भीतर ही भीतर बहुत गुस्सा आ रहा था, ऊपर से चाची दो बार झाँक कर चली गयी थी।”
-“मम्मी,पापा पूछ रहे हैं कि खाना लग गया क्या?” कुणाल ने आकर कहा तो बातचीत का क्रम बीच में ही टूट गया।
बात-चीत, चाय-नाश्ता, भोजन-पानी वक्त कैसे गुजरा कुछ पता ही नहीं चला। माहौल बेहद खुशनुमा था, सबके चेहरे पर मुस्कान थी। शालिनी ने मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया और सोचा-“आज पहली बार मैं अपनी बेटियों को इतनी हसीन शाम दे पायी हूँ।”
जब ये लोग वापस अपने घर पहुँचे रात के बारह बज चुके थे। ऋचा और कृति फ्रेश होकर, कपड़े बदलकर सोने की तैयारी करने लगीं। लेकिन शालिनी अभी तक सोफ़े पर ही बैठी थी। तभी दूसरे कमरे से ऋचा की आवाज आई
-“मम्मी आप भी आइये। अब आराम करिए न”
शालिनी उन्हीं कपड़ों में बेटियों के पास आ गईं और बोली-“बेटा आप की मम्मी ने खुद ही अपना आराम-हराम कर लिया है। शारीरिक आराम इंसान को चैन नहीं दे सकता, यदि उसके अन में उथल-पुथल हो। मैं आप लोगों को वो सब बताना चाह रही हूँ जो मन में उमड़ रहा है। कदम-कदम पर शारदा मुझसे जीती है और ताज्जुब है कि उसे रत्ती भर भी घमंड नहीं है। शारदा आज भी उतनी ही सहज है, जितनी चौंतीस साल पहले थी। उसे विरासत में कुछ नहीं मिला था, आज उसने जो कुछ पाया है सब अपने दम पर। विपरीत परिस्थितियों में उसने यथासंभव माँ-बाबूजी का हाथ बँटाते हुए बारहवीं तक की पढ़ाई पूरी की। उसे डर था कि यदि वह माता-पिता का हाथ नहीं बंटाएगी तो उसे पढ़ाई छोड़नी पड़ सकती है। खेती-किसानी के काम, दुकान के काम, और कभी न खत्म होने वाले घर के काम। जिस प्रकार बैल जुए को ढोकर हल या बैलगाड़ी को आगे खींचता है, उसी प्रकार वह अपने कंधों पर पढ़ाई का बोझ उठाकर जीवन की गाड़ी को आगे खींचने लगी।
एक बार उसने हिम्मत जुटाकर बड़े भाई से कहा था कि यदि वो भी थोड़ा काम में हाथ बंटा देंगे तो उसे भी पढ़ने के लिए ज्यादा समय मिल पाएगा। बहन का हौसला देखकर उन्होंने उसकी बात मान ली थी। बारहवीं के रिज़ल्ट आने पर जब पता चला कि वह अपने जिले में प्रथम आई है, तो माता-पिता ने पुरस्कार के रूप में शहर के कॉलेज में उसका एडमिशन करवा दिया, और हॉस्टल में रहने की इजाजत दे दी।
मुझे ग्लानि होती है, स्वयं से घृणा होती है कि एक मैं हूँ, जिसे विरासत में सब कुछ मिला लेकिन मैं ने हर सुख-सुविधा का दुरुपयोग किया। सोने की मुहरों पर मेरा जन्म हुआ, लेकिन अपने कर्मों से मैं ने उसे राख़ बना डाला। क्या कुछ नहीं मिला था मुझे? दुनिया की हर खुशी जुटाकर देने में सक्षम माता-पिता जान से ज्यादा प्यार करते थे। बड़े भाई तो अपनी हथेली पर रखते थे। सेवा में इतने नौकर-चाकर जुटे रहते थे कि संभव होता तो मेरे बदले साँस भी ले लेते। शहर के सबसे अच्छे स्कूल में मुझे भेजा गया था। पढ़ाने के लिए एक ट्यूटर आते थे, एक ड्राइंग सिखाने के लिए टीचर आते थे, एक डांस टीचर, एक म्यूजिक टीचर आते थे। इतनी आसानी से इतनी सुविधाएं मिल गयी थीं कि मैं उनका महत्व ही नहीं समझ पाई। सुबह-शाम खाना बनाने से पहले कुक मेरी फरमाइश पूछता। इन सबका परिणाम यह हुआ कि मैं निहायत जिद्दी, घमंडी और लापरवाह हो गई। बड़ों का आदर करना भूल गई, छोटों को प्यार करना सीखा नहीं, दोस्ती तो किसी से कर ही नहीं पाती थी, शारदा से इसलिए दोस्ती हो पाई, क्योंकि वह अव्वल दर्ज़े की सहनशील है। मैं गुस्सा करती वो मुसकुराती, मैं नफ़रत करती वो मेरी परवाह में जान देने को तैयार। मैं कभी ये नहीं समझ पाई कि वो महान है, मुझे लगता था कि मैं महान हूँ और इसीलिए वो मेरी खुशामद कर रही है। शुरू-शुरू में मुझे लगता उसे मुझसे पैसे माँगने होंगे, पर होता उल्टा था। मेरे पिताजी उसके पिताजी से पचास गुणा अधिक पैसे भेजते थे, फिर भी फिजूलखर्ची की आदत के कारण मेरे पैसे खर्च हो जाते थे, और मुझे शारदा से पैसे माँगने पड़ते थे। वो मुझे समझाने की कोशिश करती कि फिजूलखर्ची ठीक नहीं है, तो मुझे लगता कि उसका पैसे देने का मन नहीं है, और मैं कहती-“नहीं चाहिए मुझे तेरा पैसा, हॉस्टल में मेरी और भी बहुत सारी सहेलियाँ हैं जो मुझे खुशी-खुशी पैसे उधार देने को तैयार हैं।”
वो फिर कहती-“उन लड़कियों में से कोई भी तेरी सहेली नहीं। वो सब की सब मक्खी की तरह तेरे इर्द-गिर्द घूमती रहती हैं, क्योंकि तू खिलाती-पिलाती रहती है। मुझे लगता वो मुझसे ईर्ष्या कर रही है। मेरा अहं इतना प्रबल था कि मुझे शारदा की अच्छाइयाँ दिखती ही नहीं थी। ये तो उसी का धैर्य था कि मेरे साथ निभा लेती थी, और उसके प्यार भरे व्यवहार के कारण मैं उसके प्रति इतनी नरम तो हो ही गई थी कि उसके साथ अपनी हर बात शेयर करने का मन करता। यदि कभी एक-दो घंटे भी दिखाई नहीं देती तो मैं उसे ढूँढने चल देती, लेकिन मुलाक़ात होने पर मैं ऐसा दिखावा करती जैसे मैं बहुत व्यस्त हूँ, और मुझे उससे कोई लेना-देना नहीं है। वो तो अहम नाम की चीज से परिचित ही नहीं थी, तुरंत पूछती- कहाँ जा रही है शालू?
पहले साल तो हम इत्तफाकन रूममेट बन गए थे, लेकिन अगले दो सालों में उसने खुशी से साथ रहने के लिए मेरा नाम दिया। मैं कहती- शारदा मैं तुझे इतनी मुसीबतें देती हूँ फिर भी तू मुझे अपनी रूम मेट बनाने को तैयार रहती है। वो हँसकर कहती-“अपरिचित मुसीबत झेलने से अच्छा है कि मैं परिचित मुसीबत ही झेलूँ।”
मुझे मन ही मन लगता कि वो मेरे साथ इसलिए रहना चाहती है क्योंकि मेरे साथ रहने से उसकी प्रेस्टीज़ बढ़ती है, जबकि हर साल उसकी पर्सेंटेज मुझसे काफी अच्छी रही। वो मेरी बड़ी से बड़ी गलती को हँसकर झेलती, लेकिन सिर्फ एक गलती पर मुझे थप्पड़ मारा था, जब मैं ने अपनी माँ के फ़र्जी दस्तखत किए थे।
“पर आपने ऐसा क्यों किया था?” ऋचा ने पूछा और कृति के हाव-भाव से भी जिज्ञासा झलक रही थी।
-“दरअसल हॉस्टल से स्टेशन लीव लेने के लिए पैरेंट्स से परमिशन लेटर लाना होता था। मैं ने स्वयं परमिशन लेटर लिखकर, मम्मी के साइन किए, उस लेटर को लिफाफे में डालकर अपना पता लिखा, और उसे एक दूसरे लिफाफे में डाल कर अपनी पड़ोस की एक सहेली को पत्र लिखा कि अंदर वाला लिफाफा अपनी कॉलोनी के पोस्ट-ऑफिस से पोस्ट कर देना, फिर उसका पता लिखकर लेटर पोस्ट कर दिया। वही परमिशन लेटर डाक से आया और वार्डन ने मुझे स्टेशन लीव दे दिया, और मैं सप्ताह भर के लिए बॉयफ्रेंड के साथ मनाली चली गई। हॉस्टल के नियम इतने सख्त थे कि लेटर भी हमें वार्डन के द्वारा मिलता था, वह भी खुला हुआ, सारे लेटर पढ़ कर दिये जाते थे। पर देखो मैं फिर भी निकल गई। मैं ने सारा प्रबंध इतनी चालाकी से किया था कि किसी को शक नहीं हुआ, घरवाले समझते रहे कि मैं हॉस्टल में हूँ और हॉस्टल वाले समझते रहे कि घर में हूँ। मेरा जिस दिन निकलने का प्लान था, उससे एक दिन पहले शारदा मुझे रात भर समझाती रही थी कि मैं गलत कर रही हूँ, मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए। मैं ने उसे घिसी-पिटी, दब्बू , गँवार, दकियानूस, बैकवर्ड जैसे विशेषण दिये थे। फिर भी उसने कहा था- “तू मुझे कुछ भी कह पर अपना ये प्रोग्राम कैंसिल कर दे।”
मैं ने कहा था- “तू मुझसे जलती है, क्योंकि तेरे नसीब में यह सब नहीं। जनमते ही एक खूँटे से बाँध दी गयी है, और बड़ी होते ही वहाँ खाना बनाने, बच्चा पैदा करने और पालने के लिए पहुँचा दी जाएगी।”
वह गंभीर हो गई, फिर बोली- “शालू! मैं ने अपनी निजी बातें तुमसे इसलिए शेयर नहीं की कि तुम उनका मज़ाक उड़ाओ। शालू! मैं ने तुझ पर बहुत विश्वास करके तुझे अपना हमराज़ बनाया है, हो सके तो मेरी भावनाओं का अपमान मत करना।”
ऐसा लगा कि वह काफी डिस्टर्ब हो गई है, आँगन में जाकर टहलने लगी। मुझे अफसोस होने लगा, मैं उसे हर्ट करना नहीं चाह रही थी, लेकिन मेरा स्वभाव ही ऐसा था कि मैं अपने मन की करती थी, किसी का समझाया जाना या सलाह-मशवरा देना मुझे बिलकुल नागवार गुजरता था। मुझे जो ठीक लगता था, मैं कर के मानती थी, कोई बीच में पड़ता था तो लड़ाई हो जाती थी। कभी मैं हर्ट होती थी तो कभी सामने वाला। आज सामने शारदा थी और वो मेरे बर्ताव से बुरी तरह आहत हो गई थी। परंतु इतना सब कुछ होने के बावजूद भी मैं ने अपना इरादा नहीं बदला था। मैं ने अपनी पैकिंग कंप्लीट की, फिर बाहर आई तो देखा कि वो आँगन में रखे बेंच पर बैठी है। मैं ने उसके पास बैठकर उसका हाथ अपने हाथों में लेकर कहा- “सॉरी शारदा! मैं अपनी बात पर शर्मिंदा हूँ।”
उसने कहा- “इट्स ओके, बट प्लीज़ फॉर गॉड शेक! कैंसिल दिस विज़िट”
मैं ने कहा- “शारदा मैं उससे वादा कर चुकी हूँ।”
-“वादा तोड़ा भी जा सकता है। तुम्हारा यह प्रोग्राम बहुत रिस्की है। जान-बूझकर आग में कूदना समझदारी नहीं।”
-“मैं उससे किया वादा नहीं तोड़ सकती, दुनिया छोड़ सकती हूँ।”
उसने मेरा सिर सहलाते हुए कहा- “यदि तुम दोनों सच्चे प्रेमी हो तो विवाह होने तक इन खूबसूरत कार्यक्रमों को स्थगित रखकर धैर्य के साथ एक-दूसरे की प्रतीक्षा कर सकते हो।”
मैं चुप हो गयी, क्योंकि मैं जान रही थी कि न शारदा झुकेगी न मैं, चाहे बहस कितनी भी देर क्यों न कर ली जाए।” हम दोनों सहेलियाँ कमरे में आकर चुपचाप सो गईं। सुबह शारदा नहाकर निकली तो देखा शालू नाश्ता लेकर बैठी है। शारदा ने कहा- “चल! धीरे-धीरे ही सही, पर तू सुधर रही है, अच्छा लग रहा है।”
हम दोनों ने साथ नाश्ता किया, साथ कॉलेज के लिए निकलीं, हमारी पहली क्लास साथ में ही थी, दूसरे पीरियड में शारदा की क्लास थी और मेरा यह लीज़र पीरियड था। मैं हॉस्टल की तरफ आने लगी तो उसने कुछ नहीं कहा। वह पूरी तरह आश्वस्त थी कि मैं अपना इरादा बदल चुकी हूँ, लेकिन मेरे मन में तो कुछ और ही था। मैं वापस कमरे में आई, एक कागज़ पर लिखा- “सॉरी शारदा, मैं तुम्हारी बात काट कर जा रही हूँ” कागज़ को मोड कर पेन-स्टैंड से दबा दिया, फिर बैग उठाया, वार्डन से गेटपास साइन करवाया और निकल गई। न वार्डन को कोई शक-संदेह हुआ न गेटकीपर को। गेट से बाहर निकलते ही मैं ने रिक्शा लिया और उसे बस-स्टैंड चलने को कहा। मैं इतनी प्रसन्न थी कि क्या कोई नवविवाहिता अपने हनीमून पर जाते हुए होती होगी, फ़र्क बस इतना था कि मुझे ये सफ़र अकेले ही तय करना था, वो ऑलरेडी वहाँ पहुँच चुका था, होटल की बुकिंग उसने एडवांस में करवा रखी थी। मैं जब वहाँ पहुँची उसने मेरा जोरदार स्वागत किया। हम दोनों बहुत खुश थे। मुझे लग रहा था कि समय को दोनों हाथों से पकड़ लूँ, लेकिन यह संभव तो था नहीं। एक सप्ताह, एक मिनट की तरह बीत गया और मुझे वापस हॉस्टल आना पड़ा। वापसी में हम दोनों उतनी दूर साथ आए, जितनी दूर का रास्ता कॉमन था। जब दोनों अपने-अपने रास्तों पर आगे बढ्ने के लिए अलग हुए तो बहुत दुख हुआ। मैं ने भावुक होकर कहा था- “अब हमें शादी कर लेनी चाहिए।” उसने गंभीरता से कहा था- “पहले हम दोनों को अपना-अपना कैरियर बना लेना चाहिए, ताकि आगे की ज़िंदगी आसान बन सके।”
तब मुझे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि वो कभी इतना बदल जाएगा, कि मुझे उसे छोडना पड़ेगा। खैर! ज्यों-ज्यों हॉस्टल नजदीक आ रहा था, मन में बेचैनी उभरने लगी थी। कहीं मेरी पोल न खुल गई हो? कहीं पापा मिलने के लिए न आ गए हों? कहीं मम्मी ने हॉस्टल में फोन न कर दिया हो? अनेक प्रश्न मन-मस्तिष्क को मथ रहे थे। हॉस्टल के निकट वाले बस-स्टॉप पर उतरकर मैं पैदल ही रास्ता तय करने लगी। सामान भी भारी नहीं था और मुझे कोई जल्दी भी नहीं थी, सच तो यह था कि हॉस्टल जाने का मन बिल्कुल भी नहीं था। भारी मन लिए, छोटे कदम रखती हुई भी मैं गेट के भीतर आ ही गयी, दिल की धड़कनें तेज हो गई थी। कहीं कुछ गड़बड़ न हो गया हो? मैं मन ही मन ईश्वर को पुकारने लगी। मैं ने जो कुछ भी किया वो प्यार में किया। हे ईश्वर! तुम मेरी भावना को समझना और मेरी रक्षा करना। वार्डन से सामना होते ही मैं ने कहा- “गुड मॉर्निंग मैम!”
उन्हों ने भी सहजता से कहा- “गुड मॉर्निंग बच्चे! रजिस्टर में एंट्री कर दिया?”
-“यस मैम”
स्टेशन-लीव से वापस आने पर रजिस्टर में एंट्री करने का नियम था। मुझे थोड़ी तसल्ली हुई। मन में सोचा- “लगता है सब ठीक है।”
कदम अनायास ही तेज हो गए, कमरे में आई तो देखा शारदा नाश्ता कर रही है। उसने ज्यों ही मेरी तरफ देखा, मैं ने चहककर कहा- “हलो माई डार्लिंग, माई स्वीटहार्ट, हाउ आर यू?”
शारदा ने जवाब नहीं दिया, आराम से नाश्ता करती रही। मैं ने कहा- “शारदा तूने मेरा वेट नहीं किया? तुम्हें याद नहीं था कि आज मैं आनेवाली हूँ।? चल! मान लिया कि तुझे तेज भूख लगी थी, इसलिए वेट नहीं किया, पर मेरे लिए नाश्ता तो ला सकती थी?”
शारदा चुपचाप उठी और जूठी प्लेट लेकर बाहर निकल गई, मैं भी पीछे से निकली, मेस की ओर गई, लेकिन मेस बंद हो चुका था। अब नाश्ता करने के लिए कैंटीन जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था, पर मेरा रूम से निकलने का मन ही नहीं नहीं हुआ, चुपचाप बिस्तर पर लेट गई, न फ्रेश हुई, न कपड़े ही बदले। कब नींद आ गई पता भी नहीं चला, लंच की बेल से आँख खुली। शारदा कुर्सी-टेबल पर बैठी हुई लिख रही थी। मैं उठकर बैठ गई, फिर कहा- “कॉलेज नहीं गई?”
इस बार उसने जवाब दिया- “आज संडे है।”
मैं ने कहा- “ओह! मैं तो भूल ही गई। शारदा, बहुत नाराज़ हो मुझसे?”
-“मेरी नाराज़गी या खुशी से फर्क पड़ता है तुम्हें?”
-“बहुत फर्क पड़ता है, अब तू बोली है तो मुझमें एनर्जी आ गई है, वर्ना तेरी खामोशी ने तो मुझे बेजान ही कर दिया था।”
-“शालू मुझे दुख इस बात का है कि तू मुझसे छुप कर गई, मेरे विश्वास को तोड़ कर गई। यदि तू रात में चुप होने की बजाय ये कह देती कि तू जाकर ही मानेगी, तो मुझे बुरा नहीं लगता।”
-“मैं ने कई बार कहा था कि मेरा निर्णय बदलने वाला नहीं है। वैसे शारदा प्यार में मैं ने सबका विश्वास तोड़ा है, तुम्हारे साथ-साथ अपने परिवार वालों का भी। वो कहावत है न कि मुहब्बत और जंग में सब जायज़ है।”
-“इंसान सिर्फ उस कहावत को याद रखता है, जो उसकी सोच के अनुरूप हो। ऐसी हजारों कहावतें हैं, जो तुम्हारे खिलाफ जाती हैं। उदाहरण के तौर पर- झूठ के पैर नहीं होते, और तुम झूठ के सहारे चलने की कोशिश कर रही हो, चार कदम चलते-चलते लड़खड़ाकर गिर जाओगी। तुम्हें एहसास भी है कि तुम्हें बचाने के लिए मैं ने कितने झूठ बोले हैं? वो इसलिए कि एक कहावत यह भी है कि किसी कि भलाई के लिए बोला गया झूठ, झूठ नहीं होता है। आँटी का फोन आया था, यदि मैं हॉस्टल में नहीं होती तो पता नहीं तेरा क्या होता? इस चिंता में कि कहीं तेरे घर से फोन न आ जाए, कोई दूसरी लड़की फोन उठाकर ये न कह दे कि तू तो घर ही गयी है, कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए, मैं फोन के आसपास ही मंडराती रही हूँ। एक सप्ताह से न मैं ठीक से क्लास अटेंड कर पायी हूँ, न ठीक से सोई हूँ, न ही ठीक से पढ़ाई कर पाई हूँ।”
-“सॉरी डियर”
-“अब जाने दे।”
-“मैं ने फिर शरारत से कहा- “तुम्हारी इस निष्ठा से मैं प्रसन्न हुई पुत्री। तीन वर मांग लो।”
शारदा ने भी शरारत से कहा -“हे देवी! एक वर तो बिना माँगे प्राप्त कर चुकी हूँ, अब और की आकांक्षा नहीं है।”
मैं ने हँसते हुए कहा लेकिन मुझे इस समय भोजन की तीव्र आकांक्षा है। फिर हम दोनों खाना खाने के लिए मेस में आ गईं। रूम में वापस आने पर बातचीत का क्रम फिर आगे बढ़ा। शारदा ने कहा- “शालू बुरा मत मानना, पर तुम में गंभीरता बिल्कुल भी नहीं है। गंभीरता के बिना कुछ भी प्राप्त नहीं किया जा सकता। विद्या तो कदापि नहीं, यहाँ तक की प्रेम भी नहीं, सफलता भी नहीं।”
-“विद्या और प्रेम नाम तो सुना है, पर सफलता कभी नहीं सुना। वैसे विद्या और प्रेम की चिंता तो उसके बॉयफ्रेंड और गर्ल फ्रेंड करेंगे। मेरे बॉयफ्रेंड का नाम तो आह्लाद है, और जहाँ आह्लाद हो वहाँ गंभीरता की क्या आवश्यकता?”
मैं अपनी रौ में बोल रही थी और हँस रही थी।
शारदा ने कहा- “शालू! इतनी भी हँसी अच्छी नहीं कि आगे चलकर हँसी का पात्र बनना पड़े। जीवन में अच्छे मूल्यों को धारण करने से इंसान ऊपर उठता है।”
-“तेरे जैसे फिसड्डी लोग ही मूल्यों के लिए जान देते रहते हैं। स्मार्ट लोग इन बातों की परवाह नहीं करते हैं। एक बात बता तू ने सदैव मूल्यों, सिद्धांतों, आदर्शों की रक्षा की है, और मैं ने सदैव उनकी उपेक्षा की है, फिर भी हम दोनों एक ही जगह खड़े हैं, तू मुझसे आगे तो नहीं निकल पाई है।” मैं ने ऐंठ कर कहा। शारदा ने मेरे गाल पर जोरदार थप्पड़ मारा। रियली इट वाज़ अनएक्सपेक्टेड।
मैं ने गुस्से से कहा- “तुम्हारी इतनी हिम्मत? आज तक किसी ने मुझे थप्पड़ नहीं मारा”
-“तभी तो ……….समझ से काम लिया करो। अपने विचारों में परिपक्वता लाओ।” मैं रोने लगी, उसने मेरी ओर रुमाल बढ़ाया और प्यार से कहा- “इतना कम है कि मैं आज तुम्हारे बराबर पहुँच गयी हूँ। तुम ये सोचो कि तुम्हारी यात्रा कहाँ से शुरू हुई थी, और मेरी कहाँ से? मैं सिद्धांतों पर चलती हुई लगातार आगे बढ़ती रही हूँ, और तुम अपने घमंडी और लापरवाह स्वभाव के कारण पीछे खिसकती गयी हो, तभी आज हम दोनों एक स्थान पर हैं। शालू! अभी यात्रा खत्म नहीं हुई है, अभी बहुत लंबी दूरी तय करनी है, अब ये तो वक्त ही बताएगा कि हमदोनों में से कौन आगे निकलता है।
और सचमुच आज वह इतना आगे निकल चुकी है कि मुझमें उससे आँख मिलाने की हिम्मत नहीं है। लेकिन शारदा बिल्कुल सहज है। इसका कारण यह है कि उसने कभी अपने अहं को अधिक विशाल नहीं होने दिया। वह पीछे होती तब भी सहज होती, क्योंकि ये उसका स्वभाव है, हर हाल में शांत और सहज, और मेरा स्वभाव घमंड से लबालब। मुझे लगता था कि मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ, समय के साथ मेरा घमंड न सिर्फ टूटा, बल्कि पिस कर चूर्ण हो गया। फर्स्ट डे जब मैं हॉस्टल में आई थी, और मुझे इसके साथ रखा गया तब मैं ने इसके साथ रहने से इंकार कर दिया था, उसका एडमिशन फर्स्ट लिस्ट में हुआ था, और मेरा नाम थर्ड लिस्ट में भी नहीं आ पाया था। पापा ने कॉलेज में फोन किया था तो बताया गया कि एक-डेढ़ महीने बाद फोन करिए। प्रायः ऐसा होता है कि जिन स्टूडेंट्स का यहाँ से अच्छे कॉलेज या संस्थान से कॉल आ जाता है वो छोड़ कर चले जाते हैं, और यहाँ सीट खाली हो जाती है, तो इच्छुक छात्रों का एडमिशन ले लिया जाता है, लेकिन प्रिंसिपल ऐसे छात्रों का इंटरव्यू लेते हैं और उनकी अनुमति के बाद ही एडमिशन दिया जाता है। मेरा एडमिशन बाद में सीट खाली होने पर प्रिंसिपल के इंटरव्यू के बाद ही हुआ था।
हॉस्टल में रूम एलॉट होने के बाद जब मैं कमरे में आई तो देखा तेल सने बालों की दो चोटी किए एक लड़की कमरे में झाड़ू लगा रही थी, उसके कपड़े भी बहुत साधारण, सस्ते और देहातीटाइप थे। मैं ने सोचा ये स्वीपर होगी। तभी वार्डन की आवाज़ आई- शारदा……….
इसने बाहर निकलकर कहा- “यस मैम।”
-“बच्चे ये शालिनी है, आपकी रूममेट। आप दोनों मिल-जुलकर रहना।” वार्डन ने शारदा को समझाते हुए कहा।
शारदा ने कहा- “यस मैम” और मेरी ओर देखकर मुसकुराई। मेरे होठों से मुस्कुराहट तो लापता ही हो गई। गहरी चिंता ने आ घेरा कि इस गँवार लड़की के साथ मैं कैसे रहूँगी? पापा ने कहा फँसा दिया मुझे?
शारदा ने कहा- “आओ, बैठो। तुम सिर्फ एक बैग लेकर आई हो? तुम्हारा बिस्तर कहाँ है?”
-“कल-परसों तक ड्राइवर लेकर आ जाएगा।”
मैं ने इस अंदाज़ में कहा कि उसकी समझ में आ जाए कि मैं बहुत बड़े बाप की बेटी हूँ।
उसने कहा- “अच्छा, तुम्हारा एडमिशन श्योर नहीं था, इसलिए बिस्तर, बर्तन वगैरह लेकर नहीं आई, कोई बात नहीं, जब तक सारी चीजें अरेंज नहीं हो जातीं तुम मेरी चीजें इस्तेमाल कर सकती हो, और मेरा बिस्तर शेयर कर सकती हो।” वह आगे कहती रही-
-“मेरा तो फर्स्ट लिस्ट में ही नाम आ गया था। कॉल लेटर पर लिखा था- प्रोविज़नली एडमिटेड, इसलिए मैं तो सबकुछ लेकर ही आई थी।
मैं ने मन ही मन सोचा- “फर्स्ट लिस्ट में नाम क्या आ गया खुद को बड़ा तीसमार खाँ समझ रही है। मेरा एडमिशन श्योर नहीं था, लगता है किसका एडमिशन करना है, किसका नहीं, डिसाइड करना इसी का काम हो।?”
जबकि मैं भी समझ रही थी कि वो जो कह रही है, बिल्कुल सच है। सचमुच मेरे एडमिशन और वापसी की संभावना फिफ़्टी-फिफ़्टी थी। एक गँवार लड़की मुझसे पढ़ाई में आगे, मुझे ईर्ष्या-सी होने लगी।
तभी उसने कहा- “मम्मी-पापा की याद आ रही होगी है न! मुझे भी आती है, लेकिन तुम्हारे आने से ऐसा लग रहा है जैसे खालीपन कुछ भर सा गया हो।”
मैं ने सोचा-“यदि मेरे वश में होता तो मैं कभी तुम्हारे साथ नहीं रहती।”
लाचारी ही ऐसी थी कि न चाहते हुए भी, उसके बर्तन में खाना और उसके साथ उसके ही बिस्तर पर सोना भी पड़ा। लेकिन इसके बावजूद भी मन ही मन मैं उसे हीन व निकृष्ट ही समझती रही, पर वो दिलोजान से मुझ पर मेहरबानियाँ लुटाती रही। चार दिनों बाद मुझे तेज बुखार हो गया, मैं कमरे में बेसुध पड़ी थी, सर दर्द से फटा जा रहा था, पूरा बदन टूट रहा था, शारदा जब कॉलेज से लौट कर आई, और मेरी हालत देखी तो सबसे पहले वह वार्डन के पास गई, उनसे कहा कि शालिनी को डॉक्टर के पास ले जाना है, चौकीदार भैया से कहकर ऑटो बुलवा दें। वो मुझे एक नर्सिंग होम में डॉक्टर से दिखाने ले गई, जहाँ मुझे एडमिट कर लिया गया, कई सारे टेस्ट हुए, इस बीच वो मुझे बार-बार तसल्ली देती रही कि सब ठीक हो जाएगा, मैं चिंता न करूँ, वो मेरे साथ है वगैरह-वगैरह।
वो प्रतिदिन सुबह-शाम मुझसे मिलने आती, मेरे लिए फल लाती, मुझसे अच्छी-अच्छी बातें करती। जब डॉक्टर ने कहा कि अब मेरे सारे रिपोर्ट्स ठीक हैं, और जल्दी ही मुझे हॉस्पिटल से छुट्टी मिल जाएगी, तो उसने ईश्वर को धन्यवाद कहा। सच! उसके गुण इतने अनमोल हैं कि उसने मेरे दिल में काफी जगह बना ली। मुझे ऐसा लगने लगा कि जीवन में कभी भी शारदा से अलग न होना पड़े। जिस दिन मुझे डिस्चार्ज होना था, उस दिन भी मुझे वह लेने आई। हॉस्टल में आकर हफ्ते-दस दिन मेरी खूब देखभाल करती रही, लेकिन इन सबके बावजूद भी मेरा मूल स्वभाव अक्सर हावी हो जाता, और मैं उसकी उपेक्षा कर जाती, मगर उसके शांत स्वभाव और अथाह धैर्य के कारण हमारी दोस्ती टूटी नहीं। निभाया भी सदैव उसने ही ज्यादा। अब उससे दुबारा मिलना हुआ है तो मैं अपनी पुरानी गलतियों की क्षतिपूर्ति करते हुए उसके साथ अपनी दोस्ती को नए रँग देना चाहती हूँ।
कॉलबेल की आवाज से कृति ने चौंक कर कहा- “मम्मी सुबह के दस बज रहे हैं। आप काफी थक गई होंगी, पूरी रात आप बोलती रही हैं।”
-“नहीं बेटा, आप दोनों थक गए होगे, मेरा मन आज आधा हल्का हो गया। आधा भारीपन उस दिन समाप्त हो जाएगा जिस दिन अपनी आधी बची कहानी आप दोनों को सुना दूँगी।”
ऋचा ने दरवाजा खोला तो सामने विशाल खड़ा था। उसे मन ही मन अपने ऊपर शर्म आई कि उसने विशाल को बुलाया था लेकिन मम्मी को बताया तक नहीं है, विशाल को यदि पता चल गया कि मैं ने मम्मी से बात नहीं की है, तो उसे लगेगा कि मैं सीरियस नहीं हूँ। वैसे तो विशाल की चर्चा मम्मी के सामने करती रही है, मम्मी भी मन ही मन समझती हैं कि हम दोनों एक-दूसरे को पसंद करते हैं, लेकिन आज तो शादी की बात करनी थी, मम्मी के सामने।
उसने मुस्कुराकर कहा- “आओ विशाल!”
-“अभी फ्रेश नहीं हुई? मैं कहीं ज्यादा जल्दी तो नहीं आ गया? वैसे समय तो दस बजे का ही तय हुआ था।”
-“विशाल तुम बिलकुल समय पर हो, मैं ही लेट हूँ। बैठो हमलोग अभी आते हैं।”
ऋचा ने भीतर आकर कहा- “मम्मी बात ये है कि ………”
शालिनी ने ऋचा की बात काट कर कहा – “बेटे मैं समझ रही हूँ कि क्या बात है? डोंट वरी, आपलोग तैयार होकर आओ, मैं नाश्ता तैयार करती हूँ।”
कुछ ही देर बाद ऋचा, कृति, विशाल और शालिनी डाइनिंगटेबल पर नाश्ता कर रहे थे।
-“बेटे, आप यदि ऋचा के जीवनसाथी बनते हो तो मेरे लिए यह बहुत ज्यादा खुशी की बात होगी। लेकिन मैं जानना चाह रही हूँ कि आपके माता-पिता की क्या राय है?
-“आँटी, मैं ने सोचा पहले आप से ही बात कर लूँ, क्योंकि मुझे पूरा विश्वास है कि उन्हें मैं मना ही लूँगा।”
-“बेटे, मना ही लेंगे आप, यानि वे खुशी से ऋचा को स्वीकार नहीं करेंगे, आपके आग्रह आपकी जिद के कारण मान जाएँगे।”
-“क्या फर्क पड़ता है आँटी, आखिर मानेंगे तो सही।”
-“फर्क पड़ता है बच्चे! मेरी ख़्वाहिश है कि वे ऋचा को स्वेच्छा से स्वीकार करें, उसे उसके गुणों के कारण पसंद करें न कि बेटे की जिद के कारण।”
-“आँटी आप ने मुझे पास किया न? या कोई संदेह है?”
-“बेटे आप तो मेरी नज़र से शत-प्रतिशत अंकों से पास हो।”
-“आँटी, मेरे मम्मी-पापा को ऋचा अवश्य पसंद आएगी, इसमें कोई संदेह नहीं है, लेकिन मनाना इसलिए पड़ेगा क्योंकि पापा अपने फ्रेंड की बेटी को अपनी बहू बनाना चाहते हैं।”
-“बेटे, मैं ने अपने जीवन में बहुत दुख झेले हैं, इसीलिए बहुत डरी हुई हूँ, कहीं मेरी बेटी को वह सब न झेलना पड़े। खासकर यदि लड़के के माता-पिता लड़की को दिल से स्वीकार नहीं करते हैं, तब लड़का माता-पिता और पत्नी के बीच पिसने लगता है, ऐसे में एक वक्त आता है जब वह माँ-बाप के पाले में जा बैठता है, और पत्नी पर दबाब डालने लगता है कि वह सास-ससुर की शर्तों पर ही इस घर में रहे, बिना यह सोचे कि उन शर्तों पर रहना संभव है भी या नहीं? लड़की का कोई दोष है भी या नहीं? और ऐसा वह सिर्फ इसलिए करता है कि समाज उसे ‘जोरू का गुलाम’ या ‘कपूत’ न कहे।”
-“आँटी, आप मुझ पर भरोसा रखें। मैं आपसे वादा करता हूँ कि ऋचा को सदैव खुश रखूँगा।”
-“बेटे मैं आपकी भावनाओं की कद्र करती हूँ और ईश्वर से दुआ करती हूँ कि मेरा भरोसा और आपका वादा कायम रहे। लेकिन कहते हैं न कि दूध का जला मट्ठा भी फूँक कर पीता है। बेटे, ऋचा के प्रति जो भावना आज आपके मन में है वह सदैव बनाए रखना। मेरी बेटी आपके समकक्ष है, शिक्षा में, आय में, लगभग हर बात में। वह अपना जीवनयापन करने में पूर्ण समर्थ है, वह सिर्फ आपका साथ चाहती है, क्योंकि आपको चाहती है। एक समय ऐसा भी था, जब स्त्री को आर्थिक सुरक्षा पति से ही मिलती थी, यदि किसी कारणवश पति ने उसे छोड़ दिया तो वह सड़क पर आ जाती थी। फिर कई ऐसे कानून बने जिसमें स्त्री को कागजात के सहारे पति से एक हद तक आर्थिक सुरक्षा प्राप्त होने लगी। लेकिन आज तक कोई ऐसा कानून नहीं बना, जो पत्नी के दिल पर लगे ज़ख़्मों को भर सके। महत्वपूर्ण बात यह है कि दिल टूटने का दर्द हर स्त्री बराबर ही महसूस करती है, चाहे वह शिक्षित हो या अशिक्षित, आर्थिक रूप से सक्षम हो या अक्षम?
दूसरी बात, भारतीय स्त्री उच्च शिक्षा प्राप्त कर लगभग हर क्षेत्र में अपनी पहुँच बना चुकी है, लेकिन उनकी समस्याएँ आज भी समाप्त नहीं हुई हैं। आज भी अकेली स्त्री के प्रति समाज का नज़रिया अच्छा नहीं है। आज भी अगर कोई शादी किसी भी कारण से टूटती है तो लोग स्त्री में ही दोष ढूँढने लगते हैं।”
-“आँटी, मैं आपसे फिर रिक्वेस्ट करता हूँ कि आप मेरा विश्वास करें, मैं ऋचा को अपनी पलकों पर रखूँगा। मैं मानता हूँ कि स्त्रियों की स्थिति आज तक अपने समाज में संतोषप्रद नहीं हो पाई है, लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है, आज अपने देश में बहुत से ऐसे परिवार हैं, जो स्त्री को भरपूर मान-सम्मान देते हैं। उनके साथ किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं करते हैं, तथा उसे आगे बढने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। मैं अपने घर में सॉरी ऋचा के घर में, क्योंकि घर की मालकिन ये रहेगी और मैं तो इसका दासानुदास। हाँ तो ऋचा के घर में, और अन्यत्र भी इसके सम्मानपूर्ण जीवन का दायित्व ग्रहण करता हूँ, साथ ही यह अपेक्षा करता हूँ कि यह भी परिवार के प्रत्येक सदस्य के मान-सम्मान को कायम रखेगी। वैसे मेरी और ऋचा की इतनी अच्छी अंडरस्टैंडिंग है कि मुझे नहीं लगता कि हम दोनों के बीच कभी किसी भी प्रकार की दिक्कत आएगी। रही बात मम्मी-पापा के साथ सामंजस्य की, तो मैं सदैव पत्नी और माता-पिता के बीच पुल का काम करूंगा।”
-बेटे, कुछ बातें कहने में जितनी सहज लगती हैं, उतनी वास्तव में होती नहीं हैं, और जहाँ तक दो लोगों की अंडरस्टैंडिंग की बात है, कई बार ऐसा लगता है कि हम किसी को बहुत अच्छी तरह समझते हैं, लेकिन वास्तव में यह प्यार की दीवानगी होती है, जो अपने साथी में सारी विशेषताएँ देख लेती है, समझ लेती है। सपने जागते हुए देखे जाएँ या सोते हुए, उनका अस्तित्व तब तक ही रहता है, जब तक कि कठोर यथार्थ से टकराकर वह चकनाचूर न हो जाए। यथार्थ से टकरा-टकराकर जब सपने टूटते हैं तो एहसास होता है कि हम अब तक जो समझ रहे थे, वह सच नहीं था।”
-“आँटी, एक तरफ आप कह रही हैं कि आपने मुझे पास किया, दूसरी तरफ आप अनेक आशंकाएं प्रकट कर रही हैं। कहीं ऐसा तो नहीं है कि आपको यह रिश्ता मंजूर नहीं है और आप मेरे सामने यह बात नहीं कहना चाहती हैं। मैं स्पष्ट कर दूँ आँटी, हम दोनों निश्चित विवाह करेंगे, साथ ही आपको और मेरे माता-पिता को भी मना कर ही दम लेंगे। नए रिश्ते के लिए हम पुराने रिश्तों को तोड़ना नहीं चाहते, बल्कि इस नई कड़ी को जोड़कर परिवार की शृंखला को और सशक्त बनाना चाहते हैं। आँटी, प्लीज़ बताइए आपकी अपने दामाद से क्या उम्मीदें हैं, मैं उन पर खरा उतरने की पूरी कोशिश करूंगा।”
-“बेटे, एक ही उम्मीद है, यदि पूरी कर दोगे तो मेरी जिंदगी की सारी तमन्नाएँ पूरी हो जाएंगी, मेरी बेटी को हमेशा खुश रखना।”
-“बस! इतनी सी बात?”
-“मैं तो डर रहा था, पता नहीं आप क्या कहेंगी? कोई ऐसी उम्मीद न रखती हों आप जिसे पूरा करना मेरे लिए असंभव हो।”
-“बेटे, ये इतनी सी बात नहीं है, यही तो सबसे बड़ी बात है। प्रायः विवाह से पहले लड़के खुद भी बड़े-बड़े सपने देखते हैं, साथ ही अपनी प्रेमिका को भी मीठे और बड़े सपने दिखाते हैं, किन्तु शादी के कुछ समय बाद बड़े सपने तो टूटकर बिखरते ही हैं, पत्नी के छोटे-छोटे शौक-अरमान भी पूरे नहीं हो पाते। धीरे-धीरे आँखों में सपनों की जगह आँसू रहने लगते हैं और होठों पर मुस्कुराहट की जगह चुप्पी छा जाती है। आश्चर्य की बात तो यह है कि शादी से पहले प्रेमिका की आँखों में एक भी आँसू की बूँद नहीं देख पाने वाला और प्रेमिका की चुप्पी को पाँच मिनट भी नहीं सहन करने वाला प्रेमी पति बन जाने के बाद इस बात से भी बेखबर रहने लगता है कि उसकी पत्नी अंदर ही अंदर मर रही है। पहले वरीयता सूची में जिसका नाम सबसे ऊपर होता है, बाद में उसी का नाम सबसे नीचे आ जाता है।”
-“आँटी, दुनिया में हर प्रकार के लोग हैं, कुछ उदाहरणों को देखकर आप सामान्यीकरण नहीं कर सकते हैं। कहीं पत्नी दुखी रहती है, कहीं पति, कहीं-कहीं दोनों। लेकिन यह सब देखने-सुनने के बावजूद लोग जीवनसाथी की तमन्ना करते हैं और इस उम्मीद से विवाह करते हैं, कि उनका विवाह सफल रहेगा और रहता भी है। कम ही शादियाँ टूटती हैं, ज़्यादातर तो रास्ते के ऊबड़-खाबड़ पर हिचकोले खाकर आगे बढ़ जाती हैं, अच्छी चलती हैं।”
-“बेटे, शादियाँ कम टूटने का कारण यह नहीं है कि शादी सफल है, बड़ा कारण यह है कि स्त्री कदम-कदम पर समझौते करती है। समझौते के कई कारण हैं, एक तो समाज में पति से अलग स्त्री को अच्छी नहीं मानते हैं, दूसरे अधिकतर मामलों में वह आर्थिक रूप से भी आत्मनिर्भर नहीं होती है कि इतना बड़ा निर्णय ले सके। जहाँ तक तलाक की बात है तो उसके लिए भी कोर्ट और वकील की शरण में जाना पड़ता है, बहुत अधिक रुपयों की आवश्यकता होती है।”
पता नहीं शालिनी कब तक और क्या-क्या बोलती रही जब चुप हुई तो एहसास हुआ कि वह अकेली बोल रही है। विशाल न जाने कब जा चुका है और दोनों बेटियाँ सोफे पर ही सो गई हैं। दोनों बेटियों को प्यार से देखते हुए वह उनके अच्छे भविष्य की कामना करने लगीं। तभी कॉल बेल बजी, दरवाजा खोला तो सामने विशाल, शारदा उसके पति और कुणाल एक साथ खड़े थे। विशाल ने हँसकर कहा- “आँटी, हमलोग अंदर आ जाएं?”
दोनों बहनें हड़बड़ाकर उठ गयी थीं। शालिनी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था, विशाल शारदा का बेटा है? हाँ कल शारदा बड़े बेटे सोनू की बात करते हुए बोली थी कि डॉक्टर है, आज रात की ड्यूटी है, फोटो दिखाने वाली थी, फिर कुछ और बात चल गई और ध्यान दूसरी ओर चला गया। वह अभी तक हक्की-बक्की खड़ी थी, शारदा ने उसे गले लगाकर कहा- “मेरे बेटे को प्यार हुआ तो तेरी बेटी से। सचमुच ये दुनिया इतनी छोटी है मुझे पता भी नहीं था। आई तो थी बड़े बेटे के रिश्ते की बात करने एक स्वयंसिद्धा स्त्री से, जैसा मेरे बेटे ने बताया, वो तू निकली, तो लगे हाथ अपने छोटे बेटे के लिए तेरी छोटी बेटी का भी हाथ माँग रही हूँ, यदि तुझे मंजूर हो तो आज से ऋचा और कीर्ति मेरी।” ऋचा मन ही मन बेटियों के भविष्य के लिए दुआ माँगने लगी थी, आखिर बेटियों के भविष्य के लिए ही तो उसने पति का घर छोड़ा था, वह घर जहाँ सबकुछ था पर कुछ भी नहीं, क्योंकि वह प्रेमी ऋचा के जन्म के बाद कितना बदल गया था। उसे दूसरा बच्चा बेटा ही चाहिए था, कितना दबाब बनाया था उसने गर्भस्थ शिशु के लिंग की जाँच के लिए, पर उसने भी हिम्मत की, दिल कडा कर मात्र दो हजार रु. लेकर ऋचा की उँगली थामे घर का राशन खरीदने के बहाने घर से निकली और सीधा स्टेशन पहुँच गयी थी, जो ट्रेन प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी, वह कलकत्ता जा रही थी, जेनेरल टिकट लेकर उसमें बैठ गई थी, माता-पिता से पहले ही संबंध टूट चुके थे, अब अपने दम पर अपना और बच्चों का भविष्य संवारना था। बहुत कष्ट उठाना पड़ा पर दोनों बेटियाँ उसकी उम्मीदों पर खरी उतरीं, आज दोनों डॉक्टर हैं। अब यदि दोनों को अच्छा जीवनसाथी भी मिल जाए तो शालिनी के दिल को सुकून मिले।
-“आँटी, आप जैसे मानेंगी, मैं आपको मनाऊँगा, आपको मना कर ही ऋचा से शादी करूँगा।” विशाल की आवाज से वह वर्तमान में लौटी, और हाँ में सिर हिला दिया। शारदा मिठाई का डब्बा खोलकर सबका मुँह मीठा कर रही थी, पर शालिनी के मन में एक बार फिर संघर्ष के दिन चलचित्र की भाँति सजीव रूप में चलते जा रहे थे।