अपनी बातः गौरवमय भारत; जड़ों की ओर- शैल अग्रवाल

अगस्त का महीना है यह और अगस्त का महीना हमेशा ही ध्यान भारत की तरफ खींचता है। आजादी और उसकी उपलब्धियों का जश्न मनाना चाहता है, साथ ही देश की प्रगति, दशा और दिशा का भी लेखा-जोखा रखना चाहता है। किधर जा रहा है भारत और क्या हम खुश हैं इसकी प्रगति व परिस्थियों से? और यदि नहीं तो क्या हो सकता है एक आम आदमी का योगदान परिस्थितियों और अपने देश को सुधारने की दिशा में ?

फिर यह तो विशेष वर्ष है। बधाई! बधाई कि हम भारत के हैं, भारत से हैं और भारत पर न्योछावर होने का आज भी वही ज़जबा रखते हैं! बधाई कि हम जिन्दा हैं देखने को कि हमारी आजादी 74 वर्ष पूरे करके 75 वें वर्ष में प्रवेश कर रही है। यानी अमृत महोत्सव मनाने को तैयार है। इस मील के पत्थर पर्व की एक-एक देशवासी और हर भारतवंशी व भारत प्रेमी को पुनः पुनः और बहुत-बहुत बधाई! ऐसे में लीक से हटकर यह अतिरिक्त अंक भाव सुमन की तरह माँ भारती के चरणों में अर्पित करने से रोक नहीं पाई खुद को मैं। छह महीने की थी जब भारत को अजादी मिली थी। संग ही बढ़ी हूँ। पलपल की साक्षी और पलपल को जीती-सोखती। बचपन से ही इतना तल्लीन रही भारत के इस आजादी के संघर्ष में कि मानने लगी थी कि मैं थी, वहाँ उस संघर्ष में। कि किसी क्रांतिकारी की ही आत्मा है इस शरीर में भी। तभी तो दस वर्ष की उम्र तक लगातार कुछ सपने परेशान करते रहे थे। कभी कोई सिर काटता दिखता और मेरा सिर वापस खुद ही जुड़ जाता, तो कभी लाशों के नीचे रेल के डिब्बे में खुद को दबा पाती। कभी किसी रैली में भीड़ के साथ जाने कहाँ जाते देखती खुद को, तो कभी जाने किससे और किस वजह से भागती रह जाती। इधर-उधर छुपती रहती। सच बस यही था कि एक बेचैनी का अहसास और कुछ करने की ललक लगातार पीछा करती रहती। हो सकता है आसपास की खबरों में, किस्से-कहानियों में इस तरह के तथ्यों की बाहुल्यता रही हो, इस वजह से ऐसा होता रहा हो । पर उस पीड़ा को, उस संघर्ष को पूरी तीव्रता से अनुभव करती थी उन पलों में और बात व भय जब भी बर्दाश्त से बाहर हो जाए तब खुद को जगाना भी सीख लिया था, पर किसी से कुछ कह न पाती थी। बचपन से ही जानती थी कोई नहीं सुने या समझेगा इन्हे। बेवजह ही भगाते-दौड़ाते वे सपने जाने क्या संकेत और संदेश देना चाहते थे, मन की किन गुत्थियों को सुलझाना चाहते थे आज तक नहीं जान पाई हूँ। सिवाय इसके कि भारत की प्राचीनतम विचारधारा पुनर्जन्म में विश्वास करना होगा। कुछ और नहीं तो उद्देश्यों और संकल्पों की एक निरंतरता मिलती है इससे जीवन को। आध्यात्म और योग व दर्शन आदि में भी जबाव ढूंढे, पर कई गूढ़ प्रश्न आजतक अनुत्तरित ही हैं । उनमें से एक सपना यह भी था, जिसमें एक महल से निर्जन घर में घूमने लग जाती थी। अहसास रहता था कि घर मेरा है और यहीं रहती हूँ मैं। इतनी बार यहाँ इंगलैंड में भी, बड़े होकर भी देखा वह सपना कि उसके एक एक कमरे से आज भी वाकिफ हूँ। विशेषतः वह शानदार बैठक और ऊबड़-खाबड़ पत्थरों से ढका पूजा घर जिसमें जाने कितनी अंग-भंग मूर्तियाँ हैं, जो खुदाई से निकली-सी प्रतीत होती हैं। शायद घर में चारो तरफ फैली भांति-भांति की पत्रिका, अखबार और उर्बर कल्पना शत्ति का ही असर रहा हो यह भी। परन्तु सर्वाधिक आश्चर्य तो तब हुआ जब एक और सपना जो बचपन में बहुत बार देखती थी कि कई पुलों के नीचे से कार में बैठी जाने कहाँ और क्यों भागी जा रही हूँ , हूबहू साकार हो गया। यहाँ ब्रिटेन में जब पहली बार आई तो मोटरवे पर जगह जगह दिखे हूबहू वही पुल और आज भी मोटरवे के नीचे आए दिन वैसे ही कार में बैठी उनके नीचे से दौड़ती रहती हूँ। कहीं भी घूमने जाती हूँ तो अक्सर आशंकित हो जाती हूँ कि कहीं वह घर भी तो आँख के आगे नहीं आ जाएगा, अचानक ही एक दिन, जैसे राम की प्रतिमाएं दिखी थीं. स्वीडेन और नौर्वे के संग्रहालय में! शिव परिवार और बहुत पुरानी बुद्ध की वह लम्बी खड़ी मूर्ति दिखी बरमिंघम में! और भी बहुत कुछ देखा है- एक अपमान, एक खीज , एक विस्मय और थोड़े बहुत संतोष के साथ भी…कि चोरी भले ही हो गया हो, पर नष्ट नहीं हुई हैं हमारी ये अमानत।

सन 1947 में पैदा होने के नाते अन्य सभी उस वर्ष में पैदा बच्चों की तरह गौरवमय और विशेष महसूस करती हूँ, कि भले ही उस क्रांति में और कोई योगदान देने का अवसर न मिला हो, पर प्रभु ने हमें आजादी का बिगुल बजाते हुए जीवन में भेजा। नमन और प्रणाम करती हूँ, उन सभी शहीदों को जिन्होंने अपना हर सुख-चैन और जान तक न्योछावर करके हमें आजाद भारत का नागरिक बनाया।
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इकबाल ने कभी लिखा था – सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा-और हम राष्ट्रीय पर्व जैसे 26 जनवरी या पंद्रह अगस्त के दिन स्कूल के प्रांगण में लहराते तिरंगे के आगे खड़े, भाव विभोर सुख और गौरव के पंखों पर चढ़े इस गीत को उल्लसित हो-होकर गाया करते थे। परन्तु वे बचपन के दिन थे, जब सावन के अंधे की तरह हरा ही हरा था चारो तरफ। क्या आज हम चाहें भी तो गा सकते हैं उसी तन्मयता और ईमानदारी के साथ इस गीत को ? शायद नहीं, क्योंकि हम बच्चे नहीं रहे अब, और सिर्फ मान लेने व आंखें बन्द कर लेने से ही हमारा हिन्दोस्तान सारे जहाँ से अच्छा नहीं हो जाता !

आए दिन की प्राकृतिक आपदा और पड़ोसी मुल्कों द्वारा परोसी गईं बेवजह की मुसीबतें, न सिर्फ सचेत रहने को आगाह करती रहती हैं अपितु अन्य खबरें पर्यावरण, धर्म और विस्तारवाद के लालच से जुड़ी हमारे आजके प्रगतिशील और सिद्धांतहीन समाज के खोखलेपन की तरफ भी हमारा ध्यान खींचती है। कई विचलित करने वाली खबरों ने तो खुद आधुनिक भारतीय चरित्र पर भी कई-कई प्रश्न चिंह लगा दिए हैं।

सच्चाई तो यह है कि देश आजकल वाकई में आपद्कालीन परिस्थितियों में एक सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव से गुजर रहा है। परोक्ष और अपरोक्ष रूप से देश बदल रहा है, हम बदल रहे हैं। हमारी मान्यताएँ और सोचने के तरीके बदल रहे हैं। माना प्राकृतिक आपदा पर हमारा वश नहीं, परन्तु देश के साधु-सन्त, नेता-अभिनेताओं के कुकर्म…क्या यही वे व्यक्ति नहीं, जिनकी तरफ आम जनता दिशा निर्देश और आदर्शों के लिए देखती है?

एक आपदा से उबरने की कोशिश करते हैं, ‘ भूल सुधार हो सकती है’ का संकल्प लेकर आस की किरण ढूंढ़ते हैं तबतक दूसरा तूफान हिम्मत तोड़ देता है। बलात्कार, भ्रष्टाचार और लालच से जर्जर देश का चरित्र वाकई में मरणासन्न अवस्था में पहुंच गया है-जहाँ के वृद्धों से अमानवीय तरीकों से छुटकारा पाया जाता है, जहाँ गरीबों की कीमत कीड़े-मकोड़ों से ज्यादा नहीं, और जहाँ नारी शरीर मात्र एक मांस का लोथड़ा है भूखे दरिंदों के लिए। शिक्षा, स्वास्थ सब व्यापार के धंधे हैं और नैतिकता हर जगह से शून्य है, चाहे वह राजनैतिक परिसर हो या धार्मिक। जहाँ पैसे से सब कुछ खरीदा जा सकता है- नाम और प्रतिष्ठा तक। ताली बजाने वालों से लेकर फूल माला पहनाने वाले सब हैं बाजार में और खरीदे जा सकते हैं। किसी भी क्षेत्र में दिखता है यह बंदर और मदारी का खेल, बस लालच की डुगडुगी बजाने भर की देर है। फिर जो भी ताकत की कुरसी पर जा बैठा वह माफिया के सरगने जैसे हथकंडे अपनाकर कुरसी की रक्षा करता है, सच्चाई और आदर्श क्या देश तक भले ही जाए भाड़ में।
देख-देखकर ही विचार भटकने लगते हैं और विश्वास लड़खड़ाने लग जाता है। सोचने की बात है कि क्या हो गया है हमारे इस हरे-भरे, दया और दर्शन में अग्रणी देश को कि खबरें पढ़ते ही, देखते ही सिर शर्म से झुक जाता है, क्यों माली ही आज चमन को उजाड़ने पर आमदा हैं? क्यों हर नीति हमारे देश में चुटकी बजाते ही अनीति में पलट जाती है, और किसी के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगती? अपितु समरथ को जग गोसाईं की तर्ज वाला ही कोरस है निरंतर।

जिसे मौका मिलता है वही कभी राजनीति तो कभी धर्म की आंच पर स्वार्थ की रोटी सेक और खा रहा है और करोणों भूखे-नंगों की आह उनका हाजमा तक नहीं बिगाड़ पाती? फिल्मों में दिखाई देता ‘अमर प्रेम’ कैसे आज के ‘ बद्तमीज इश्क’ में बदला-क्या कभी सोचा है हमने-कहाँ गलती हुई, क्यों मुन्नी बदनाम हुई और शीला की जवानी जैसे भड़काऊ गीत ही क्यों चारो तरफ गूंजते हैं आज?

न सिर्फ आज हमारी फिल्मों की आर्थिक सफलता का ये एक प्रमुख हिस्सा हैं क्योंकि अर्धनग्न थिरकती लड़कियों पर फिल्माए गए हैं, अपितु गली-बाजार चारो तरफ हमें वैसी ही शारीरिक और वैचारिक नग्नता दिखती है। सभ्य और शिक्षित परिवार की छोटी-छोटी बच्चियाँ पारिवारिक आयोजन और शादी ब्याह में इन उत्तेजक गीतों पर वैसे ही कूल्हे मटकाती नजर आती हैं और सगर्व अभिभावक व परिजन ताली बजाते नजर आते हैं ! क्यों इन अभद्र शब्दों के अर्थ हमें छूते नहीं, और हमारी भारतीय संस्कृति के गौरवमय स्तंभ, शालीनता, परोपकार, बड़ों का आदर सत्कार आदि गुणों पर सीधा प्रहार नहीं कर पा रहे है?

जब आदमी सिर्फ अपने बारे में ही सोचता है, सामंतशाहियों की तरह से भाई भतीजों के सहारे अपना ही साम्राज्य फैलाने लगता है तो धूर्तता, दुष्कर्म…जायज नाजायाज हर हथकंडे को अपनाता है। यही वजह है कि उद्दंडता और अभद्रता ही संस्कृति और देश के चरित्र का पर्याय है आज। कोई किसी से कुछ नहीं कहता, क्योंकि सभी एक से हैं।

बूढ़े माँबाप को तो संभाल नहीं पा रहे हैं, बोझ हो गए हैं वे,सनातन उद्दात्त दायित्व- जैसे कि वसुधैव कुटुम्बकम् को कैसे समझ या निर्वहन कर पाएंगे हमारे युवा। यह डौमीनो असर कैसे रोक सकते हैं हम, आज जब स्वार्थ-परता ही हमारे देश का चरित्र बन चुकी है, सोचना ही होगा।

बढ़ते यौन अपराध, घूस , चोरी डकैती क्या यही आधुनिकता है, क्या इसी इक्कीसवीं सदी के सपने में जी रहे थे हम ! यह स्वार्थ की ही तो अति है कि हर संभावी परिणाम और आपदा से आंखें मीचे हम शुतुरमुर्ग की तरह सब अनदेखा कर रहे हैं और रेत में सिर छुपाए बैठे हैं। कहीं ईमानदार औफिसर को नौकरी छोड़नी पड़ती है, तो कहीं एक सच्चे सामाजिक कार्यकर्ता को दुर्घटना ग्रस्त करके मरने से भी बद्तर कर दिया जाता है, क्योंकि उसने जानलेवा धमकियों के बाद भी देश के हित में चुनाव में खड़े होने की हिम्मत की थी। पत्रकार को गोली मार दी जाती है क्योंकि उसने जो देखा या महसूस किया, सही-सही लिखने की हिम्मत की। क्या यही हमारे सपनों का देश है?

मानवता का मजाक बनाती ये खबरें, घटनाएं क्यों हमें द्रवित नहीं कर पातीं, क्यों हमारी चेतना को नहीं ललकारतीं, क्योंकि दोषी हम सभी हैं और अपनी-अपनी जिम्मेदारी ठीक से निभा नहीं पा रहे हैं। हो सकता है नक्कारखाने में तूती की तरह हमारी आवाज न सुनाई दे, परन्तु प्रयास तो जारी रखना ही होगा। वाकई में अभी हमारी लड़ाई खत्म नहीं हुई है! अब लड़ाई पराधीनता कि नहीं स्वाधीनता के संयम को स्थापित करने की है। आचरण और व्यवहार पर निगाह रखने की है और दूसरों के सुख दुख समझने की है। हराम के अरबों का हाजमा करने वालों को अब लाखों और करोणों का घोटाला बड़ा नहीं लगता, उन्हें बताने की जरूरत है कि घोटाला तो घोटाला ही है, चाहे वह एक रुपये का ही क्यों न हो? अगर नेम व शेम पौलिसी से कुछ असर होता है तो बिना भारी कुरसी के पायों से डरे ऐसा होना चाहिए और उन्हें तुरंत ही पद से हटाए जाने की मांग भी। मानवता के नाम पर दानवता के सौदे आखिर कबतक?

उद्धृत करना चाहूंगी कादंबिनी की संपादिका मृणाल पाण्डेय को।

“हमारे विगत में सही वैचारिक फूट जब कभी भी हुई तो उससे अणुबम सरीखी ऊर्जा निकली है, और उस समय उसने देशकाल पात्रता के हिसाब से समय-समय पर हमारे देश में नर्म और गर्म दलों की, वाम और दक्षिण पंथ और मध्यमार्गी दलों की वैचारिकता स्पष्टता बनाई। लेकिन मंथन के बाद सार्थक ऊर्जा के विकिरण की बुनियादी शर्त यह है कि मथानी का आधार किसी एक की निजी सत्ता हवस की आंधी को नहीं, कठोर वैचारिकता की कछुआ पीठ को बनाया गया हो। हवा-हवाई गुब्बारों की फूट से तो गर्म हवा ही निकल सकती है।“

सारी अच्छाइयों और बुराइयों के बाद भी गौरव मय भारत रहा है अपना। धर्म की संस्कृति पर चलते हुए विश्व को ही अपना बन्धु मानने वाला और सर्वे भवन्तु सुखिनः की प्रार्थना के साथ एक सादा और शांत ऋषि-मुनियों से जीवन से अपनी शुरुवात करने वाला। धर्म की हानि होने पर प्रभु स्वयं अवतरित हो जाते हैं मानवता की रक्षा के लिए, ऐसी कामना और विश्वास करने वाला देश है हमारा। आश्चर्य नहीं भारत में जहाँ-जहाँ घूमने गई, जो भी देखा-समझा और जाना भारत को आज भी, इतने हजारों वर्षों बाद भी , भारत की भक्ति और संस्कृति को शिव, राम और कृष्णमय ही पाया मैंने और आज भी हमारा सारा विमर्ष , सारी वैचारिक और धार्मक मान्यतायें रामायण और महाभारत इन्ही दो महान ग्रन्थों में अपनी हर समस्या का समाधान और शांति तलाशती हैं।
एक सुदृढ़ सशक्त वैचारिक धरोहर तो है ही हमारे पास, बहुत कुछ दिया है प्रकृति ने भी हमें। क्या नहीं है सुजलां , सुफलां, शस्य श्यामला हमारी मातृभूमि में !

लेखनी का यह अंक इसी गौरवमय माँ का वन्दन और श्रुतिगान है। कहीं कुछ कर्कष या दुख भरी कर्ण-अप्रिय ध्वनियाँ या शिकायतें सुनाई दे रही हैं तो उन सभी पर ध्यान देना भी हम सभी भारतीयों का धर्म है-क्योंकि कहीं भी रहें, हम ही तो हैं भारत और इसकी पहचान। इसका एक-एक आंसू , एक-एक मुस्कान …सारे सुख दुख हमारे अपने ही तो हैं।… माना हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी बहुत कुछ कर रहे हैं, करना चाहते हैं परन्तु अगर भारत देश नाम की इस बगिया को स्वच्छ व सुंदर रखना है, तो स्वभावगत् इन बुराइयों को, इस कूचघास को उखाड़ते चलना हर भारतीय का धर्म भी है और कर्तव्य भी। मानाकि धर्म, सद्भाव और पारस्परिक सद्भाव भारतीय समाज व परिवार प्रणाली के मेरुदंड रहे हैं, वहीं यह बात भी उतनी ही सही है कि यदि धोखाधड़ी , जलन और आपसी फूट न होती देश में तो मज़ाल था कि विदेशी 500 से अधिक वर्षों तक क्या हमपर यूँ शासन कर पाते? खुदको आइने में उतारने की, प्रांजल करने की हिम्मत तो बटोरनी ही होगी। न तो अतीत के गौरव में जिया जा सकता है और ना ही आँखें मूंदकर सही दिशा में चला ही जा सकता है।

बुरे का श्राद्ध और अच्छे का पोषण; आज भारत की कोई अन्य इससे अच्छी पूजा और वन्दना हो ही नहीं सकती और अपने छोटे से तरीके से लेखनी का यह प्रयास सदा जारी रहेगा- केदार नाथ अग्रवाल के इन शब्दों के साथ सभी देश प्रेमियों का आवाहन करते हुए कलम को विराम देती हूँ।

‘‘टूटें न तार कभी जीवन सितार के/ऐसे बजाओ इन्हें प्रतिभा के ताल से
किरणों के कुमकुम से, सेनुर, गुलाल से/लज्जित हो युग का अंधेरा निहार के।”

भारत की स्वाधीनता की इस 74 वीं वर्षगांठ और जन्माष्टमी व रक्षाबंधन जैसे माह के आगामी महत्वपूर्ण त्योहारों पर हर भारतवासी, भारतवंशी और भारत बंधुओं को अशेष बंधाइयों के साथ ईश्वर से यही प्रार्थना है कि हम सब चाहे जहाँ कहीं भी हों और जिस भी हालत में हों, खुश रहें और अपनी पूरी योग्यता…पूरी खुशी व पूरी ईमानदारी व समर्पण के साथ, इस कठिन व भ्रमित वक्त में भी भरपूर जीवन जिएँ।
जानती हूँ समय एक अनवरत धारा की तरह है, अगला-पिछला सब साथ लेकर बहता है फिर भी जब भी भारत के बारे में सोचती-पढ़ती हूँ , कहीं भी घूमने गई हूँ तो मुख्यतः भारत के इतिहास को तीन हिस्सों में बंटा पाती हूँ। ऋषि-मुनियों और भक्तों का भारतः वह शिव राम और कृष्ण का समय, मुगल काल और अंग्रेजों का कालः यानी पराधीन भारत और अंत में 1947 के बाद का आज का भारत। इन्ही तीन खंड़ों के आधार पर तीन विशेष अंक देने का इरादा है लेखनी का भारत के इस अमृत महोत्सव वर्ष में। सभी लेखक कवि व विचारक मित्रों से सहयोग का अनुरोध भी है और विश्वास भी ।

तो मित्रों प्रस्तुत है पहला भाव सुमन मां भारती के चरणों में-भारत का गौरवमय अतीत…

वन्दे मातरम्!
शैल अग्रवाल

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