सोच और संस्कारों की सांझी धरोहर
Bridging The Gap
(छायांकनःशैल अग्रवाल)
स्वागत है नववर्ष
‘वक्र भले है पदचाप समय की
विधना भी खेले कितनी आँख-मिचौली
उदास नहीं, निराश नहीं, विश्वास अटूट
जबतक ये सूरज चंदा, आनंद है हर्ष है
है ज्योति किरण सी आस हमारी जगमग
शब्ब् शब्द हर भाव स्वप्न-सा मनमोहक
जलती धरती पर रहे शीतल मरहम
आओ फिर हरियाते और लहराते
नव वर्ष के संकल्प नव !’
शैल अग्रवाल

जनवरी-फरवरी २०२६
(अंक १६४-वर्ष १९)
लेखनी-लघुकथा-महोत्सव (भाग-२)
अपनी बातः यह दूसरी कडी
इस अंक मेंः
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