साक्षात्कारः रूपसिंह चन्देलः अशोक दर्द

वरिष्ठ साहित्यकार रूपसिंह चन्देल के साथ अशोक दर्द की बातचीत

प्रश्न १- पाठकों को उत्सुकता होती है लेखक के जन्मस्थान, परिवार आदि के विषय में जानने की, कृपया बताएं ?
उत्तर : मेरा जन्म एक मध्यवर्गीय परिवार में कानपुर जनपद के गांव नौगवां(गौतम) में १२ मार्च,१९५१ को हुआ था. पिता (सुरजन सिंह चन्देल) कलकत्ता (अब कोलकाता) में रेलवे में नौकरी करते थे. वास्तव में यह मेरे पिता का अपना गांव नहीं था. यह उनकी ससुराल थी अर्थात मेरी ननिहाल जहां मेरा परिवार बस गया था. कहना सही होगा कि बसने के लिए विवश हुआ था. मेरे प्रपितामह महीपत सिंह कानपुर के मसवानपुर नामक गांव में रहते थे. यह गांव आज शहर के मध्य अवस्थित है. इसका ऎतिहासिक नाम महिसानपुर था. पितामह बिपत सिंह कानपुर के नवाबगंज थाना में सिपाही थे. उन्होंने अपने लिए पुराना कानपुर के रानीघाट (गंगा किनारे का एक घाट) में एक मकान बनवा लिया था, क्योंकि नवाबगंज से मसवानपुर लगभग पांच मील दूर है. उन दिनों आबादी कम थी और जंगल था. पुलिस की नौकरी एक प्रकार से चौबीस घण्टे की होती है, शायद उन्होंने रात या देर से आने-जाने के कारण यह निर्णय किया था. प्रपितामह और प्रपितामही का पता नहीं, लेकिन पितामही अर्थात मेरी दादी की मृत्यु तब हो गयी थी जब मेरे पिता ढाई वर्ष के थे. मेरे एक बुआ थीं जो पिता जी से पांच-सात वर्ष बड़ी थीं. संभव है और अधिक बड़ी रही हों. मेरे पितामह लगभग छः फुट के थे, जबकि पिताजी पांच फुट तीन इंच. इसका मतलब यह कि दादी का कद कम रहा होगा. बहरहाल दादी की मृत्यु के पश्चात पितामह ने पुनः विवाह किया. मेरी सौतेली दादी को पुत्र हुआ जिनका नाम नन्हे था. लेकिन मेरे पितामह की मृत्यु भी जल्दी ही हो गयी —शायद तब जब पिता जी छः-सात वर्ष के रहे थे. मेरी बुआ का विवाह शहर से लगभग पन्द्रह मील दूर गांव देसामऊ में हो चुका था. पितामह की मृत्यु के पश्चात सौतेली दादी अपने पुत्र को लेकर अपने मायके चली गयीं. अंततः मेरे पिता को अपनी बहन के यहां जाकर रहना पड़ा, जहां बड़े होने के पश्चात वहां पड़ी दस बीघा चरीदा जमीन को उन्होंने जोत योग्य बनाया था. वह सरकारी जमीन थी, जिसे उन्होंने किसी प्रकार पिताजी ने नाम लिखवा लिया था. लेकिन पिताजी और उनके बहनोई के संबन्ध मधुर नहीं थे. परिणामतः पिताजी प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान फौज में सिपाही के रूप में भर्ती हुए. वह अपढ़ थे और जिन्दगीभर अपढ़ ही रहे थे. युद्ध के दौरान वह सिंगापुर,फिर फ्रांस और इटली भेजे गए. वहां से लौटने के बाद उन्होंने वह नौकरी छोड़ दी या छटनी में निकाल दिए गए थे. उसके बाद उन्होंने कुछ दिन खेती करने का प्रयास किया, लेकिन पुनः बहनोई के साथ संबन्ध बिगड़ने के बाद कलकत्ता (कोलकता) चले गए, जहां बंगाल पुलिस में सिपाही के रूप में भर्ती हुए. वह नौकरी भी उन्हें रास नहीं आयी और एक बार फिर वह गांव लौटे. लेकिन फिर वही हाल और वह मुम्बई गए जहां एक मारवाड़ी के यहां कुछ दिन काम किया. यह पता चलने के बाद कि मारवाड़ी कुछ गलत व्यवसाय में लिप्त था उन्होंने वह नौकरी भी छोड़ दी. एक बार फिर गांव और वहां से कलकत्ता. कुछ दिनों तक सड़क किनारे बाबू मोशाओं के लिए दातून बेचने के बाद किसी प्रकार रेलवे में खलासी के रूप में भर्ती हुए और मालगाड़ी के ड्राइवर के रूप में सितम्बर, १९५९ में अवकाश ग्रहण किया. अनुमान है कि १९३५ के आसपास नौगवां (गौतम) की रामदुलारी गौतम के साथ उनका विवाह हुआ. पिताजी के भांजे ने कोर्ट में हलफनामा देकर कि उनके मामा की मृत्यु हो चुकी है और उनका कोई वारिस नहीं है देसामऊ के पिताजी के खेत अपने नाम लिखवा लिए थे. पिताजी ने यह कहते हुए कि, “भांजा भी बेटा ही होता है” खेतों की ओर से अपने को विमुख कर लिया था. वह कोलकता (तब कलकत्ता) में बसना चाहते थे, लेकिन मां की जिद के कारण अवकाश ग्रहण के बाद उन्हें अपनी ससुराल नौगवां (गौतम) आना पड़ा, जहां मेरे नाना ने अपनी १३ बीघा अतिरिक्त खेत मां को दे दिए थे. हम तीन भाई और दो बहनें थे. बड़े भाई श्री जगरूपसिंह चन्देल मुझसे ९ वर्ष बड़े हैं, जबकि छोटा भाई स्व. राजकुमार चन्देल ९ साल छोटा था. उसकी मृत्यु १८ दिसम्बर,२०१५ को हो गयी थी. बड़ी बहन मुझसे १२ वर्ष बड़ी थीं जबकि छोटी बहन तीन साल छोटी थी, उसकी मृत्यु भी १८ दिसम्बर,२०१९ को हुई.
मेरा २०१९ में प्रकाशित उपन्यास ’कानपुर टु कालापानी’ पिताजी के जीवन पर ही आधारित है.
प्रश्न २ – आपकी शिक्षा कहाँ-कहाँ हुई? प्रारम्भिक शिक्षा से उच्च शिक्षा तक की पूरी यात्रा के बारे में बताएं.
उत्तर – मेरी प्रारंभिक शिक्षा गांव से एक मील उत्तर स्थित गांव पुरवामीर के जुग्गीलाल कमलापति प्राइमरी पाठशाला में हुई. उन दिनों मेरे गांव में विद्यालय नहीं था. वहां से १९६२ में पांचवी कक्षा उत्तीर्ण किया. छठवीं से लेकर आठवीं अर्थात जूनियर हाई स्कूल तक की शिक्षा गांव से तीन मील दूर महोली नामके गांव में हुई. १९६५ में आठवीं की बोर्ड परीक्षा में प्रथम श्रेणी पायी. १९६५ में नवीं में मैंने भास्करानंद इण्टर कॉलेज, नर्वल में विज्ञान के छात्र के रूप में प्रवेश लिया. यह “झंडा ऊंचा रहे हमारा, विजयी विश्व तिरंगा प्यारा” राष्ट्रगान के रचयिता श्यामलाल गुप्त पार्षद का गांव है. वहां से १९६७ में हाई स्कूल करने के पश्चात बड़े भाई मुझे शहर ले गए जहां वह हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ((HAL) में नौकरी करते थे. ग्यारहवीं में मैंने जाजमऊ के इंटर कॉलेज में विज्ञान में प्रवेश लिया, लेकिन न मुझे फिजिक्स समझ आ रही थी, न गणित और न ही केमेस्ट्री. मैं पिछड़ता जा रहा था. मैं गांव से गया था, जबकि वहां सभी शहर के पढ़े छात्र थे. मैं निरंतर हीन भावना का शिकार होने लगा. अंततः मैंने पुनः गांव लौटने का फैसला किया. नर्वल में उस वर्ष से विज्ञान की कक्षाएं प्रारंभ हो चुकी थीं. बहुत जद्दो-जहद के बाद गांव लौटा और भास्करानंद इंटर कॉलेज में विज्ञान में प्रवेश लिया. समझ कुछ तब भी नहीं आ रहा था, लेकिन विद्यार्थी अपने जैसे थे और माहौल अपने अनुकूल पाकर मैंने परिश्रम किया और ग्यारहवीं उत्तीर्ण कर गया, लेकिन दुर्भाग्य से ८ जुलाई,१९६८ को मुझे टायफाइड हो गया जिसने मेरा साल बरबाद कर दिया. पूरा वर्ष जानवर चराते बीता. लेकिन इस दौरान यह अनुभूति हुई कि यदि मैं गांव में रहा तब जीवन में कुछ भी नहीं कर पाउंगा. मन में ऊंची आकांक्षाएं थीं—कुछ बनने की. पुनः शहर लौटने का निर्णय किया. घर की आर्थिक स्थिति १९६२ से बहुत ही दयनीय थी. सुबह है तो शाम नहीं वाली स्थिति रही थी भाई साहब की नौकरी लगने तक. उनकी नौकरी के बाद भी हालात बहुत अच्छे न हुए थे. वह अकेला कमाने वाले थे. घर में मां ने दो भैंसे और एक गाय पाली हुई थी. उनका दूध भी कटता जाता था. ९ लोगों का परिवार था और आय सीमित थी. उसपर १९६७ में छोटी बहन की शादी की गई थी जिसमें कर्ज लिया गया था. इससे बड़ी बात यह थी कि मैं बड़े भाई की बात की अवहेलना करके गांव लौटा था. वह पुनः शहर ले जाने को तैयार नहीं थे. बहुत समझाने के बाद भाई साहब मुझे शहर ले जाने के लिए राजी हुए, लेकिन शैक्षणिक योग्यता के लिए नहीं, उन्होंने मुझे आई.टी.आई. में प्रवेश दिलाया. संस्थान का शास्त्रीनगर में होस्टल था. मैं पूरे वर्ष उसमें रहा. मेरी क्लास में लगभग तीस छात्र थे, जिसमें केवल सात उत्तीर्ण हुए थे, जिसमें मैं भी एक था. उसके बाद की मेरी सारी शिक्षा एक निजी छात्र के रूप में हुई. १९७१ में उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड से मैंने इण्टरमीडिएट किया. १७ अप्रैल,१९७३ को सरकारी नौकरी लगी तो आगे पढ़ने की दबी इच्छा पुनः जाग्रत हुई. कानपुर के डी.बी.एस. कॉलेज गोविन्दनगर में सुबह के सत्र में प्रवेश लिया. सुबह सात बजे से नौ बजे तक कॉलेज जाना था. नौकरी ऑर्डनेंस फैक्ट्री में थी, जो वहां से निकट ही थी. केवल चार दिन ही कॉलेज गया कि मेरा स्थानांतरण ऑर्डनेंस फैक्ट्री, मुरादनगर (तब मेरठ, अब गाजियाबाद) हो गया. रेगुलर पढ़ने की इच्छा पर पुनः तुषारापात. उसके बाद रेगुलर पढ़ाई एक स्वप्न ही रही. १९७४ में कानपुर विश्वविद्यालय से बी.ए. और १९७६ में निजी छात्र के रूप में ही डी.ए.वी. कॉलेज कानपुर से प्रथम श्रेणी में हिन्दी में एम.ए. किया. लगा जीवन बदलेगा. और पी-एच.डी. करने का संकल्प किया. एक निजी छात्र के रूप में एम.ए. किया था, भले ही प्रथम श्रेणी थी जबकि उस वर्ष कानपुर विश्वविद्यालय के अधीन चार सौ महाविद्यालय थे, जिनमें केवल बीस छात्र एम.ए. हिन्दी में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए थे. मैं उनमें से एक था, लेकिन जिस भी प्रोफेसर के पास उसके अधीन पी-एच.डी. के रजिस्ट्रेशन के लिए जाता उसका यही कहना होता कि मैंने प्राइवेट छात्र के रूप में एम.ए. किया था और वह प्राईवेट छात्र को अपने अधीन नहीं रखते. एक-दो ने रजिस्ट्रेशन करवाने के लिए रिश्वत की मांग की. हताश हो चुका था, लेकिन तभी मेरे इंटर कॉलेज के समय के मुझसे सीनियर श्री डी.पी.शुक्ल, जो उन दिनों कानपुर विश्वविद्यालय के डिग्री विभाग में कार्यरत थे ने मेरी सहायता की और डॉ. बैजनाथ त्रिपाठी जी अपने अधीन मुझे रजिस्ट्रेशन करवाने के लिए तैयार हो गए. बहुत ही नेक व्यक्ति थे और इस प्रकार १९८५ में मुझे पी-एच.डी. की उपाधि मिली थी.
प्रश्न ३ – बचपन जीवन का स्वर्णिम काल होता है .इस स्वर्णिम काल की कुछ यादें?
उत्तर – मेरी स्मरण शक्ति बहुत अच्छी है, यही कारण है कि अब तक मैं ६४ संस्मरण लिख चुका हूं. ५४ संस्मरणों की मेरी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. बचपन की कितनी ही यादें ताजा हैं. लेकिन एक ही आपसे साझा करूंगा. मेरे बचपन का कुछ समय कलकत्ता में बीता था. शायद मैं चार वर्ष का था तब की बात है. प्राइमरी तक की शिक्षा पुरवामीर पाठशाला से उत्तीर्ण करके बड़े भाई साहब आगे की पढ़ाई के लिए कलकत्ता जा चुके थे. मां पिता-पिता निरक्षर थे, लेकिन बच्चों को पढ़ाने की उत्कट इच्छा थी उनकी. पिता जी भद्र बंगालियों के साथ रहते थे. वह उन सबके पढ़ने-लिखने से प्रेरित थे और हम सभी को उच्च शिक्षा देना चाहते थे. उस बार कलकत्ता जाने पर मुझे भी स्कूल भेजने का निर्णय किया गया. पिता जी हावड़ा के लोकोमोटिव वर्कशॉप में थे और उससे निकट ही था बामन गाछी, जहां रेलवे ने अपने कर्मचारियों के लिए नयी कॉलोनी बनायी थी. यह चार मंजिला कॉलोनी थी लाल रंग के ईंटों की बनी हुई. इसमें मध्यम श्रेणी के अधिकारियों से लेकर द्वितीय श्रेणी के कर्मचारी रहते थे. पिता जी को सी-८६ नं फ्लैट मिला हुआ था, जो पहली मंजिल पर था. बहुत सुन्दर और बड़ा फ्लैट था वह.
मुझे सड़क पार एक स्कूल में प्रवेश दिलाया गया. पढ़ने में मेरी रुचि नहीं थी. मैं परेशान. कॉलोनी के बाद सड़क थी जिसमें वाहन चलते रहते थे. उसके बाद एक नाला था. नाला पार करके एक बस्ती थी, जिसमें किन्हीं सिन्हा जी का निजी स्कूल था. स्कूल में हमें जमीन पर फट्टों पर बैठना होता. बड़े भाई सुबह स्कूल छोड़कर अपने कॉलेज चले जाते और दोपहर छुट्टी होने पर मैं स्वयं आ जाया करता. पढ़ाई में मन न लगने के कारण मैं किसी प्रकार बचने के उपाय सोचने लगा. अंततः एक दिन मैंने रोते हुए स्कूल न जाने की घोषणा कर दी. पूछने पर कहा कि हेड मास्टर डांटते हैं और बच्चों को गोबर लिपी जमीन पर टाट फट्टों पर बैठना होता है. मैं ऎसे गंदे स्कूल में पढ़ने नहीं जाउंगा. भाई और पिता जी ने बहुत समझाया, लेकिन मैंने जिद ठान ली थी. पूछा गया कि क्या करोगे, बोला –“खेती करूंगा.” मेरी जिद काम आयी. कुछ दिनों बाद स्कूल का वार्षिक कार्यक्रम था. रंग बिरंगी पोशाकों में सजे उस स्कूल के बच्चे उस दिन ढोल-ताशों के साथ कॉलोनी में आए थे. हेड मास्टर सिन्हा मुझे समझाने मेरे फ्लैट में आए, लेकिन उनके समझाने का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ा मुझपर. मैं उस विद्यालय तो नहीं गया लेकिन बड़े भाई ने अपने कॉलेज के निकट एक स्कूल में मुझे प्रवेश दिला दिया. वह साफ-सुथरा स्कूल था और बैठने के लिए मेज-कुर्सियां थीं. छोटा-सा लॉन और फूलों सजी क्यारियां थीं. भाई साहब प्रतिदिन दोपहर मुझे कभी लड्डू तो कभी गुलाबजामुन दे जाते. मेरा मन रमने लगा. दो-तीन माह ही उस स्कूल गया तभी मां ने गांव लौटने का कार्यक्रम बना लिया और मुझे और छोटी बहन को लेकर गांव लौट आयीं. उसके बाद कुछ माह तक मैं हम उम्र बच्चों को कंच्चे खेलता देखता रहा था. खेलने में कभी रुचि नहीं रही. बाद में किसी प्रकार समझाकर मां ने मुझे जुग्गी लाल कमलापति विद्यालय में प्रवेश दिला दिया था.
प्रश्न ४ – लेखक बनना है यह विचार कब आया?
उत्तर – २० अक्टूबर,१९६२ को चीन ने भारत पर आक्रमण किया था. यह युद्ध २१ नवंबर,१९६२ को समाप्त हुआ था. उन दिनों मैं छठवीं का छात्र था. महीना याद नहीं. स्कूल में हम टाट-फट्टों में बैठते थे. लंच का समय था. कक्षा स्कूल से बाहर लगी हुई थी. सभी बच्चे लंच के लिए गए हुए थे. मेरे साथ एक और छात्र कक्षा में था. शिक्षक की कुर्सी पर दैनिक जागरण अखबार पड़ा हुआ था. हम दोनों ने उसे आधा-आधा बांट लिया. जो हिस्सा मेरे पास आया उसमें किसी की वीर रस की कविता प्रकाशित थी. उसे पढ़कर मेरे अंदर भी वीर रस उमड़ा और मैंने भी उसी समय एक तुकबंदी लिख डाली. उसके बाद वैसी तुकबंदियां लिखने लगा. मन में लेखक बनने का विचार दृढ़ निश्चय का रूप ले चुका था. एक दिन मेरे पड़ोसी कृष्णकुमार त्रिवेदी, जो मेरे सहपाठी और मित्र बाला प्रसाद के पिता थे, को मेरी तुकबंदियों की छोटी-सी डायरी-नुमा पुस्तिका मिली, जिसे मैंने खास उसी उद्देश्य से कॉपी के पन्नों को फाड़कर बनाया था. उन्होंने उसे देते हुए मुझसे पूछा, “तुम क्या बनना चाहते हो?” मैंने कहा, “लेखक बनना चाहता हूं.” आठवीं की परीक्षा के बाद एक लंबी कहानी लिखी –’नौकरी की खोज’. नवीं में दो जासूसी-से उपन्यास लिखे. उसके बाद वर्षों तक का समय संघर्षमय रहा. पुनः विधिवत लेखन १९७८ में प्रारंभ हुआ.
प्रश्न ५ –सबसे पहले आपने किस विधा में लिखा. वह रचना कौन सी थी क्या आपको याद है?
उत्तर – पहली रचनाओं के विषय में बता चुका हूं. लेकिन वे सब रचनाएं उपलब्ध नहीं. १९७८ में पटना की एक लघु-पत्रिका की ओर से नशाबंदी पर एक आलेख लिख भेजने का प्रस्ताव मिला. सबसे पहले प्रकाशित होने वाली वह रचना थी, लेकिन न वह आलेख आज मेरे पास है और न ही उस पत्रिका का नाम याद है.
प्रश्न ६ – सबसे पहली छपी रचना का सुख आपने सबसे पहले किसके साथ साझा किया था?
उत्तर – ३१ अक्टूबर,१९७३ में मैं स्थानांतरित होकर मुरादनगर पहुंचा था. १९७७ में वहां की विवधा नामक साहित्यिक संस्था से जुड़ा. वहां के साहित्यिक अभिरुचि के लोगों से ही मेरी मित्रता थी. उनमें एक वरिष्ठ मित्र थे प्रेमचन्द गर्ग. उस आलेख का सुख सबसे पहले प्रेमचन्द गर्ग से साझा किया था.
प्रश्न ७ – आपने विभिन्न विधाओं में कार्य किया—सर्वाधिक कौन-सी विधा आपको आकर्षित करती है?
उत्तर –उपन्यास विधा.
प्रश्न ८ – इतना लिखने के बावजूद क्या आप अनुभव करते हैं कि जो आप लिखना चाहते थे नहीं लिख सके?
उत्तर – बिल्कुल सही कहा आपने. बहुत कुछ है ऎसा जो लिखा जाना है. १८५७ की क्रान्ति को लेकर एक वृहद उपन्यास की योजना लगभग तीस सालों से मन में पल रही है. ढेर-सारी सामग्री एकत्रित किया. पढ़ा. दर- असल क्रान्ति की योजना कानपुर के निकट बिठूर में अजीमुल्ला खां द्वारा बनायी गयी थी, जो नाना साहब के सलाहकार और मंत्री थे. यदि अजीमुल्ला खां नहीं होते तब वह क्रान्ति नहीं होती. मेरे उपन्यास का प्रमुख पात्र उन्हें ही होना है, लेकिन वह योजना टलती जा रही है. अन्य उपन्यासों के इतने कथानक दिमाग में मंडराने लगते हैं और चूंकि वे सम-सामयिक स्थितियों पर होते हैं इसलिए वे लिखे गए और आगे भी उन पर ही काम करने का विचार है. समय मिला तो उस उपन्यास पर कार्य अवश्य करूंगा.
प्रश्न ९– अपने अब तक के लेखन से संतुष्ट हैं?
उत्तर – जिस दिन संतुष्ट हो जाउंगा, लिखना बंद हो जाएगा.
प्रश्न १० – आपके साहित्यिक मित्रों की सूची कितनी लम्बी है .आप किस-किस को यहाँ याद करना चाहेंगे ?
उत्तर – बहुत लंबी नहीं है. आजकल शेक्सपियर का एक कथन बहुत दोहराया जा रहा है –“नाम में क्या रखा है!”
प्रश्न ११ –आपकी रचनात्मकता का मुख्य स्वर क्या है?
उत्तर – मैं व्यवस्था विरोधी लेखक हूं. मुझे जो कहना होता है निर्भीकता के साथ बेलागभाव से कहता हूं. किसी पुरस्कार या पद का लालच कभी नहीं रहा,क्योंकि ये लालच लेखक को उसके लेखकीय कर्तव्य से विरत करते हैं. मेरी कहानियों के अधिकांश पात्र हाशिए पर पड़े लोग हैं तो उपन्यासों में विभिन्न सामाजिक,राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक आदि विभिन्न विषयों का चित्रण हुआ है. किसी दलगत विचार से संबद्ध नहीं—कह सकते हैं मेरा रचनात्मक स्वर मानवतावादी है.
प्रश्न १२ – साहित्य में आपका कोई उस्ताद रहा जिससे आपने रचनात्मक बारीकियां सीखी हों ?
उत्तर – कोई उस्ताद नहीं रहा.
प्रश्न १३ – कहते हैं प्रत्येक सफल पुरुष के पीछे किसी नारी का हाथ रहता है– आपके अनुसार यह कितना सच है?
उत्तर – मैं ऎसा नहीं मानता. यदि सफल पुरुष के पीछे किसी नारी का हाथ होता है तब जो नारियां सफलता के शिखर पर पहुंचीं उनके पीछे किसका हाथ रहा. जीवन और लेखन में मैं मैक्सिम गोर्की को अपना आदर्श मानता हूं. गोर्की के जीवन में किसी नारी की भूमिका नहीं देखता. हो सकता है किसी व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों की सफलता में उसकी मां, पत्नी, प्रेमिका या किसी अन्य स्त्री की भूमिका रही हो. लेकिन यह सभी सफल व्यक्तियों का सच नहीं है. हर सफल व्यक्ति के जीवन की सफलता के अलग-अलग कारण होते हैं. उसमें उसके संघर्ष की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है. यदि मैं अपनी बात करूं तो सच यह है कि मेरा जीवन इतना संघर्षपूर्ण रहा और आज भी है कि हर अगले कदम को मैंने चुनौती के रूप में लिया और प्राणपण से उसे पूरा करने के प्रयत्न किए. वैसे मैं महान व्यक्ति नहीं इसलिए उपरोक्त कहावत मेरे संदर्भ में वैसे भी लागू नहीं होती, लेकिन यह स्पष्ट कर दूं मेरे जीवन में किसी स्त्री की कोई ऎसी भूमिका नहीं रही जिससे मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली हो. आप मुझे जुनूनी कह सकते हैं और वह जुनून मुझे यहां तक ले आया. केवल लेखन के लिए छः साल पहले सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया था.
प्रश्न १४ – आपने रूसी साहित्य का अनुवाद किया है. यह कार्य आपने किसी के प्रस्ताव पर किया या पुस्तकों का चयन स्वयं किया और किन कठिनाइयों का सामना आपको करना पड़ा?
उत्तर – कभी रूसी लेखक अलेक्सेई तोल्स्तोय की बाल कहानियों का अनुवाद किया था. कुछ अन्य अंग्रेजी लेखकों की बाल कहानियों के अनुवाद भी किए थे. उसके बाद लगा कि मुझे किसी बड़ी कृति का अनुवाद करना चाहिए. नौकरी से स्वैच्छिक अवकाश लेने से पहले अकस्मात मुझे लियो तोल्स्तोय का अंतिम उपन्यास ’हाजी मुराद’ केन्द्रीय सचिवालय पुस्तकालय, शास्त्री भवन से मिला. मेरे लिए यह चौंकाने वाली बात थी, क्योंकि तोल्स्तोय के सभी उपन्यासों के अनुवाद मैं तब तक पढ़ चुका था. बल्कि आज भी सभी मेरे निजी पुस्तकालय में हैं. ’हाजी मुराद’ चेचन समस्या पर केन्द्रित है और उपन्यास का मुख्य नायक हाजी मुराद है, जोकि एक ऎहितिहासिक चरित्र है. उपन्यास पढ़ने के बाद पता चला कि वह उपन्यास तोल्स्तोय ने १८९६ से १९०४ के दौरान लिखा था और मूल रूसी भाषा में वह उनके मरणोपरांत १९१७ के बाद प्रकाशित हुआ था. कारण पर विचार किया तो लगा कि उस उपन्यास में अधिकांश पात्र ऎतिहासिक हैं और संभव था कि लिखे जाने तक उनमें से कुछ जीवित रहे हों. बहरहाल सेंसर बोर्ड ने उसे प्रकाशन की अनुमति नहीं दी थी. जार के समय हर पुस्तक या रचना के लिए सेंसर बोर्ड की अनुमति लेना होता था. मैंने इस उपन्यास के विषय में राजेन्द्र यादव सहित कई वरिष्ठ लेखकों से चर्चा की. किसी को जानकारी ही नहीं थी कि तोल्स्तोय ने ऎसा उपन्यास भी लिखा था. तभी मैंने तय किया कि मैं उसका हिन्दी अनुवाद करूंगा. उसकी फोटॊ-प्रति मैंने रख ली और ३० नवंबर,२००४ को स्वैच्छिक सेवावकाश लेने के बाद १ दिसम्बर,२००४ से ही मैंने उसका अनुवाद प्रारंभ कर दिया. उसका चयन मैंने स्वयं किया था. वह संवाद प्रकाशन से २००८ में प्रकाशित हुआ. उसके बाद मैंने लियो तोल्स्तोय पर ३० संस्मरणों का अनुवाद किया, जो ’लियो तोल्स्तोय का अंतरंग संसार’ नाम से पुस्तकाकार रूप में संवाद प्रकाशन से ही २०१३ में प्रकाशित हुई. मुझे हाजी मुराद के अनुवाद में कठिनाई हुई थी, क्योंकि किसी बड़ी कृति का वह मेरा पहला अनुवाद था. अपने वरिष्ठ साहित्यकार मित्र स्व. वीरेन्द्र कुमार गुप्त को तीन-चार चैप्टर दिखाए. उन्होंने केवल पहला चैप्टर देखा और कुछ सुझाव दिए. यह पुस्तक मेरे लिए चुनौती थी. मैंने तीन बार उस अनुवाद पर कार्य किया और अंततः संतुष्ट होने के बाद ही उसे प्रकाशन के लिए दिया. उसके बाद ऎसा अभ्यास हो गया कि चीजें आसान हो गयीं. हाल में मैंने हेनरी त्रायत लिखित लियो तोल्स्तोय की जीवनी ’तोल्स्तोय’ (६९९ पृष्ठ अंग्रेजी में) का अनुवाद पूरा किया, जो संवाद प्रकाशन, मेरठ से जल्दी ही प्रकाशित होगी.
प्रश्न १५ – दोस्तोएव्स्की की जीवनी ’दोस्तोएव्स्की के प्रेम’ आपने लिखी, इसकी प्रेरणा आपको कैसे मिली?
दोस्तोएव्स्की की अनेक जीवनियां लिखी गयीं फिर आपके द्वारा इसे लिखने का क्या कारण रहा?
उत्तर – ’दोस्तोएव्स्की के प्रेम’ लिखने की प्रेरणा मुझे स्व. वीरेन्द्र कुमार गुप्त जी से मिली थी. वह दोस्तोएव्स्की से बहुत प्रभावित थे. उन्होंने दोस्तोएव्स्की का संपूर्ण साहित्य पढ़ा था. मुझे भी पढ़ने के लिए प्रेरित किया. एक पुस्तक है ’थ्री लव्स ऑफ दोस्तोएव्स्की’. वीरेन्द्र जी ने उसे पढ़ने के लिए प्रेरित किया. संयोग से यह मुझे दिल्ली पब्लिक पुस्तकालय में मिल गयी. उस पुस्तक ने दोस्तोएव्स्की के जीवन के विषय में और जानने की इच्छा जागृत कर दी. दिल्ली विश्वविद्यालय पुस्तकालय में उन पर मुझे प्रचुर सामग्री मिली. उन पुस्तकों से गुजरते हुए पाया कि उनका जीवन भयानक रूप से अराजक था. तभी मुझे हेनरी त्रायत लिखित जीवनी पढ़ने का अवसर मिला. आश्चर्य की बात यह थी कि उसमें दोस्तोएव्स्की के अराजक जीवन के कुछ अंश ही थे. इसका अनुवाद श्री बल्लभ सिद्धार्थ जी ने किया है. यह संवाद प्रकाशन से प्रकाशित हुई थी और प्रकाशन से पूर्व श्री आलोक श्रीवास्तव ने उसे देखने के लिए मुझे भेजा था. यह तो बाद में पता चला कि बल्लभ जी ने लेखक के चरित्र के उन अंशों का अनुवाद किया ही नहीं जिससे दोस्तोएव्स्की की छवि खराब होती. यही नहीं दोस्तोएव्स्की की पत्नी अन्ना ने उनकी जो जीवनी लिखी उसमें भी सब कुछ छुपाया उन्होंने. अन्य जीवनीकारों ने भी वही किया. मारिया, अपोलिनेरिया और अन्ना तो वे स्त्रियां थीं जिनके साथ दोस्तोएव्स्की के प्रेम संबन्ध रहे. उनकी पहली पत्नी मारिया थी. अपोलिनेरिया उनसे २३ वर्ष छोटी थी और दोस्तोएव्स्की ने उसका जीवन तबाह कर दिया था. अंत में उन्होंने दूसरी शादी अन्ना से किया था, जिसने उनके जीवन को संवार दिया था. लेकिन जीवनियों से इतर जो साहित्य मिला उनमें दोस्तोएव्स्की के अराजक जीवन पर विस्तार से प्रकाश डाला गया था और हिन्दी पाठकों को उनके जीवन की वास्तविक छवि दिखाने के लिए मैंने यह पुस्तक लिखी. दोस्तोएव्स्की भयानक रूप से जुआरी, शराबी और लंपट थे. उन्होंने शताधिक स्त्रियों के साथ संबन्ध बनाया था. उनके लिए स्त्री होना ही पर्याप्त था, वह सड़क छाप थी, वेश्या थी या किसी अच्छे परिवार से थी यह मायने नहीं रखता था. वास्तव में वह विकृत यौनिकता का शिकार थे.
प्रश्न १६ – अब तक आपको कितने सम्मान मिले. सम्मान मिलना कितना सुखद है, बतायेंगे ?
उत्तर – सबसे पहले १९९० में हिन्दी अकादमी से मेरे पहले कहानी संग्रह ’अज़गर तथा अन्य कहानियां’ के लिए साहित्यिक कृति सम्मान मिला. उसी वर्ष बाल कहानी संग्रह ’चतुर रबीला’ को भी हिन्दी अकादमी दिल्ली से साहित्यिक कृति सम्मान मिला. १९९४ में किशोर उपन्यास ’अजीमुल्ला खां’ को उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान से पुरस्कार मिला. २००० में मेरे एक अन्य कहानी संग्रह ’ आखिरी खत’ को हिन्दी अकादमी दिल्ली ने सम्मानित किया. २५ दिसम्बर,२०१३ को मेरे उपन्यास ’गुलाम बादशाह’ को आचार्य निरंजननाथ सम्मान (उदयपुर-कांकरोली, राजस्थान) प्राप्त हुआ. लेखक की किसी कृति को सम्मान या पुरस्कार मिलना सुख तो देता है, लेकिन मैं सम्मान/पुरस्कार के पीछे दौड़ने वाला लेखक नहीं हूं और न कभी उसके विषय में सोचा.
प्रश्न १७ – वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य को आप किस तरह देखते हैं , लेखन के साथ-साथ आलोe vmmकी क्या स्थिति है?
उत्तर – वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य बहुत खराब है. युवा लेखक अपनी पूर्व पीढ़ी को पढ़ना नहीं चाहते. एक-दो पुस्तकों के बाद वे साहित्यिक आकाश में छा जाने के जुगाड़ में लग जाते हैं. पुरस्कार से लेकर अपने जैसे युवाओं के गुट बनाकर अपने वरिष्ठों से लेकर अपने समकालीनों पर हमले करते हैं. चर्चा में आने के लिए अश्लीलता परोसी जा रही है. इस दौड़ में मेरी पीढ़ी के लेखक-लेखिकाएं भी शामिल हैं. बल्कि कहना सही होगा कि मेरे समकालीनों ने ही वह पृष्ठभूमि तैयार की जिसपर आज का युवा लेखक चल रहा है. अश्लील साहित्य को राजेन्द्र यादव ने बहुत प्रश्रय दिया था. परिणाम सामने है. सबसे चिन्तनीय स्थिति उन युवा रचनाकारों की है जो अपने अलावा किसी को भी लेखक मानने को तैयार ही नहीं है. किसी वरिष्ठ के सुझाव पर वे उसका अपमान तक करने से नहीं चूकते. ऎसे कई युवा रचनाकारों को स्व. रवीन्द्र कालिया जी ने सिर चढ़ाया हुआ था. एक कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए एक बार उन्होंने कहा था, “ आज के युवाओं की हर कहानी ’उसने कहा था’ है”. और जहां तक प्रश्न आलोचना और समीक्षा की है—वह है ही नहीं. आज तक मुंहदेखी आलोचना/समीक्षा होती रही है. आज उमाशंकर सिंह परमार, अजीत प्रियदर्शी, डॉ. अनिल पाण्डे, डॉ. रणजीत कुमार सिन्हा जैसे कुछ युवा आलोचक उभरकर सामने आए हैं जो ईमानदार आलोचना/समीक्षा लिख रहे हैं. उनसे बहुत उम्मीद है. लहक (सम्पादक – निर्भय देवयांश) जैसी कुछ लघु-पत्रिकाएं उन्हें प्रकाशित कर रही हैं.
प्रश्न १८ – नई पीढ़ी से क्या उमीदें हैं। उनके लिए आपका क्या सुझाव है?
उत्तर – नयी पीढ़ी से बहुत उम्मीदें हैं. उन्हें चर्चा की भेड़ चाल से ऊपर उठकर साहित्य के विषय में सोचना चाहिए. साहित्य साधना है. जितना पढ़ेंगे उतना ही अच्छा सृजित करेंगे. पूर्व पीढ़ी को पढ़ना उतना ही आवश्यक है जितना समकालीन साहित्य को.
प्रश्न २० – कोई यादगार संस्मरण?
उत्तर – पहले ही कह चुका हूं कि मैं अब तक ६४ संस्मरण लिख चुका हूं. तीन संस्मरण पुस्तकें आ चुकी हैं और चौथी भी आ जाएगी साल-दो साल में. सभी संस्मरण यादगार ही रहे हैं. यहां किसी संस्मरण की चर्चा करना अनावश्यक रूप से बातचीत को लंबा करना होगा.
प्रश्न २१ – आपके जीवन में संघर्ष के मायने ?
उत्तर – संघर्ष के मायने चुनौती. मैंने जीवन भर चुनौतियां स्वीकार कीं—साहित्यिक ही नहीं निजी जीवन से संबन्धित भी. उनपर विजय पाने का प्रयास किया. कठिन अवश्य रहा, लेकिन विजय पायी. सच कहूं कि यदि जीवन में संघर्ष न रहे होते तो आज जो हूं वह न होता. और आज भी कितने ही प्रकार के संघर्षों से दो- चार होता रहता हूं. बस उनके स्वरूप बदल गए हैं.
प्रश्न २२ – आपने चुनौतियों की बात की –तो क्या घर/परिवार/रिश्तेदार और मित्रो से भी ऎसी चुनौतियां मिलीं?
उत्तर – बेशक—बल्कि सबसे अधिक उन्हीं से मिलीं.
प्रश्न २३ – देश की राजनैतिक स्थिति के विषय में आपके विचार?
उत्तर – देश की राजनैतिक स्थिति भयावह है. एक भी पार्टी नहीं है ऎसी जो भ्रष्ट नहीं है. जब आपराधिक छवि के लोग विधायक/सांसद या पार्षद बनेंगे तब अच्छी स्थिति की कल्पना नहीं की जा सकती. इन सभी में अधोषित समझौता होता है कि सत्ता से बाहर रहते सत्तादल के खिलाफ शोर मचाएगें. घोटालों की पोल खोलेंगे लेकिन जब स्वयं सत्ता में आ जाएंगे तब उन्हीं घोटालों पर चुप्पी साध जाएगें. क्यों? क्योंकि तब वे पहले से बड़े घोटाले कर रहे होते हैं और बाहर हो चुकी पार्टी तब शोर मचा रही होती है. सच यह है कि सभी पार्टियों ने जनता को मूर्ख बनाया है. जनता इनके बहकावे में वोट देती है और हर बार ठगी अनुभव करती है. पिछले सत्तर सालों से यही होता आ रहा है और आगे भी होता रहेगा.
प्रश्न २४ –आपके मन में कभी राजनैतिक क्षेत्र में जाने का विचार आया?
उत्तर – मैं यदि राजनीति में चला जाउंगा तब उनके विरुद्ध कैसे लिख सकूंगा.
प्रश्न २५ – कहते हैं साहित्यिक पुरस्कारों में बहुत धांधली होती है—आपका क्या विचार है?
उत्तर – सरकारी से लेकर गैर सरकारी पुरस्कारों में धांधली ही धांधली है. पहले से तय हो जाते हैं. साहित्य अकादमी तक बदनाम है. बाकी के विषय में क्या कहा जाए.
प्रश्न २६ – आपने कविताएं भी लिखी हैं. जो कविता आपको पसंद है पाठकों से साझा करें।
उत्तर – गलतफहमी में कविताएं लिखी थीं. डॉ. हरिवंश राय बच्चन जी ने उन्हें पढ़ने के बाद मुझे लिखा कि तुम कुछ भी बन सकते हो लेकिन कवि नहीं बन सकते. इसलिए अपना और दूसरों का समय नष्ट मत करो और मैंने उनका पत्र मिलने के बाद कविता लिखना बंद कर दिया था. यह १९७९ की बात है. इसलिए मैं पाठकों से क्षमा चाहूंगा.
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प्रश्नकर्ताः अशोक दर्द