साक्षात्कारः विश्वनाथ प्रसाद तिवारीः ओम निश्चल

मेरे भीतर का किसान हर वक्‍त जागता रहता है

विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी की ओम निश्‍चल के साथ बातचीत

(विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी पिछले दिनों कई कारणों से चर्चा के केंद्र में रहे। एक तो असहिष्‍णुता की मुहिम चलाकर कुछ लेखकों ने साहित्‍य अकादेमी पुरस्‍कार लौटाए जिसके पीछे केवल सरकार का सैद्धांतिक विरोध-भर न था। इससे सीधे तत्‍कालीन अकादेमी अध्‍यक्ष तिवारी जी पर निशाना साधा गया। यह और बात है कि धीरे धीरे उस विरोध की हालत स्‍वयमेव पतली होती गयी तथा सारी चीजें साफ हो गयीं। दरअसल पहली बार एक खांटी हिंदी का आदमी साहित्‍य अकादेमी के अध्‍यक्ष पद की कुर्सी पर आसीन हुआ था जो गौरव अकादेमी के स्‍थापना काल से अब तक इस भाषा के किसी लेखक को न मिल सका था। तिवारी जी गांधीवादी सिद्धांतों के आदमी हैं तथा अपने व्‍यवहार व आचरण में सादगी की मिसाल हैं। देश विदेश हर जगह अपनी धोती कुरते व बंडी के साथ देखे जाते तिवारी के भीतर गांधी लोहिया और उच्‍च विचारकों के उच्‍चादर्श भरे हैं जो उन्‍हें मानवता के ऊँचे आसन पर प्रतिष्‍ठित करते हैं। इधर वे दिल्‍ली आए तो उनसे उनकी यात्राओं और लेखकीय सरोकारों पर भी बातचीत की गयी। अपने मिजाज में किसान किन्‍तु भीतरी चेतना से संपन्‍न एक लेखक के समर्पण के साथ वे आज भी उसी विश्‍वास और निष्‍ठा से बात करते हैं जैसे हम एक भारतीय परंपरा के लेखक से मिल रहे हों। –ओम निश्‍चल )

प्रश्न-एक प्रशासनिक पद पर होते हुए आपको देश भर की यात्राएं करनी होती हैं। इनमें आपके भीतर का लेखक क्‍या महसूस करता है। प्रशासनिक साँसत में पड़ी रचनात्‍मकता के बारे में क्‍या कहेंगे।

देखिए ओम जी! जो बुनियादी रुप से लेखक होता है उसकी संवेदनशीलता उसके साथ साथ चलती रहती है। प्रशासनिक व्‍यस्‍तताओं के बीच भी उसकी रचनात्‍मकता सक्रिय रहती है। वह सारे काम करता है जो कि एक सामान्य आदमी करता है मगर क्योंकि उसकी संवेदनशीलता उसके साथ साथ चलती है इसलिए वह हर काम में अपनी रचनात्‍मकता की सामग्री इकट्ठा करता रहता है या यूं कहें उसका अंतर्मन वह सामग्री संजोता रहता है। एक प्रशासनिक अफसर या एक राजनेता या अन्य किसी सार्वजनिक जीवन में व्यस्त व्यक्ति भी अपने काम के बीच बीच में अपनी रचनात्मक संवेदना को छोड़ता नहीं ।

जहां तक मेरा सवाल है ; यह सही है कि मुझे यात्राएं काफी करनी पड़ती हैं मगर उनके बीच बीच में जो रचना की लहरें आती हैं उनको मैं कागज पर संकेतो में अंकित भी करता चलता हूं । अगर ऐसा ना हो तो यात्राएं भी हवा में निकल जाती हैं। ऐसा करने से जिन क्षणों में वह लहरें मस्तिष्क में या मन में घुमड़ती हैं उन क्षणों को बाद में दर्ज करना आसान हो जाता है। दूसरी बात कि अलग अलग आस्‍वाद के कार्य होते हैं जैसे कि पुलिस अधिकारी अगर रचनाकार है तो उसके दोनों कर्म में बहुत अंतर होता है लेकिन मैं तो साहित्य अकादमी का अध्यक्ष हूँ ; मेरा सरोकार केवल साहित्यकारों से हो सकता है, उन्‍हीं के सान्‍निध्‍य में रहना होता है तो चाहे जहां जाएं, सभी भाषा के साहित्यकारों से मिलना-जुलना होता है और मुझे इससे लाभ होता है। मुझे इससे कभी नुकसान नहीं हुआ है, न हीं मेरी रचनात्मक क्षमता और रचनात्मक ऊर्जा में किसी प्रकार का ह्रास हुआ है, बल्‍कि विकास ही हुआ है। इसलिए आप यह समझिए कि यह मेरे मनोनुकूल क्षेत्र है और इस क्षेत्र में मुझे किसी रचनात्मक काम में किसी प्रकार की बाधा नहीं महसूस हुई।

तथापि मैं जानना चाहता हूं कि यात्राओं के बीच रहते हुए जिस तरह अभी हाल ही आपकी डायरी आयी, अस्‍ति और भवति नामक आत्‍मकथा आई, अन्‍य कई पुस्‍तकें भी ;यानी आप लगातार लिख रहे हैं तो इस यायावरी ने आपकी रचनात्‍मकता को किस हद तक समृद्ध किया है।

सबसे पहली बात तो यह है कि यात्राओं ने मुझे समृद्ध किया है और यात्राओं से मुझे बहुत सी नई रचनात्मक सामग्री मिली है। मेरी यात्राएं भी सामान्‍यत: वैसी ही की गयी यात्राएं हैं जैसे सामान्‍य लोग किया करते हैं पर जिन यात्राओं पर मैंने यात्रावृत्त लिखें हैं, उनमें संभव है कुछ दूसरे लोगों के यात्रा वृत्‍तांतों से अंतर मिले। एक अंतर तो यह है मैं जहां कहीं भी गया हूं या जाता हूँ , वहां के इतिहास को, वहां के भूगोल को समझने की कोशिश करूँ। अगर किसी मंदिर में गया तो मंदिर की बनावट को उसके स्‍थापत्‍य को देखूँ, उसके पौराणिक संदर्भ को नोट करूँ, भले मैं उस तरह से आस्तिक ना होउँ जैसे कि सामान्य आदमी होता है। मगर मैंनेे उस धार्मिक स्थान की महत्ता को समझने की कोशिश की है। इसी तरह से प्राकृतिक स्थानों पर भी जाने पर उस प्रकृति को एक नई दृष्‍टि से देखने की कोशिश की है।

प्रश्न-यात्राओं का जीवन और लेखन में क्‍या महत्‍व है आपकी दृष्‍टि में?

यात्राओं का जीवन में बहुत महत्‍व होता है, लेखक के लिए तो यह जरूरी है कि वह यायावरी से अपने जीवनानुभवों को समृद्ध करे। जैसे सेंट पीटर्सवर्ग गया तो सबसे पहले उसके खुलेपन ने मुझे आकर्षित किया। जिस स्थान की जिस जिस विशेषता ने सबसे पहले मुझे आकृष्ट किया उसके बारे में मैंने जानकारियां हासिल कीं उन्‍हें डायरी में नोट किया। अगर किसी स्थान पर किसी खास घटना ने प्रभावित किया तो उसे भी। अंडमान के सेलुलर जेल गया तो जानने की कोशिश की कि जहां हमारे बहुत सारे क्रांतिकारी रखे गए थे उनके साथ किस तरह का व्‍यवहार होता था। उनके प्रति जेल अधिकारियों का क्‍या सुलूक होता था। और अगर हम किसी पहाड़ी प्रदेश में गए जैसे कि कौसानी गए तो उसका वर्णन दूसरे ढंग से होता है। तो हर स्थान का अपना अलग महत्व होता है। किसी का ऐतिहासिक तो किसी का धार्मिक, किसी का भौगोलिक तो किसी का साहित्‍यिक। पहले उन स्थानों को उनके विशेष महत्व के साथ देखा। फिर अपनी निगाह से उसे देखा परखा। अगर कोई साथ घूम रहा है तो बहुत से लोग अपने यात्रावृत्त में उसका उल्लेख नहीं करते। लेकिन मैंने इसमें राहुल सांकृत्यायन के आदर्श का पालन किया है। राहुल सांकृत्यायन को अगर रेलवे स्टेशन पर कोई मिला तो उसका भी नाम पूछकर उन्होंने अपने आत्मवृत्त में लिखा है। जिस हाथी पर वह चढ़े तो उस हाथी के महावत का नाम भी लिखा है । उनके भीतर यह भाव था कि जो हमारे साथ हैं उन्‍हें दर्ज भी करें। आप देखेंगे कि अपने यात्रा संस्मरण को प्रायः मैंने उन्हें समर्पित किया है जिन लोगों के कारण मैंने यात्राएं कीं या जो लोग मेरे साथ रहे।

प्रश्न- इन यात्राओं ने आपको किस तरह समृद्ध किया है ?

मुझे तरह तरह की यात्राएं करने का अवसर मिला है ! खासतौर से धार्मिक स्थानों की यात्राएं इसलिए महत्वपूर्ण है कि उनके साथ बड़ी लंबी सांस्कृतिक परंपरा का बोध होता है। आज किसी को जनकपुर महत्वपूर्ण नहीं लग सकता है मगर वहां पहुंचते ही एक लंबा इतिहास और वह चीजें मन में घूम जाता है। विदेशों की यात्राएं भी बहुत की हैं मैंने और पाया है कि वहां का खान-पान, रहन-सहन, जीवन बोध सोच, पारिवारिक ढांचा अलग है। जब मैं अमेरिका की यात्रा पर गया और योरोप के कई देशों की यात्रा की तो अमेरिका और यूरोप को एक भारतीय यात्री की तरह देखा। जैसे मैंने यूरोप में परिवार व्यवस्था देखी और वृद्धों को वृद्धाश्रम में छोड़ने की आम बात देखी। इस घटना को विशेष महत्व देकर लिखा। हमारा भारतीय मन उद्वेलित हुआ। ओम जी, मेरी यात्राओं में केवल वर्णन और घटनाएं ही नहीं, वे वैचारिक महत्‍व की होती हैं। दुनिया भर का आदमी अपने सुख-दुख में एक सा लगता है लेकिन उसमे कहीं बहुत गहरे अंतर भी दिखाई पड़ते हैं । जिन्‍हें मैंने रेखांकित करने की कोशिश की है। अब जैसे भारत में कहीं भी चले जाइए , आपको भारतीय आदमी आत्मा में विश्वास करने वाला दिखाई पड़ता है । न जाने कितने गहरे संस्कार उसके भीतर हैं कि हर भारतीय आत्मा में विश्वास करता है इसलिए जब अपने भारत की यात्राओं का वर्णन किया तो उसका नाम ही रखा आत्‍म की धरती । कहीं जाइए तो वहां आदमी आत्मा की बात करता है। शरीर और आत्मा के द्वैत को मानता है और यह बहुत बड़ी दार्शनिक बात है। इसी प्रकार हमारी यात्राओं में इतिहास भी है भूगोल भी है धर्म और संस्‍कृति भी है और भारतीय विचार भी हैं। अगर भारतीय जीवन और यूरोपीय जीवन में कुछ अंतर दिखाई पड़ता है और भारतीय जीवन दृष्टि कमजोर दिखाई पड़ती है तो उसमें यूरोप की जीवन दृष्टि की प्रशंसा भी है। वहां की नदियों की प्रशंसा मैंने की है और वहां के प्राकृतिक परिवेश की स्वच्छता की तारीफ की है।

प्रश्न- आपने जो बात बताई, अपने देश और विदेश की यात्रा के दौरान आपके अवलोकन और विचार में क्‍या कुछ ध्‍यातव्‍य होता है?

ओम जी, मेरे मन की जो बनावट है, वह पूर्णत:भारतीय है। भारतीय का मतलब भारतीय चित्‍त। भारतीय मूल्यों के प्रति निष्‍ठा। हमारे समय में पुराने मूल्यों का संस्कार करके गांधी ने जिन्हें आधुनिक मूल्‍यों के रुप में संस्‍कारित किया । गांधी के सारे पुराने मूल्‍यों के संस्‍कारित रूप हैं जो मेरे भारतीय मन के निकट हैं। भारतीय मूल्यों का आशय प्राचीन उच्चतर मूल्यों से है।

प्रश्न- लेखन के लिए तो एकांत की जरूरत होती है। इतनी यात्राओं में यह एकांत कैसे जुटाते हैं ?

यात्रा में एकांत नहीं संभव है यह जानता हूँ । लेकिन जहां आप जा रहे हैं वहां आप अकेले हो गए तो आपको लिखना चाहिए। जहां तक आलोचना लिखने का सवाल है वह यात्राओं में संभव नहीं क्योंकि उसके लिए आपको कुछ संदर्भ चाहिए। कुछ और पुस्तकें चाहिए लेकिन रचनात्मक लेखन के लिए आप कहीं भी 2 दिन 4 दिन रह कर लिख सकते हैं। अगर यह काम भी संभव नहीं है तो आप किसी कागज पर नोट्स ले करके रख सकते हैं जिसे घर पहुंचने पर अपनी अभ्यस्त जगह पर बैठ कर के लिखिए। तो मुझे यात्राओं में केवल कागज और कलम की जरूरत होती है। रास्ते में पढ़ने की सुविधा है तो कोई भी पुस्तक जो उस समय हमारे हाथ में लगी है जिसमें हमारी रुचि है वह पुस्तक भी पढ़ लेता हूँ। तो लेखन के लिए यात्रा में पुस्तकें लेकर जाने की जरूरत नहीं है ; रचनात्मक लेखन केवल कागज कलम से संपन्‍न होता है।

प्रश्न- आपकी एक पूरी पुस्‍तक पत्ररूप में ही है। यात्राओं में इतने लंबे पत्र लिखने का समय कहां होता है ?

आपको ज्ञात होगा कि जब उत्तर प्रदेश पत्रिका लखनऊ से निकलती थी ठाकुरप्रसाद सिंह निकालते थे तो उसमें पत्र रुप में निबंध भी छपते रहे हैं । आपको ध्यान होगा कि आत्‍म की धरती में पत्रों के कलेवर में ही सारी बातें आती हैं। अब जैसे मान लीजिए कि मैं चेन्नई में हूं या कोयंबटूर में हूं लेकिन मैंने पत्र पूरा लिखा नहीं । उसकी तिथि अंकित की और उसमें जो जो कुछ हमको लिखना है उन चीजों के नोट्स लिए। ऐसा करके रख लिया। पुस्‍तक में शामिल मेरे सारे पत्र उसी दिन के लिखे हुए पत्र नहीं है और वहीं के लिखे हुए नहीं हैं। अगर छोटा पत्र हुआ तो लिख दिया नहीं तो बाद में जाकर पूरा किया लेकिन लिखा है उसी तिथि में । ट्रेनों में भी मैं लिखता रहा हूँ, अगर कभी बन गया तो पूरा पत्र और नहीं तो अधूरा हुआ तो बाद में जाकर उसको पूरा किया और वे पत्र डिस्पैच नहीं किए गए ।

प्रश्न- यात्राओं के प्रति आपकी आसक्‍ति उत्‍तरोत्‍तर आपके लेखक को लुभाती रही है। आखिर क्‍या चीजें हैं जो आपको घुमक्‍कड़ी के लिए उकसाती रही हैं?

यात्रा की जो मनस्थिति होती है वह अपने से बाहर जाने की होती है। मनुष्य को मैं समझता हूं कि वह एक अधूरा प्राणी है। कुछ-न-कुछ वह कमी महसूस करता है और इसको बहुत सारी चीजों से भरता है। भारत में शताब्दियों से लोग यात्राएं करते रहे हैं। दुर्गम से दुर्गम स्थानों को पार करने की इच्‍छा लोगों में रही है। मुझ में विद्यार्थी जीवन से ही यात्रा की ललक पैदा हुई । प्रारंभ में न जाने क्यों मुझे हिमालय बहुत आकर्षित करता रहा है और हिमालय का मतलब पर्वत प्रदेश । अब इसके कुछ बहुत गहरे मनोवैज्ञानिक कारण रहे होंगे जिनकी छानबीन मैं नहीं कर पाता। मैंने पहाड़ी यात्रा की है काठमांडू की 1967 में। मुझ में शुरू में मृत्यु भय कुछ ज्यादा ही था लेकिन पता नहीं क्यों उस मृत्यु भय के बावजूद मैंने पहाड़ी यात्राएं कीं। हिमाचल की मैंने लगभग चार पांच बार यात्राएं की हैं। सुदूर श्रीनगर से लेकर कुल्लू मनाली तक और वह काम मैंने अपने विश्वविद्यालय के काल में ही किया। जहां कहीं जाना हुआ किसी शैक्षणिक काम से तो वहां दो-चार दिन अलग से मैंने अपने खर्चे पर यात्राएं करने का अवसर जरूर निकाला। इस प्रकार विश्वविद्यालय के कार्यकाल में ही मैंने लगभग सारे भारत की यात्रा कर ली और आत्‍म की धरती पुस्तक 1999 में छपी। विदेश यात्राएं भी मैंने विश्वविद्यालय काल में ही कर ली थी। पहली लंदन की, दूसरी मारीशस की। साहित्य अकादमी में आने के बाद तो यात्राओं के सिलसिले बनते रहे। साहित्य अकादमी में मैं 2008 में आया फिर यात्राओं का क्रम शुरू हुआ लेकिन जितना आनंद मुझे अपने विद्यार्थी जीवन में या विश्वविद्यालय के जीवन में, अध्यापक जीवन में यात्रा करने में आया वैसा आनंद बाद की यात्राओंमें नहीं। क्योंकि जब दुबारा तिबारा यात्राएं उन्‍हीं जगहों की होने लगीं तो पहली यात्रा आप को जितना आकृष्ट करती है पहले प्रेम की तरह; उतनी दूसरी तीसरी आप को आकर्षित नहीं करती। जब से साहित्य अकादमी में आया तब से तो मैंने भारत की कई बार यात्राएं कीं और विदेशों में भी कई देशों में जाना हुआ। ब्रिटेन, जर्मनी ,फ्रांस नीदरलैंड ,लक्जमबर्ग ,अमेरिका, जापान, चीन, साउथ कोरिया आदि लगभग 16 देशों की यात्राएं की हैं।

प्रश्न- लोग प्राय: हवाई जहाज से यात्राएं करते हैं लेकिन आप अभी भी रेल गाड़ी में भी सफर करते हैं इसके पीछे आपकी क्‍या मनोभूमि रही है ?

बहुत दिनों तक मुझे जहाज पर चलने में डर लगता रहा इस कारण हवाई जहाज से जाना स्‍थगित करता रहा। एक बार मुझे और राजेंद्र यादव दोनों को एक महिला ने जयपुर में एक समारोह में बोलने के लिए निमंत्रित किया। दोनों को एक ही जहाज से जाना था पर मैं नहीं गया लिहाजा वह भी नहीं गए । मैं जब से साहित्य अकादमी में आया तब भी प्राय: कहा करता था कि ट्रेन से ही मेरा रिजर्वेशन करायाजाय। मैं ट्रेन से ही यात्राएं किया करता था। लेकिन जब देखा की यात्राएं बहुत हो रही है और यहां से चेन्नई मैं कैसे जाऊंगा। फिर वहां से कही और बहुत दूर जाना है तो फिर मैंने जहाज पर चलना शुरू किया । आज भी डर लगता है, कोशिश करता हूं कि कोई साथ में रहे तो थोड़ा डर कम हो जाता है ।

प्रश्न-लेकिन मृत्यु का क्‍या है वह तो रेलगाड़ी में भी आ जाती है और आप की आत्मकथा अस्‍ति और भवति में तो एक रेल दुर्घटना का वर्णन ही है जिसमें मृत्यु के मुंह से आप बाल बाल बचे थे? (यह सवाल कवि राजेन्‍द्र उपाध्‍याय ने किया)

मृत्यु से तो डरता हूँ। लेकिन जिस घटना का जिक्र आपने किया राजेंद्र जी, उसी घटना के बाद मुझे लगता है कि मृत्यु भय कुछ ज्यादा हो गया क्योंकि जिस ट्रेन से मैं जा रहा था उस ट्रेन का वह डिब्बा टूट कर नदी में गिर पड़ा और मैंने मृत्यु को साक्षात सामने देखा था । उस घटना के डेढ़ साल तक कोई यात्रा नहीं की। क्‍योंकि जब ट्रेन पॉइंट बदलती थी तो बहुत दिनों तक मुझे लगता था कि यह नीचे जा रही । लेकिन धीरे-धीरे अभ्‍यास हो जाता है। यहां से लंदन ट्रेन से तो जा नहीं सकता। पैदल भी नहीं जा सकता । तो एक तरह की मजबूरी हो गई । कहा जाता है कि जिस चीज से आपको भय लगता है उसको जरूर करिए, आप का भय दूर हो जाएगा।

प्रश्न-और किस किस चीज से भय लगता रहा है?

जिस गांव में पैदा हुआ हूं उस गांव से रोज नदी पार करके स्कूल जाया करता था। हमारे गांव के ठीक बगल में नदी बहती है और नदी के इस पार ही कस्बा है जहां से सारा सामान आता था और शिक्षा दीक्षा स्कूल सब नदी के पार था । लिहाजा रोज नदी पार करना पड़ता था। दो- -तीन बार नाव पानी में बह गई । एक बार हमारे सामने ही हमारे आगे वाला यात्री बह गया पानी में और मर गया ।

प्रश्न- जब आप कह रहे हैं कि पानी से बहुत भय लगता है और आपकी नाव बह गई तो माता-पिता बच्‍चों को तैरने की कला क्‍यों नहीं सिखाते ?

हां, यह सच है कि जीवन रक्षक कलाएं हर बच्चे को जरुर सीखनी चाहिए । जैसे पेड़ पर चढ़ना, नदी में तैरना। अगर आप कहीं पेड़ पर चढ़ना शुरू किए तो माता-पिता अतिरिक्त प्रेम और मोह के कारण डांटते हैं। इसीलिए मैं नहीं सीख सका । हालांकि आज की दुनिया में कितना जरूरी है स्कूटर चलाना, मोटरसाइकिल चलाना, कार चलाना। हम अपने बच्चों को नहीं चलाने देते । साइकिल भी हम लोगों ने चोरी चोरी ही चलानी सीखी।

प्रश्न- कलाओं के बारे में लेखकों की चर्चाएं होती हैं । जैसे अज्ञेय तमाम कलाओं में माहिर थे। इस बारे में क्‍या कहेंगे आप ?

देखिए, बहुत से ऐसे लेखक हैं जो अनेक कलाओं में पारंगत रहे हैं जैसे हिंदी में अज्ञेय जी। वह तमाम कलाओं में निष्‍णात थे। लेकिन मैं इतना सौभाग्यशाली नहीं और अधिकांश लेखक ऐसे नहीं हैं। प्रेमचंद ने चिट्ठी लिखी थी मुंशी दयानारायण निगम को कि मैं केवल दो ही चीजें कर सकता हूं और दो ही मेरा लक्ष्य है । एक स्कूल की हेडमास्टरी और दूसरी किसी अखबार की संपादकी। तो बहुत से ऐसे लेखक होते हैं जो बहुत सारी चीजें नहीं कर पाते। वैसे ही मैं किसान हूं, किसानी कर सकता हूं । मेरी दिलचस्पी भी है। बाग बगीचे खेती-बारी में मेरी बहुत दिलचस्पी है । मेरे पिताजी मुझको खेती करने वाला ही बनाना भी चाहते थे लेकिन प्रकृति ने कुछ ऐसा अच्छा या बुरा किया कि मैं लेखक बन गया। मैं किसान का आदर भी बहुत करता हूं। भारत में जो निर्दोष कौम है वह किसानों की ही है पर सबसे ज्यादा आत्महत्या किसान ही कर रहे हैं । इस समय भी जब आप बातचीत कर रहे हैं, किसानों की आत्‍महत्‍या का समाचार सबसे ऊपर है।

प्रश्न- भारत में आज किसानों की सुधि लेने वाला कोई नहीं है। यह बात आपको एक खेतिहर लेखक के रूप में किस हद तक कचोटती है?

भारत में आजादी के बाद किसानों की हालत को सुधारने की कोशिशें तो हुईं पर आजादी के पहले केवल एक राजनेता ने किसानों के बारे में सोचा था, गांव के बारे में सोचा था और वे थे महात्मा गांधी। महात्मा गांधी का जो सपना था और उनकी जो योजनाएं थीं , आजादी के बाद शुरू ही नहीं हुईं। उनहोने ग्राम स्वराज की बात की , सत्ता के विकेंद्रीकरण की बात की। सत्‍ता को ग्राम तक पहुंचाने की बात की । पंचायतों को मजबूत बनाने की बात की। पर आजादी के बाद की सरकारों ने इस ओर ध्‍यान नही दिया। इसीलिए आज वकील अपने लड़के को वकील बनाना चाहता है , अध्यापक अध्यापक बनाना चाहता है , आईएएस अपने बेटे को आईएएस बनाना चाहता है, डॉक्टर डॉक्टर बनाना चाहता है मगर किसान अपने बेटे को किसान नहीं बनाना चाहता। हर जगह कोई उद्योगपति अपने प्रोडक्‍ट की कीमत खुद तय करता है पर फसल की कीमत किसान खुद नहीं तय करता । किसान की फसल की कीमत सरकार तय करती है। यही कारण है कि किसान को उसकी लागत के अनुसार मिलता नहीं । लिहाजा वह आत्महत्या के लिए विवश होता है । ऊपर से जो नई व्यवस्था आई है जिसको भूमंडलीकरण की व्यवस्था कहते हैं, उसने किसानों को कर्जदार बना दियाहै। किसान को कर्ज लेना पडता है पर उस कर्ज के अनुरूप उस की पैदावार नहीं होती है। इसलिए वह कर्ज चुका नहीं पाता है ।

प्रश्न- किसान देवता के लिए यह समय कैसा है?

ओम जी, मेरे भीतर गांव और गांव का किसान हर वक्‍त जागता रहता है। पर गांव भी आज वैसे ही हो गए हैं जैसे कोई भी दुर्व्यवस्था की जगह। इसके कई कारण हैं। भूमंडलीकरण के कारण, राजनीति के कारण । जो गांधी की स्‍वराज वाली कल्पना थी वह तो बुनियादी रुप से दूसरी थी । अगर उनकी कल्पना पर चला गया होता तब गांव में यह विकृति नहीं आती । जो आए दिन प्रधानी और उसके चुनाव के लिए लाखों रुपए खर्च करना पडता है और शराब आदि बहाना पडता है यह सब गांव में नहीं होता।

प्रश्न-तिवारी जी, आप साहित्‍य अकादेमी के अध्‍यक्ष रहे हैं, तो हमारी जिज्ञासा है कि यहां रह कर जो लेखकों के लिए करना था, वह किस हद तक स्‍वतंत्रता व ईमानदारी से कर सके। क्‍या है जो स्‍मरणीय रहेगा?

सबसे ज्यादा कार्यक्रम 365 दिनों में पांच सौ से ज्यादा कार्यक्रम मेरे समय में हुए। सबसे ज्यादा पुस्तकें मेरे समय में छपीं। बड़ी विनम्रता से कह रहा हूं कि तमाम ऐसे स्‍थानों पर मैं गया जहां लोगों ने यह कहा कि साहित्य अकादमी का अध्यक्ष पहली बार यहां आया है। या जहां हमारे कार्यक्रम हुए वहां मंचों पर लोगों ने कहा कि अकादमी का कार्यक्रम पहली बार हो रहा है या जो लेखक शरीक हुए उन्होंने कहा कि अकादमी के कार्यक्रम में मैं पहली बार शरीक हुआ तो इसको मैं अपना सकारात्मक योगदान मानता हूं । दूसरी बात यह कि मैंने कोशिश की है सभी वर्गों के सभी विचारधाराओं के लोग अकादमी के मंच पर आएं। जब मैं आया उसके पहले नामवर सिंह और अशोक वाजपेयी अकादमी के कार्यक्रमों में नहीं आ रहे थे । महाश्वेता देवी के चुनाव के बाद से ही अकादमी का बायकॉट कर रहे थे। मैंने व्यक्तिगत रूप से उन से अनुरोध करके अकादमी के कार्यक्रमों में आने के लिए प्रेरित किया और वह लोग आए। आप अगर सूची देखेंगे तो विभिन्न विचारधाराओं के लोग भारी संख्या में अकादमी के कार्यक्रमों में शामिल हुए। यह सूची बहुत बड़ी है । जितने लोग अकादमी के कार्यक्रमों में पहले भाग ले चुके थे उनसे लगभग 15 गुना ज्यादा लोगों की भागीदारी अकादमी में हमारे कार्यकाल में हुई। इसको लेकर अशोक बाजपेयी ने जनसत्ता में एक टिप्पणी भी की कि साहित्य अकादमी मीडियाकर्स को महत्व दे रही है। मैंने इसका जवाब भी दिया कि प्रतिभावान कुछ लोगों को लेकर अकादमी चलेगी तो यह कह कर विरोध होगा कि अकादमी केवल चार पांच लोगों को लेकर चलना चाहती है और चूंकि अकादमी एक सार्वजनिक संस्था है , जनता के पैसे से संचालित होती है इसलिए इसका फर्ज है कि जिसमें भी थोड़ी प्रतिभा हो उसको सामने लाने की कोशिश की जाए। यही मैने किया है।

प्रश्न- डॉक्टर साहब यह जो समावेशिता रही है साहित्य अकादेमी की, इसके बावजूद पुरस्कार लौटाने के हवाले से देश में जिस तरह असहिष्णुता को रेखांकित करने का माहौल बनाया गया, उसके बारे में क्‍या कहना चाहेंगे?

मैंने इस मुद्दे पर बीस पेज का एक लंबा लेख लिख दिया है लेकिन आपने पूछा तो मुझे कहना चाहिए कि इस विरोध के मूल में अकादमी थी ही नहीं । इस विरोध के मूल में सरकार थी और जो विरोध करने वाले थे वह भीतर से सरकार का विरोध कर रहे थे। अकादमी एक बहाना बन गई। इसमें लेखक की स्वाधीनता या सहिष्णुता जैसा मुद्दा भी नहीं था क्योंकि इस घटना के पहले सैकड़ों घटनाएं असहिष्णुता की घटित हो चुकी थीं और इस घटना के बाद भी घटित हुई हैं । लेकिन यह घटना एक विशेष समय में हुई और अपने प्रमाणों के आधार पर मैं इसे एक राजनीतिक कदम कह सकता हूँ। (तिवारी जी का यह लेख संपादकीय के रूप में अभी उनके द्वारा संपादित दस्‍तावेज़ के 157वें अंक में छपा है जिस पर देश भर में काफी प्रतिक्रियाएं हुई हैं। )

प्रश्न-इन दिनों क्‍या क्‍या लिख रहे हैं क्‍या क्‍या चीजें आने वाली हैं ?

ओम जी, इन दिनो अभी मैंने एक यात्रा संस्‍मरण नेशनल बुक ट्रस्‍ट को दिया है जिसका शीर्षक है पतझर में योरोप तथा अन्‍य यात्राएं। एक संस्‍मरणों की पुस्‍तक अगले महीने देने जा रहा हूं किताबघर को जिसका शीर्षक होगा समय की स्‍मृति। मेरी कविताओं का नया संकलन भी आने वाला है। वो भी एक या दो महीने के अंदर देने जा रहा हूँ । एक साक्षात्‍कार की पुस्‍तक है जो अभी देनी है। एक आलोचना की पुस्‍तक दे चुका हूं सामयिक प्रकाशन को। डायरियों का संकलन अब छह महीने बाद ही। इस प्रकार ये छह पुस्‍तकें छपने या जल्‍दी छप के आने की प्रक्रिया में हैं।
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डॉ ओम निश्‍चल
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