विमर्षः जानवर कौन-अर्जित मिश्रा

दृश्य-1 किसी गांव के एक खेत में एक शेर घुस आया| ग्रामीणों को जब भनक लगी तो सैकड़ों लोगों ने उस शेर को घेर लिया| कुछ लाठी-डंडो से लैस थे तो कुछ पत्थर को ही अपना हथियार बनाये थे| अब शेर तो ठहरा जंगल का राजा, अपने राजसी घमंड में उसने दहाड़ मारकर लोगों को डराने की कोशिश की जो कि असलियत में अपने जीवन की रक्षा करने का उसका अंतिम प्रयास था, पर ग्रामीण कहाँ मानने वाले थे सब को शेर का शिकारी बनने का मौका जो मिलने वाला था और भीड़ में यह अपेक्षाकृत आसान भी था| भाई यही अपनी वीरता की कहानी तो उन्हें अपने बच्चों और उनके बच्चों को सुनानी थी| खैर फिर हुआ वही जो होना था ग्रामीणों ने मिलकर लाठी डंडों से पीट-पीट कर उस डरे-सहमे व बेबस जानवर को मार डाला|
दृश्य-2 किसी कॉलोनी में एक कुतिया ने कुछ पिल्लों को जन्म दिया| जब पिल्ले कुछ बड़े हुए तो वे गली में इधर उधर घूमने लगे| वैसे तो सभी बहुत प्यारे थे परन्तु प्यारा होने के साथ कुछ अधिक ही चंचल था| हर आने-जाने वाले के साथं वो शरारत करता था| कॉलोनी के छोटे बच्चे भी उसके साथ खेलते थे| लोग कहते है कि एक दिन खेलने के दौरान कॉलोनी में रहने वाले डॉक्टर साहब के बच्चे को उस पिल्ले का दांत लग गया| डॉक्टर साहब बहुत नाराज़ हुए और ये स्वाभाविक भी है| परन्तु फिर जो हुआ वो स्वाभाविक नहीं था| उसी रात को डॉक्टर साहब ने उस पिल्ले को ईंट से पीट-पीट कर मार डाला| उस पिल्ले की मां वहीँ पर थी, उसे शायद खतरे का अहसास भी हो गया था, पर वह कुछ ना कर सकी| बस बेबसी से अपने अबोध बच्चे की एक पढ़े लिखे डॉक्टर के हाथों होती नृशंस हत्या की मूक गवाह बन कर रह गयी|
दृश्य-3 किसी राजमार्ग पर किसी पशु को किसी वाहन ने कुचल दिया है| तब से लगातार वाहन उसके शरीर को रौंद कर निकल रहे हैं| और ये सिलसिला तब तक चलता रहेगा, जब तक उसका शरीर जार-जार होकर खुद ही सड़क से ना हट जाये|
वैसे इन उपरोक्त दृश्यों में कुछ नया नहीं है| हम अपने आस-पास ऐसे अनेक उदहारण रोज़ देखते हैं| फेसबुक और अन्य माध्यमों पर ऐसे दृश्य और ख़बरें लगभग रोज़ ही दिख जाते है जिसमें कहीं कोई पशु किसी तेज़ रफ़्तार वाहन की टक्कर से घायल दिखाया जाता है, कहीं लोग यूँ ही कुत्ते या बन्दर या किसी अन्य पशु को मारते दिखाई देते हैं| इन दृश्यों व ख़बरों के साथ एक मार्मिक अपील भी होती है कि पशुओं के साथ ऐसा व्यवहार नहीं होना चाहिए, जिसे हम पढ़ते हैं, कुछ दुखी भी होते हैं, फिर भूल जाते हैं|
कुछ ये हमारे दिमाग में बसा हुआ भी है कि कोई हिंसक जानवर यदि रिहाईश में घुस जाये तो उसे मार दो, सांप कहीं दिख भी जाये तो उसे मार देना चाहिए|
अब सवाल ये उठता है कि क्यों ये पशु हमारे घरों में, खेतों में, राजमार्गों पर घुस जाते हैं मरने के लिए| अब हमारे घर या खेत में घुसेंगे तो अपनी रक्षा करने के लिए हमें तो मारना ही पड़ेगा, राजमार्गों के बीच मैं बैठ जायेंगे तो वाहन तो टक्कर मरेगा ही, अरे भाई राजमार्ग तो बना ही है तेज रफ़्तार वाहनों के चलने के लिए| कुछ लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि पशुओं का मांस के लिए कत्लखाने में क़त्ल होना जरुरी है वरना ऐसे ही राजमार्गों पर झुण्ड के झुण्ड बैठे रहेंगे और हादसे होते रहेंगे|
अब जरा सोंचिये ये पशु आते कहाँ से हैं| राजमार्गों पर झुण्ड में दिखने वाले पशु अधिकतर पाले जाने वाले गोवंश होते हैं, जिन्हें या तो दुहकर छोड़ दिया जाता है, या तो पालने वाला इस पात्र नहीं कि पशु को खिला सके, या खिलाना चाहता ही नहीं| तो बस छोड़ देता है, अपने दम पर जिन्दा रहने के लिए|
फिर सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि कभी सोंचा है कि लगातार बढ़ती मानव बस्तियों ने पशुओं के निवास व विचरण करने वाले स्थानों पर कब्ज़ा कर लिया है| जिन खुले मैदानों में पशु घास चरने आते थे, आज उनके बीच से राजमार्ग निकल गया है, वो तो अपने विचरण के स्थान पर ही हैं किन्तु हम उनके स्थान में घुस गए हैं और दोष उन्हें देते हैं|
इसी प्रकार हमने जंगलों का अतिक्रमण कर मानव आबादी बसा ली| तो जंगली जानवर कहाँ जायेंगे| वो तो अपने घर में ही हैं हम उन्हें उनके घर से निकाल कर बस गए हैं, और उन्हें आस-पास दिखाई देने पर मार डालते हैं|
आरम्भ में मनुष्य जंगलों में इन्ही पशुओं के मध्य इन्ही की तरह रहा है, जैसे-जैसे सभ्यता पनपती गयी, मनुष्य ने जानवर और मनुष्य के मध्य एक रेखा खींच दी| किन्तु फिर भी पशुओं का हमारे समाज ने पूरा ख्याल रखा| उन्हें किसी ना किसी देवता से संबध कर उनकी रक्षा का प्रबंध किया गया| अधिकतर पशु आज भी पूजनीय हैं|
फिर भी पशुओं के प्रति हिंसा जारी है| हमें ये समझना चाहिए की ये धरती जितनी हम मनुष्यों की है उतनी इन पशुओं, पक्षियों, पेड़-पौधों की भी है| प्राकृतिक व्यवस्था बनाये रखने के लिए सभी जीव-जंतु आवश्यक हैं|अतः सभी जीव-जन्तुओं के प्रति संवेदना होना अति आवश्यक है|
जिम्मेदारी शासन की भी है, आवारा पशुओं के लिए जो व्यवस्था की जा रही है, स्पष्ट है कि वे नाकाफी हैं| शासन को चाहिए कि इन आवारा पशुओं का भोजन, चिकित्सा व रहने का स्थान सुनिश्चित किया जाये ताकि ये पशु भोजन की तलाश में इधर-उधर ना घूमें| पशुपालन पर भी नियंत्रण की आवश्यकता है, ये सुनिश्चित किया जाये, कि कोई भी जानवर को सड़कों पर भोजन कि तालाश में ना छोड़े|
हिंसक जानवरों के रिहायशी इलाकों में घुसने के संबंध में शासन को चाहिए की ऐसे इलाकों को चिन्हित करें जहाँ अक्सर कोई ना कोई जानवर घुस जाता है, वहां के लोगों को आवश्यक सूचनाये व प्रशिक्षण दिया जाये ताकि पशुओं की हत्या रोकी जा सके|
आखिर में सबसे बड़ी जिम्मेवारी हम सब की है कि हम ना स्वयं किसी पशु पर अत्याचार करें ना ही किसी को करने दें|
अर्जित मिश्रा

सीतापुर
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