अपनी बातः साथ तेरा साथ फूलों का…

यदि फूलों का शौक है तो कांटों से गुजरना ही होता है!
इस अंक के साथ लेखनी को शुरू हुए तेरह साल हो चुके और गुजरे इन सारे दिनों, महीने और वर्षों में, जिया ही नहीं, ओढ़ा-बिछाया और सोया है लेखनी को। व्यस्त दैनिक जीवन से पल-पल चुराते,’जो कुछ उतना जरूरी नहीं’ को जान-बूझकर परे धकेलते। कभी-कभी तो अपनों की बेवजह नाराजगी तक झेलते । अब तो यह मासूम आदत एक लत बन चुकी है; सच कहूं तो क्या समस्त जीवन ही बस आदतों में फंसा एक क्रम ही नहीं, जो जाने अनजाने खुद-ब-खुद उंगली पकड़कर ले चलता है हमें, बिना रुके, बिना सोचे…ध्रुवतारे-सा गाइड और मंजिल दोनों ही बना।
जैसे जंगल की हरियाली का उत्स मनाने टेसू के शोख धधकते फूल खुद ही खिल आते हैं, वैसे ही लेखनी ने भी संभाला है मुझे, मन को महकाया है, उर्जा दी है । सृजनात्मक इस प्रेरणा ने जीवन के सपाट पलों को एक उत्सव बना उत्साह, नियमितता और दिशा दी है।
धन्यवाद लेखनी इस अपरिमित सुखमय सानिध्य के लिए।
तेरह वर्ष के इस सफर में सभीकुछ अच्छा या पूरी तरह से मन-माफिक ही रहा हो, ऐसा दावा तो नहीं ही कर सकती। कभी तबियत ने साथ नहीं दिया तो कभी कम्प्यूटर की तकनीकी जानकारी में उतनी माहिर न होने की वजह से कई बाधाएँ और विलंब हुए। परन्तु हर तकलीफ के बाद हर बार ही लेखनी के तैयार रूप को देखकर वही खुशी महसूस हुई जो कि एक पर्यटक को दुर्गम रास्तों से चलकर अपने गंतव्य पर पहुँचकर मिलती है। उस मनोरम दृश्य को देखकर वह शरीर की थकान और पैरों के छाले सभी कुछ भूल जाता है।

आप सभी मित्रों के सहयोग से लेखनी का हर अंक पठनीय और स्मरणीय रहा है। कमेंट देने में भले ही थोडा आलस कर जाते हों मित्र, पर दैनिक हिट्स तो यही बताती हैं कि लेखनी को जी भरकर पढ़ा जा रहा है।

वजह चाहे कोई भी क्यों न हो, पूरा संतोष मिलना वैसे भी असंभव ही है। यही स्वभाव है हमारा; जैसे आधा चंद्रमा पूरी धरती के चक्कर लगाता है और अपनी ही धुरी पर घूमती धरती उस जलते सूरज के गोले के इर्दगिर्द, सभी एक चक्कर, एक भटकन में ही तो हैं, अनगिनित भ्रम और भ्रांतियों में उलझे…
कुछ पाने के लिए खोना भी जरूरी है, यही सिखाया गया था हमें बचपन से। तभी तो ढूंढने की अलख जगेगी… रहस्यमय यात्रा पर चल पाएंगे। जैसे चलने से पहले थमना जरूरी है, उर्जा के लिए, वैसे ही यात्रा भोतिक हो या आंतरिक अक्सर व्यग्र नहीं, एक समग्र दृष्टि की ही जरूरत होती है । सफलता-असफलता , प्राप्ति और उपलब्धियों का आकलन हमारे लिए दूसरे नहीं अंततः स्वयं हमें ही करना है, तभी तो संतुष्टि मिल पाती है और बात समझ में भी आती है । फिर सब कुछ वही तो नहीं जो इन्द्रियों से दिखे, बहुत कुछ महसूस भी तो करते हैं, कर सकते हैं…यदि चाहें तो। जिसका कोई स्थूल अस्तित्व नहीं वह भी तो है ही हमारे आस पास…शायद ज्यादा बड़ा सच बनकर, ईश्वर की तरह… यादों में बसे नश्वर हमारे अपने बेहद निजी संसार की तरह…बाहर ही नहीं, अन्दर झांककर भी मिलता है जीवन में बहुत कुछ…फिर सबकुछ हमेशा के लिए कब और कहां है यहां …हम खुद भी तो नहीं? फिर यह व्यग्रता और बेचैनी क्यों ?

कौन जाने, शायद रह ही जाता हो सब यहीं आसपास बिखरा और उळझा-उलझा । बहती हवा-सा…डूबते-उगते दिनों के निरंतर के इस क्रम-सा।…
हम सभी ने कभी-न-कभी अवश्य ही महसूस किया होगा पेट में खलबली मचाती और हदय को डुबोती इस काली-चुभती भावना को… अक्सर एक भय जो बना रहता है कि हमसे हमारी प्रिय चीज खो जाएगी या कोई छीन लेगा । मांओं के संदर्भ में तो यह बात और भी ज्यादा खरी उतरती है और यही वजह है कि आए दिन ही वे बच्चे की सुरक्षा और सही सलामती को लेकर भगवान से दुआ-प्रार्थना करती दिखती हैं।

कई बार अंधा किया है मुझे भी मन की इस व्यग्रता और तल्लीनता ने…

बरसों पुरानी-सी बात है…एक कलम थी, ‘लकी कलम’, जो सिर्फ परीक्षा या खास मौकों पर ही निकलती थी। हाई स्कूल से ( शायद उसके पहले इतनी सोच नहीं थी कि अंधविश्वास जन्म ले पाएँ) सारी परीक्षाएं उसी से दी गईं। एक महत्वपूर्ण परीक्षा का दिन था और वह भी सबसे कठिन विषय गणित की परीक्षा का और उम्र थी मात्र 14 वर्ष…हर असंभव को संभव करने वाली, सपने देखने वाली उम्र। ‘लकी कलम’ का होना अनिवार्य था। कमरे का कोना-कोना ढूंढ डाला परन्तु कलम नहीं मिली। मां के पास हर समस्या का हल था । हताश, रूँआसी दौड़ी-दौड़ी तुरंत ही जा पहुँची उनके पास ,’ तुमने कहीं मेरी कलम तो नहीं देखी ? देर हो रही है और पूरा कमरा छान डाला, कहीं पर मुझे मिल ही नहीं रही !’

मां एक तरफ तो मेरी हर बात बहुत ध्यान-से सुन रही थीं और दूसरी तरफ लगातार एक मनोरंजक और कौतुक भरी मुस्कराहट के साथ मुस्कुराए जा रही थीं…। बात खतम होते ही जोर-से हंस पड़ीं, ‘बाबरी, हाथ में कलम लेकर, कलम ढूंढ रही है। ‘

झेंप से पानी-पानी थी – कलम बांए हाथ में किताब कौपी के साथ पकड़े कलम को कैसे ढूंढे जा रही थी मैं अबतक… ऐसा कैसे हो सकता था! पर, अक्सर ऐसा ही तो होता है, जब हम बहुत जल्दी में होते हैं या किसी चीज का महत्व बहुत ज्यादा होता है हमारे लिए और तब अपनी धुन के आवेग पर सवार थम जो नहीं पाते ..पीछे हटकर,कटकर, एक समग्र दृष्टि जो नहीं ले पाते परिस्थिति की ।

मन की इस बेचैन व्यग्रता के साथ हम, जिसे भी ढूँढते हैं, अक्सर ही वो हमारे साथ या हमारे बेहद पास होकर भी मिल नहीं पाता । दिखता नहीं। इस ‘न मिल पाने के’ कई कारण हो सकते हैं; हमारी अपनी लापरवाही…अपेक्षाओं पर खरे न उतर पाने का भय, या फिर जीवन की व्यस्तता में थमना ही भूल जाना, ध्येय से भटकना…बिल्कुल उस श्वान की तरह ही, जो अपनी ही पूंछ को ढूंढता, गोल-गोल चक्कर लगाता रह जाता है, या हमारी इतनी आसक्ति कि कभी या किसी भी हालत में खोना ही न चाहें!।

जो प्रिय है उसके विछोह की कल्पना तक पीड़ादायक होती है। प्रियजन के जरा भी देर से लौटने पर मन बेचैन हो उठता है और खराब से खराब … अनहोनी बातों की ही संभावना मन में सबसे पहले आती हैं और तुरंत ही अबूझ अनिष्ट की आशंका से मन कांपने लग जाता है।

तीव्र लगाव जरूरी नहीं कि व्यक्तिओं से ही हो…जीवन, वस्तु, जगह, अनुभव, स्वाद, मात्र यादें या एक बलवती इच्छा, कुछ भी तो हो सकती है यह, किसी भी रूप में हमारे साथ। हमारे जीवन ही नहीं, अस्तित्व तक में रची गुंथी। और इसी ‘कुछ’ से कटकर, थमकर उसी को पकड़ने की कोशिश की है हमने ‘लेखनी’ के इस अंक में …।
‘कुछ’ जो सदा हमारे साथ रहता है, इस साक्षात्कार अंक में भी है। हमारी अपनी लेखनी के नियमित लेखक और उनका व्यक्तित्व उनकी प्रेरणा…आंसू और मुस्कान, जैसे खिलते फूल, सूरज की एक किरन… आम दिन की छोटी-छोटी घटनाएं जो घटती तो हैं पर उनपर ध्यान नहीं दे पाते, या इसकी जरूरत नहीं समझते। इसी बहाने इन्हें भी समझने, बेझिझक अपना भी मन खोलने और सभी मित्रों को धन्यवाद देने का प्रयास है यह साक्षात्कर अंक। खुद से और अपनों से बिन्दास गुफ्तगू का एक लघु प्रयास। आत्म लिप्सा न समझें।
नीरज जी ने भी तो कहीं लिखा है-
जिन्दगी भर तो हुई औरों से गुफ्तगू लेकिन
आज तक हमसे हमारी न मुलाकात हुई!
पर कैसे हो खुदसे मुलाकात ! साक्षात्कार हो या अवलोकन, एक प्रायोजित विधा ही तो है यह भी, जहाँ बस उतना ही बताया या दिखाया जाता है जितना कि हम चाहते हैं या संभव है। सबके बस में तो हनुमान हो पाना संभव नहीं। कहाँ से लाएँ वह आत्मदृष्टि और निश्छलता, जो अनचाहा हटाए, बढ़ाए नहीं, सफेद को सफेद और काले को काला देख पाए। सिलेटी के बिस्तार में न भटके । दूसरों के प्रश्न प्याज के छिलकों सी कुछ परतें तो खोलेंगे पर जड़ तक नहीं पहुंचेंगे, यह भी निश्चय ही है,जब तक कि जवाब देने वाला खुद न चाहे । और खुद को पूरा खोलकर रख देना…यह साधना और प्रयास तो आज भी एकाकी और तप सा ही कठिन और दुर्लभ है। और फिर शीशों का क्या, हर शीशा तो पूर्णतः निर्मल और प्रखर नहीं। माना हर आदमी ने अपने आगे बड़े-बड़े शीशे टांग रखे हैं, जिनमें वही दिखता है जो वो देखना चाहेगा , पर यह मात्र उसका अपना सच है। जैसे कि बिना अपना माने कोई कहे कि तुम मेरे अपने हो। सिर्फ कहने भर से कोई चीज, देश, व्यक्ति अपना नहीं हो जाता। शाहीन बाग का धरना एक बड़ा उदाहरण है इसतरह की मिथ्या का। अपना होने के लिए निस्वार्थ रमना पड़ता है, अपने से ज्यादा जिसका हम होने का दावा कर रहे हैं, उसके हित में सोचा तक नहीं तो दावा स्पष्टतः झूठा ही है। दूरी के अंगारों पर नंगे पैर चलकर पहुंचता है साधक या प्रेमी इष्ट के पास। वरना नफरत की आग यूँ धधकती न रह जाती, जैसा कि आज विश्व के हर कोने में हो रहा है …दिल्ली, आसाम, काश्मीर , मिडल ईस्ट, लंदन, अमेरिका कहीं भी हम सिर्फ नेताओं और दंगाइयों को ही दोष नहीं दे सकते। अपने मन में भी झांकना ही होगा।
वरना हम नहीं, मिट्टी ही हमें ललकारेगी। नफरत जीतने का आजभी बस एक ही तरीका है…खुद को भूलकर रमना और डूबकर अपनाना। प्यार खुद में एक ऐसी शक्ति है जो सबकुछ जीत सकती है।
सोचती हूँ तो मन आभार और पुलक से मन भर जाता है कि बेहद प्यार करने वाले मां-बाप की गोदी में भेजा ऊपर वाले ने, वह प्यार आज भी तो जीवन की सबसे बड़ी ढाल है। उस मिट्टी से गढ़ा जिससे तुलसी , कबीर जैसे संत बने और मिटे थे …जो प्रसाद और प्रेमचंद के आंसू और मुस्कानों से सिंची है।
यहाँ पश्चिम में तो आदमी इतना व्यस्त और मस्त है कि खुद में उलझी जिन्दगी झट से बीत जाती है, न तुम खाली न हम खाली वाले अंदाज में।
दृष्टि और दर्शन दोनों ही भिन्न हैं हमारे। हमें कमल सा जीने को कहा गया। लिप्त होकर भी पूर्णतः निर्लिप्त।
… पर यहाँ भी तो कुछ ऐसे सीधे-सच्चे इन्सानों का साथ दिया उसने, जिन्होंने मित्रता को अभूतपूर्व लगन और मिठास से निभाया , थामा और रोका। पास हों या दूर, सभी अपनों को , अपनेपन के इस अहसास को तहेदिल से आभार कहने का प्रयास है यह अंक। पुनः पुनः आभार मित्रों। भगवान ने चाहा तो यह यात्रा यूँ ही चलती रहेगी और अगले कई मोड़ों पर हम साथ-साथ पहुँचेंगे। आभार उन सभी लेखक व कवि मित्रों को जो इस अंक के सहभागी बने।
वक्त हो तो बताइयेगा अवश्य प्रयास कैसा लगा? कई मित्रों से परिचय होगा इस अंक में आपका, उनके अंतरंग मन और संसार में झांकने के मौके के साथ, तो देर किस बात की , खुली हवा से पहुँचिए और जी भरकर बहिए उनके साथ…
पुनश्चः लेखनी का अगला अंक हमने सामंजस्य पर बनाने का मन बनाया है। सामंजस्य कहाँ तक और कितना…कितनी जरूरत है इसकी जीवन और समाज में ? क्या जिर्राफ और कछुए में भी सामंजस्य संभव है पूरे आत्म-सम्मान के साथ, यदि नहीं तो फिर आपकी सोच में सह-अस्तित्व का क्या अर्थ है…क्या यह समाज में बढ़ती हिंसा असहिष्णुता और संवेदन हीनता का ही परिणाम है?
आपकी रचनाओं और विचारों का हमें इन्तजार रहेगा। भेजने की अंतिम तिथि 20 अप्रैल 2020.
शैल अग्रवाल