मंथनः ये तेरा घर ये मेरा घर-शैल अग्रवाल

” ज़मीं भी उसकी,ज़मी की नेमतें उसकी
ये सब उसी का है,घर भी,ये घर के बंदे भी
खुदा से कहिये, कभी वो भी अपने घर आयें!”

गुलजार

ऐसा नहीं, कि गृहिणी होने की वजह से ही प्रिय विषय है यह मेरा। ईश्वर के मुंह की तरह ही बृहद रूप में सभी कुछ ही तो संजोए हुए है घर…हर चीज से ही तो जुड़ा है अपनी दीवार, छत और नींवों जैसा…खिड़की और झरोखों जैसा। खिड़की या गवाक्ष खोलकर भीतर से देखो तो जहांतक आँखें देख और समेट पाएँ, पूरा ही धरती और आकाश है यह और यदि दरवाजे से बाहर निकलो, तो एक  कबीला या  समाज भी। दो कदम और आगे  चलो तो पूरा शहर है। शहर जो किसी देश का हिस्सा है और देश जो इस विश्व या पृथ्वी में  ही  है और फिर अगर थोड़ी और उदार व निष्पक्ष दृष्टि से देख पाएं, तो पृथ्वी ब्रहमांड से अलग कहां…सभी कुछ तो एक दूसरे से  जुड़ा हुआ है।

बिल, घोंसला, कोटर से गुफा तक, यह बसेरे की कहानी शायद तबसे चली आ रही है जबसे सृष्टि की  संरचना हुई ।  पृथ्वी पर रहने वाले ये जीव-जन्तु ही क्यों उस रचयिता को भी तो क्षीर-सागर और कैलाश पर्वत की जरूरत पड़ ही गई। शेर और बाघ जैसे अन्य अपने से अधिक ताकतवर सहचरों की तरह ही सदियों से गुफाओं में छुपे मानव ने बुद्धि के विकास के साथ-साथ अनेकानेक नवीनतम जीवनी के साधन जुटा लिए और इसके नित-नित, नए-नए और भव्यतम रूप हमारी आँखों के आगे आने लगे, आ रहे हैं व भविष्य में भी आते ही रहेंगे…सुना है अबतो बुलेट प्रूफ कारों की तरह ही हरतरह के हमले से पूर्णतः सुरक्षित घरों का निर्माण भी किया जाएगा।

पर सारी प्रगति और मानवता के हजारों साल  के इतिहास और विकास के बाद भी, झोंपड़े और झुग्गियां तो आज भी हैं जो घोंसले और कन्दरा के बीच ही कहीं आजभी वैसी  ही दयनीय दशा में  ही लटकी हुई हैं,  अपनी  उसी मूल रचना  और स्वरूप में। पचास प्रतिशत इन्सान आज भी उसी गुफा या सच कहा जाए तो गुफाओं से भी अस्थाई और असुरक्षित घरों में रह रहे हैं या बेघर ही घूम रहे हैं। परन्तु गुफा से घर और घर से महल और महल से राजमहल तक का यह सफर मुख्यतः मानवता के विकास का ही सफर तो रहा है, साथ साथ चन्द सयानों की योजना, संचालन और ताकत व बुद्धिमत्ता का  प्रदर्शन भी। यही वजह है कि एक साधारण सी संरचना, करीब-करीब बुनियादी यह जरूरत, हमें  पूरी मानवता का इतिहास बता देती है। उसका भूगोल, इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीति… पूरा-का-पूरा ज्ञान-विज्ञान समेटे हुए है मानव का घरौंदा। क्योकि  एक सफल और सुचारु घर के लिए भी प्यार और सद्भाव के साथ-साथ कर्मठता और कुशल संयोजन उतना ही जरूरी हैं, जितना कि एक देश या पूरे मानव समाज के लिए,  वरना घर, घर नहीं, मात्र एक ढांचा ही रह जाता है, जहां उम्र गुजारने के बाद भी कई-कई अजनबी अपने अपने अकेलेपन में भटकते उसे पिंजरे में तब्दील कर लेते हैं…बहुत आसान है कुबुद्धि के साथ किसी भी घर का मात्र एक पिंजरा बन जाना। जैसे कि एक अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता वैसे ही एक अकेली ईंट घर नहीं बना सकती।

एक सुचारु और आदर्श गृह-संरचना के लिए नींव और छत के साथ-साथ फर्श और रौशनदान या खिड़की व दरवाजे की जरूरत होती है।  वैसे भी घर घर हो, उसके लिए प्यार और सूझबूझ चाहिए। कर्मठता, त्याग व सद्भाव की अपेक्षा करता है एक खुशहाल घर, परिवार के हर सदस्य से। जहांतक घर की बुनियादी जरूरतों का सवाल है आजभी प्रकृति से, आसपास बिखरे कीड़े-मकोड़े पशु-पंछियों से, विशेषतः चीटियों और मधुमक्खियों की लगन व श्रम ही नहीं उनकी कुशल संयोजना व संचालन, बया की कला और शेरनी का संरक्षण और सियार की एकजुटता व नेवले का साहस और मकड़ी का लालच व लापरवाही; सभी  से बहुत कुछ सीखा जा सकता है घर-परिवार के बारे में…ममत्व और संरक्षण के बारे में …आखिर यही दो तो घर की असली परिभाषाएं हैं।

माना कि हम सभी ये सारी बातें जानते हैं पर फुरसत कहां है आज हमें जो बुनियादी इन बातों को याद रख पाएँ। मशहूर और बेहद संवेदनशील  लेखिका और कुशल संपादिका पद्मश्री मेहरुन्निसा परवेज़ ने भी अपने किसी पुराने संपादकीय ‘आत्मदृष्टि’ में यही बात बहुत सुन्दर ढंग से समझाई है। अपनी बात को और खुलकर कहने के लिए समरलोक के उनके एक संपादकीय क एक अंश बहुत श्रद्धा व सम्मान के साथ उद्ध्रत करना चाहूंगी ;

” मधुमक्खी  का छत्ता भी देखने और समझने की चीज है। छत्ते में ढेरों घर बने होते हैं । कितनी ढेर मजदूर मधुमक्खियां वहां दिन-रात काम करती हैं। कितनी लगन और परिश्रम से हर घर में मधु तैयार होता है। अलग-अलग मधुमक्खी के द्वारा यह तैयार होता है, लेकिन एक-सी तासीर और गुणों वाला होता है। बोतल में रखो तो जरा भी अन्तर नहीं दिखता। इस तरह एकजुट होकर लगन से एक-सा कार्य करने वाले मजदूर क्या और किसी फैक्टरी में हैं? क्या इंसान के भीतर ऐसा श्रम, साधना, भाव और लगन पैदा हो सकती है ? क्या हम संसार के लिए अमृत बन सकते हैं? हम अपने भीतर का छल-कपट-बैर-जहर क्यों नहीं निकाल फेंकते ? हम अपने भीतर को शहद के छत्ते की तरह मीठा और गुणकारी क्यों नहीं बना लेते? शहद निकालने के बाद भी छत्ते में कितना मोम भरा होता है। मधुमक्खी शहद बनाकर भूल जाती है। उसे अपने महान कार्यों का, उपकारों का ध्यान नहीं रहता, ऐसा मनुष्य क्यों नहीं कर पाता? वह अपने छोटे से कार्यों को उपकारों को भूल तक नहीं पाता? मधुमक्खी की सारी मेहनत की कमाई को मनुष्य ले उड़ता है और वह इस बेइमानी को भूल जाती है। नया निर्माण करने में जुट जाती है, ऐसा सद्गुण इंसान के भीतर क्यों पैदा नहीं होता? हम दूसरे के छल-कपट को कभी नहीं भूल पाते ? अपने को मोम कर लेने की क्षमता हमारे भीतर नहीं है। दूसरे के मन को दुःखाने में इन्सान को कितना आनंद आता है, दूसरे से बदला लेकर वह अपने को कितना बड़ा समझने लगता है। ये  सारी बातें यदि हम एक नन्ही-सी मधुमक्खी से सीखें तो कितने बड़े-बड़े कार्य कर सकते हैं। इन्सान अपनी महानता का बखान करता है। अपनी पूजा करवाता है, अपनी मूर्ति चौराहे पर लगवाकर शताब्दियों तक अपने को जीवित रखने की योजना में लगा रहता है।

जानवर, पक्षी, चींटी, मधुमक्खी को आखिर  कौनसा  भगवान जन्म देता है?  भगवान या अल्लाह ? इनका स्वर्ग-नरक,  जन्नत-दोज़ख कहां है? हम तो धर्म के बिना एक कदम नहीं चल पाते, एक घूंट किसी का छुआ पानी नहीं पीते, यह कैसे बिना धर्म के जिन्दा रहते हैं। मरने के बाद का स्वर्ग-नरक का भय इन्हें क्यों नहीं तंग करता। यह ढेर-ढेर बातें जो कुछ सोचने पर मजबूर करती हैं।”

जैसे तरह तरह के प्राणी होते हैं और उनके अपनी रुचि अनुसार तरह तरह के घर , उनके तरह-तरह के स्वभाव भी। हममे से कई ऐसे भी हैं, जो जहां कदम टिका दें, वही उनका घर बन जाता है। न पीछे छूटे की याद आती है और न कल क्या होगा इसकी ही फिक्र! खुश किस्मत हैं ऐसे इन्सान जो इतनी बेफिक्र और मस्त जिन्दगी जी पाते हैं, अधिकांशतः तो ऐसे ही होते हैं कि इसके चप्पे-चप्पे से प्यार करने लग जाते हैं। कुछ दिन दूर रहे नहीं कि इसकी याद सताने लग जाती है फिर चाहे वह पांचतारा सुख-सुविधाओं  से लैस होटल हो या राजसी वैभव से भरापूरा राजमहल। कुटिया, छप्पर , चाल या आलीशान महल, घर तो घर ही है।  हो भी क्यों न गृहस्वामी और गृहस्वामिनी जो बना देता है यह एक आम इन्सान को । यही तो वह नीड़ है जहां हम जीवन की पहली सांस लेते हैं, पहला शब्द बोलते हैं और जिसके आंगन में जीवन का पहला कदम चलते हैं। … घर बसाने का सपना आदमी तो आदमी पशु पक्षियों तक को होता है। घर जिसके अन्दर परिवार की पूरी मोह ममता और वात्सल्य किलकता है:  घर जिसके अन्दर प्यार और ममत्व के साथ-साथ अगर ध्यान न दो तो सारी बुराइयों और लड़ाइयों की जड़ें भी उतनी ही आसानी  और तेजी से बढ़ और पनप सकती हैं और पूरे ही घर का स्वास्थ बिगाड़   देती हैं ।

उष्मित वातावरण हो तो जर, जोरू, जमीन तीनों ही फैल-फूटकर पल्लवित होने लग जाती  हैं, फल देने लगती हैं। यही कारण है कि घर की रक्षा और सुरक्षा का ध्यान विशेष रूप से रखता है आदमी और उसे प्राणों से भी ज्यादा प्यारा होता है अपना घर। घर…जिसके लिए लडाइयां लड़ी ही नहीं, जीती और हारी भी जाती हैं।  किसी ने चोरी का सेव खाने पर अपना स्वर्ग छोड़ा था (एडम और ईव) तो किसी ने अपनी अतिशय भलमनसाहत के रहते( भगवान श्री राम) चाहे जैसे छूटे, पीछे छूटा घर आजीवन भटकाएगा जरूर…कभी देश बनकर तो कभी बूढ़े मां बाप बनकर। कुछ नहीं तो मात्र चन्द यादें ही बनकर। सदियों से ही यह घर छूटने का दुख ऐसा दुख है जिससे आदमी मुश्किल से ही उबर पाता है…चाहे फिर उसने घर स्वेच्छा से छोड़ा हो या किसी मजबूरी के तहत। यदि इस दुख की तीव्रता को अनुभव करना है तो हमें किसी प्रवासी या रिफ्यूजी का मन जानना पड़ेगा। अकेले विदेश में काम करने गये नौजवान से पूछना होगा।  घर जिसकी तलाश में कई बेघर आजीवन भटकते ही रह जाते  हैं और यह एक नासूर बना उनके अस्तित्व और पहचान दोनों को ही पूरी तरह से मिटाता चला जाता है…एक नयी पहचान लेने पर मजबूर कर देता है। मिल जाए तो स्वर्ग न मिले तो नर्क वाली कहावत जितनी घर पर चरितार्थ होती है शायद ही किसी और पर।

घर, जिसके अन्दर बैठकर छोटी से छोटी हैसियत का आदमी भी खुदको किसी राजा से कम नहीं समझता, इसी घर-परिवार का संतुलन यदि जरा-सा भी बिगड़ जाए तो कई घर तो ऐसे भी बन जाते हैं जहां घरवाले एक-दूसरे के साथ आजीवन अजनबियों की तरह रहते ही जीवन निकाल देते हैं । दूसरी तरफ जिस घर की नींव प्यार की हो और छत विश्वास की, उसे आंधी-पानी, दुख-दर्द,  कुछ भी नहीं हिला सकते, हिला नहीं पाते। आखिर प्यार और विश्वास ही तो वे दो सबसी बड़ी नेयमतें हैं भगवान की, जिनके आधार पर वह एक सुखी घर-परिवार की नींव रख पाता है।

शैल अग्रवाल