हिम और ज्वालामुखी के संयोग से निकली सुन्दरता – न्यूजीलैंडः हरिहर झा, मेलबोर्न-लेखनी-मार्च-अप्रैल 18

“चराति चरतो भग:” जो चलता है उसका भाग्य चलता है। सब जानते हुये भी कुछ वर्षों से अमेरिका और भारत के अलावा किसी नई जगह पर यात्रा करने का सौभाग्य हाथ नहीं आया तो कुछ निराशा हो रही थी फिर एक मुहावरा याद आया कि “बगल में छोरा, गाँव में ढिंढोरा” । अरे! न्यूजीलैंड जो मेलबोर्न से करीब है वहाँ क्यों न जाया जाय। हम सपरिवार सिडनी होते हुये न्यूजीलैंड की ओर रवाना हुये। यह देश उत्तरी द्वीप और दक्षिणी द्वीप – दो भागों में विभाजित है | कितने आश्चर्य की बात है कि ये दोनो भाग जिनमें अनेकों ज्वालामुखी और हिमाच्छादन का इतिहास छुपा है फिर भी इनके गर्भ से निकली है प्राकृतिक सुन्दरता और इसके साथ ही यहाँ के आदिवासियों की कलाकृति के रूप में मानव-संस्कृति का शैशवकाल जीवंत है।

ओकलैंड पहुँचे। पहले उत्तरी द्वीप देखने की बारी थी। ओकलैंड डोमेन जो शहर का सबसे पुराना पार्क है और प्राचीन काल के ज्वालामुखी पर बसा हुआ है। ड्राइव करते हुये हेमिल्टन पहुँचे जहाँ वाइकाटो म्यूजियम देखा। यहाँ एक नन्हे से ताल पर बसा मावरी संस्कृति और भूतापीय गतिविधियों के लिये प्रसिद्ध रोटोरुआ नगर है। अब हम उत्तरी द्वीप के दक्षिण-पश्चिमी भाग में आ पहुँचे थे। यहाँ ‘ते पुइया ताल’ है जिसकी उत्पत्ति २००० वर्ष पूर्व हुई थी जिस समय इतना बड़ा ज्वालामुखी निकला था कि यूरोप और चीन भी धुँये में आच्छादित हो गये थे। ते पुइया ताल इसका परिणाम है। रोटोरुआ में बुलबुलेदार किन्तु धूलधूसरित तालाब दर्शनीय हैं। यहाँ का ज्वालामुखी-क्षेत्र रोटोरुआ, ते पुइया ताल और ’बे ऑफ़ प्लेन्टी’ तक फैला हुआ है जो भूतापीय गतिविधि का बड़ा केन्द्र है। अद्भूत प्राकृतिक सौदर्य और थर्मल गीज़र देखते हुये माउन्ट टारावेरा, गवर्नमेंट गार्डन, पोलिनेशियन स्पा आदि देखने के बाद मावरी आर्ट्स एंड क्राफ़्ट्स इंस्टिट्युट पहुँचे। यहाँ मावरी संस्कृति के बारे में अद्भूत जानकारी मिली। इन पंक्तियों के लेखक ने भी प्रारंभिक ट्रेनिंग का एक पाठ लिया। सांस्कृतिक शिक्षा के अलावा यहाँ आदिवासी किसी आक्रमणकारी को बिना हथियार के भी दुष्मन को डरा पाने में सफल हो जाते हैं। वे आँखों की पुतलिया इतनी गोल-मटोल कैसे कर पाते हैं यह सब इन्हें घुट्टि में पिलाया जाता है। अंत में प्रभावशाली हाका नृत्य देखा तथा तमाकी संस्कृति का भोजन लिया।

अगले दिन होबिटन देखने की बारी थी। होमो-सेपियन के अलावा जो होबिट या ठिगने मानव की प्रजाति थी उसके बारे में कुछ जानने को मिलेगा ऐसा मैं अपने अज्ञान में समझ रहा था। पर नहीं, यहाँ सर्वत्र होलिवुड छाया हुआ था। पीटर जैक्सन ने जे. आर. आर टोल्किन के प्रसिद्ध उपन्यास “लॉर्ड ऑफ़ द रिंग्स” के कपोल कल्पित कथानक के आधार पर तीन भाग में शृंखला फिल्म बनाई थी तो स्टूडियो के सेट यहाँ अस्थाई रूप में खड़े किये गये थे। पर इस शृंखला को ऐसी अभूतपूर्व सफलता मिली कि प्रोड्यूसर सोच में पड़ गये कि आगे क्या किया जाय? तीन भाग का उपसंहार बनाने के बदले उन्होने प्रस्तावना भाग बनाना शुरू किया। इसका अर्थ यह है कि “लॉर्ड ऑफ़ द रिंग” के तीन भाग के बाद क्या हुआ इसे छोड़ कर इन तीन भाग के पहले क्या हुआ था, इस पर ’होबिटोन’ चित्रपट बनाया। तथा पहले जो स्ट्डियो की अस्थाई संरचना थी उसे स्थाई संरचना के रूप में स्थापित कर दिया। अब हजारों पर्यटक उसे देखने आते हैं और इस तरह व्यापार का नया आयाम खुल गया।

जब यहाँ से हम फिर ओकलैंड पहुँचे तो यह २०१७ का अंतिम दिन था। हम नये वर्ष के स्वागत में जुट गये। १ जनवरी को पहले यहाँ सीबीडी में स्काई टावर देखा। ४८वे तल पर स्थित एपीई ( ओकलैंड पीयरींग एक्स्चैन्ज ) के द्वारा यह अवलोकन और दूरसंचार के लिये उपयोग में लाया जाता है। माउन्ट एडन जाते हुये प्राकृतिक द्रष्यों का नजारा देखा पर पता चला यह ज्वालामुखी की चोटियों से घिरा हुआ है। अगले दिन क्वीन्सटाउन के लिये प्रस्थान किया। प्राकृतिक द्रष्यों की बहार के कारण दक्षिणी न्यूजीलैंड को उत्तरी न्यूजीलैंड से बेहतर माना जाता है। कुछ लोगों को मैंने इसकी तुलना स्वीटज़रलैंड से करते हुये पाया। यहाँ की चोटी पर ऊँचे ऊँचे पेड़ देख कर मुझे लगा ये आपस में बातें कर रहे हैं जिसे मैं सुन नहीं पा रहा। और इस तरह निम्न पंक्तियाँ लिख दी : “मौन इस संवाद को समझूँ, / नहीं कुछ आस / कोई कंप्यूटर? / विश्लेषण करे कुछ खास / दिमाग की नस नस बना ली भले विश्वकोष / मूढ़ता में ना दिखे प्रकृति का भव्य रास / संगीत से घृणा, / कोलाहल भरा है प्यार / मौसम गज़ल गा रही मैं दे न पाता दाद।“ तो पहले मिलफोर्ड साउंड देखा । यह विशाल ’मीटर पीक’ के लिये जाना जाता है तथा यहाँ के वर्षावन और झरने अद्भूत हैं। यहाँ पेंगुइन, डोल्फिन और फर सील बहुतायत में पाये जाते हैं। क्रूज़ में सैर करते हुये आसपास का जो प्राकृतिक द्रष्य देखा तो बस जैसे इसकी सुन्दरता पर लुट जाने को दिल चाहता है। बड़ा अद्भूत!

अगले दिन माउन्ट कूक पहुँचे। यह न्य़ूजीलैंड का सबसे ऊँचा पर्वत है। इस ३७०० मीटर से भी ऊँचे पर्वत ने हिलेरी को ऐवरेस्ट पर चढ़ने के लिये पर्वतारोहण की ट्रेनिंग दी। यहाँ के आदिवासियों में एक रोचक किंवदंति प्रसिद्ध है। ओराकी और और उसके तीन भाई ’आकाश-पिता’ के बेटे थे। समुद्री यात्रा के दौरान उनकी डोंगी एक चट्टान में बदल गई। ठंडी हवाओं ने डोंगी को पत्थर में बदल दिया जो न्यूजीलैंड का दक्षिणी भाग बनी और वे तीनो भाई सर्द झोकों से दक्षिणी ऐल्प्स की चोंटियाँ बन गये।

इसके बाद हम स्काईलाइन से टिकी-ट्रैल होते हुये गोन्डोला बेस पर पहुँचे तथा शोटओवर जेट का आनन्द लिया। शोटओवर जेट का भी अनोखा आनन्द है। मान लीजिये हम कोई सिनेमा देखने गये तो भी लौट कर मुँह बिगाड़ते हुये कहते हैं कुछ मजा नहीं आया – बड़े बोर हुये। पर यहाँ जिस जेट में बैठे थे वह तेज गति से किनारों से टकराती हुई जा रही थी उस चोट में भी हम हँस रहे थे और छूटते ही सबने कहा – बड़ा मजा आया। इस ’मजा’ आने को समझना टेड़ी खीर है। समझ कर हम करेंगे भी क्या? आनन्द ले लेना काफी है।

अगले दिन न्यूजीलैंड के प्राकृतिक द्रष्यों को अंतिम प्रणाम करते हुये मेलबोर्न के लिये रवाना हो गये।

राहुल सांस्कृत्यायन ने ’अथातो घुमक्क्ड़-जिज्ञासा’ में भ्रमण के महत्व पर अच्छा प्रकाश डाला है। वे घुमक्कड़ी को धर्म बताते है। सफल महापुरूषों की सफलता में भ्रमण का कितना हाथ रहा है उस पर अच्छा प्रकाश डाला है। आधुनिक युग में पुराने जमाने जैसी मुश्किलें नहीं रही। पर पर्यटन अब भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इस यात्रा ने मुझे क्या दिया इसे शब्दों में बताना संभव नहीं है। (फोटो: रचना झा)