हास-परिहासः दोपहर की चाय-हरिहर झा/लेखनी-मार्च-अप्रैल 18

शायद आप मुझसे सहमत हों कि प्रवासियों के लिये बीते समय को लौटाने का एक सुन्दर तरीका है – भारत-यात्रा। पुरानी यादों के अनेक क्षणों का एक एक फूल वर्तमान समय के धागे में बंधा हुआ देखने की ललक किसे न होगी? पिछली बार मैंने यही सोच कर बीड़ा उठाया किन्तु क्या बताऊँ भारत में पैर रखते रखते ही काफ़ी कल्चर शॉक लग चुके थे। इमिग्रेशन-ऑफ़िसर से झगड़ा किया, कुली को नसीहत देने का मजा चख लिया, टैक्सी-ड्राइवर की चोरी और सीना जोरी देखी और उसकी लाल-पीली आंखों का करारा जवाब दिया तब जाकर घर पहुँचा तो लगा किसी सुखे रेगिस्तान से हिल-स्टेशन आ पहुँचा हूँ । यहाँ अपने परिवार में आकर अपनों का प्यार और आदर मिला । सोंचता हूँ -भारत के किसी भी परिवार में आपस में या तो गहरा प्रेम है या गहरा वैमनस्य; पश्चिमी जगत की तरह उदासीनता तो बिल्कुल नहीं । मैं इस मामले में कुछ सौभाग्यशाली रहा हूँ पर यहाँ आकर भी मुझे तकलीफ़ इस बात की होने लगी कि मेरी भाभी या भतीजी उठ कर पीने का पानी नहीं लेने देते थे। मेरी कीटाणु-रहित पानी की बोतल खाली होने पर उबाल कर ठन्डा किया पानी मुझे हाथ में मिल जाता था । पत्नी तक यहाँ आकर इतनी सेवाभावी हो गई थी कि वह मेरे बाथरूम में घुसने से पहले टोवेल सलिके से रख देती थी कि भाभी के सामने नीचा न देखना पड़े या भाभी खुद उठ कर टोवेल न रख दें ।

एक रोज घर की सभी स्त्रियां गई हुई थी किसी स्वामीजी की कथा सुनने । मुझे कुछ न कुछ घर का काम कर लेने की आदत सी हो गई है । मन ने कहा बन्दे ! यह स्वर्णिम अवसर है यहाँ आकर कभी तुझे एक कप चाय उठ कर ले आने तक का मौका नहीं मिला; बनाने की तो बात ही दूर । रंगे सियार की भांति मुझे भी अपनी स्वाभाविक आदत को अभिव्यक्ति देने की हूक उठी । सोंचा – एक कप चाय बना करके कर दे अपने अरमान पूरे । यहाँ कौनसा चूल्हा जलाना पड़ेगा ? गैस तो गैस है – वह यहाँ पाइप से न निकले, सिलेन्डर से निकले इससे तुझे क्या फ़र्क पड़ता है ? मैंने स्टोव का बटन घुमाया इस आस में कि स्टोव की गैस तो स्टार्टर से अपने आप जलने लगेगी । गैस की गन्ध से किचन भरने लगा पर स्टोव न जला । तब पास में पड़ा लाइटर देख कर समझ गया कि गैस जलाना पड़ेगा । गैस ऑन करने के बाद लाइटर जलाया पर वह भी ढपोल-शंख था जो ””टिक-टिक” करता रहा पर जलने का नाम न लेता था। ख़्याल आया कि लाईटर के होने और उसके दुरुस्त होने में फ़र्क होता है । दुरुस्त न होने पर भारत में लाइटर क्या कोई भी चीज़ दुरुस्त करवाई जा सकती है – सस्ते में । इसके लिये “होना” बहुत जरूरी है क्योंकि न होने वाली ( या फैंक दी गई ) वस्तु को आज तक कोई दुरुस्त नहीं करवा पाया । “टू बी ओर नोट टू बी” को मैं कुछ वक्र अर्थों में समझ रहा था ।

चाय की बात अटक गई । दियासलाई बहुत ढूंढी पर न मिली । परसों लाईट गई थी अचानक ! आस्ट्रेलिया में साल में एक बार “अर्थ-ऑवर” – पर्यावरण के लिये एक घंटा बिजली बन्द कर के अपने आप को धन्य समझते हैं वह भी सुरक्षा-बिजली की व्यवस्था के बाद ! यहां तो रोज-रोज के “अर्थ-ऑवर” बिना बुलाये मेहमान की तरह चले आते हैं पर हाँ, तो परसों घर में मोमबत्ती जलाई गई थी । अब माचिस कहाँ पड़ी होगी भगवान जाने ! भगवान शब्द दिमाग में आते ही ख़्याल आया कि भगवान के लिये अगरबत्ती और माचिस में “इक दूजे के लिये” वाला रिश्ता होता है । अहा क्या बात है! अगरबत्ती के पास माचिस क्या मिली भानुमति का पीटारा मिल गया । आस्ट्रेलिया वापस आने के महिनों बाद भी याद आता है कि उस रोज आखिर मैंने दोपहर की चाय बना ही ली थी ।