यात्रा संस्मरणः जगन्नाथ पुरी- पद्मा मिश्रा / लेखनी -मार्च-अप्रैल 18

जगन्नाथ स्वामी नयन पथ गामी भवतु में ***
> > सागर तट पर —-
> > मानव मन यायावरी है ..धरती के सुन्दर रूपों को देखने -आत्मसात करने की तीव्र इच्छा उसे यात्राओं के लिए प्रेरित करती है इस बार मेरे परिवार ने जगन्नाथ पुरी जाने का कार्यक्रम बनाया ,वहां टाटा स्टील बनाये गए होली डे होम्स –गार्डन रिसोर्ट ”में हमने दो कमरे बुक करवाए ,टिकट लिया और अपने गन्तव्य की ओर पुरुषोत्तम एक्सप्रेस से निकल पड़े …रात भर का सफर था -सुबह सूरज की किरणों ने ऐतिहासिक नगरी पुरी में हमारा स्वागत किया –ऑटो से गार्डन रिसोर्ट पहुंचे जहा प्रबंधक दास जी ने हमारी अगवानी की -अपने कमरों मेंस्नान कर हम तैयार हो ही रहे थे कि चाय आ गई ..चाय ने हमारी यात्रा की सारी थकन मिटा दी -हमारे पास समय ही ..समय था और –.समुन्द्र का गहरा आकर्षण था मन में अतः सबसे पहले निकटवर्ती सागर तट पर जाने की योजना बनी -पैदल ही चलते हुए हमने जैसे ही बालुकामय धरती को छुआ -मन रोमांच से भर गया ..सामने ही अहंकार से भरा हुआ सागर गर्जना करता हुआ दिखाई दिया –जब उसकी लहरें पुरी के पावन तट को स्पर्श करतीं थीं तो लगा जैसे ईश प्रभाव से नतमस्तक हो ,पराजित होकर वापस लौट जा रही थीं …लहरों का बार बार तट से टकराना ..शांत हो जाना और पुनः चलायमान हो उत्तुंग ऊंचाइयों को छू लेना ..शंकराचार्य के कथन की याद दिला रहा था —”पुनरपि जनमं .पुनरपि मरणं …”–आज इस तट पर बैठे बैठे मन हर्ष -उल्लास और आध्यात्म की त्रिवेणी में गोते खा रहा है –मानो विशाल सागर एक हृदय की तरह है -जो अपने आगोश में पूरे संसार को भी समाहित कर लेने की क्षमता रखता है ..तभी एक चंचल लहर आकर मेरे पांवो को भिंगो गई ..जिसकी कुछ बूँदें सिर पर पड़ीं -मन तृप्त हो उठा ..जैसे भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद मिला हो …आस पास कुछ मल्लाहों -मछुआरों के बच्चे लहरों से खेल रहे थे …छोटे छोटे सीप -शंख पकड़ कर वे हमें दिखाते और खरीदने का भी आग्रह कर रहे थे ….उत्तुंग लहरों पर अठखेलियाँ हुए सागर के बेटे बहुत दूर निकल गए हैं,-हवा तेजी से बहरही है — तन मन को झकझोरती हुई …शीतलता अंतर्मन को छू रही है ..दिन में जो सूरज आग बरसा रहा था – अब शांत हो समुन्दर के विशाल आगोश में समां रहा है .. मै अपने परिवार के सदस्यों के साथ सागर तट पर घंटो बैठी रही ,-खूब तस्वीरें खींची ,लहरों को छू करजीवन के क्रमवत परिवर्तन को महसूस किया मैंने — ….आज पुरी के पावन तट बैठे हुए भगवान जगन्नाथ के भक्ति भाव व् उपासना का बोध भी जाग रहा है ,– मानो जीवन के सागर तट पर को मन की आस्था और विश्वासों को नमन -समर्पण करता मन -विनत है —उस विशाल पारावार के सम्मुख –जैसे सागर की विशालता और महाप्रभु की भक्तिमयता ,एकाकार हो गई है .अभी अभी हाथों में तरह तरह के मोतियों की मालाएं लिए एक युवक गुजर गया ..मैंने उसे बुलाया नहीं फिर भी वह वापस लौटा -पूछा –”माला लेंगी मैडम ?..मेरे न कहने की प्रतीक्षा किये बिना –”ये मोती देखिये !..चार सौ लगा दूंगा ”..मुझे हंसी आ गई ,सागर से निकले सच्चे मोतियों की कीमत सिर्फ चार सौ कैसे ?”…वह चला गया –अँधेरा हो गया था ..लहरें अब उग्र होती जा रही थीं भयावह अँधेरे में सफ़ेद लहरों का क्रम भयभीत भी करता है और रोमांच भी पैदा करता है ..अंततः हम वहां से उठे और धीरे धीरे पैदल चलते हुए गार्डन रिसोर्ट आ पहुंचे ,आठ बजे खाना खा कर ..बातें करते हमें गहरी नींद आ गई ….
> > दूसरे दिन सुबह एक सुकून भरी शांति महसूस हो रही थी ,हम सब स्फूर्ति व् उत्साह से भरे हुए …जल्दी जल्दी तैयार होने में व्यस्त हो गये थे ,टाटा स्टील के गार्डन रिसोर्ट की यह पहली सुबह बहुत सुहावनी थी –चाय हमारे कमरे में ही आ गई थी ,…..फिर हम एक आध्यात्म भाव .-भावनाओं और भक्ति से भरे भगवान जगन्नाथ के दर्शनों की यात्रा पर चल पड़े ,-चौक पर पहुँचते ही एक युवा पांडा जी हमारे साथ हो लिए ,अनचाहे ही उनसे बात करनी पड़ी ..फिर वे हमें अच्छी तरह दर्शन करवा देने के लिए राजी हुए ,प्रसाद आदि सारी व्यवस्था सम्पन्न होने तक वे हमारे साथ रहे मन्दिर में प्रवेश से पूर्व हमे अपनी चप्पलें ,मोबाईल ,कैमरा आदि वस्तुएं जमा कर देनी पड़ीं जिसका शुल्क भी दिया गया —द्वार पर ही भगवान जगन्नाथ बलभद्र और सुभद्रा के विग्रह विद्यमान थे जनके बारे में पंडा जी ने बताया –”ये मुसलमानों के दर्शनार्थ राखी गई हैं -यहाँ सिर्फ हिन्दू ही प्रवेश कर सकते हैं ”—हम अनेक सोपानो को पार कर मुख्य द्वार से अंदर गए …धुप ..दीप -आरती व् प्रार्थना के मन्त्रों से पूरा मन्दिर परिसर गुंजायमान था ..घी और धुप की सुगंध सर्वत्र व्याप्त हो रही थी मंदिर की प्राचीन दीवारों पर वास्तु कला ,एवं प्राचीन वैभव का अनूठा सौन्दर्य मोहित कर रहा था ..सामने स्थित रत्न सिंहासन पर जगन्नाथ महाप्रभु ,बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियाँ विराजमान थीं ..साथ ही सुदर्शन चक्र भी ..नीचे महा लक्ष्मीऔर सरस्वती की मूर्तियाँ थीं ..भगवान के मस्तक पर हीरे की चमक दूर से ही आकर्षित कर रही थी मन्दिर के भीतरी अंतर्कक्ष में यद्यपि
> > अँधेरा था परन्तु जलते हुए सैकड़ों दीपों और आरती की ज्योति से प्रकाश जगमगा रहा था .लोबान और अगरु की गंध पुरे वातावरण को भावमय बनाती हुई –रहस्यमयता की सृष्टि कर रही थी , -मेरी बेटी ऋचा यहाँ पहली बार आई थी, हम सब मंत्र मुग्ध थे …मन्दिर परिसर में भगवान शिव ,हनुमान ,पार्वती ,लक्ष्मी ,सरस्वती आदि अनेक देवी देवताओं के मन्दिर थे जिनमे दर्शन हेतु जाने पर उनमे बैठे हुए पुजारियों की चतुराई की मै तो कायल हो गई हमने जैसे भगवान के सामने सिर झुकाया –तुरंत कुछ फूल -प्सिंदूर ,चूड़ी आदि थमाकर दक्षिणा और मुल्य की मांग करने लगते थे ,—थोडा बुरा जरुर लगा अब ये अनचाहे कैसी दक्षिणा ?पर वही नारी सुलभ भावुकता –कि सुहाग के सिंदूर और चूड़ियों पर क्या बहस ?उन्हें पैसे दे दिए ..पर बाकी के मन्दिरों में हमने बाहर से ही नमन किया -मन्दिर की प्रदक्षिणा करते समय मन बार बार पुकार उठता था –”जगन्नाथ स्वामी -नयन पथ गामी -भवतु में ”…हमारी परिक्रमा पूरी हुई -सामने एक उड़िया भक्तों का समूह भजन गायन कर रहा था ..भाषा न समझते हुए भी भजन हमे हृदय में छू रहा था .सच ही खा है प्यार और भावनाओं की कोई भाषा नहीं होती वह तो बस ह्रदय ..नेत्रों ..मुस्कान के द्वारा अभिव्यक्त होती है …–”भज गोविन्दम ..भज गोविन्दम …गोविन्दम भज मूढ़ मते ”..गाती हुई कुछ महिलाएं नृत्य कर रही थीं -भावना और भक्ति का अद्भुत समन्वय था .-अपूर्व दृश्य था …जो हमे अपने साथ बहाए लिए जा रहा था .
> > हमने तीन रूपये का टिकट लिया और भगवान को चढाये जाने वाले महाप्रसाद की रसोई देखने चल पड़े ..जहाँ सात सौ चूल्हों पर आठ सौ कुशल रसोइये भगवान का भोग तैयार करते हैं ,ये सारा प्रसाद मिटटी की सात सौ हंडियों में पकाया जाता है ,जिसे ‘अटका’ कहते हैं .एक दिन प्रयोग में ली गयी हांड़ी दूसरे दिन काम में नहीं लाई जाती ..लगभग दो सौ सेवक सब्जियों ,फलों ,नारियल को काटते हैं ,मसलों की काट छंट और पिसाई करते हैं ..छप्पन प्रकार के व्यंजन भोग के लिए बनते हैं –,दाल चावल,सब्जी,मीठी पूरी ,खाजा,लड्डू ,पड़ा ,बूंदी,चिउड़ा ,नारियल ,धी से तैयार पदार्थ -माखन, मिसरी आदि का महा प्रसाद बनता है ,हमको भी कुछ तैयार प्रसाद मिला जिसे हमने आदर से ग्रहण किया .
> > बाहर आकर पुनः पाँव धोये और अपना कैमरा ,मोबाईल वापस लेकर ऑटो रिक्सा से रिसोर्ट पहुंचे ..शरीर थकान से चूर था ..भूख भी लग रही थी –गर्मी की तपन ने हमें झुलसा दिया था ..स्नान किया फिर नीचे डाइनिंग एरिया में खाने के लिए गए ..खाना स्वादिष्ट था -गर्म चावल ,दाल ,दो सब्जियां पापड़ ,सलाद ,चटनी .अंचार –हमारी भूख में यह भोजन अमृतोपम लगा ….
> > शाम पांच बजे —
> > हमने दो पहर में अपने कमरे में ही आराम करने का निर्णय लिया और शाम की चाय के बाद पुनः पैदल ही समुद्र तट की और निकल पड़े ..आज आसमान पर भी बादल थे और सागर की सफेद लहरें भी पहले से अधिक शीतल और चंचल लगीं …. ,धरती व् आकाश जैसे एक हो गये थे ..तस्वीरों में सारे दृश्यों को ..प्रकृति के पल पल बदलते रूप को हम कैद करते गए सब कुछ वर्णनातीत ..शब्दातीत …सागर में नदियों का मिलना …लहरों में बदलना ..और बार बार तट को छू कर खिलखिलाते हुए लौट जाना …ये सब मेरे कवि मन को अभिभूत कर रहा था .–सृजन की कामना जाग उठी –वहीँ बालू पर बैठ कर एक कविता लिखी –”कह उठा सागर -समर्पण हूँ तुम्हारा ,तुम हमेशा ही मेरे अहसास में हो ”…….आस पास नई पीढ़ी के कुछ युवा आपत्तिजनक तस्वीरें खिंचवा रहे थे ,हमारे अनुशासित -अभिभावक मन को कुछ बुरा लग रहा था ..लेकिन –”सबकी अपनी दुनिया है ”यह मान कर हम मौन रहे …..मैंने भी अपने पति ,व् बेटी तथा पारिवारिक सदस्यों के साथ तस्वीरें लीं ..इसी भने अपनों के संग साथ को भी स्मृतियों में संजो लिया ….वहीँ रेत पर बैठे हुए जिन्दगी की आपाधापी से दूर ..तमाम तनावों -उलझनों से दूर ..अपने जीवन साथी के साथ बैठे हुए ये गीत बार बार याद आ रहा है –”वक्त की कैद में जिन्दगी है मगर –चंद घड़ियाँ यही हैं ..जो आजाद हैं ,इनको खोकर कभी …उम्र भर ना तरसते रहें ”……..मेरे आस पास लोगों का मेल लगा है ..तरह तरह के लोग ..कुछ सजे हुए ऊंट और घोड़े भी नजर आ रहे हैं ,छोटे छोटे बच्चे उन पर सवारी करते हुए खूब शोर मचाते अभी अभी निकल गए हैं ….ठंडी हवा पूर्ववत बह रही है ….अँधेरा बढ़ रहा था ..और लहरें उग्र होती जा रही थीं ,पर मन वहां से लौटना ही नहीं चाहता था ,…पर लौटना तो था ही ……..
> > तीसरा दिन —-
> > आज का दिन पॅकेज टूर के लिए नियत था ..विडिओ कोच से हमे कोणार्क और लिंगराज मन्दिरों की यात्रा पर निकलना था ,बस आरामदायक थी ,…बस के चलते ही शीतल हवा आह्लादित कर गई .गाइड ने माइक सम्भाला और अगले पड़ावों के लिए आवश्यक दिशा निर्देश देना प्रारम्भ किया .बस का नाम तिरुपति था अतः हम सभी सहयात्रियों को वह ”तिरुपति परिवार ”कह कर सम्बोधित कर रहा था .उन्होंने चंद्रभागा और कोणार्क के विषय में ऐतिहासिक और रोचक जानकारियां दीं ….थोड़ी देर बाद ही हमारी बस चंद्रभागा पर रुकी ..सागर की स्वच्छ फेनिल उत्तुंग लहरों को देख कर मन मुग्ध हो गया …हम भींगते रहे थे देर तक ..आने की इच्छा ही नहीं हो रही थी ,..लेकिन हमारे गाइड ने मात्र सात मि ० का समय दिया था …बस आगे की ओर चल पड़ी थी ..असीम हरियाली ..घने आम ,ताड़ व् नारियल के पेड़ों से घिरे रस्ते पर हमारी बस तेजी से आगे बढ़ रही थी –दिन चढ़ने के साथ साथ सूर्य की गर्मी भी बढ़ रही थी ,..हम कोणार्क के मार्गों की सुन्दरता को निहारते हुए वहां की प्रशासनिक व्यवस्था की तारीफ के लिए मजबूर हो गये थे .साफ ..स्वच्छ और लम्बी सुंदर सड़कें …जहाँ तहां डस्टबिन ..तरह तरह की सुंदर कलाकृतियों में दिखाई दिए …हरे भरे पेड़ों को काट छंट कर –कहीं लेटी हुई युवती ..कहीं हिरन ..तो कहीं बगीचे का रूप दिया गया था ..चौराहों पर ट्रैफिक पुलिस मुस्तैदी से तैनात थी …मै सुदूर झारखंड की पथरीली दुनिया से निकल कर ..किसी स्वप्न में विचरण कर रही थी …..कोणार्क आ गया था .हम बस से उतरे –गाइड ने हमे टिकट थमाया और तिरुपति परिवार उनके साथ हो गया ,…गाइड के द्वारा बताई गई कहानियां ऐतिहासिक कम ..काल्पनिक ज्यादा लग रही थीं ..हम इतिहास से परिचित थे ..अतः अपनी इच्छानुसार घूमते रहे ..तस्वीरें लीं ..उन पत्थरों ..खंडहरों की ऐतिहासिकता ,साम्राज्य के उत्थान पतन, प्रेम हर्ष व् विषाद का जीवंत प्रमाण उपस्थित कर रही थीं …सूर्य के रथ की कल्पना कर बनाया गया मन्दिर समय के थपेड़ों और कुछ ही वर्षों पूर्व आये तूफान नष्ट भ्रष्ट हो गया था .पर उनके अवशेष किसी रहस्यमयी दुनिया में ले जा रहे थे –यहाँ पूजा नहीं होती ..कुछ मूर्तियाँ -कला कृतियाँ ढह गई हैं ..पर सुंदर हरे भरे पेड़ों ..बगीचों की हरियाली मोहित कर रही थी,सामने शीतल जल कीधारा प्राकृतिक रूप से लोगों की प्यास बुझा रही थी . हमने वहां बिताये एक एक पल को कैमरे में कैद किया अंततः भूख मिटने के लिए बाहर आये -कुछ होटल थे जहाँ शाकाहारी भोजन की व्यवस्था थी ..पर हम सबने इस थका देने वाली यात्रा में भोजन न करके फल ,नारियल पानी ,जूस आदि से भूख शांत करने का निर्णय लिया ..गाइड द्वारा दिए गए डेढ़ घंटे का समय पूरा हो गया था ,–हम वापस बस की ओर लौटे -..बस भुवनेश्वर के रास्तों पर दौड़ रही थी ..अगला पड़ाव था लिंगराज मन्दिर ..वहां ऊंचाई पर स्थित मन्दिर तक पहुँचने के लिए गर्म तपती सीढियों से जाना था ..मै बुरी तरह थक गई थी ..ऋचा ,मिश्र जी और मेरे रिश्तेदार वहां के लिए चल पड़े पर मै नहीं गई ,बस में ही बैठी रही …थोड़ी देर बाद झुलसते पांवों से थके हारे यात्री वापस लौटने लगे ,मेरे परिवार के सदस्य भी गर्मी से परेशान वापस आये ..नंगे पांवों से दौड़ते हुए —-हमारी यात्रा पुनः आरम्भ हुई –धौला गिरि आ रहा था …..कलिंग युद्ध की विभीषिका और मारे गये सैनिकों और आम नागरिकों की नृशंस हत्याओं से सम्राट अशोक का हृदय विदीर्ण हो गया था ..पश्चात्ताप की ज्वाला में जलते सम्राट ने बौद्ध धर्म की शरण ली ,बुद्ध के शांतिमय उपदेशों ने उन्हें सही राह दिखाई और उन मारे गए सैनिकों की स्मृति में यह शांति- स्तूप बनवाया था जिसके ऊपरी हिस्सों में धर्म अर्थ मोक्ष धृति क्षमा दम ,असतेय और करुणा के प्रतीक चिह्न बने हुए थे ,शांति और क्षमा के साकार रूप को देख हृदय बुद्ध की करुणा के प्रति नतमस्तक हो उठा … सीढियों पर चढ़ते हुए मन में प्रार्थनाएं गूंज रही थी -”बुद्धम शरणम गच्छामि –धम्मम शरणम गच्छामि –संघम शरणम गच्छामि ”….उपर पहुँच कर जन्म -उपदेश और निर्वाण प्राप्ति तक बुद्ध के अनेक स्वरूपों के दर्शन किये –कामिनी नदी ,और युद्ध के मैदान के अवशेषों की तस्वीरें ली गई ..अंततः वापस लौटते हुए मन में अपूर्व शांति का अनुभव हो रहा था .
> > प्यास लगी थी -छोटी छोटी दुकानों में बिकता स्थानीय मिनरल वाटर तो मिल रहा था ,पर वह स्वच्छ नहीं था ,हमने वहीँ परिसर से बहते साफ जल को बोतलों में भर लिया ,.बस आगे की यात्रा पर चल पड़ी ….अगला ऐतिहासिक पड़ाव था –उदयगिरी और खंड गिरी की गुफाएं ,जो जैन साधुओं के उपासना स्थल थे .जहाँ तपस्या करते हुए आध्यात्म और भक्ति के गूंजते मन्त्रों का अहसास और उसकी प्राचीनता अभी भी मौजूद थी .सब कुछ नष्ट भ्रष्ट ,जीर्ण परन्तु एक कहानी कहता हुआ -सारा परिवेश ……कुछ बन्दर भी दिखे जो हर आने जाने वाले पर्यटक से हाथ मिलाते द्वारा दिए चने और केले खा रहे थे ,–सबका मनोरंजन भी हो रहा था .–पीपल वृक्ष की छाया में हमारे सहयात्री बैठे थकन मिटा रहे थे –हमने भी चिप्स के पैकेट खोल लिए ,पानी पीकर गर्मी की चुभन कम हुई ….बस आगे की ओर चल पड़ी ,इस बार हमारा गन्तव्य था –”नंदन कानन — यानि पक्षियों -दुर्लभ प्रजाति के जानवरों का बसेरा –चिड़ियाघर ”..नंदन कानन एक लोकप्रिय प्राकृतिक स्थल है जहाँ दुर्लभ हिंस्र ,और पक्षियों की अनेक जातियों को उनके प्राकृतिक परिवेश में सुरक्षित रखा जाता है .वहां पहुँच कर हमारे गाइड ने हमे प्रवेश टिकट और कैमरा आदि ले जाने का अनुमति पत्र थमाया ..प्रवेश द्वार पर सबकी जाँच हुई —आगे का दृश्य सचमुच नंदन कानन सा ही लुभावना ,हरीतिमा से भरपूर ,…शांत वातावरण में किसी तपोवन सा प्रतीत हुआ वहां घूमते हुए विष्णु गुप्त के ”पंचतंत्र ”.. की याद आई …निर्भय हो पिंजरों में घूमते हुए शेरो की गर्जना जहाँ भयभीत कर रही थी ..वहीँ हिरनों के झुण्ड और लगभग सौ की संख्या में उनके शावकों ने मनमोह लिया …वे खेल रहे थे और अपनी छोटी छोटी काली आँखों से ह्मे निहार रहे थे ,जिनमे स्वर्ण मृग ,कृष्ण मृग ,बारहसिंगे और चीतल भी थे …कुछ आगे जाकर मगरमच्छों की एक पूरी फौज ही मिली -छोटे बड़े मगर मच्छ ,भयानक -तीखे दांतों वाले जबड़े खोले –तो कहीं शांत सोये पड़े थे .भालू ,चिम्पैंजी ,और दरियाई घोडा भी अपने करिश्माई अंदाज में दिखे …कुछ पिंजरों में सांपों की कई प्रजातियाँ थीं ,,करैत कोबरा और विश्व प्रसिद्द एनाकोंडा भी हमने देखा ………हमारी बस के प्रस्थान करने का समय हो चुका था , हम भी घूमते हुए थक कर चूर थे …बस वापस पुरी के रास्तों पर लौट रही थी –आस पास की हरियाली ,छायादार वृक्षों से गुजरते हुए तथा शहर की सुन्दरता को निहारते हुए हम पुरी पहुंचे —-रिसोर्ट तक पहुँचते रात हो गई थी– तन मन थक कर चूर था …रात का खाना खा कर गहरी नींद आई .
> > आखिरी दिन —
> > सुबह सुबह ही मेरे पारिवारिक रिश्तेदार नहा धो कर तैयार होकर पुनः दर्शनों के लिए मन्दिर जा रहे थे -ऋचा भी साथ गई –रिसोर्ट में मै और मेरे पति -ही रह गए थे हमने भी पहले सामान की पैकिंग की फिर नहा कर ठंडी हवा में सागर तट की ओर चल पड़े … अब सागर को अलविदा कहने की बारी थी …तट पर बैठे रहे देर तक ,तस्वीरेंलीं ,..लहरों के साथ मन की भावनाएं भी बहती रहीं –लौटते हुए कुछ प्रसाद और छोटे छोटे उपहार भी लिए अपने मित्रों के लिए …..आज रात ९ बजे की ट्रेन थी .
> > ..हम पुरुषोत्तम से जमशेदपुर वापस लौट रहे थे ..पर अपना मन सागर की लहरों -महाप्रभु को सौँप कर पर बार बार यहाँ आने की कामना के साथ …..मेरी यह यात्रा आजीवन चिर स्मरणीय बनी रहेगी ”..

**पद्मा मिश्रा.. जमशेदपुर