माह के कविः शशिकांत/ लेखनी-मार्च-अप्रैल 18


फूल , तितली, महक, हवा लिक्खें
आपको खत में और क्या लिक्खें

क्या हुई वो बहार की आमद
काफिला वो कहाऎ रुका लिक्खें

क्या कुसूर आपका नहीं कोई
क्या है मेरी ही हर ख़ता लिक्खें

गर ख़ता मुझ से हो गई कोई
मेरे हक़ में हो जो सज़ा लिक्खें

दिल में था जो वही कहा मैंने
आपको गर बुरा लगा लिक्खें

ये तेरा ग़म जो पाल रक्खा है
इसने मुझको सँभाल रक्खा है

गर हो फुर्सत तो आके देख कभी
ख़ुद को अश्कों में ढाल रक्खा है

तेरे हाँ और नहीं के झगड़े ने
मुझको उलझन में डाल रक्खा है

तेरे हल्के से इक तबस्सुम ने
ख़ूब मुश्किल में चाल रक्खा है

आज किस सोच में है तू सय्याद!
वो परिंदे, ये जाल रक्खा है

भला क्यों ऐब देखें हम किसी में
कमी कोई न कोई है सभी में

फ़क़त अल्फ़ाज होकर रह गए हैं
वफ़ा, उल्फ़त, भरोसा इस सदी में

मिला क्या जी दुखाने में किसी का
कभी ये सोचकर देखें तो जी में

है उसके सामने ये ताज फीका
उसे देखा है मैंने चाँदनी में

तिलिस्म इसका ज़रा टूटे तो जानें
छिपे हैं राज़ क्या-क्या खामुशी में

ग़ज़लों में जो ढाले तूने
आँसू खूब सँभाले तूने

ख़ुद को ही उलझा बैठा ना
आप बुने थे जाले तूने

मन का चैन कहीं मिल पाया
पूजे लाख शिवाले तूने

बीनाई बिन किस मतलब के
बख़्शे लाख उजाले तूने

इक सीधी-सी बात कही थी
क्या-क्या अर्थ निकाले तूने

आँधियों का था न उसको कोई डर
जब तलक पत्ता हरा था शाख पर

उम्र भर तू अक़्ल की सुनता रहा
देख अब दिल का कहा भी मानकर

कब तलक भटकेंगे आओ घर चलें
सो चुका है शहर लम्बी तानकर

बाद मुद्दत के वो जब मुझसे मिला
किस क़दर रोया मुझे पहचानकर

लाख सदियों तक इसे साधा गया
आज भी इन्सान है इक जानवर

परेशां जब भी पाती है ये मेरे गाँव की माटी
मुझे जीना सिखाती है ये मेरे गाँव की माटी

मिले ज्यूँ बाद मुद्दत के कोई माँ अपने बेटे से
गले से यूँ लगाती है ये मेरे गाँव की माटी

हर इक ज़र्रा है इसका जान से बढ़कर मुझे प्यारा
मेरे पुरखों की धाती है ये मेरे गाँव की माटी

मैं इसके पास से होकर कभी जब भी गुजरता हूँ
मुझे फिर-फिर बुलाती है ये मेरे गाँव की माटी

परेशांहाल रातों में मैं जब बेचैन होता हूँ
मुझे लोरी सुनाती है ये मेरे गाँव की माटी

खुद हमने ये राह चुनी
छोड़ा ताज, फ़कीरी ली

सबकी सुनते हैं लेकिन
करते हैं अपने मन की

सबकी अपनी राह अलग
किसकी किसके साथ बनी

हर इक तुझको पा जाए
राह कहाँ इतनी सीधी

जाने क्यूँ तुझ से मिलकर
जीने की फिर आस जगी

जो सच्चे हैं वही मजबूर हैं अब
अजब ही शहर के दस्तूर हैं अब

उजालों को चुनौती दे रहे हैं
अँधेरे किस कदर मग़रूर हैं अब

जो थे सरताज कल तक मुजरिमों के
सियासत में वही मशहूर हैं अब

था बस्ती में चरागां जिनके दमसे
वो चेहरे किस क़दर बेनूर हैं अब

भरे हैं जीत की खुशियों से ये दिल
बदन ज़ख़्मों से चाहे चूर हैं अब

हल्का-सा गर एक इशारा कर बैठे
पल में वो इक बूंद को धारा कर बैठे

कब तक कोई साथ निभाए किस को ख़बर
क्या जाने कब कौन किनारा कर बैठे

फूस के घर में रहते हो, ये याद रहे
जाने कब क्या एक शरारा कर बैठे

हम दरिया थे, सागर में मिलकर नाहक़
अपना मीठा जल भी खारा कर बैठे

साभार, शशिकांत जी के ग़ज़ल संग्रह ‘ सफर में हूँ ‘ से एक चयन

शशिकांत

साहित्यिक परिचय
गीत, ग़ज़ल , कविता एवम् बालगीत विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं, रेखाचित्र एवम् कार्टून प्रकाशित। देश-विदेश के अनेक मंचों से काव्यपाठ। कलम उगलती आग, कारगिल की हुंकार, गुलदस्ता आदि संग्रहों में गीत , ग़ज़ल सम्मिलित।
प्रकाशित कृतिः ‘आइना मेरा’ ग़ज़ल संग्रह ‘ हम हैं सुमन एक उपवन के ‘ बाल-गीत संग्रह
संपर्कः ghazal.shashikant@gmail.com