मंथन-ये यात्राएँ-शैल अग्रवाल/लेखनी-मार्च-अप्रैल 18

नई-नई जगहों की खोज…समुद्र की अतल गहराइयों से चांद तक…धरती को तो छोड़ो, पूरे ही सौर मंडल में यह अन्वेषक और सैलानी मानव यात्राएँ कर चुका है, कर रहा है, परन्तु अभी भी कई-कई बृह्मांड हैं जहाँ इसे पहुंचना है, जहाँ तक इसकी पहुँच नहीं हुई हैं, तभी तो शेक्सपियर का एक पात्र कहता है कि होरेशियो तुम्हारे यह चांद-तारे…इनसे गमकता संसार ही सबकुछ नहीं। इससे आगे और अलावा भी बहुत कुछ हैं, जिसकी तुम्हें अभी खबर ही नहीं। उपरोक्त यह वाक्य तब भी उतना ही सही था जितना कि आज भी। रहस्यमय हमारी यह दुनिया और ब़ह्मांड…इसकी संरचना आज भी उतनी ही अनजानी और जटिल है, जितनी कि तब थी, हमारी सारी तरक्की और वैज्ञानिक खोजों के बाद भी। परन्तु खोजी और कौतुकमय मानव ने न तो कल हार मानी थी और ना ही कल मानेगा। चाहे इन यात्राओं का इतिहास कितना ही खतरनाक और खर्चीला क्यों न हो! इन यात्राओं में जहाँ कई-कई सुख और उपलब्धियाँ हैं, आज भी दुश्वारियाँ और कष्टमय निराशा भी हैं। अनचाहे विलंब से लेकर पूर्ण अवरुद्ध, कभी-कभी तो अंग-भंग या जान तक से हाथ धोना पड़ जाता है, बात चाहे एक साधारण रेल या बस यात्रा की हो या फिर अंतरिक्ष उड़ान की। मार्ग में आनेवाली कठिनाइयाँ तक तरह-तरह के दुःस्वप्न दिखला सकती हैं। कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि यात्रा पूरी होने से पहले ही शरीर थककर साथ छोड़ देता है और यात्रा अधूरी ही रह जाती है। परन्तु मानव सभ्यता और संस्कृति का इतिहास इन हताश् निराश यात्राओं से नहीं लिखा गया, सारी परेशानियों के बावजूद वह नए गृह-उपगृहों पर झंडे गाड़ रहा है। जो रुकजाए वह यात्री ही कैसा? ऐसी ही एक जोखिमभरी यात्रा है कैलाश मानसरोवर की। इस दुरूह यात्रा में प्रति वर्ष ही कुछ प्राणों की आहुति तो अवश्य ही लगती है, प्रायः उतनी ऊंचाई पर आक्सीजन की कमी की वजह से। फिर भी यात्राएँ होती रहती हैं और होती रहेंगीं।

सोचें अगर कोलम्बस अपनी जोखिमभरी यात्रा पर न निकला होता, तो क्या हमें अपने पड़ोसियों का पता चल पाता…आदान प्रदान, यह व्यापार हो पाता किसी का भी इतनी त्वरित गति और सहजता से और दुनिया अपने इस विकास के इस मार्ग पर चलने की सोच तक पाती! पहले की ली गई इन छोटी -बड़ी जोखिमों का ही नतीजा है कि आज आदमी सिडनी या टोकियो में सुबह का नाश्ता करके लंदन में रात का खाना खा सकता है। जहाँ भारत में अभी तक अधिकांश यात्राएँ तीर्थ-स्थलों से जुड़ी हुई हैं , या फिर गरमी की बाहुल्यता में पहाणों की सैर तक ही सीमित हैं। यूरोप में भ्रमण एक बड़ा व्यापार है। औसत से औसत आदमी भी साल में एक दो बार तो घूमने जाता ही है। वैसे गोवा , मनाली आदि लोकप्रिय पर्यटन स्थल की तरह विकसित हो रहे हैं और नवविवाहितों के मुख्य पर्यटन स्थल बन चुके हैं। यहाँ के एयरपोर्ट पर लाल चूड़ों से भरी कलाइयों वैसे ही दूर से दिखाई देती हैं जैसे कि पहाड़ों की चोटियों पर लहलहाते देवदार के पैर… यह बात दूसरी है कि दुल्हनें अब लजाती शरमाती, रेशमी साड़ियों में नहीं, प्रायः जीन्स में हंसती-खिलखिलाती ही दिखती हैं।

भारत-भ्रमण ही नहीं, खुद को भाग्यशाली मानती हूँ कि जल-थल और हवाई वाहनों के माध्यम से पचास से अधिक देशों के भ्रमण का मौका दिया है जिन्दगी ने । यात्राओं का एक बड़ा सुख जहाँ विभिन्न और भांति-भांति के अजनबियों से मिलना उनके परम्परागत भोजन और कपड़ों का आनेद लेना है, उनकी हस्तकला और पारम्परिक चीजों को खरीदना और उनका संग्रह भी मेरे लिए एक बड़ा आकर्षण रहा है। सिर्फ उपहार ही नहीं जो साथ लेकर आते हैं हम इन यात्राओं से , स्मृतियों का एक खजाना भी जुड़ता चला जाता है, मोहक .तस्बीरों के रूप में, अनमोल यादों के रूप में।

इन यात्राओं के दौरान कुछ देश ऐसे भी देखे, जो उतने खूबसूरत नहीं थे, फिरभी उनकी यादें आज भी पीछा नहीं छोड़तीं। बेचैन करती हैं। कहीं-कहीं तो सामाजिक और वैचारिक भिन्नता इतनी अधिक दिखी, आज के समाज और जिन्दगी से इतनी भिन्न लगी ये जगहें, कि वास्तविक ही नहीं महसूस हो पाईं… पांच सौ साल पीछे चले गए हम इनमें घूमते-फिरते। ऐसा महसूस होता था जैसे किसी कहानी या इतिहास में विचरण कर रहे हों। इन देशों के बारे में कभी फुरसत से विस्तार में लिखूँगी यदि जिन्दगी ने मौका दिया तो…
अधिकांशतः ये रोमांचक यात्राएं आज भी तो स्मृति में चित्रवत् ही अंकित हैं। हजारों यादें रेत के कणों-सी सुधि की धूप में झिलमिल करती रहती हैं। कुछ हीरे सी चमकती हैं तो कुछ नुनखरी और रेतीली भी हैं, फटी बिबाइयों से रिसती और दुखती हुई-सी ।

चूंकि उम्र का अधिकांश भाग यूरोप में ही बीता है और यूरोप निसंदेह संपन्न, विविध और खूबसूरत है, यात्राओं का यह अनुभव ज्यादातर सुखद ही रहा है मेरे लिए। परन्तु पूरी पृथ्वी सदा ही तो शस्य श्यामला नहीं रह सकती, कितना ही सावन के अंधे को हरा-ही-हरा क्यों न सूझे! मेरे अनुभव भी अपवाद नहीं।
याद आती है ट्यूनिशिया की वह यात्रा जहाँ अचानक ही रंग में भंग हो गया था और हमारी बनाना बोट उलट गई थी। सब डूबते-डूबते बचे थे। या फिर फ्रैंकफर्ट में वह पल भी कम डरावना नहीं था जब जहाज 4 घंटे लेट हो गया था और सभी भारतीय पासपोर्ट धारियों की जहाज के अंदर ही गिनती की गई थी। पूरा नाजियों का इतिहास याद करके मन कांप उठा था उस पल । वह तो बाद में ही पता चल पाया था कि ऐसा बस सिर्फ इसलिए हुआ कि भारत से आए कोई मंत्री जी और उनकी पार्टी जहाज में वापस लौटने के बजाय अभी भी एयरपोर्ट पर सनग्लासेज ही खरीद रही थी और एक साथ 11 व्यक्तियों को छोड़कर जहाज नहीं उड़ सकता था।

आज के इस संदेहपूर्ण और आक्रामक वातावरण में अक्सर ही यात्रियों को घंटों के लम्बे और अनचाहे विलंब का सामना करना पड़ता है, कभी किसी छूटी चेतावनी की वजह से तो कभी किसी यात्री की बेवकूफी या लापरवाही की वजह से। कई बार वजह काफी ठोस और असल भी होती है जैसा कि पिछले हफ्ते भारत से लौटते वक्त की उड़ान के दौरान हुआ। अचानक ही एक यात्री की तबियत खराब हो गई और इलाज के लिए उसे जहाज से उतारना पड़ा था । उसका सामान पहचानते व उतारते-उतारते उड़ान दो घंटे के विलंब के बाद ही उड़ पाई थी तब।

कभी-कभी तो बिना किसी पूर्व सूचना के भी आजकल उड़ान निरस्त कर दी जाती है , विशेषतः देश के अंदर की उड़ानें …हवाई अड्डे पर पहुंचकर यह कितना निराशा जनक होगा, इसका अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है। यही नहीं एक एयरपोर्ट की जगह यह आपको तीन-तीन एयरपोर्ट भी घुमा सकती हैं और जहाज के अंदर भारतीय रेलयात्रा जैसा पूरा आनंद लेता हैं यात्री भूलकर कि वह जहाज में इसलिए बैठा था क्योंकि उसके पास वक्त कम था या फिर वह गन्तव्य पर शीघ्रातिशघ्र पहुँचना चाहता है। एकबार आपने टिकट ले ली तो फिर आपके वश में कुछ नहीं, सिवाय कोसने और दुखी होने के। कुछ ऐसा ही अभी हाल में वाराणसी से भुवनेश्वर जाते हुए हमें बर्दाश्त करना पड़ा था… फर्क नहीं पड़ता तब कि आपकी टिकट कितनी सस्ती या मंहगी है या आपके पास कितना नियंत्रित समय है।
यूँ तो प्राचीन और अर्वाचीन के बीच का समंजस्य ही मानव सभ्यता की विकास यात्रा है, परन्तु कई जगहों पर नए और पुराने के बीच में जबर्दस्त खींचातानी और एक स्पष्ट विरोधाभास भी दिखा हमें। कुछ ऐसे भी देश थे जहाँ पर्यटकों की भरपूर लुटाई की व्यवस्था रहती है, चोर उचक्कों के द्वारा नहीं, खुद वहाँ के प्रशासकों द्वारा ही। रम्य और रमणीय रहें ये यात्राएँ इसके लिए पर्यटकों की सुख-सुविधा का भरसक ध्यान रखना ही होगा सिर्फ उनके जेब के अंदर रखे माल की गिनती ही नहीं। खाए, अघाए देशों को भूल जाएँ तो अभी भी भूख और गरीबी…उनसे उत्पन्न समस्याएँ विचलित करने को पर्याप्त रूप से फैली पड़ी हैं चारो तरफ। कई-कई अमीर देशों में भी भूख व गरीबी आराम से पांचतारा होटलों के साथ-साथ ही उनके अगल-बगल में ही पनपती देखी जा सकती है। कितना कुरूप और वीभत्स है यह हमारी विकसित सभ्यता का चेहरा… और तब चारो तरफ फैली यह मौकापरस्ती व धोखाधड़ी भलाई में पूर्ण विश्वास करने से रोकने लग जाती है एक आम पर्यटक को। सब बनावटी लगने लगता है। भीख मांगते हाथ भी कई बार चोर उचक्कों में तब्दील हो जाते हैं। खबरों में सुनना और देखना दूसरी बात है परन्तु प्रत्यक्ष में देखा और अनुभव किया सबक आदमी कभी नहीं भूलता- ऐसा ही व्यक्तिगत अनुभवों का निष्कर्ष रहा है। ये यात्राएँ स्वर्ग दिखाने के साथ-साथ, न सिर्फ उजागर करती हैं कई छद्म परिस्थितियों को अपितु उनसे सावधान करने की भी कोशिश करती हैं…नित नया कुछ दिखाती और सिखाती हैं ये हमें।…