पर्यटन और मनोविज्ञान-शील निगम-लेखनी-मार्च-अप्रैल 18

‘सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िन्दगानी फ़िर कहाँ!’
‘पर्यटन और मनोविज्ञान’ दोनों को जोड़ती यह पंक्ति निश्चय ही पर्यटन के महत्व को परिभाषित करती है। पर्यटन मानव मन की मुक्ति का ज़रिया होने के साथ-साथ मन के क्षितिज के विस्तार का साधन है।’वैलेन्टाइन’ के अनुसार, “मनोविज्ञान मन का वैज्ञानिक अध्ययन है।” मनुष्य का मन तो बिना टिकट का खर्चा किये न जाने कहाँ कहाँ विचरण करता ही रहता है पर चाहे बच्चा हो या बड़ा नयी नयी जगह घूमने की प्रबल इच्छा हर किसी में होती है।बच्चे और युवा स्कूल कॉलेजों द्वारा आयोजित पिकनिक,भ्रमण,कैम्प आदि में आनंद लेते ही हैं। छुट्टियों में अपनी आर्थिक परिस्थितयों के आधार माता-पिता भी कहीं न कहीं भ्रमण का कार्यक्रम बनाते ही हैं। इससे न केवल जीवन की एकरसता सरसता में बदल जाती है,अपितु मन में एक नये उत्साह के आने से मन प्रफुल्लित रहता है। एक नया जोश आ जाता है।
मनुष्य आदिम काल से घुमक्कड़ प्रवृत्ति का रहा है। साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन के अनुसार-
“घुमक्कड़ों के काफ़िले न आते जाते तो सुस्त मानव जातियाँ सो जातीं और पशु से ऊपर न उठ पातीं।”
चार्ल्स डारविन का उदाहरण देते हुए उन्होनें कहा-
“क्या डार्विन अपने महान आविष्कारों को कर सकता था यदि उसने घुमक्कड़ी का व्रत न लिया होता।”
यहाँ यह कहना अप्रासंगिक न होगा कि घुमक्कड़ी के कारण अपने पिता से डाँट खा कर राहुल सांकृत्यायन जी ने घर छोड़ दिया था। जीवन भर देश-विदेश घूमते रहे और अपने अनुभवों के आधार पर प्रसिद्ध पुस्तक ‘वोल्गा से गंगा तक’ लिखी। घुमक्कड़ी के इस शौक ने उन्हें मशहूर लेखक ही नहीं बनाया अपितु उनके व्यक्तित्व में आमूलचूल परिवर्तन करके अद्भुत मनीषी,चिन्तक,दार्शनिक,कर्मयोगी और सामाजिक क्रान्ति का अग्रदूत बना दिया।
हर व्यक्ति के व्यक्तित्व को प्रभावित करतीं हैं उसकी मूलप्रवृत्तियाँ। मैक्डूगल के अनुसार, “मूलप्रवृत्तियाँ संपूर्ण मानव व्यवहार की चालक हैं। प्राणी का व्यवहार मूलप्रवृत्तियों द्वारा संचालित होता है।”
मैक्डूगल ने तो यहाँ तक सिद्ध किया कि मनुष्य मूलप्रवृत्तियों के कारण ही कार्य करते हैं। व्यक्ति के व्यवहार को तथा उसमें इच्छा शक्ति को प्रेरित करने में अभिप्रेरणा भी बहुत महत्वपूर्ण भूनिका निभाती है। जब कोई प्रबल इच्छा व्यक्ति के चेतन मस्तिष्क को बहुत कस कर प्रभावित करती है तो वह उसके लिये अभिप्रेरणा बन जाती है।
पर्यटन के संदर्भ में मूलप्रवृत्तियाँ और अभिप्रेरणाएं व्यक्ति को कैसे प्रभावित करतीं है? उदाहरण दे कर इसको समझा जा सकता है। जैसे- प्रकृति से अत्यंत लगाव से व्यक्ति नदी,जंगल,पहाड़ों के सुरम्य वातावरण में ही रम जाना चाहता है,चाहे कुछ दिनों के लिये ही सही। बर्फ से ढकी पर्वतमालाएं,हरी-भरी वादियाँ,पहाड़ी झरनों का शोर और कहीं कल-कल बहतीं नदियाँ। प्रकृति के इन दिलकश नज़ारों के अनुभव लेकर पर्यटक जब वापस लौटता है तो मन प्रफुल्लित, चित्त प्रसन्न और हृदय में दूना उत्साह लेकर अपनी दिनचर्या में लग जाता है। शरीर नव स्फूर्ति से भर जाता है। हर काम में मन लगता है। रूसो ने ‘प्रकृति की ओर लौटो’ का जो नारा दिया उसका उद्देश्य यही था कि ‘युवा छात्र समाज से दूर गाँवों में प्रकृति की छत्र-छाया में ज्ञानार्जन करें।’वास्तव में यह वाद अठारहवीं शताब्दी की युरोप की सामाजिक,आर्थिक,शैक्षिक तथा धार्मिक क्षेत्र में होने वाली क्रान्ति के परिणाम स्वरूप हुआ। यह क्रान्ति विशेष रूप से तत्कालीन रूढ़िवादिता एवं अंधविश्वासों से ग्रसित धार्मिक संस्थाओं के विरूद्ध हुई थी। युवा पीढ़ी इन सब के नकारात्मक प्रभाव से दूर प्रकृति के सान्निध्य में गुणवत्तापूर्ण समय व्यतीत कर सकें इसलिये यह नारा महत्वपूर्ण था।
धार्मिक प्रवृत्ति के जनमानस हर जगह अपनी धार्मिक आस्थाओं के सहारे मन में ईश्वर को पा लेने का स्वप्न संजो कर अपने अपने धर्म के आधार पर देश-विदेश के धार्मिक स्थलों के भ्रमण का आनंद उठाते हैं और आत्मिक सुख का अनुभव करते हैं। उनकी भक्ति भावना को परम् शान्ति मिलती है। मन संतुष्ट हो जाता है। जिस तरह भारत में हिन्दू धर्म की प्राचीन संस्कृति और स्थापत्य कला से सुसज्जित हज़ारों मंदिर और देवस्थान विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं उसी तरह अन्य देशों में अलग- अलग धर्मों के तीर्थस्थल हैं जिनकी बेजोड़ स्थापत्य कला मन को लुभाती है। अगर पर्यटक मन से धार्मिक संकीर्णता का पर्दा हटा कर उन धार्मिक स्थलों के भव्य भवनों की सुंदर नक्काशीदार छतों के नीचे सुंदर प्राचीरों की चाहरदीवारों के अंदर एकाग्रचित्त हो कर ध्यान करे तो मन ईश के चरणों में रमने का सच्चा आभास दे जाता है।
एक ही तरह की दिनचर्या के कारण जीवन में नीरसता आ जाती है। मन करता है दूर कहीं जा कर एकरसता से छुटकारा पाया जाये। ऐसे में पर्यटन ही मानसिक तनाव दूर करके मन को खुशी प्रदान करता है।
मनुष्य सामाजिक प्राणी है। दूरदराज़ के लोगों से मिलना,उनकी संस्कृति,रहन-सहन,रीति-रिवाजों को जानना समझना मनुष्य की जिज्ञासा होती है। पर्यटन इस चाहत को पूर्ण करता है। हमारा तो देश ही विभिन्न जीवन शैलियों और संस्कृतियों का खज़ाना है। अनेक धर्मों,संप्रदायों,मतों और पृथक आस्थाओं व विश्वासों का महादेश है। यहाँ की सांस्कृतिक समुच्चयता और अनेकता में एकता का स्वरूप विश्व के अन्य देशें के लिये विस्मय और कौतूहल का विषय है जिससे आकर्षित हो कर बहुत से विदेशी पर्यटक हमारे देश में आते हैं।।इसी तरह पूरे विश्व में रंग-बिरंगी सभ्यता और अतुलनीय संस्कृतियाँ फैली हुईं हैं जिन्हें देख कर पर्यटक आत्मविस्मृत तो होता ही है साथ में उसका ज्ञान संवर्धन भी होता है।
शिक्षा के क्षेत्र में तो पर्यटन बहुत महत्व रखता है। अन्य देशों के छात्र हमारे देश में और हमारे देश विद्यार्जन के लिये विदेश जाते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में बहुत कुछ हम विदेशी शिक्षा प्रणाली से कुछ नया जान पाते हैं बहुत कुछ दूसरे देश के लोग हमारे शिक्षा संस्थानों से ग्रहण करते हैं। इस आदान-प्रदान से अनुभवों के भंडार में वृद्धि होती है।साथ-साथ सभी देशों में नौकरी और व्यवसाय के अवसर मिलते हैं।व्यक्ति और समष्टि की आर्थिक स्थिति समृद्ध होती है। विश्व में व्यवसाय और आजीविका के बहुत अवसर हैं जो मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करके उसे आत्मसंतुष्टि देते हैं। व्यक्ति देश-विदेश में समुचित व्यवसायिक शिक्षा एवं अनुभव ग्रहण करके अपना व्यवसाय शुरू करने के लिये विचार, शक्ति, सृजनात्मकता और नवीनता की ओर आकृषित होता है। अपनी क्षमताओं और कार्यकुशलता से अपने विचारों को कार्यान्वित करके अपने व्यवसाय का कुशलता से प्रबंन्धन करता है। एक ओर जहाँ वह स्वयं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाता है दूसरी ओर दूसरों को रोज़गार दे कर अपने देश की आर्थिक उन्नति में मददगार साबित होता है।
पिछले कुछ दशकों पहले अधिकतर युवा व्यवसाय और नौकरी के सिलसिले में विदेश में जाते थे तो वहीं के होकर रह जाते थे पर अब स्थिति बदल गई है। अब वहाँ पहुँचने के बाद कुछ लोग अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार समय-समय पर अपने माता-पिता को भी बुलाते रहते हैं जिससे प्रौढ़ वर्ग को भी विदेशों में जाने और घूमने के अवसर मिलते हैं और संयुक्त रूप से परिवार में समय बिताने से छोटे बच्चों को भी घर के बड़े-बूढ़ों का प्यार मिलता रहता जो उस अवस्था में उनके सर्वांगीण विकास के लिये अत्यंत आवश्यक है। साथ-साथ बुज़ुर्गों को भी भरे-पूरे परिवार में गुणवत्तापूर्ण जीवन बिताने का अवसर प्राप्त होता है जो उनका मनोबल बढ़ाता है।
मानव मन सदा से भूत में जाकर गूढ़ रहस्यों को उजागर करके अपने ज्ञानचक्षुओं पर प्रकाश डालने की चेष्टा करता है। हर देश में हजा़रों वर्ष पुरानी ऐतिहासिक धरोहर होती हैं जो पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। उन स्थानों का अबूझापन और अनजानापन एक रहस्यमयी कथा कहता सा प्रतीत होता है,अनगिनत पहेलियों के प्रश्न खड़े करता है। पुराने वक्त की प्राचीरें,इमारतें अपने शहरों की गंध आज भी अपने भीतर समाये ख़ामोश खड़ी रहकर एक पुरानी एलबम का आभास देती हैं। उन प्रस्तरों के आगोश में जाते ही वहाँ रहने वाले अदृश्य चरित्रों से संवाद करने का मन हो उठता है। अनायास ही आभास होता है कि वे कहीं हमारे आस-पास तो नहीं। पर्यटकों के लिये यह अनुभव अत्यंत रोमांचक होता है। रहस्य-रोमांच से भरपूर अनेकों स्मृतियाँ सदा के लिये मानसपटल पर अपना स्थान बना लेती हैं। मन आत्मविस्मृत सा हो जाता है।
इसी तरह हर देश की अपनी सांस्कृतिक विरासत होती है जिस पर पूरा देश गर्व करता है। सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत को आने वाली सदियों तक सुरक्षित रखने के हर संभव प्रयास किये जाते हैं। कलात्मक रूचि रखने वाले पर्यटक देश-विदेश की सांस्कृतिक धरोहर को बड़े चाव से देखते और समझते हैं।
संगीत और कला की समझ के लिये देश,भाषा और काल की विविधता कोई मायने नहीं रखती। एक ओर जहाँ कोई भी कला मनुष्य की सभी इन्द्रियों को तरंगित करती है वहीं दूसरी ओर संगीत की मात्र स्वर-लहरियों को सुषुम्ना नाड़ी के अंदर तक महसूस करना परम् आनंद की अनुभूति प्रदान करता है। विश्व के विभिन्न देशों के भ्रमण के दौरान इन अनुभवों आदान-प्रदान होता है। आजकल तो सरकारी और निजी संस्थाओं की योजनाओं के तहत समय-समय पर बहुत से देशों में ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जिनमें लोगों को रंगारंग कार्यक्रमों में शामिल होने और कार्यक्रमों को प्रस्तुत करने के लिये संगीत, नृत्य तथा रंगमंच के कलाकारों को आमंत्रित किया जाता है।
साहित्य पढ़ना-लिखना व्यक्ति की आत्मा की क्षुधा को शान्त करता है। हर देश में साहित्यकार अपनी संवेदनाओं को व्यक्त करने के लिये किसी न किसी रूप में निरंतर साहित्य सृजन करते ही रहते हैं। देश-विदेशों में अनेक साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं जिनमें विभिन्न भाषाओं में सेमिनार, नाटक, काव्यगोष्ठियाँ तथा अन्य प्रकार के साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं।अलग- अलग देशों की साहित्यक संस्थायें भी दल बना कर विदेशों में साहित्यिक टूर का आयोजन करते हैं।जिनमें कार्यक्रमों के समापन के बाद उन देशों में भ्रमण की योजना भी होती है इस तरह ‘एक पंथ दो काज’ हो जाते हैं। लोग साहित्यिक उन्नति की ओर तो अग्रसर होते ही हैं, देश-विदेश में पर्यटन के अवसर भी प्राप्त करते हैं।
जिस तरह भारत मेंं घुमंतु प्रवृत्ति की पूरी जाति ही बंजारा जाति है उसी प्रकार विश्व के कई स्थानों में इस प्रवृत्ति के लोग रहते हैं जो विशेष रूप से पशुपालन करते हैं और चारागाहों की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते हैं और शिकार से अपनी जीविका अर्जित करते हैं। जैसे अमेरिका के ब्लैकफुड,ग्रोस,वेंचरएसिनी बोइन,क्रो चेयनी,डाकेटा,अपरापाहो,कियावा और कोमांचे अति घुम्मकड़ जीवन व्यतीत करते हैंऔर चमड़े के बने ‘टिपी’ नामक तंबुओं में रहते हैं।उत्तर और पूर्व में उनमें गोत्रविभाजन पाया जाता है, दक्षिण और पश्चिम में नहीं। राजकीय संगठन प्रजातंत्रीय प्रणाली का है। कोमांचे समूह के अतिरिक्त अन्य समूहों में जातीय संगठन है। युद्ध और शांति के नेता अलग होते हैं। इन समूहों में अनेक प्रकार की सैनिक तथा धार्मिक समितियाँ संगठित हैं। इनमें भी रक्षक शक्तियों में विश्वास पाया जाता है। सूर्यनृत्य तथा सामूहिक धार्मिक कृत्य की दृष्टि से ये प्रथम भाग के समकक्ष हैं।
हमारे देश की बंजारा जाति अपनी लोककलाओं के कारण पर्यटकों को आकर्षित करती है। संगीत,नृत्य,रंगोली,कशीदाकारी,चित्रकारी और सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है ‘गोदना’ जो ‘टैटू’ के नाम से पूरे विश्व में आधुनिकतम फैशन के रूप में प्रचलित है। ये खानाबदोश लोग जगह जगह पर अपने कारवां के साथ देश के हर हिस्से में डेरा जमा कर न केवल अपनी कला को दूसरों तक पहुँचाते हैं अपितु उसे अपनी जीविका का साधन भी बनाते हैं और अपनी संस्कृति को सदियों से संजो कर रखे हुए हैं।घुमन्तु प्रवृत्ति के होने के कारण ये लोग निडर,निर्भीक,लड़ाकू,जुझारू और साहसी प्रवृत्ति के होते हैं।किसी भी स्थान की सीमा को स्वीकार नहीं करते। बेहिचक,बेधड़क कहीं भी अपना डेरा डाल देते हैं।
मनुष्य स्वाभाव से ही खोजी प्रवृत्ति का रहा है।क्रिस्टोफर कोलंबस को अमेरिका खंड खोजने का श्रेय जाता है।उसका मानना था कि पृथ्वी गोल होने के कारण यूरोप से पश्चिमी दिशा की ओर जाने से भारत मिलेगा।पर उसे अमेरिका के कुछ खंड मिले।समुद्री मार्ग से खोज करते करते कोलम्बस कहाँ से कहाँ पहुँच गया और अंत में वास्को-डि-गामा भारत पहुँचा।भारत की खोज में चले कोलंबस ने अमरीका को ही भारत जान लिया था और अपने एक पत्र में उसने यहाँ के निवासियों का उल्लेख “इंडियोस” के रूप में किया था। इस भूभाग पर गोरी जातियों की सत्ता का विस्तार इंडियन समूहों की जनसंख्या के एक बड़े भाग के नाश का तथा सामान्य रूप से उनकी संस्कृतियों के ह्रास का कारण हुआ। उनके छोटे छोटे समूह इस विस्तृत भूभाग में विभिन्न क्षेत्रों में अब भी पाए जाते हैं, यद्यपि उनकी संख्या बहुत कम रह गई है।
खोज युग के सबसे सफल खोजकर्ताओं में से एक और अन्वेषक, यूरोप से भारत सीधी यात्रा करने वालों में वास्को-डि-गामा भी समुद्री रास्ते से अफ्रीका के दक्षिणी कोने से होता हुआ भारत पहुँचा था।वह तीन बार भारत आया।उसे एक सफल अन्वेषक के अतिरिक्त अरब सागर का महत्वपूर्ण नौसेनानी और इसाई धर्म के रक्षक के रूप में भी जाना जाता है। उसकी प्रथम और बाद की यात्राओं के दौरान लिखे गये घटनाक्रम को सोलहवीं सदी के अफ्रीका और केरल के जनजीवन का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ माना जाता है।
उन दिनों समुद्री मार्ग का सफ़र इतना सरल नहीं होता था। अब पर्यटक बड़े-बड़े जलयानों में अत्याधुनिक सुख-सुविधाओं से पूर्ण क्रूज़ में सुखद समुद्री यात्रा का आनंद उठाते हैं।
किसी भी देश का इतिहास उठा कर देखें, युद्धधों से भरा पड़ा है।सत्ता पाने की चाह ने कितनों का खून बहाया,कोई हिसाब नहीं।पर उन युद्धों के अवशेष आज भी मौजूद हैं।छोटे-बड़े देशों में बड़े-बड़े महलों,किलों शहरों,पुरानी इमारतों में आज भी विधवंसक युद्धों के निशान दिखाई दे जाते हैं जिनकी वीभत्स सच्चाई जान कर पर्यटकों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं।देशी- विदेशी,पुरातन असलों-हथियारों की गूँज कानों में गूँजने लगती है।
भारत के इतिहास में अनेकों विदेशी यात्रियों का ज़िक्र है जो समय- समय पर भारत आये। यहाँ भ्रमण करके उन्होंने यहाँ समय बिता कर उस समय की सामाजिक,राजनैतिक,आर्थिक,धार्मिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को समझ बूझ करके उनका विवरण अपनी पुस्तकों और दस्तावेज़ों मे लिखा और विश्वपटल पर संजो कर रख दिया। ज़ाहिर है ऐसा उन्होंने अपनी घुमक्कड़ी और देश-विदेश के बारे में जानने की इच्छा के वशीभूत हो कर किया।इनमें से कुछ इस प्रकार हैं:–
प्लिनी – यह भारत में पहली शताब्दी में आया था प्लिनी द्वारा ‘ नेचुरल हिस्ट्री ‘ ( Neutral History ) नामक पुस्तक लिखी गयी है। इस पुस्तक में भारतीय पशुओं,पेड़ों,खनिजों आदि के बारे में जानकारी प्राप्त होती है
टॅालमी – ‘ भारत का भूगोल ‘ नामक पुस्तक के लेखक टॅालमी ने दूसरी शताब्दी में भारत की यात्रा की थी।
मेगास्थनीज – यह एक यूनानी शासक सैल्युकस निकेटर का राजदूत था जो 302 ई.पू. चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में आया था। यह 6 वर्षों तक चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में रहा और ‘ इंडिका ‘ नामक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक से मौर्य युग की संस्कृति,समाज एवं भारतीय इतिहास की जानकारी प्राप्त होती है ।
डाइमेकस – यह बिन्दुसार के राजदरबार में आया था । डाइमेकस सीरीयन नरेश आन्तियोकस का राजदूत था। इसके द्वारा किये गए विवरण मौर्य साम्राज्य से संबंधित है।
डायोनिसियस – यह यूनानी राजदूत था जो सम्राट अशोक के दरबार में आया था। इसे मिस्र के नरेश टॅालमी फिलेडेल्फस द्वारा दूत बनाकर भेजा गया था।
फाहियान – यह एक चीनी यात्री था जो गुप्त साम्राज्य में चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासन काल में 405 ई. में भारत आया था तथा 411 ई. तक भारत में रहा। इसका मूल उद्देश्य भारतीय बौद्ध ग्रंथों की जानकारी प्राप्त करना था। इसने अपने विवरण में मध्यप्रदेश की जनता को सुखी और समृद्ध बताया है।
हेुंएनसाँग – यह भी एक चीनी यात्री था जो हर्षवर्धन के शासन काल में भारत आया था। यह 630 ई. से 643 ई. तक भारत में रहा तथा 6 वर्षों तक नालंदा विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण की। हुएनसाँग के भ्रमण वृत्तांत को सि-रू-की नाम से भी जाना जाता है।इसके विवरण में हर्षवर्धन के काल के समाज,धर्म एवं राजनीति का उल्लेख है
संयुगन – यह चीनी यात्री था जो 518 ई. में भारत आया था। इसने अपनी यात्रा में बौद्ध धर्म से संबंधित प्रतियाँ एकत्रित किया।
इत्सिंग – इस चीनी यात्री ने 7 वी शताब्दी में भारत की यात्रा की थी। इसने नालंदा विश्वविद्यालय तथा विक्रमशिला विश्वविद्यालय का वर्णन किया है।
अलबरूनी – यह भारत महमूद गजनवी के साथ आया था। अलबरूनी ने ‘ तहकीक-ए-हिन्द या ‘किताबुल हिन्द’ नामक पुस्तक की रचना की थी। इस पुस्तक में हिन्दुओं के इतिहास,समाज, रीति रिवाज, तथा राजनीति का वर्णन है।
मार्कोपोलो – यह 13 वी शताब्दी के अन्त में भारत आया था। यह वेनिस का यात्री था जो पांडय राजा के दरबार में आया था।
इब्नबतूता – यह अफ्रीकी यात्री मुहम्मद तुगलक के समय भारत आया था।मुहम्मद तुगलक द्वारा इसे प्रधान काजी नियुक्त किया गया था तथा राजदूत बनाकर चीनी भेजा गया था। इब्नबतूता द्वारा ‘ रहेला ‘ की रचना की गई है जिससे फिरोज तुगलक के शासन की जानकारी मिलती है।
अलमसूदी – यह अरबी यात्री प्रतिहार शासक महिपाल प्रथम के शासन काल में भारत आया था। इसके द्वारा ‘महजुल जबाह’ नामक ग्रंथ लिखा गया था।
अब्दुल रज्जाक – यह ईरानी यात्री विजयनगर के शासक देवराय द्वितीय के शासन काल में भारत आया था।
पीटर मण्डी – यह यूरोप का यात्री था जो जहांगीर के शासन काल में भारत आया था।
बाराबोसा – यह 1560 ई. में भारत आया था जब विजयनगर का शासक कृष्णदेवराय था।
निकोला मैनुकी – यह वेनिस का यात्री था जो औरंगजेब के दरबार में आया था। इसके द्वारा ‘ स्टोरियो डी मोगोर ‘ नामक ग्रंथ लिखा गया जिसमें मुगल साम्राज्य का वर्णन है।
बेलैंगडर डी लस्पिने – यह एक फ्रांसीसी सैनिक था जो 1672 ई. में समुद्री बेड़े के साथ भारत पहुँचा था। इसके द्वारा पाण्डिचेरी नगर की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान रहा था।
जीन बैप्टिस्ट तेवर्नियर – यह शाहजहां के शासन काल में भारत आया था। इसके द्वारा ही भारत के प्रसिद्ध हीरा ‘ कोहिनूर ‘ की जानकारी दी गई हैं।
कैप्टन हॅाकिग्स – यह 1608 ई. से 1613 ई. तक भारत में रहा। यह जहांगीर के समय भारत आया था तथा ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए सुविधा प्राप्त करने का प्रयास किया। यह फारसी भाषा का जानकार था। इसके द्वारा जहांगीर के दरबार की साज सज्जा तथा जहांगीर के जीवन की जानकारी प्राप्त होती है।
सर टामस रो – यह 1616 ई. में जहांगीर के दरबार में आया था। इसके द्वारा जहांगीर से ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए व्यापारिक सुविधा प्राप्त करने का प्रयास किया गया था।
बर्नियर – यह एक फ्रांसीसी डाँक्टर था जो 1556 ई. में भारत आया था। इसने शाहजहां तथा औरंगजेब के शासन काल का विवरण किया है। इसकी यात्रा का वर्णन ‘ ट्रेवल्स इन द मुगल एम्पायर ‘ में है जो 1670 ई. में प्रकाशित हुआ था।
हमिल्टन – यह एक शल्य चिकित्सक था जो फारुखसियर के शासन काल में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रतिनिधि मंडल का सदस्य बनकर भारत आया था।
इन विदेशी यात्रियों ने भारत में रह कर बड़ी बारीकी से यहाँ की धार्मिक, सामाजिक,सांस्कृतिक, राजनैतिक तथा लोककलाओं का अध्ययन किया।पुस्तकों के रूप में दस्तावेजों के रूप में संकलित किया।जिससे न केवल भारत को दुनिया में पहचान दिलायी अपितु हमारे देश की ऐतिहासिक धरोहर को भी सुरक्षित रखने में सहयोग किया।
शील निगम

आगरा (उ. प्रदेश )में जन्म ६ दिसम्बर , १९५२ .
शिक्षा-बी.ए.बी.एड.

कवयित्री, कहानी तथा स्क्रिप्ट लेखिका.

मुंबई में १५ वर्ष प्रधानाचार्या तथा दस वर्ष हिंदी अध्यापन.
विद्यार्थी जीवन में अनेक नाटकों, लोकनृत्योंतथा साहित्यिक प्रतियोगिताओं में सफलतापूर्वक प्रतिभाग एवं पुरुस्कृत.
दूरदर्शन पर काव्य-गोष्ठियों में प्रतिभाग, संचालन तथा साक्षात्कारों का प्रसारण.
आकाशवाणी के मुंबई केंद्र से रेडियो तथा ज़ी टी.वी. पर कहानियों का प्रसारण. प्रसारित
कहानियाँ -‘परंपरा का अंत’ ‘तोहफा प्यार का’, ‘चुटकी भर सिन्दूर,’ ‘अंतिम विदाई’, ‘अनछुआ प्यार’ ‘सहेली’, ‘बीस साल बाद’ ‘अपराध-बोध’ आदि .
देश-विदेश की हिंदी के पत्र -पत्रिकाओं तथा ई पत्रिकाओं में कविताएं तथा कहानियाँ प्रकाशित.विशेष रूप से इंगलैंड की ‘पुरवाई’ तथा ‘लेखनी’ कनाडा के ‘द हिंदी टाइम्स’ व ‘प्रयास ‘ तथा ऑस्ट्रेलिया के ‘हिंदी गौरव’ व ‘हिंदी पुष्प’, नीदरलैंड्स की ‘आम्सटेल गंगा’ में बहुत सी कविताओं, आलेख तथा कहानियों का प्रकाशन .’हिंद युग्म’ द्वारा कई कविताएँ पुरुस्कृत.
बच्चों के लिए नृत्य- नाटिकाओं का लेखन, निर्देशन तथा मंचन.
कहानियों के नाटयीकरण ,साक्षात्कार,कॉन्सर्ट्स तथा स्टेज शो के लिए स्क्रिप्ट लेखन.
हिंदी से अंग्रेज़ी तथा अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद कार्य-हिंदी से अंग्रेज़ी एक फिल्म का अनुवाद, ‘टेम्स की सरगम ‘ हिंदी उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद, एक मराठी फिल्म ‘स्पंदन’ का हिंदी अनुवाद.
जनवरी २०१४ में बाबा साहब अम्बेडकर राष्ट्रीय पुरूस्कार (देहली).
जून २०१५ में ‘हिंदी गौरव सम्मान’ (लंदन).
मार्च २०१६ में ‘हम सब साथ साथ’ द्वारा ‘प्रतिभा सम्मान’ (बीकानेर).
नवंबर २०१७ में सिद्धार्थ तथागत साहित्य सम्मान (सिद्धार्थ नगर).
‘नया लेखन नये दस्तखत’ द्वारा लघुकथा प्रतियोगिता में बहुत सी कहानियां सर्वश्रेष्ठ घोषित.
‘शीर्षक साहित्य परिषद’ द्वारा आयोजित दैनिक प्रतियोगिता में कविताएं, लघुकथाएं तथा कहानी ‘माँ’ सर्वोत्कृष्ट घोषित।
अगस्त २०११ में ‘द संडे टाइम्स’ के स्पेशल इशु में इक्कीसवीं सदी की १११ लेखिकाओं में नाम घोषित.
इ पुस्तकें-
काव्य बीथिका
कथा मंजरी
साझा संकलन-
अनवरत, मुंबई की कवयित्रियाँ,१४ काव्य रश्मियाँ,प्रेमाभिव्यक्ति,सिर्फ़ तुम,मुम्बई के कवि
विदेश-भ्रमण -युनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर,जर्मनी,हालैण्ड, फ्राँस,फ़िनलैंड तथा मालदीव्स.
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