चांद परियाँ और तितलीः बाल कहानी-अरुणा घवाना,कविता-शैल अग्रवाल/ लेखनी मार्च-अप्रैल 18

ह्यूरान नदी का ब्रिज और व्ह्यटी

ह्यूरान नदी के किनारे डक्की बत्तख अपने छोटे से बच्चे व्ह्यटी के साथ रहती थी। डक्की ने व्ह्यटी को सख़्त हिदायत दे रखी थी कि वह ह्यूरान नदी के ब्रिज तक तो अकेला तैर सकता है, पर ब्रिज के उस पार वह तभी जाए जब उस के साथ कोई हो। व्ह्यटी एक आज्ञाकारी बच्चा था, इसलिए कभी अकेला वहां नहीं जाता।

एक दिन मौसम बहुत सुहाना था। व्ह्यटी नदी में तैरने लगा। तैरते-तैरते वह गाना गुनगुनाने लगा। उसे अब बहुत मज़ा आने लगा था। तैरते-तैरते वह ह्यूरान ब्रिज के पास आ पहुंचा। पर अभी व्ह्यटी का घर वापस जाने का मन नहीं था। वह और आगे तैरने लगा।

तैरते-तैरते वह बहुत आगे जंगल में चला गया। तभी अचानक आवाज़ आई-छपाक! व्ह्यटी ने पीछे मुड़कर देखा।

‘अरे यह तो फ़ाक्सी लोमड़ी है’। वह डर गया। उसे अब मां की सीख याद आने लगी-‘अकेले ब्रिज के पार नहीं जाना’।

पर अब क्या हो सकता था- कुछ नहीं! तभी उसे याद आया, मां ने तो यह भी कहा था कि खतरे के समय घबराना नहीं चाहिए।

बस फ़िर क्या था, व्ह्यटी तेजी से तैरने लगा।

पर फ़ाक्सी भी कहां कम थी। वह भी तेजी से पीछे-पीछे तैरने लगी।

तैरते-तैरते व्ह्यटी एक ऐसी जगह पहुंचा, जहां नदी बर्ड पार्क के पास से गुजरती थी। पार्क में बहुत से लोग थे।

‘चलो, अब तो मैं फ़ाक्सी से बच जाऊंगा’ सोचते हुए व्ह्यटी नदी के किनारे-किनारे तैरने लगा, जबकि फ़ाक्सी लोगों को देख नदी के बीचोबीच पानी के नीचे-नीचे तैरने लगी।

प्यारे से व्ह्यटी को देख नदी के किनारे खेल रहे जैवी ने उस पर अपना छोटा सा मछ्ली का जाल फ़ेंका। व्ह्यटी भी यही चाहता था, इसलिए वह पांच साल के उस बच्चे के जाल में खुद ही फ़ंस गया।

जैवी अपने जाल में व्ह्यटी को देख बहुत खुश हुआ। उसने व्ह्यटी को अपनी टोकरी में डाला और खुशी-खुशी घर की ओर चल दिया। यह देख फ़ाक्सी मनमसोस कर रह गई। और चुपके-चुपके पानी के नीचे-नीचे जंगल की ओर वापस तैर चली।

उधर जैवी व्ह्यटी को लेकर घर पहुंचा। मां ने जैवी से व्ह्यटी के बारे में पूछा। जैवी ने सारी बात कह सुनाई। सारी बात सुन मां बहुत खुश हुई। फ़िर जैवी से कहा कि वह हाथ धोकर जल्दी से खाना खाने आ जाए। जैवी हाथ धोकर डाइनिंग टेबल पर आ गया। उसने व्ह्यटी की टोकरी अपने पांव के पास ही डाइनिंग टेबल के नीचे ही रख दी।

इधर जैवी खाने में मस्त हुआ, उधर घर के बाहर बैठी जैवी की बिल्ली ब्लैकी चुपके से घर में घुसी और डाइनिंग टेबल के नीचे से टोकरी समेत व्ह्यटी को ले गई।

मन ही मन व्ह्यटी को खाने का सोच ब्लैकी तेज कदमों से खुशी-खुशी नदी की ओर चल दी।

अब व्ह्यटी को तो अपने बचने की कोई उम्मीद ही नहीं बची। वह रह-रहकर मां डक्की की सीख याद करने लगा, पर अब तो कुछ हो ही नहीं सकता। डर के मारे उसने तो अपनी आंखें बंद कर ली।

कुछ देर बाद अचानक टोकरी रुक गई। डरते-डरते व्ह्यटी ने आंखें खोली।

‘अरे, टोकरी तो रुक—’ कह उसने नजर इधर-उधर दौड़ाई। ब्लैकी, डब्बी कुत्ते से उसे छुपा रही थी।

‘इससे अच्छा मौका बचने का फ़िर नहीं मिलेगा’ सोच बिना देर किए व्ह्यटी टोकरी से कूदा और छिपता-छिपाता नदी की तरफ़ भागा। जब तक ब्लैकी को अपनी गलती का अहसास होता, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। नदी की बहती धारा में व्ह्यटी कूद चुका था। और वह एक ऊंची सी लहर पर सवार हो गया। इस लहर ने उसे ह्यूरान ब्रिज के पास उतारा। यह देख व्ह्यटी की जान में जान आ गई। शाम का अंधेरा घिर चुका था। वह तेजी से घर की ओर बह चला।

दूर से देखा मां घर के बागीचे में बेसब्री से टहल रही थी। वह तेजी से तैरता मां के पास जा पहुंचा।

‘तुम इतनी देर अकेले कहां रहे’ कहती हुई डक्की उसे घर के अंदर ले गई।

‘नहीं, मां मैं अकेला नहीं था’ कह वह गरम-गरम सूप पीने के लिए डाइनिंग टेबल पर मुसकुराते हुए बैठ गया।

अरुणा घवाना


माँ जब…
माँ जब मैं बड़ा हो जाऊं
पहन के वर्दी पायलट बन जाऊं
साथ चलोगी ना मेरे…
ऊँचाइयों से ना डर जाना
काले बादलों से ना घबराना
कालीन हैं ये बस
उड़ते जहाज के नीचे
साथ चलोगी ना मेरे…
दुनिया की हम सैर करेंगे
आइस्क्रीम और पीजा खाएँगे
छोड़ के चूल्हे-चौके के
ये सारे झंझट पीछे
साथ चलोगी ना मेरे !

शैल अग्रवाल