कविता आज और अभीः लेखनी-मार्च-अप्रैल 18

अख़बार
सुबह की चाय और अखबार का
साथ है कितना पुराना!
एक के बिना अधूरा दूसरा,
ये हमने है जाना या
हम से पुरानों ने ही जाना।
चौबीस घंटे से पहले,
ये हो जाता है पुराना।
पुराने अख़बारों की पर्तों का,
हर घर मे होता है,
कहीं न कहीं कोई ठिकाना।

कभी किसी पुराने अखबार को,
खींच कर निकालना फिर,
साफ़ सफ़ाई कर के
किसी अलमारी में बिछाना।
सफ़र में जाते समय
उस मे जूते लपेटना,
कभी बच्चों की किताबों पर
उसको चढ़ाना।
हमने तो इसे रोटी के डिब्बों,
में भी लगाते देखा था।

अब सुना है,
इसकी स्याही ज़हरीली होती है,
ज़हरीली तो होगी ही
ख़ून और बलात्कार
के रंग मे रंगी होती है।
हैरान हूं कि ये लाल नहीं,
अब भी काली होती है!

भर गया ऊपर तक जब,
अख़बारों का ठिकाना,
रद्दीवाले को बेचा,
दस रु किलो!
लो कुछ वापिस आ गया।
इस अख़बार में कभी
चना जोर-गरम मिलता था,
पकौड़े भी मिलते थे,
खोलने पर किसी खोये की,
तस्वीर भी मिलते देखी थी,
ये श्याम श्वेत फिल्मों
का था ज़माना ।

अब अख़बार की थैलियां नही बनती
जिन से कोई ग़रीब,
चार पैसे कमा कर,
चने खाता था।
आज अख़बार के तिकोन में
दालें नहीं बिकती,
न मसाले ही बिकते है।
आज पैकेजिंग का है ज़माना,
चिप्स, नमकीन, दालें,
बना बनाया भोजन और दूध-दही
अब पौलीथीन की थैलियों में मिलता है…..
इंसान ने क्या चीज़ बनाई थी
पौलीथीन….
वो बन गया, एक सैलाब……………
रोकने से अब नहीं रुक रहा….
पॉलिथीन उड़ रहा है
हवा में… तैर रहा …नदी में…. समंदर में………..

आज का अख़बार अब देख लूं ज़रा
नहीं तो हो, न जाये पुराना।

….

मैं,मैं हूँ,मैं ही रहूँगी
मैं नहीं राधा बनूँगी,
मेरी प्रेम कहानी में,
किसी और का पति हो,
रुक्मिनी की आँख की
किरकिरी मैं क्यों बनूंगी !

मैं सीता नहीं बनूँगी,
मैं अपनी पवित्रता का,
प्रमाणपत्र नहीं दूँगी
आग पे नहीं चलूँगी
वो क्या मुझे छोड़ देगा
मै ही उसे छोड़ दूँगी,
मैं सीता नहीं बनूँगी।

मैं न मीरा ही बनूंगी,
किसी मूरत के मोह मे,
घर संसार त्याग कर,
साधुओं के संग फिरूं
एक तारा हाथ लेकर,
छोड़ ज़िम्मेदारियाँ
मैं नहीं मीरा बनूंगी।

यशोधरा मैं नहीं बनूँगी
छोड़कर जो चला गया
कर्तव्य सारे त्याग कर
ख़ुद भगवान बन गया,
ज्ञान कितना ही पा गया,
ऐसे पति के लिये
मैं पतिव्रता नहीं बनूंगी
यशोधरा मैं नहीं बनूंगी।

उर्मिला भी नहीं बनूँगी
पत्नी के साथ का
जिसे न अहसास हो
पत्नी की पीड़ा का ज़रा भी
जिसे ना आभास हो
छोड़ वर्षों के लिये
भाई संग जो हो लिया
मैं उसे नहीं वरूंगी
उर्मिला मैं नहीं बनूँगी।

मैं गाँधारी नहीं बनूंगी
नेत्रहीन पति की आँखे बनूँगी
अपनी आँखे मूंदलू
अंधेरों को चूमलू
ऐसा अर्थहीन त्याग
मैं नहीं करूंगी
मेरी आँखो से वो देखे
ऐसे प्रयत्न करती रहूँगी
मैं गाँधारी नहीं बनूँगी।

मैं उसी के संग बनूँगी,
जिसको मन से वरूँगी,
पर उसकी ज़्यादती
मैं नहीं कभी संहूंगी
कर्तव्य सब निर्वाहुंगी
बलिदान के नाम पर
मैं यातना नहीं संहूँगी
मैं मैं हूँ मै ही रहूँगी।

-बीनू भटनागर

इंटेलिजेंस फेलियर

कुछ और असुरक्षित होती है दुनिया
हर किसी के लिए
हर आतंकी हमले के बाद
चाहे जहाँ भी हुआ हो हमला
जिनकी भी जानें गयीं हों
हमें लगता है कि सोमालिया और उस जैसी जगहों में
होने वाले हमलों का मलबा
कभी नहीं पहुँचेगा
पहली और दूसरी दुनिया तक
उन्हें लगता है कि तेल की खाड़ी से
सारा तेल ले जाकर
वो करते रहेंगे
देशों का पुनर्निर्माण
साम्राज्यवादी तर्ज़ पर
और सबको लगता है
कि कभी नहीं पता चलेगा
ऐसी जगहों में आये दिन
फटने वाले बमों के निर्माताओं का नाम
पता, ठिकाना
दुनिया बँटी रहेगी
सुरक्षित और असुरक्षित खेमों में
इतने यातायात, परिवहन, भ्रमण
और भागमभाग के बीच
उड़ान और ढ़लान के बीच
कि किसी के पास नहीं होता
किसी का नाम
और कितने मेहमान होते हैं हम
दूसरे देशों के वायुयानों में उड़ते हुए
बिल्कुल अजनबी देश के वायुयानों में उड़ते हुए
जिनसे फ़ोन करके हमने पूछा होता है
कि उनके हवाई अड्डों से गुज़रने के लिए
हमें ट्रांज़िट वीज़ा तो दरकार नहीं
कि रोज़ बदल रहे हैं
आने और जाने के नियम
और हमारा पुराना शासक
फिर से बना रहा है पैसे
बना कर ढेर सारे कायदे, क़ानून
और किनकी क्या नाराज़गियाँ हैं
जो पहुँचती नहीं
अंतर राष्ट्रीय वार्ताओं के टेबलों तक
वो जो एक घना सा जाल है
हवा में
अंतर राष्ट्रीय संपर्क और सहयोग का
क्यों टूटा है वह इस बीच बार बार
और कुछ अजीब सा है
ज़मीन पर चलने वाली गोलिओं में भी
जैसे पहचान कर मारे गए हों अजनबी
और जबकि हो रही है तहक़ीक़ात
फूलों से लदे
बंद वातानुकूलित कमरों में
क्या कर रही है
जनता भी
बनाये रखने को
एक दूसरे के जीवन की शांति…………….

पंखुरी सिन्हा

पड़ोसी

मेरे घर के
ठीक बगल में हैं उनके घर
पर नहीं जानता मैं उनके बारे में
ज़्यादा कुछ

उनकी हँसी-खुशी
उनकी रुदन-उदासी की डोरी से
नहीं बँधा हूँ मैं

मेरी कहानियों के पात्र
वे नहीं हैं
उनके गीतों की लय-तान
मैं नहीं हूँ

एक खाई है
जो पाटी नहीं गई मुझसे
एक सफ़र है
जिसे हम अकेले ही
तय करते हैं

आते-जाते हुए अकसर हम
एक-दूसरे की ओर
केवल परस्पर अभिवादन के
काग़ज़ी हवाई जहाज़
उड़ा देते हैं

मिलना तो ऐसे चाहिए मुझे उनसे
जैसे चीनी घुल-मिल जाती है पानी में
पर महानगर की
मुखौटों वाली जीवन-शैली
पहाड़ बन सामने खड़ी हो जाती है

मुखौटों वाली इसी जीवन-शैली से है
मेरी पहली लड़ाई
बाक़ी के युद्ध तो
मैं बाद में लड़ लूँगा

जान
क्या तुम्हें याद है हमारी
बीस बरस पहले की वह फ़ोटो

आज भी सुरक्षित है
वह फ़ोटो मेरे ऐल्बम में
उस फ़ोटो में आज भी जवाँ हैं
बीस बरस पहले की हमारी हसरतें
हमें अपने होनेपन की सुगंध में भिगोती हुई

इस फ़ोटो में नहीं ढले हैं हम
वक़्त के निर्मम हाथों से हम हैं दूर
लगातार फैलती झुर्रियों और
निरंतर बढ़ते चश्मे के नम्बर
यहाँ नहीं कर पाए हैं खुद पर ग़ुरूर

मैं इस फ़ोटो से जलता हूँ
मैं इस फ़ोटो को चाहता हूँ
मैं इस फ़ोटो को देख मचलता हूँ
मैं इस फ़ोटो पर रीझता हूँ

बीस बरस पहले की खो गई दुनिया में
जाने का चोर-द्वार है यह फ़ोटो
तन की सूखती नदियों और पिघलते ग्लेशियरों को
स्मृतियों में फिर से जिलाने का
एक अध-सच्चा क़रार है यह फ़ोटो

सुशांत सुप्रिय

1.
घेरों में सुरक्षा है
सुरक्षित आदमी जैन से सोता है
पर जो सोता है वही तो खोता है
सोतों पर ही तो अक्सर
हमला होता है।
2.
पूंछ उठाकर उसने जमीन झाड़ी
और अपनी सरहद खींच दी
अब वह सुरक्षित था
आराम से हलका हो सकता था
ज्यादा फरक तो नहीं
इनमें और हममें

3.

हमेशा से यही होता है
चन्द वही लोग गलियारे में
और चन्द वही लोग सामने बैठे
खुद के ही बनाए सिंहासन पर
हर आदमी अपनी-अपनी बघारता
अपनी ही दुनिया में विचरता
सबके एक लक्ष, वही एक बात
गलियारे में जमा भीड़ ताली बजाती
बिना कुछ जाने, सोचे-समझे
पर, आखिर किस लालच में

4.
चांद-सा दिल
बढ़ती-घटती रही खुशी
कभी चमकती दमकती
और रौशनी फैलाती
तो कभी अपने ही अंधेरों में डूबी
उधार की रौशनी तलाशती

5.
जड़ों में सोख ली सारी नमी
तनों में समेट लिए जाने कितने
अनगिनित रहस्य
तब कहीं जाकर खिले
चन्द स्वप्न फुनगियों पर

6.

एक युद्ध लगातार
जय-पराजय लगातार
अन्याय की भीड़ में कुचला
घायल न्याय लगातार
न रावण मिटे न राम ही चैन से
आज भी वही द्वन्द्व लगातार
फिर भी मन, फिर भी ए मेरे मन
संकल्प, एक प्रयास लगातार….

शैल अग्रवाल