विमर्षः द्वंद्व और जनचेतना के चितेरे कवि फेदेरीको गार्सिया लोर्का-सुशील कुमार

जब अभिव्यक्ति के खतरे की कीमत कवि को अपनी जान देकर चुकानी पड़े तो इतनी बात जरूर समझ में आती है कि प्रतिगामी ताकतों ने किस हद तक समय-समय पर समाज में अराजकता और विध्वंसकता का माहौल बनाया है। यहाँ मेरा सन्दर्भ स्पानी कवि फेदेरीको गार्सिया लोर्का से है। इनको पढ़ना मेरे लिए नितांत एक नया अनुभव है, क्योंकि भारतीय कवियों-लेखकों ने अबतक इनकी कविताओं का जो निकष प्रस्तुत किया है, वह ज्यादातर जितना अधूरा और बेमानी है, उतना कच्चा और अवयस्क , या फिर मुझे यह कहीं न कहीं उनकी विचलित विचारधाराओं से बोझिल-गझिन मालूम होता है ।
मुझे ऐसा क्यों लगता है कि किसी कवि को समझने के लिए उसकी रचना को पढ़ना जितना जरूरी है, उससे अधिक उसके जीवन को? जितना उसके जीवन को पढ़ना अनिवार्य है, उससे ज्यादा उन सामाजिक – आर्थिक -राजनीतिक परिवेश को ,जिसमें उसके कवि का जन्म हुआ, वह पल्लवित हुआ। मुझे कहने में हिचक नहीं कि परिवेश से उस कवि के अंदर जो काव्यवृत्तियाँ उत्पन्न होती है, उसकी मीमांसा में पाठकों-लेखकों द्वारा अपने विचार का घालमेल कर उसे अपने विचारधारा का कवि मानने के लिए अपने पाठकों को मजबूर करने की कलात्मकताएं और कलमकारियाँ वस्तुतः उस कवि के साथ अन्याय ही होता है ,क्योंकि वहाँ वे अपनी विचारधारा को सम्पुष्ट करने के लिए उस कवि की समीक्षा करते नजर आते हैं। समझना यह जरूरी है कि इस स्वार्थवृत्ति से कवि के स्वाभाविक मूल्यांकन की प्रक्रिया में बाधा पहुंचती है जिसके बारे में हम बताने को तत्पर होते हैं।
गोया कि, आप महसूस कर पाएंगे कि लोर्का की कविताओं से गुजरना जीवन के उन स्वप्नों, सच्चाइयों और द्वंद्वों से एक साथ गुजरने जैसा है, जिसकी निर्मिति करुणा, प्रेम और विद्रोह के स्फुट समवेत स्वर से होती है, मानो समुद्र की उत्ताल तरंगें उसके तट से पछाड़ें खाकर बारम्बार लौट रही हों, जिसमें उसके सौंदर्य की शुभ्र नीली आभा के साथ तट पर बने भीतों की बेतरतीब सुंदर आकृतियों का बिखरना और जल का निरन्तर शोर भी शामिल हो! लेकिन कवि विजेंद्र स्पानी कवि लोर्का को लोकधर्मिता के जिस साँचे में ढालकर उनको पढ़ना चाहते हैं, वह उनके कवि-व्यक्तित्व को जबरन उन कवियों से जोड़ते नजर आते हैं जिनका दूर -दूर तक लोर्का से वास्ता नहीं। लोर्का के जीवन-संघर्ष, उनकी चुनौतियां, उनकी अभिरुचियाँ और काव्य शिल्प सब निराला, नागार्जुन, त्रिलोचन, केदार बाबू, मुक्तिबोध, विजेंद्र से जीवन संघर्ष , चुनौतियों व रुचियों से अलग हैं, इसलिए लोकपक्षधरता को लेकर इन भारतीय कवियों से उनकी तुलना करना उनकी अपनी स्वार्थ-सिद्धि ही कही जाएगी (यहां यह पहले ही स्पष्ट कर देना जरूरी है कि ये सब भी कवि कम महत्वपूर्ण नहीं हैं , मगर इनके जीवन के संघर्ष और द्वंद्व लोर्का से अलग हैं)। अगर हमारे देश की कवियों से लोर्का की तुलना की भी जाएगी तो मुझे अवतार सिंह संधू ‘पाश’ और मानबहादुर सिंह जैसे शहीद कवियों करनी होगी। पाश की हत्या तो मात्र 38 वर्ष की अवस्था में 23 मार्च 1988 को आतंकवादियों द्वारा हत्या कर दी गई, और मानबहादुर की भी निर्मम हत्या 60 साल के पहले ही ही गई। विजेंद्र जी ने कभी उन कवियों से लोर्का का तुलनात्मक अध्ययन पाठकों के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया, जिनका वे नाम लेते हैं।
खैर.. मैं मानबहादुर सिंह और लोर्का , दोनों शहीदों की एक, एक छोटी कविता को रखकर इनकी काव्य जिजीविषा को दिखलाना चाहता हूँ कि रचना और कर्म केवल कवि के जीवनानुभवों और ईमानदारी से प्रकट होती है। वेबपत्रिका ‘कविताकोश’ में मानबहादुर सिंह का परिचय देते जनप्रिय गजलकार डाँ डी एम मिश्र समालोचक डॉ परमानंद श्रीवास्तव के बरक्स कहते हैं कि – ‘‘ कौन जानता था कि उनकी ‘‘ सरपत ‘‘ शीर्षक कविता उन्हीं पर घटित होगी । इससे स्पष्ट होता है कि वह वह कवि के रूप में कितने बड़े दूरद्रष्टा थे । उन्होंने उस कविता का पाठ भी किया
– “मुझे काटो — मैं नए-नए कल्लों में फूटूँगा / मुझे जलाओ — सावन का हरा आतिश बन छुटूँगा / मैं माटी का मन हूँ – मैं जन हूँ / मुझे अपने ऊपर छा लो / तुम्हें छाँह दूँगा / तुम्हारी थकी-हारी ज़िन्दगी को / सुस्ताने को बाँह दूँगा / अपनी खटिया मुझसे बिन लो / मैं पेड़ नहीं कोई विशालकाय / कृशकाय अस्थियों का उपेक्षित झुरमुट हूँ / मेड़ पर खेत का रखवाला हूँ / कहीं माटी कटती हो, बहती हो / मुझे रोप दो / सहस्त्र-सहस्त्र अँगुलियों से धरती की छाती कस लूँगा / बालू से भी जीवन रस लूँगा / मैं न चुकने वाला ऐसा विकास हूँ / जिसे चरे जाने का भय नहीं / मैं दरबदर झूमती मज़बूर हरकत हूँ / मैं सरपत हूँ / मैं धरती का लहराता घन हूँ / मैं जन हूँ / माटी का मन हूँ ”
फिर इसी तर्ज पर लोर्का की एक कविता देखिए :
“मुझे महसूस हुआ
मैं मार डाला गया हूँ ।
उन्होंने चायघरों, क़ब्रों और गिरजाघरों की
तलाशी ली,
उन्होंने पीपों और आलमारियों को
खोल डाला ।
सोने के दाँत निकालने के लिए
उन्होंने तीनों कंकालों को
खसोट डाला ।
वे मुझे नहीं पा सके ।
क्या वे मुझे कभी नहीं पा सके ?
नहीं ।
वे मुझे कभी नहीं पा सके ।
या फिर लोर्का की यह मशहूर कविता –
इस तरह की उसकी एक और कविता है :
“मैं सोना चाहता हूँ ।
मैं सो जाना चाहता हूँ ज़रा देर के लिए,
पल भर, एक मिनट, शायद
एक पूरी शताब्दी… लेकिन
लोग यह जान लें
कि मैं मरा नहीं हूँ…
कि मेरे होठों पर चाँद की अमरता है,
कि मैं पछुआ हवाओं का अजीज दोस्त हूँ…
…कि,
कि… मैं अपने ही आँसुओं की
घनी छाँह हूँ…”
इन दोनों कवियों को अपना प्रारब्ध सम्भवतः ज्ञात था जो उनका दुःस्वप्न बनकर उनके अवचेतन मन के किसी कोने में हिलोरें मारता था। जीवन का यह द्वंद्व और अनुभव कितना मर्मान्तक और एक दूसरे के करीब है!
कवि फेदरिको गार्सिया लोर्का सही मायने में जनता के सुख-दुःखों और उनके जीवन-द्वंद्वों के गायक-कवि हैं. इनकी कविताएं कारखानों में तैयार की गई मोतियों की ज्यों नहीं लगती, बल्कि समुद्री सीपियों के कवच के अंदर मेघ-बूंदों से बनी असली मोतियों की तरह लगती हैं जो कवि के परिवेश और प्रकृति में पककर स्वत: निर्मित होती हैं. इसलिए ये जितनी दुर्लभ, द्युति-आपुर और ताजा हैं, (अपने तासीर में) उतनी ही संवेदित, आलोड़ित व सम्मोहित करनेवाली.
लोर्का को पढ़ते हुए आप अनुभव करेंगे कि एक ओर इन कविताओं में जहाँ तीसरे दशक की दुनिया के चरमपंथियों और प्रतिगामी शक्तियों की जद में कराहती जनता के उत्पीड़न के दुर्द्धर्ष इतिहास, गृहयुद्ध और घोर अराजकता व क्रूरता के हृदयविदारक चित्र मौजूद हैं, वहीं दूसरी ओर लोकरंग और आदिमराग की अंतरंगता (जिसमें जनजीवन के गीत, नृत्य और तुमुल हर्ष-उल्लास-उछाह हैं) के भी दर्शन होते हैं. लोर्का अपनी कविता मानव जीवन की इन्हीं चरम अवस्थितियों के तनाव और ‘फ्यूजन’ से बनाते हैं, पर ऐसा करते हुए वे गदल नहीं मचाते जिस कारण इन कविताओं में अधिक शोर-गुल या वाचालता लक्षित नहीं की जा सकती। यहाँ शब्दों की सघन नीरवता और खामोश कहन की शैली जितना मर्मी और मर्मान्तक हैं , उतनी ही जैविक बिम्बों की माला में बेतरतीब गुँथी हुईं . यहाँ कवि अपनी वाग्मिता से पाठकों को हैरत में नहीं डालता। यह समझ लेना जरूरी है कि लोर्का के बिम्बों से कविता में जो रोमांच उत्पन्न होता है , वह यथार्थ के उस रूप में प्रत्यक्षीकरण के कारण ही सम्भव होता है , जैसा कवि व्यक्त करना चाहता है! अगर यह कवि का सायास प्रयत्न होता तो गीतों के सैकड़ो वर्षों पुराने फ्रेम के उपयोग के कारण शायद लोर्का आज प्रासंगिक नहीं रह पाते!
भारतवर्ष के बिम्बकारों को इससे यह सबक लेना चाहिए कि जीवन की भट्ठी में तपकर रची गई लोर्का की कविताओं के बिम्ब कविता के बदलते प्रतिमानों के दौर में भी इसीलिए जीवंत और प्रासंगिक हैं क्योंकि सच्चे अर्थों में ये कवि के परिवेश व क्रियाशीलनों से उपजे चेतन बिम्ब हैं, शब्दों की प्रयोगशाला में गढ़े हुए कृत्रिम बिम्ब नहीं. ये उनके जीवन और स्वानुभवों के विषाद-बिम्ब (नॉस्टेल्जिया-इमेज) हैं जो इन्द्रिय-बोध की प्रखर चेतना से लोर्का के द्वारा परिवेश व प्रकृति से अर्जित किया गया लगता है.
लेकिन नई कविता के अभिलक्षणों यथा; फैंटेसी-कला, अस्तित्ववाद व प्रतीकवाद से अति-प्रभावित आज के कुछ कवि तो ऐसे-ऐसे चौंकाने वाले बिम्ब गढ़ते हैं कि पूछिये मत! और पाठक उसी पर वाहवाही करते नजर आते हैं , क्योंकि ये मन को गुदगुदाने वाले बिम्ब होते हैं, जबकि उसके किसी अभीष्ट और स्त्रोत का अता-पता नहीं होता!
यहाँ किसी कवि का खरगोश पृथ्वी को अंधेरे में कुतर देता है तो किसी कवि का सुअर कभी मुस्कुराता है,कभी उसको जुकाम हो जाता है , कभी कवि के पात्र के बिना बजाए रात में हारमोनियम बजता है तो किसी कवि का पूरा घर ही हवा में जल भरी तसली सा हिलता नजर आता है. गौर करने वाली बात यह है कि खामियाँ बिम्बों में नहीं होती, न ये बिम्ब वर्जित और व्यर्थ ही हैं, पर बुर्जुआ और संभ्रांत चेतना से अटे-पड़े इन बिम्बों से बिम्बकारों की सौंदर्य-दृष्टि और आस्वाद का स्वत: अहसास हो जाता है. मसलन,अशोक वाजपेयी, उदयप्रकाश, अरुण कमल, बाबुषा कोहली, शुभमश्री, अनामिका, सरीखे अनेक वरिष्ठ और युवा कवि ऐसे हैं जिनकी कविताओं के अधिकतर बिम्ब जीवनधर्मी नहीं हैं, जनशब्दों और जनक्रियाओं से ये बनाये गए जरूर हैं, पर इन अधिकतर बिम्बों में आभिजात्य सौंदर्य की आहट मिलती है. यहां बिम्ब शब्दों के चयन की मगजमारी और बाजीगरी से बनती है जो केवल मनोविनोद और चमत्कृति भर हैं और पाठक के मन में कोई अमिट छाप न छोड़कर केवल कौंध भर जाती है. इसके उलट आज कुछ ऐसे भी वरिष्ठ व युवा कवि हैं जो बिम्बों का सचेत होकर अपनी कविताओं में उपयोग करते हैं, जैसे कि शम्भु बादल, अग्निशेखर, सुधीर सक्सेना, स्वप्निल श्रीवास्तव, नरेंद्र पुंडरीक, योगेंद्र कृष्णा, शिरोमणि महतो, अशोक सिंह(दुमका), राजकिशोर राजन इत्यादि नाम गिनाना यहां प्रेय नहीं. इन उदाहरणों से उनकी बिम्ब-प्रवृत्ति पर आरोपित चेतना का आभास मिल जाए, कहने का मूलार्थ इतना ही है। देखने की बात यह है कि लोर्का की कविताएं तीसरे-चौथे दशक की कविताएं हैं, सत्तर-अस्सी साल पुरानी. कवि का फ्रेम भी पुराना है, फिर भी आज नया और जीवित लगता है, “समुद्र सा” क्योंकि बिम्ब उनके जीवन से निकलकर सीधे अनुभव के दरवाजे से उनकी कविताओं में प्रवेश पाते हैं.
सुरेश सलिल ने ठीक ही लिखा है कि “लोर्का किसी महबूब शायर की तरह पढ़े और सराहे जाने वाले कवि हैं”.
संघर्षशील जनता से उनको बेहद प्यार था. वे इसीलिए लिखते थे कि जनता उनसे प्यार करे. उनकी रचनाएँ जन के दुःख-दर्द और संघर्ष का मुखपत्र है. अपनी जनता के प्रति अप्रतिम लगाव, आप्लावित करुणा और अथाह प्यार के कारण ही उनकी कविताओं में फासिस्ट ताकतों के प्रति विद्रोह का स्वर उभरता है. प्रेम, कारुणिकता और प्रतिरोध का ऐसा समागम बहुत कम कविता श्रेणियों में परिलक्षित होता है!
गोया कि, उनकी कविताओं से गुजरना किसी भूली हुई आदिम चेतना और आदिमराग के उस संसार में लौटने जैसा है, जिसमें जीवन-मरण की मँडराती काली छायाओं और द्वंद्वों की फुसफुसाहटों व त्रासदियों के बीच मनुष्य के जीने और साबित बचे रहने की जद्दोजहद और बेचैनी के साथ आह्लाद और सुकून भी विद्यमान है। यह कहीं उत्तप्त मन की खामोशी है, कहीं सीलन भरी उदासी और अवसाद है तो कहीं मृत्यु से साक्षात्कार और दुःस्वप्न भी हैं. इनमें जितनी मुमूर्षा और विकलता है, उससे अधिक जीवन है, जिजीविषा है. जितना संघर्ष और द्वंद्व है, उतना ही जीवन का उत्सव भी है. जितनी कोमल रागात्मकताएँ हैं , उतनी ही बज्र साहसिक वृत्तियां भी हैं। वह जितनी कविता है, उतनी ही जैविक कला भी। इन सब विशेषताओं के बावजूद उनकी कविताएं किसी अतिवृत्ति का शिकार नहीं होती और न अपनी कहीं राह खोती हैं। सबसे बड़ी बात यह कि ये कविताएँ कवि की बुद्धि के आवेग से नहीं निकलती, सीधे उस जीवन-संघर्ष से निकलती हैं जो प्रकृति और हृदय के अद्भुत ताल और लय पर चलती है और दूसरे के जीवन को अबाध स्पर्श करती हैं, बल्कि कहें, उनमें अंतर्भूत हो जाती हैं। इनमें कहीं बनावटी नाटकीय संवेग नहीं, बल्कि बाह्यगत विद्रूपताओं से उपजी आंतरिक लहरें और कोलाहल हैं जो मन को हिलोरती भी है ,कचोटती भी है और एक नई लड़ाई के लिए हमें तैयार भी करती है।
इनमें आपको कविता का भरपूर आस्वाद मिलेगा, इनमें लय है, प्रगीतात्मकता है। रूपाभा है। प्रभावान्विति है। ध्वन्यात्मकता है और जनपदीय चेतना की अनुपम बानगी है, जहां कवि की संवेदना जितनी ज्ञानात्मक है, उतनी ही जनपक्षधर । वह कवि का उपार्जित यथार्थ नहीं जो नवरीतिकालीन बुर्जुआ चिंतन से पगी हुई हो और जो उन्हीं सरीखे समीक्षकों को भाता हो जो किसी भी निरथर्क रचना पर अपना शब्द-जाल बुनकर तालियों और प्रशंसाओं की मायालोक बटोरने में माहिर हो, बल्कि इन कविताओं का उपार्जित यथार्थ मानवीय लोक के द्वंद्व और संघर्ष का व्यापक सन्दर्भ रचता हैं |
एक बात और , यह कि लोर्का की कविताएं जितनी सर्वसाधारण की समझ में आ सकती है, उतनी बौद्धिक कवियों-समालोचकों को नहीं. जैसे ही हम अपने चश्मे से इसे देखने लगते हैं, अपने बनाये फ्रेम में फिट करने की कोशिश करते हैं, हम उनकी कविताओं के सर्जनात्मक आनंद और आस्वाद से वंचित होने लगते हैं, मसलन कि ये कविताएं जिस रौ और रागात्मकता के साथ लिखी गई है, उसे पढ़ने-गुनने के लिए एक सरल दीवाना हृदय चाहिए, और जनता का ही दिल हो सकता है(आइए उनकी कुछ कविताओं का पाठ करते हैं)-
1】
लकड़हारे
मेरी छाया काट
मुझे ख़ुद को फलहीन देखने की यंत्रणा से
मुक्त कर !

मैं दर्पणों से घिरा हुआ क्यों पैदा हुआ ?
दिन मेरी परिक्रमा करता है
और रात अपने हर सितारे में
मेरा अक्स फिर बनाती है

मैं ख़ुद को देखे बग़ैर ज़िन्दा रहना चाहता हूँ

और सपना देखूंगा
कि चींटियाँ और गिद्ध मेरी पत्तियाँ और चिड़ियाँ हैं

लकड़हारे
मेरी छाया काट
मुझे ख़ुद को फलहीन देखने की यंत्रणा से
मुक्त कर !
●अंग्रेज़ी से अनुवाद : विष्णु खरे
2】
जब चाँद उगता है
शाम की घण्टियाँ ख़ामोशी में डूब जाती है
और अभेद्य रहस्यमय रास्ते दीखने लगते हैं

जब चाँद उगता है
समुद्र ज्वार में पृथ्वी पर छाने लगता है
और हृदय बन जाता है
अनन्त प्रसार में एक छोटा-सा द्वीप
……………………………….
……………………………….

जब चाँद उगता है
हज़ार हज़ार यकसाँ बिम्बों में
तो थैलियों में से रुपहले सिक्के
ग्लानि से रो देते हैं।
●अंग्रेज़ी से अनुवाद : धर्मवीर भारती
3】
गिटार का रोना शुरू होता है
अल-सुबह का नशा चूर-चूर हो चुका है
गिटार का रोना शुरू होता है
इसे ख़ामोश करना फ़िज़ूल है
नामुमकिन है इसे ख़ामोश करना

यह एक सुर में रोता है
जैसे रोता है पानी
जैसे रोती है हवा
बर्फ़ीले इलाकों में

नामुमकिन है इसे ख़ामोश करना
यह दूर की चीज़ों के लिए रोता है
जैसे गर्म दक्षिणी रेत
सफ़ेद बबुने फूलों के लिए तड़पता है
बग़ैर निशाना जैसे तीर रोता है
बग़ैर शाम जैसे सुबह रोती है
और पहली मरी चिड़िया पर
जैसे शाख रोती है

ओह ! गिटार
दिल पाँच शमशीरों से
बुरी तरह घायल है
●अँग्रेज़ी से अनुवाद : विनोद दास

– सुशील कुमार

मो.न. 7004353450
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परिचय:
• जन्म: 13 सितम्बर, 1964. स्थान: मोगलपुरा, पटना सिटी के एक कस्बाई इलाका और 1985 से दुमका ( झारखंड ) में निवास.
• घर के हालात ठीक नहीं होने के कारण पहले प्राइवेट ट्यूशन, फिर बैंक की नौकरी की. 1996 में लोकसेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण कर राज्य शिक्षा सेवा में चयनित. संप्रति स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के अंतर्गत रामगढ़ (झारखंड) जिले में शिक्षा विभाग के पद पर कार्यरत.
• हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में लिखने-पढ़ने में गहरी रुचि. कविताएँ, समालोचना, आलेख इत्यादि कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित.
• नवीनतम गद्य कृति :आलोचना का विपक्ष 2019 में और कविता संग्रह: हाशिये की आवाज 2020 (लोकोदय प्रकाशन, लखनऊ से)
पहला काव्य- संग्रह – *तुम्हारे शब्दों से अलग* ( 2011)
• काव्य-संग्रह *जनपद झूठ नहीं बोलता* 2012 में
• प्रारंभिक कविताओं का एक संकलन ‘कितनी रात उन घावों को सहा है’ (2004)
• ईमेल- sk.dumka@gmail.com
• फोन न / मो. 7004353450
स्थायी पता : सुशील कुमार
हंस निवास / कालीमंडा
पुराना दुमका / दुमका / झारखंड – 814101