मुद्दाःअबला तेरी यही कहानी : लड़ाई हमें ही लड़नी होगी -मंजरी पांडे


नारी सुरक्षा , अस्मिता का प्रश्न आज की उपज नही बल्कि आदिकाल से चला आ रहा है । नारी को हमेशा समाज ने उपभोग्य और सेवादार समझा । ज़रा सी ना नुकुर पर उलाहना,प्रताड़ना प्रतिशोध, अवमानना सब उपहारस्वरूप उसकी झोली में डालते रहे । सीता ,द्रौपदी , अहिल्या आदि राजघराने और मर्यादित ऋषिकुल की बेटी बहुएँ जब इस घृणित , कुत्सित व्यवहार का शिकार होने से नही बच सकीं तब सामान्य लोगों की बात ही क्या ?
बड़े बड़े विद्वान तर्क देकर गर्भावस्था में सीता के परित्याग व वन में छोड़ने को , भरी सभा में द्रौपदी के चीरहरण को शापग्रस्त होकर अहिल्या के पत्थरमय जीवन को सही ठहरा लें ,भगवान की लीला बता लें , ये न होता तो वो न होता की सफाई पर आज जो प्रश्न सुरसा की तरह मुँह बाएँ जा रहा है उसकी नींव उसी प्राचीन काल में ही पड़ गई थी कहें तो अतिशयोक्ति नही होगी ।
कहने का तात्पर्य प्रश्न जो तब खड़ा था आज भी है ।हाँ परिस्थितियाँ हमेशा ही परिवर्तनशील हैं आज मीडिया का प्रचार प्रसार है जिसके कारण स्थितियाँ दिन प्रतिदिन खुल के सामने आ रही हैं तो भयावह दृश्य उपस्थित हो रहा है । यही नही हैवानियत , दरिंदगी , बर्बरता , नृशंसता का जो वीभत्स स्वरूप समाज में दिख रहा है उससे मानव हृदय विदीर्ण हुआ जा रहा ,आक्रोश उबल रहा है । पर दूसरी दृष्टि से यह सहानुभूति जो देश क्या पूरे संसार की सामने आ रही है । यह संकेतक भी हो सकती है । वो कहावत है ना लोहा जब गरम हो तब चोट करना चाहिये । अब वक़्त आ गया है जब इस हैवानियत का समाधान निकालना ही होगा । आदिकाल की महान् स्त्रियों नें पीड़ा सह ली , मान,सम्मान,परंपरा को आत्मसात् कर लिया उफ् तक न की । क्यों किया ? उनके बारे में हम जानना समझना ,गड़े मुर्दे उखाड़ना नही चाहते बस आज जो हम देख रहे हैं उसकी बात करेंगे।
हालाँकि कई लोग दलील देतेहैं । स्त्रियों के छोटे कपड़े पहनना , स्तन, नितम्ब , खुली टाँगों का दिखना , अमर्यादित खान- पान ,बेख़ौफ़ घूमना फिरना आदि आदि कामुकता को बढ़ावा देता है जिसका दुष्परिणाम प्रतिदिन प्राय: हर राज्य पूरे देश में रेप रेप रेप गूँज रहा है । पर दलील करने वालों से कोई पूछे दो चार छ: महीने , चार छ: साल की बच्ची का क्यों रेप हो जाता है ? उनमें क्या दिखाई देता है ? इसका कोई उत्तर नही । दरअसल ये मानसिक विकृतियाँ हैं । जिसे येन केन प्रकारेण अपनी हवस ,अपनी कामुकता को तृप्त करना है वह करता है वय कोई भी हो ।
अब आदि काल से चली आ रही वर्तमान समय में विकराल स्वरूप में हमारे सम्मुख नर्तन कर रही इस निर्लज्जता , बर्बरता के समूल नाश का , समाधान का समय आ गया है । कौन करेगा ? आज की नारी । क्यूंकि आज नारी परवश नही है । घर बाहर बराबर का आधिपत्य है । जल थल अतल वित्त में उसका वर्चस्व है । पढ़ाई से लेकर अपने हुनर और कला के विकास के लिये , नौकरी के लिये , घूमने फिरने के लिये वह गाँव घर से , अपनों से कोसों दूर बड़े-बड़े अनजान शहर , होटल्स , देश विदेशों में अकेली आ जा रही है , रह रही है ,सारे निर्णय स्वयं ले रही है , अपने अच्छे बुरे का विचार कर रही है तब अपनी अस्मिता कैसे बचाई जाये इस पर भी वह स्वयं बख़ूबी विचार कर सकती है । कहने का तात्पर्य अपनी लड़ाई अब स्वयं उसे लड़नी चाहिये । कितनी नही पता पर नारी सशक्तिकरण की चर्चा तो बहुतहै । नारी अपनी लड़ाई स्वयं लड़े तब कितनी सशक्त हुई या कितना दिखावा है सब सामने आ जाए ।
अपनी लड़ाई लड़ने का मतलब घर बार सबसे विरोध कर लेना नही है । आज की युवा पीढ़ी ऐसा कर रही है । माता पिता ने ज़रा रोका टोका , समझाया बुझाया , ऊँच नीच की बात की ,बच्चों को कर्तव्य का पाठ पढ़ाया नही कि बच्चे दुश्मन। तो क्या करें ? बड़े बुज़ुर्गों ने पहले ही कहा है कि बेटे के पाँव में बाप का जूता आने लगे तो यह संकेत है कि बच्चा बडा हो गया है । पिता को उसके साथ मित्रवत् व्यवहार करना चाहिये यानि अब समझाना बुझाना डाँट मार के नही चलते फिरते तरीक़े से करना चाहिये । क्योंकि वय की संधिबेला होती है । बालपन से किशोरावस्था एवं युवावस्था में प्रवेश हो रहा होता है । यह अवस्था उम्र की सबसे खूबसूरत होने के साथ दुर्गम भयंकर भी होती है । यह बात जितनी प्रासंगिक तब थी आज भी है । आज मीडिया की चकाचौंध में बहुतायत से नारियाँ भटक गई हैं या दिग्भ्रमित हो गई हैं । अत: अपने भटकाव को समझना होगा ।
मैं नारी की अस्मिता की लड़ाई की बात कर रही हूँ । इसकी तैयारी हर नारी को स्व के स्तर से शुरू करनी होगी । पहले अन्तरात्मा से मोर्चा लेना होगा । नैतिक अनैतिक क्या है सोचना समझना विचार करना होगा । अपनी कमज़ोरियों को समझना स्वीकारना और दूर करने का यथासम्भव प्रयास करना होगा । भावातिरेक से बचना होगा । कोमल हृदय पर कठोर आवरण भी कभी कभी धारण करना होगा ।अतीत को समझना भविष्य को लक्ष्य बना कर वर्तमान पर संयम से चलना होगा ।किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह को छोड कर नये प्रतिमान गढ़ना होगा । तब बदलाव की स्थायी नई इबारत लिखी जा सकेगी । समय परिस्थिति पूर्वापर रीति परंपराओं मान्यताओं को समझ कर ,घर बाहर में सामंजस्य बना कर , अधिकार और कर्तव्य को ईमानदारी और निष्ठा से ग्राह्य समझ कर नारी समवेत स्वर उठाये तो नारी शक्ति ,मातृ शक्ति न केवल अपने अस्तित्व को बचाने में सक्षम होगी वरन् स्वर्णिम इतिहास रचेगी जब अपनी लड़ाई स्वयं लड़ेगी ।
वेद ,पुराण स्मृतियों से स्त्री के गौरवशाली इतिहास का अवलोकन किया जा सकता है । मनु ने स्त्रियों को सम्मान्य पद देते हुए ही कहा था – ” यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: ” ।परन्तु इसमें आचार विचार की मान्यता अधिक थी । उच्च शिक्षा के मत पर सबकी सहमति नही दिखती ।परन्तु आधुनिक समय में यह द्वार निर्बाध रूप से खुल गया जिसका श्रेय राजा राजमोहन राय तथा स्वामी दयानन्द सरस्वती को जाता है । जिसके फलस्वरूप घर ,कार्यालय से युद्धस्थल तक सभी क्षेत्र में मान सम्मान ,पद – प्रतिष्ठा सबका अधिकार मिला है । रानी लक्ष्मीबाई,सरोजिनी नायडू, विजयलक्ष्मी पण्डित ‘इन्दिरा गाँधी,कल्पना चावला ,पहली रेल ड्राइवर सुर्रेखा यादव ,पहली नेवी पायलट शिवांगी , भारत की पहली महिला आई ए एस अधिकारी अन्ना रजम मल्होत्रा , किरण बेदी इत्यादि ज्वलन्त उदाहरण हैं । अनेक महिला संसद सदस्या और विधानसभा की सदस्या हैं । स्त्रियों पर लगे बंधन,रोक शिथिल हो रहे हैं परन्तु अत्याचार में भी बढ़ोत्तरी हुई है । ये विरोधाभास क्यों ये विचारणीय है । यानि स्त्रियों में स्वाभिमान और पौरुष अभी जागृत होना शेष है । स्त्रियोचित गुण भी छूटना नही चाहिये । क्योंकि यही हमारा मूल्य हमारी थाती है । अपनी लड़ाई इसी सामंजस्य पर आधारित है । आज जिसका बडा अभाव दिखता है । बड़े पद पर आसीन होते, विदेश जाते ही संस्कार भी छूट जाते हैं जिससे न केवल स्त्री का सम्मान कमतर हुआ है बल्कि पीढ़ियों में संस्कार का आधान ही नही होता जिसके फलस्वरूप अनैतिकताएँ बढ़ी हैं जिसका ख़ामियाज़ा स्त्री ही भुगतती है । कभी कभी ये भी लगता है कि स्वतंत्रता का स्वच्छंदता का निरंकुशता का अभिप्राय गहराई से न समझ पाने के कारण बहुत सी बालिकाएँ स्त्रियाँ उच्छृंखल हो गईं । अनैतिक कार्यों की स्वतंत्रता सिगरेट शराब के सेवन , बेख़ौफ़ ,बेरोकटोक रात्रि विचरण ,अमर्यादित आचरण ने उन्हे पतन के रास्ते पर डाल दिया । । संभवत: ऐसी ही स्त्रियों की स्वाधीनता का विरोध करते हुए मनु ने लिखा है –
अस्वतंत्रा: स्त्रिय: कार्या: , पुरुषै: स्वैर्दिवानिशम् ।
विषयानुसार च सज्जन्त्य: ,संस्थाप्या आत्मनो वशे ।। मनु. ९.२
अर्थात् मनु के अनुसार पति ,पिता आदि आत्मीय जनों को चाहिये कि वे स्त्रियों को स्वाधीन न रखें । विषयों में आसक्त स्त्री को अपने वश में रखें ।
उक्त कथन कदापि बंधन की बात नही करता वरन् व्यभिचार को बढ़ावा न हो मर्यादा की बात करता है । लज्जाशीलता जैसे नारी का गुण है परन्तु अपनी बात कहने रखने मे लज्जा कायरता है ।
अत: कार्यक्षेत्र के अलावा आचार विचार ,संयम संस्कार का आश्रय लेकर निर्भयता और स्वावलंबन के पथ पर चल कर नारी राष्ट्रीय उत्थान में महती योगदान कर सकती है । वैदिक काल की स्त्रियों ने जैसे अपना वर्चस्व बनाए रखा वैसे ही आज न केवल ऊँचाइयों को छूना वरन् बनाए रखना और बने रहना आवश्यक है । यही हमारी लड़ाई हमें तमाम कुरीतियाँ ,अत्याचारों से मुक्त कर सकेगी । हमें मृगमरीचिका के पीछे भागना छोड़ना पड़ेगा । आचार विचार से मज़बूत होना होगा तब हम सच्चे अर्थों मे सशक्त होंगे ।
भवतु सब्बमंगलम् ।

डा मंजरी पाण्डेय
( कवयित्री,लेखिका,रंगकर्मी )
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