दो लघुकथाएँः हरिहर झा, अर्जित मिश्रा


आत्मसंवाद

फुटबॉल की टीम में विकास कप्तान था और दीपक एक अच्छा खिलाड़ी। दोनो में अच्छी दोस्ती थी। विकास वैसे तो अच्छा कप्तान था पर उसकी एक कमजोरी थी। वह मित्रों की बीवियों पर बुरी नजर रखता था – विशेष कर दीपक की बीवी सुनयना पर।
एक बार दीपक ने विकास सहित मित्रों को अपने घर पर डिनर पर बुलाया। पहले विह्स्की का दौर शुरू हुआ। सभी बातों में मशगुल हो गये। आज विकास चालाकी से सुनयना के रूम में घुस आया था। बातों में उलझा कर विकास छिछोरी हरकत करता हुआ ज्यों ही कुछ आगे बढ़ा सुनयना ने बड़ी शालिनता से रोक दिया। सुनयना खुद को कमजोर समझ कर चिल्लाने वालों में नहीं थी।
उसने द्रढ़ता से कहा “कुछ शरम करो विकास, मैं और दीपक दोनो आपकी बहुत इज्जत करते हैं इसका यह अर्थ नहीं।“
शर्मिंदगी झेलता हुआ विकास कमरे से बाहर आ गया । एक बार उसे भय लगा कि वह दीपक को सब कुछ बता सकती है तब उसकी इज्जत दो कोड़ी की भी नहीं रह जायगी। फिर भी अपनी छिछोरी सोच में एक बार उसे लगा वह कोई दूसरा अच्छा मौका ढूंढेगा। उसे अफ़सोस भी हुआ कि वह क्यों जल्दबाजी कर बैठा? उसे कुछ धीरज और ’टैक्ट’ से काम लेना चाहिये था। पता नहीं वह क्यों अभी भी आशावादी था।
विकास बाहर देखता है एल्कोहल सब पर भारी रंग दिखला रही थी। उसके मित्र नशे की हालत में दीपक की ’उड़ाने’ में लगे थे। विकास की कुटिलता से दूर यहाँ मित्रों की निश्छल हँसी का आनंद चल रहा था। दीपक को कोई विरोध नहीं था क्योंकि वह मधुशाला की रंगीन दुनिया में पहुँच चुका था जहाँ मान अपमान धुयें में उड़ चुके थे। बुरा लगने वाले सभी शब्द अपने अर्थ खो चुके थे और बाकी कुछ बचा था तो हँसी-ठिठोली।
“दीपक, आज तुझे यह पार्टी देने की कैसे सूझी? वैसे तो तू इतना भूक्खड़ है कि दूसरे की थाली छिन लेने में जरा भी नहीं झिझकेगा। कुछ तो शरम खा।“
मित्रों को इतनी अच्छी पार्टी देने के बाद इसका कुछ अर्थ नहीं रह जाता पर दीपक ने नाटकीय मुद्रा में हामी भरी “मैं शरम खाता हूँ।“
“अरे! तू तो किसी की मिठाई झपट कर लेने में भी संकोच नहीं करता। इसके लिये तू और शरम खा”
“मैं और भी शरम खाता हूँ।“
“तू किसी की झूठी चाय पीने में शरम नहीं करता। इस बात पर और शरम खा” ।
दीपक ने चुपचाप सिर हिला कर कहा “मैं और भी शरम खाता हूँ।“
अब विकास की बारी थी वह बोला “इतनी सारी शरम खा ली अब तक पेट नहीं भरा इस बात पर और शरम खा।“
थोड़ी देर सन्नाटा रहा फिर सब ठहाका लगा कर हँस पड़े। सबने विकास के इस ’डॉयलाग’ की प्रशंसा की । किन्तु विकास समझ चुका था कि यह कथन दीपक के लिये नहीं था। सामने लगे काच में विकास को अपना ही चेहरा दिखाई दे रहा था।
-हरिहर झा
मेलबौर्न, आस्ट्रेलिया


शिष्टाचार
उन दिनों मेरा तबादला मेरठ हो गया था और मैं हर शुक्रवार की शाम मेरठ से अपने घर सीतापुर और इतवार की शाम घर से मेरठ बस से आया जाया करता था| होली के बाद का समय था तो अच्छी-खासी गर्मी पड़ने लगी थी| हमेशा की तरह उस रविवार की शाम भी मैं मेरठ जाने के लिए बस पर सवार हो गया| आमतौर पर यात्रा के दौरान मुझे कुछ ना कुछ पढने की आदत है, किन्तु जैसा कि आप सब जानते ही हैं, शहर छोड़ते ही बस में लाइट बंद कर दी जाती है| अधिकांश लोग ऐसे समय में मोबाइल पर गाने सुनते हैं, पर दुर्भाग्यवश मुझे गाने सुनना पसंद नहीं, और मोबाइल पर कान में लीड लगाकर तो बिलकुल भी नहीं| तो ऐसे समय में मैं वैचारिक महासागर में गोते लगाकर समय व्यतीत करता हूँ, उस दिन भी यही कर रहा था| कुछ घंटों के पश्चात् बस बरेली के बस अड्डे पर रुकी, बरेली में करीब तीस मिनट का ठहराव था, तो मैं भी अन्य यात्रियों की ही भांति अपने बैग को अपनी सीट पर रखकर नीचे उतर गया| अपना बैग या अन्य सामान सीट पर रखकर सीट पर अपनी कब्जेदारी सुनिश्चित करने की हम भारतियों में विशिष्ट कला है|
बस के आस-पास मैं यूँ ही चहलकदमी कर रहा था कि तभी मेरी नज़र एक शख्स पर पड़ी, कुछ तीस-बत्तीस साल का मध्यम कद-काठी का युवक था, चेहरे-मोहरे से संभ्रांत घर का लग रहा था| उसने पैरों में चप्पल, एक जीन्स और शरीर के उपरी हिस्से में सिर्फ एक बनियान पहनी हुई थी, और जो बात मुझे उसकी तरफ गौर करने को मजबूर कर रही थी, वह था उसकी गोद में एक दुधमुहा बच्चा|
सबसे पहला विचार जो मेरे दिमाग में आया कि कहीं ये युवक किसी का बच्चा चुराकर तो नहीं भाग रहा है| तभी मेरी बस ने हॉर्न बजा दिया, वो युवक उसी बस में चढ़ गया, पीछे से मैं भी बस में चढ़ गया, मैंने देखा की वह युवक मेरी सीट की ही पंक्ति में एक सीट पर बैठ गया है, मैं भी अपनी सीट पर बैठ गया| बस चल दी, पर मेरा ध्यान उसी युवक पर था| अचानक बादलों की गर्जना और चमकती बिजलियों के बीच बेमौसम बरसात शुरू हो गयी| बारिश के साथ तेज हवाओं ने अचानक ही ठण्ड बढ़ा दी| सभी गर्मियों के हिसाब से कपड़े पहने थे, अचानक बढ़ी ठण्ड ने सभी को सिकुड़ने के लिए मजबूर कर दिया|
मेरा ध्यान अभी भी उसी युवक पर था, परन्तु अब मेरा उसको देखने का नजरिया बदल गया था| खुद ठण्ड से कंपकंपाते हुए भी उसने बच्चे को अपने सीने से लगा रखा था मानो अपने शरीर रूपी कम्बल से बच्चे को ढकने की कोशिश कर रहा हो| वैसे तो बच्चे ने काफी कपड़े पहने हुए थे, परन्तु मौसम उस उम्र के बच्चे के लिए कुछ अधिक ही प्रतिकूल था| शायद ठण्ड से या भूख से बच्चा रोये जा रहा था, वह युवक कभी उसे दुलारता, प्यार करता, चुप कराने की कोशिश करता और कभी उसे अपने अंक में छुपा लेता| उसके चेहरे की बेबसी और बेचैनी साफ इशारा कर रही थी वह युवक अवश्य ही उस बच्चे का पिता है, जिसे अपने दिल के टुकड़े का करुण क्रंदन बर्दाश्त नहीं हो रहा था, किन्तु शायद किसी मज़बूरी की वजह से वो इस हालात में था| मैंने सोंचा शायद इस युवक का बरेली में ससुराल होगा, बीवी और ससुराल वालों से झगडा करके अपने बच्चे को लेकर वह अपने घर मेरठ जा रहा है, इसी प्रकार और भी कुछ कारण दिमाग में आये, किन्तु उस बच्चे के करुण क्रंदन ने सारे विचार धूमिल कर दिए, मुझे लगा अब इस बच्चे का रोना मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगा| लेकिन किसी के व्यक्तिगत मामले में बोलें, तो भी कैसे|
खैर, हिम्मत करके मैं उस युवक से बोला- भाईसाहब, शायद बच्चे को ठंडक लग रही है| उसने पलट कर जवाब दिया- क्या करें भाई, मज़बूरी है| उस वक़्त कुछ पलों के लिए हमारी नजरें मिलीं, उसकी आंखों में आंसुओं का ज्वार था, शायद अपने बच्चे के लिए कुछ ना कर पाने की हताशा और कुछ शायद अपनी हालत पर शर्म के कारण|
उन दिनों मैं मेरठ में सप्ताह के पांच दिन होटल में रुकता था, स्वच्छता के दृष्टिकोण से एक बिछाने के लिए और एक ओढने के लिए चादर घर से लेकर ही चलता था, जिसे होटल के बिस्तर पर बिछी चादर के ऊपर बिछा देता था|| उस युवक और उस बच्चे की हालत देखकर मुझसे रहा ना गया, अपने बैग से एक चादर निकाली और उस युवक की तरफ बढ़ा दी| मैंने कहा- आप इस चादर में बच्चे को ढक लीजिये| उसे शायद किसी से ऐसी ही पेशकश का इंतजार था, उसने तुरंत वो चादर ले ली| मैंने बच्चे को अपनी गोद में ले लिया ताकि वो उस चादर को अच्छे से फैला सके, फिर बच्चे को उसकी गोद में दे दिया, बच्चा अब चुप था, वह शायद ठंडक के कारण ही रो रहा था|
वह युवक भी अब संतुष्ट था, और अपने बच्चे को खूब दुलार कर रहा था| तभी मेरा ध्यान उस युवक पर वापस गया, मैंने सोंचा कि बच्चे को तो चादर मिल गयी, परन्तु वह युवक अभी भी ठण्ड में बनियान पहने हुए है| और कमाल की बात ये है की चादर काफी बड़ी थी जिसे वह खुद भी ओढ़ सकता था और बच्चे को भी ढक सकता था| किन्तु उसने ऐसा नहीं किया, उसने पूरी चादर अपने बच्चे पर ही लपेट दी| इस दृश्य ने मुझे भी द्रवित कर दिया| मैंने अपने बैग से एक टी-शर्ट निकाली और उस युवक को दे दी| शुरू में उसने इंकार किया कि नहीं चाहिए भाई, बच्चे को आराम हो गया मेरे लिए इतना ही काफी है| फिर सामाजिक लोक-लाज भी होती है ऐसे कैसे किसी अजनबी से कपड़े ले ले पहनने के लिए, बच्चे की बात और है| मेरे बार-बार अनुरोध करने पर उसने वह शर्ट ले ली और पहन ली| मैं मन ही मन बहुत खुश हो रहा था कि आज मैंने बहुत पुण्य का काम किया| ये स्वाभाविक भी है जब भी हम कोई अच्छा काम करते हैं तो मन को बड़ी तसल्ली होती है|
लेकिन ये तसल्ली कुछ ही देर रही, अब मेरे मन में ये कीड़ा काटने लगा कि यार मैंने इसे अपनी पसंदीदा शर्ट दे दी पर इसने धन्यवाद् तक नहीं कहा| इसी उलझन में थे कि बस मेरठ शहर में दाखिल हो गयी| मैंने सोंचा कि कोई बात नहीं अभी उतरने से पहले वह धन्यवाद् बोलेगा और सामान्य शिष्टाचार के तहत ये भी बोलेगा कि आप मुझे अपना पता बता दीजिये मैं कल आपके कपड़े वापस कर दूंगा और मैं बड़ी शान से कहूँगा कि नहीं भाई इसकी कोई जरुरत नहीं है| बड़प्पन दिखाना किसको अच्छा नहीं लगता|
परन्तु हुआ वही जो होना था, बस के अड्डे पर पहुँचते ही वह उतरकर रिक्शा करके चला गया, मेरी तरफ तो देखा तक नहीं धन्यवाद् तो दूर की बात है| मैं भी बस से उतरकर अपने होटल की तरफ पैदल ही चल दिया, ये सोंचते हुए कि बेचारा बहुत परेशान होगा, अब ऐसे में शिष्टाचार कहाँ याद रहता है……..
अर्जित मिश्रा
सीतापुर
9473808236