कविता आज और अभीः मई-जून 2020


शाम सहसा ढल गयी है
धूप ओझल हो गयी है ।

जो जहाँ हैं, लौटने को हो रहे तैयार
काम का वैसे पड़ा है सामने अंबार
अब करेंगे, अब करेंगे, हो गयी दुपहर
सोचने में और गुजरा एक अन्य प्रहर ।

डूबने को जा रहा मसि-सिंधु में संसार
मच्छरों की फ़ौज़ है उन खिड़कियों के पार
हैं वहीं टकरा रहे चमगादड़ों के पर
गूँजते हैँ हर तरफ बस झींगुरों के स्वर ।

ऊँघते उल्लू जमे हैँ शाख पर हर ओर
उस तरफ से आ रहा है शावकों का शोर
दूर तक दिखता नहीं है रौशनी का श्रोत
कर सकेंगे राह रौशन ये निरे खद्योत ?

शाम सहसा ढल गयी है ।

अंतर्व्यथा

मैं एक पर-टूटा पाँखी हूँ,
गिरा हुआ दरिया की लहरों में ।

किश्ती जो पास से निकलती है,
नाविक जो पार्श्व से गुज़रता है,
“लहरो से जूझो” कह जाता है ।

जितने ही दम-खम से
डैनों को तौलता हूँ ऊपर मैं,
उतने ही ज़ोर से डूब खा जाता हूँ ;
मैं हूँ ‘हर क्रिया की समान और
प्रतिकूल प्रतिक्रिया’ का शिकार
बाकी पाँखी तो हैं चाहते उड़ना,
और झट उड़ जाते हैं ।

जिधर ये लहरें ले जाती हैं,
उधर है वारिधि अनंत पड़ा।
कभी थे दरिया और दो पाट,
अब हर एक पाट दरिया बन गया है;
हर दरिया दो दरियों के पाट लिए बैठा है।
फिर भी लोग कहते हैं कि
बचना हो, तो रुख करो किनारे की ।

इंसान मरता है तो मातम मनाते हैं
क्योंकि वह मरता है वहां
जहाँ उसके ही जैसे बहुत-से इंसान हैं ।
मैं मरूँगा किसी बीहड़ में, खाड़ी में,
ऊपर अनंत गगन, नीचे निःसीम सिंधु ।

दूर, बहुत दूर,
किसी छोटी-सी झाड़ी में
हर आहट-हरक़त पर
चीं-चीं कर मुँह खोले
कुछ नन्हें बच्चे
एक आस लिए बैठे हैं ।

मैं अपनी मौत पर आँसू बहाऊँगा,
खुद अपनी मौत पर मातम मनाऊँगा,
क्योंकि छोड़ जाऊँगा बच्चों को वहाँ
जहाँ बिल्ली और लोमड़ी
ताक लगा बैठी हैं
मौसी और नानी के चेहरों में ।

मैं एक पर-टूटा पाँखी हूँ,
गिरा हुआ दरिया की लहरों में ।

: सुधांशु कुमार मिश्र
प्रोफेसर, अर्थशास्त्र विभाग
नार्थ-ईस्टर्न हिल विश्वविद्यालय
शिलांग, मेघालय (भारत) – 793022
इ-मेल: mishrasknehu@gmail.com

आतप

फिर फूले हैं
सेमल,टेसू, अमलतास
हुआ ग़ुल मोहर
सुर्ख़ लाल
ताप बहुत है
अलसाई है दोपहरी
साँझ ढले
मेघ घिरे
धीरेधीरे खग,मृग
दृग से ओट हुए
दुबके वनवासी
ईंधन की लकड़ी पर
रोक लगी जंगल में
वनवन भटकें मूलनिवासी
जल बिन
बहुत बुरा है हाल
तेवर ग्रीष्म के हैं आक्रामक
कैसे कट पाएँगे ये दिन
जन मन,पशु पक्षी
हुए हैं बेहाल

अफ़सोस भी है
आक्रोश भी
असफलता भी है
असमर्थता भी
जो भी है
नीले आसमान पर
बादलों का
पैच वर्क है

शैलेन्द्र चौहान

वह चूकता हैं, धंसता हैं
वह हारकर खड़ा होता है
उसे याद नहीं रहता
उसकी शुरूआत पिछले किए गए
तमाम की शुरूआत नहीं है
अब उसे फिर से बसाने हैं
अपने गतिशील रास्तें

धीमे-धीमे
मौत आती है नजदीक

धीमे-धीमे
हम बात करते हैं

धीमे-धीमे
हम जानते हैं एक-दूसरे को

कोई रहस्य, कोई बात अधूरी नहीं तब

मैं कितना कुछ जानता था अपने भ्रम में …..
हर वाक्य कि समाप्ति पर
मैं खामोश खड़ा देखता
मेरे पास नहीं रहे अब वे सिलसिले
जिन्हें मैं कहना चाहता हूं

मैं कितना कुछ नहीं जानता

नीलोत्पल

हिंसा करना खून ईश्वर का

तन में तू है, मन मे तू है ,
फ़िज़ा और कण-कण में तू है।
मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारे में,
चर्च और हर धर्म में तू है।।

सृजन और विनाश में तू है,
अंधकार, प्रकाश में तू है।
हर अमीर गरीब में तू है,
जीवन के हर रीति में तू है।।

शोषित की हर आह में तू है,
प्रेमी के हर राह में तू है।
भूख में और प्यास में तू है,
चाहत के एहसास में तू है।।

सूर्य की किरणों में तू है,
समुद्र की लहरों में तू है।
कोयल की हर कूक में तू है,
पपीहे की हर तेर में तू है।।

हिंसा करना खून ईश्वर का,
नफ़रत से अपमान ख़ुदा का।
घर उजड़ा तेरा या मेरा,
रोया रातभर भाग्य विधाता।।

एक धर्म, विश्वास एक है,
इस पर लड़ना मान नही है।
बन्दे हम सब एक ख़ुदा के,
मेरा तेरा उचित नही है।।

क्यों दर्शन दुर्लभ भारत का?

दिनकर से दिन अफ़ज़ल है
निशा अफ़्सरा सुधाकर से
दुनिया महज रंगमंच है
रूप-कुरूप कर्म संचालित हैं।।

एक कहे जग सुंदर है!
दूसरा इसे मिथ्या कहता है
देख बुराई बुरा क्यों कहता
होते देख यदि चुप रहता ?

धृतराष्ट्र जन्मांध मग़र
दर्शन महाभारत संजय से
अंधा आज नही कोई फिर
क्यों दर्शन दुर्लभ भारत का?

गांधारी कितनी माताएं ?
दुर्योधन समाज मे पलता है
पलता है यदि खलता है
फिर भी पट्टी नही खुलता है?

अच्छे कर्म रोशनी बढ़ना
मानव तू सर्वश्रेष्ठ संरचना
बुरे कर्म से ख़ुद है लड़ना
अंधकार को भेंट क्यों चढ़ना।।

3-माँ कहने से क्यों झिझक रहा?

दुराचार पनपता आँगन में,
व्यभिचार गरज़ हुंकार भरे।
सदाचार मरण शैय्या लेटी
बैकुंठ धाम इंतज़ार करे।।

निर्दोष खोजते जननी को,
ओझल पगचिन्ह निहार रहे।
माँ ने जन्म दिया जिसको,
बेटी जन्मी और कोस रहे।।

उपहास कर रहे ममता का,
जिसने तुमको पाला-पोसा।
अनगिनत उठाया ख़ुद गिरकर,
माँ कहने से क्यों झिझक रहा?

ममता का यदि मान तुझे,
क्यों वृद्धाश्रम खोज रहा?
स्वर्ग बसा कदमो नीचे,
क्यों विश्व भर्मण की सोच रहा?

प्रकाश कहाँ क्या खोज रहा
अज्ञान मनुज सा सोच रहा
प्रकाश पुञ्ज की किरणें जिनसे
उनको ही क्यों कोस रहा?
ज़हीर अली सिद्दीक़ी
ईमेल- chem.siddiqui2013@gmail.com
मोबाइल न.+९१-९९७१९२४७९१

” आओ करें कोशिशें ”
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सुनता
आ रहा हूं
लोगों की
वजनदार बातें
पढ़ता आ रहा हूं
बहुत कुछ
किताबों में सदियों से
देखता आ रहा हूं
इन नंगी आंखों से
वह अब भी
जी रहा है और
खींच कर खुद को
ले जा रहा है
उस शाम तक
जिसमें डूब कर देख सके
फिर सपने कल के
डूब जाता है वह
और उसके सपने,
आते हैं सपने में
फावड़े, गैंती, कुदालें, हथौड़े
ईटें और गारा,
आते हैं सपने में
रात की बासी
रोटियों के टुकड़े और चटनी,
आते हैं सपने में ईंट के भट्टे,
और दोपहर
की बेदर्द तपिश,
आते हैं सपने में वे मालिक
जिनके शब्दों का खारापन
सूखा देता है
आंखों की नमी,
उनके शब्दों में
आती है बदबू
तुले हैं
नोच लेने पर आबरू
उतारू हैं
करने पर हत्या स्वाभिमान की,
नहीं जानती हैं
यह शब्द उसकी नस्लें,
मरना पड़ेगा भूखा
रहना होगा नंगा
हर दिन होना होगा मजबूर
क्योंंकि की थी कोशिशें
जानने की यह शब्द
और रहा था
असफल भी एक युग
फिर भी उसकी हंसी में
हंसता है आसमान
और चू पड़ता है
बारिश की बूंदों में
जीवन का यथार्थ
खेलते हैं मिट्टी में बच्चे
करने लगती हैं ईर्ष्या
तथाकथित सभ्य समाज की आंखें,
जलती ढिबरियों की
मरियल रोशनी से
लिपट पड़ता है रात का सूनापन
और हो जाती हैं कुंठित
कई तल्ला इमारतें,
उनके जलते चूल्हों
और फैलती रोटी की गंध
खींचती है
अहम से सिमट चुकीं बस्तियों को,
गाता है जब उनका समूह
तो थिरक उठती है धरती
करीब आ जाती हैं दिशाएं
झुक जाता है आकाश
भर देती हैं महक वन देवियां
करती हैं धन्य स्वयं को हवाएं
छूकर उन लोकगीतों को,
नहीं जाना पड़ता है
खोजने उसे आनंद
नहीं भागना पड़ता है
पीछे खुशियों के
वह तब भी गाता है
कराहता होता है जब तन
उठते हैं तब भी उसके पैर
जब लगते हैं
दो क़दम भी कई कोस
वह खुश है
क्योंंकि जीत लिया है
उसने हर दर्द को
वह खुश है क्योंंकि
सजा रहा है धरती
भर रहा है रंग
निखार रहा है अपनी कला
कर रहा है दुनिया को मजबूर
उसे स्वीकारने हेतु
तुम्हें स्वीकारना होगा
सोचना भी होगा
देना होगा जबाव
समय और समाज को,
केवल कुछ कहने से
नहीं है बदलने वाला कुछ भी
आओ करें कोशिशें
कि समझ सके
जीने के मायने
आओ करें कोशिशें
कि वे दे सकें
हर व्यवस्था को जबाव
आ सके करीब हर वो शख्स
जो घूरता आ रहा है सदियों से
आओ करें कोशिशें
अंधेरे से बाहर लाने की,
उगाने की सूरज हथेलियों पर
आओ करें कोशिशें
कि वो सकें मिलकर
मन की धरती में
खुशियों की फसलें,
करना होगा कोशिशें लगातार
इसलिए कहता हूं
उठो मजदूरों
कर रहा है समय इंतजार
उठो, आओ करें कोशिशें
जारी रखें संघर्ष यात्राएं
निकाल लें
फाड़कर आकाश को
तुम्हारा अपना कल
तुम्हारी अपनी सुबह
इसलिए कहता हूं
उठो मजदूरों
अपने बच्चों के
कल के लिए
अपने वर्तमान के लिए
करो कोशिशें
जारी रखो
करना होगा तुम्हें संघर्ष
आओ उठो
शीघ्र तैयार हो
नई कोशिशों के लिए
क्योंकि कम है समय,
इसलिए
आओ करें कोशिशें
जारी रखें कोशिशें
आओ करें कोशिशें।

@ पंकज मिश्र ‘अटल ‘
रोशन गंज, कुमरा गली, शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश)२४२००१, भारत


कर्म ही प्रधान है

अखंड है वसुंधरा, अखंड आसमान है,
रूकूँ नही थकूँ नहीं मैं, जब तलक ये प्राण हैं

ह्रदय में एक गान है, कर्म ही प्रधान है…
राहों की सारी अड़चनें, सब धूल के समान हैं

पंख मेरे हैं खुले, स्वतंत्र शंखनाद है
कदम कदम हूं चल रहा, सफर ये बेजुबान है

खोजता हूं चल रहा, कदम के जो निशान हैं
दिख रही हैं मंजिलें, पर लक्ष्य न आसान है

ह्रदय में मेरे एक कतरा, भय का विद्यमान है
ये संकटों की है घड़ी, विपत्तियां महान हैं

खड़ा रहूँगा मैं अडिग, ये मेरा स्वाभिमान है
ह्रदय में एक गान है, कर्म ही प्रधान है ।

उमेश पंसारी
युवा समाजसेवी, कॉमनवेल्थ लेखन पुरस्कार विजेता
पता – जिला सीहोर, मध्यप्रदेश
मो. 8878703926
Email – umeshpansari123@gmail.com

जियो और जीने दो

बहुत हो गई नफरत साथी प्रेमसुधा रस पीने दो
बहुत नाच ली मौत यहां अब जियो और जीने दो।

विश्वशान्ति का दुश्मन आये करो सिंह का गर्जन
द्वेषभाव ना रहे सफल हो जाय ज्ञान का अर्जन
विश्व सुखी हो जाय हमारे प्रेमभाव के दम से
चुपड़ी दोदो खाने की लत पाप कराये हमसे

रूखीसूखी खाकर यारों ठन्डा पानी पीने दो
जीवन सादा उच्च विचार जियो और जीने दो।

देश जाति और धर्म के लिये खूब हो लिये झगड़े
मानवता ने की पुकार अब स्नेहभाव हों तगड़े
वाणी सीधी सच्ची होतो शंका गई सहम कर
चाय जोश का रूप स्नेह का दूध मिला है जम कर

मेलजोल के भाव से साथी चाय गरम अब पीने दो
प्रेम सादगी लिये ह्दय मे जियो और जीने दो।

विश्व एक मधुशाला खूब पिलाने आती हाला
कुटिल निगाहों से घबराती डरती साक़ी बाला
मन मलिन जो धोकर आये समद्रष्टि जो पाले
चन्दासूरज साक़ी बन कर सोम चषक मे ढाले

बच्चन जी के साथ हमे भी जाम छकाछक पीने दो
सब को गले लगाओ यारों जियो और जीने दो।

-हरिहर झा
मेलबौर्न, आस्ट्रेलिया