गीत और ग़ज़लः प्राण शर्मा/ लेखनी-मई-जून 18

मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ
क्यों कर हो आज तुम उलटे तमाम काम
अपने दिलों की तख्तियों पे लिख लो ये कलाम
तुम बोओगे बबूल तो होंगे कहाँ से आम
कहलाओगे जहान में तब तक फकीर तुम
बन पाओगे कभी नहीं जग में अमीर तुम
जब तक करोगे साफ़ न अपना ज़मीर तुम
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ

ये प्रण करो कि खाओगे रिश्वत कभी नहीं
गिरवी रखोगे देश की किस्मत कभी नहीं
बेचोगे अपने देश की इज्ज़त कभी नहीं
जो कौमे एक देश की आपस में लडती हैं
कुछ स्वार्थों के वास्ते नित ही झगडती हैं
वे कौमी घास – फूस के जैसे ही सडती हैं
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ

देखो , तुम्हारे जीने का कुछ ऐसा ढंग हो
अपने वतन के वास्ते सच्ची उमंग हो
मकसद तुम्हारा सिर्फ बुराई से जंग हो
उनसे बचो सदा कि जो भटकाते हैं तुम्हे
जो उल्टी – सीधी चाल से फुसलाते हैं तुम्हे
नागिन की तरह चुपके से दस जाते तुम्हे
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ

चलने न पायें देश में नफरत की गोलियां
फिरकापरस्ती की बनें हरगिज़ न टोलियाँ
सब शख्स बोलें प्यार की आपस में बोलियाँ
जग में गँवार कौन बना सकता है तुम्हे
बन्दर का नाच कौन नचा सकता है तुम्हे
तुम एक हो तो कौन मिटा सकता है तुम्हे
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ

सोचो जरा, विचारो कि तुमसे ही देश है
हर गंदगी बुहारो कि तुमसे ही देश है
तुम देश को सँवारो कि तुमसे ही देश है
मिलकर बजे तुम्हारे यूँ हाथों की तालियाँ
जैसे कि झूमती हैं हवाओं में डालियाँ
जैसे कि लहलहाती हैं खेतों में बालियाँ
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ

सुराही से…

ज़िंदगी है, आत्मा है, ज्ञान है
मदभरा संगीत है औ’ गान है
सारी दुनिया के लिए ये सोमरस
साक़िया, तेरा अनूठा दान है

कौन कहता है कि पीना पाप है
कौन कहता है कि यह अभिशाप है
गुण सुरा के शुष्क जन जाने कहां
ईश पाने को यही इक जाप है।

क्या निराली मस्ती लाती है सुरा
वेदना पल में मिटाती है सुरा
मैं भुला सकता नहीं इसका असर
रंग कुछ ऐसा चढ़ाती है सुरा

क्या नज़ारे है छलकते प्याला के
क्या गिनाऊँ गुण तुम्हारी हाला के
जागते-सोते मुझे ऐ साक़िया
ख्वाब भी आते हैं तो मधुशाला के

साक़िया तुझको सदा भाता रहूं
तेरे हाथों से सुरा पाता रहूं
इच्छा पीने की सदा जिंदा रहे
और मयख़ाने तेरे आता रहूं

देवता था वो कोई मेरे जनाब
या वो कोई आदमी था लाजवाब
इक अनोखी चीज़ थी उसने रची
नाम जिसको लोग देते हैं शराब

मधु बुरी उपदेश में गाते हैं सब
मैं कहूं छुप-छुप के पी आते हैं सब
पी के देखी मधु कभी पहले न हो
खामियाँ कैसे बता पाते हैं सब

जब चखोगे दोस्त तुम थोड़ी शराब
झूम जाओगे घटाओं से जनाब
तुम पुकार उट्ठोगे मय की मस्ती में
साक़िया, लाता- पिलाता जा शराब

जब भी जीवन में हो दुख से सामना
हाथ साक़ी का सदा तू थामना
खिल उठेगी दोस्त तेरी जिंदगी
पूरी हो जाएगी तेरी कामना

बेझिझक होकर यहां पर आइए
पीजिए मदिरा हृदय बहलाइए
नेमतों से भरा है मधु का भवन
चैन जितना चाहिए ले जाइए

मैं नहीं कहता पियो तुम बेहिसाब
अपने हिस्से की पियो लेकिन जनाब
ये अनादर है सरासर ऐ हुज़ूर
बीच में ही छोड़ना आधी शराब

नाव गुस्से की कभी खेते नहीं
हर किसी की बद्दुआ लेते नहीं
क्रोध सारा मस्तियों में घोल दो
पी के मदिरा गालियां देते नही।

बेतुका हर गीत गाना छोड़ दो
शोर लोगों में मचाना छोड़ दो
गालियां देने से अच्छा है यही
सोम-रस पीना-पिलाना छोड़ दो

प्रीत तन-मन में जगाती है सुरा
द्वेष का परदा हटाती है सुरा
ज़ाहिदों, नफ़रत से मत परखो इसे
आदमी के काम आती है सुरा

बिन किए ही साथियों मधुपान तुम
चल पड़े हो कितने हो अनजान तुम
बैठकर आराम से पीते शराब
और कुछ साक़ी का करते मान तुम

ज़ाहिदों की इतनी भी संगत न कर
ना- नहीं की इतनी भी हुज्जत न कर
एक दिन शायद तुझे पीनी पड़े
दोस्त, मय से इतनी भी नफ़रत न कर

मस्तियाँ दिल में जगाने को चला
ज़िंदगी अपनी बनाने को चला
शेख जी, तुम हाथ मलते ही रहो
रिंद हर पीने- पिलाने को चला

दिन में ही तारे दिखा दे रिंद को
और कठपुतली बना दे रिंद को
ज़ाहिदों का बस चले तो पल में ही
उँगलियों पर वे नचा दें रिंद को

पीजिए मुख बाधकों से मोड़कर
और उपदेशक से नाता तोड़ कर
जिंदगी वरदान सी बन जाएगी
पीजिए साक़ी से नाता जोड़कर

मधु बिना कितनी अरस है जिंदगी
मधु बिना इसमें नहीं कुछ दिलक़शी
छोड़ दूं मधु, मैं नहीं बिल्कुल नहीं
बात उपदेशक से मैंने ये कही

मन में हल्की-हल्की मस्ती छा गई
और मदिरा पीने को तरसा गई
तू सुराही पर सुराही दे लुटा
आज कुछ ऐसी ही जी में आ गई

खोलकर आंखें चलो मेरे जनाब
आजकल लोगों ने पहने है नकाब
होश में रहना बड़ा है लाज़िमी
दोस्तों, थोड़ी पियो या बेहिसाब

ओस भीगी सी सुबह धोई हुई
सौम्य बच्चे की तरह सोई हुई
लग रही है कितनी सुंदर आज मधु
मद्यपों की याद में खोई हुई

मस्त हर इक पीने वाला ही रहे
ज़ाहिदों के मुख पे ताला ही रहे
ध्यान रखना दोस्तों इस बात का
नित सुरा का बोलबाला ही रहे

– प्राण शर्मा

जन्म 13 जून 1937 वजीराबाद अब पाकिस्तान
मृत्यु 24 अप्रैल 2018 , कवेन्ट्री इंगलैंड