बहुत कुछ कहती है घाटी चिनारों की-उर्मिला शुक्ल

मरकर स्वर्ग जाने की तमन्ना तो कभी थी नहीं, मगर जीते जी स्वर्ग जाने की इच्छा तब से थी, जब से मन ने सौन्दर्य बोध को जाना, पहचाना और उससे दोस्ती की । बार-बार मन होता कि धरती के उस स्वर्ग को देखा जाय, जिसे अब तक मैनें सिर्फ फिल्मों में ही देखा था और उसके सपने बुन थे । मगर मन में सौन्दर्य बोध के जन्म लेते ही वहाँ के हालात कुछ ऐसे बदले कि जाना हो ही नहीं पाया और लगा कि ये सपना बस सपना ही रह जायेगा ।
फिर धरती के इस स्वर्ग के हालात और बदहाल हुए । बारूदी गंध, केसर की रंगत को आच्छादित करने लगी और चिनारों की घाटी में खिजा का मौसम पसरने लगा ।कश्मीर अब भी वही कश्मीर था, मगर अब वह लोगों को अपनी ओर खींचता नहीं था बल्कि एक भय का संचार करता था । ऐसे हालात में कश्मीर का आर्थिक आधार पर्यटन भी खत्म हो चला था और वहाँ के हस्तकारों को घाटी से अन्य प्रान्तों में फेरी लगाकर अपना शिल्प बेचने पर विवश होना पड़ा ।
कुछ वर्ष पहले ऐसे ही फेरी वाले से मेरा परिचय हुआ था । कश्मीरी कसीदाकारी के शाल, स्वेटर, सलवार सूट और साड़ियों का गट्ठा लिये वह मेरे द्वार पर कुछ ले लेने की मनुहार कर रहा था । मैंने उसे गौर से देखा और मीड़िया से उड़कर आती अनेक खबरें जेहन में कौंध गयीं । मन में कुछ पल को भय जगा, फिर उसे पीछे ठेल मैंने गेट खोल दिया । उससे सलवार सूट खरीदते हुए मैंने घाटी के हालात का जिक्र किया । वहाँ फैले आतंकवाद की बात चलाई, तो उसका चेहरा बदलने लगा और गोरी रंगत तांबाई सी हो चली । बहुत देर बाद उसने कहना शुरू किया- ’’ मैडम जी घाटी के हालात् उतने भी बुरे नहीं है, जितना बताया जा रहा है । हाँ कभी-कभी बारदातें होती हैं, मगर हर जगह नहीं । मगर लोगों से होकर आती बातें बाहर गहरा असर डालती हैं और नतीजा आपके सामने है । हमारी चार-चार दुकानें थीं, हाउस बोट थे मैडम जी । अपने यहाँ हम भी रईस हुआ करते थे और अब सब आपके सामने है । ’’ कहते हुए उसके चेहरे पर क्षण भर को उदासी सी उतर आयी थी । मगर उसने उदासी पोछते हुए कहा – ’’ मैडम जी आप आइये । हम आपको कश्मीर घुमायेंगे, आप आइयेगा जरूर । जब आयेंगी तभी तो सही बातें सामने आयेगी ’’ कहकर उसने अपना कार्ड दिया ।

मैंने हाँ कहा । बाद में कुछ मन भी बनाया, मगर, रोज-रोज आती कश्मीर की खबरों ने मन को डॉंवाडोल किया और वहॉं जाने का इरादा टल गया । मगर मन बार-बार उधर ही भागता रहा । मैं अकसर सोचा करती कि क्या कभी वो दिन आयेगा जब केसर की रंगत और चिनारों की लहक के साथ-साथ ललद्यद और दीनानाथ नादिभ की भूमि से रूबरू हो पाऊँंगी। और कहते हैं न जहाँ चाह होती है, वहाँं राह भी मिलती है मुझे भी राह मिल गयी । अवसर था हिन्दी भाषा संगम इलाहाबाद और कश्मीरी भाषा संगम की संगोष्ठी का ।
यह संगोष्ठी भारतीय संत परम्परा पर केन्द्रित थी और पश्चिम बंगाल के ग्रुप के साथ मुझे जाना था । तय किया गया था कि सभी क्षेत्र के लोग जम्मू पहुंँचेंगे और वहाँ से श्रीनगर तक बस से एक साथ यात्रा की जायेगी । मगर होते-होते ये हुआ कि लगभग सभी ने सीधे श्रीनगर तक की हवाई यात्रा को प्राथमिकता दी । मगर मुझे तो हिमालय का कश्मीरी सौन्दर्य देखना था, जवाहर सुरंग से होकर गुजरना था ; सो मैंने सड़क मार्ग से ही यात्रा करने का निर्णय लिया । मेरे साथ डाँ. रामचंद्र राय, सुश्री वर्षा राय (शांति निकेतन), नलिनी पुरोहित और उषा जडेजा गुजरात से थीं । यात्रा की तारीख, समय सब कुछ तय था, जम्मू तक रिजर्वेशन भी हो चुका था । मगर बिगड़ते मौसम के चलते नलिनी जी ने जोर दिया कि जम्मू से श्रीनगर हवाई यात्रा ही की जाय । सो मन मारकर मुझे भी हवाई यात्रा का विकल्प ही स्वीकारना पड़ा । रायपुर से दिल्ली तक समता एक्सप्रेस, फिर दिल्ली से जम्मू तक का सफर झेलम एक्सप्रेस से प्रारंभ हुआ ।
भोर होते-होते गाड़ी पंजाब को पीछे छोड़ चुकी थी । अब दृश्य बदल रहे थे । टेªन की खिड़की से नजर आते गाँव और शहर भी कुछ अलग से लग रहे थे, खासकर उनकी बसाहट । गाँव विरल थे और खेतों में धान और मक्के की फसलें लहलहा रही थीं । इधर के शहरों के घरों की बनावट भी कुछ अलग थी और जो चीज सबसे अलग नजर आ रही थी वह थी घरों के ऊपर स्थित सीमेंट की पानी की टंकियाँ । उनका आकार कहीं घड़े की तरह था, तो कहीं सुराही की तरह । आज जब पूरे देश में सिनटेक्स या अन्य किसी कम्पनी की प्लास्टिक की टंकियाँ अपने पैर पसार चुकी हैं, ऐसे में इन्हें देखकर सुखद लगा । प्लास्टिक सुविधाजनक तो है मगर इसके दुष्परिणाम भी बहुत हैं, मगर हम इस विषय में कहॉं सोचते हैं ? हमे तो बस सुविधा चाहिए ।

पठानकोट आते ही मोबाइल से नाता टूट गया । पहले से मालूम था कि जम्मू-कश्मीर में प्रीपेड मोबाइल काम नहीं करता, सो कोई आश्चर्य नहीं हुआ । कुछ लोगों ने पोस्टपेड नम्बर ले लिया था, मगर मुझे लगा कि कुछ दिन बिना मोबाइल के रहा जाय। हलांकि यह निर्णय बहुत महँगा पड़ा, कुछ बहुत जरूरी फोन नहीं आ पाये । बाद में लोगों को बहुत से स्पष्टीकरण भी देने पड़े ।
जम्मू पहुंचकर नलिनी पुरोहित और उषा जडेजा जी से मुलाकात हुई और हमने जम्मू से श्रीनगर की उड़ान भरी । उड़ान भरते तक मन में एक कसक थी कि क्योंकि मैं जम्मू कश्मीर घाटी के उस अनुपम सौन्दर्य से वंचित हो रही थी मगर जैसे ही जहाज ने उड़ान भरी, एक नवीन और अनुपम सौन्दर्य मेरी आँखों में उतरने लगा था । जम्मू शहर और उसके इर्द-गिर्द गलबहियाँ डाले हिमालय की छोटी बड़ी चोटियाँ अब नीचे छूट रही थीं, और जम्मू किसी नये बसने वाले शहर के मास्टर प्लान के नक्शे सा नीचे पसरा हुआ था । उड़ान अब कुछ और ऊँची हो चली थी और हम बादलों में प्रवेश कर रहे थे । और मेरी आँखों में बादलों का एक समंदर लहरा उठा था । छोटे-बड़े गुच्छों में बादलों के अनेक रूप रंग मौजूद थे वहाँ । कुछ भूरे, कुछ कपसीले बादल ऐसे बिखरे हुए थे, मानो सहस्त्रों रजाइयों की रूई धुनी गई हो । जहाज के ऊपर और नीचे बादल ही बादल । बीच-बीच में हिमालय की चोंिटयाँ भी झलक उठती थी, कहीं उनके सिरों पर मंडराते बादल उन्हें छतरी उढ़ा रहे थे ; तो कहीं बादल उसके कन्धे पर सवारी भी कर रहे थे । हिमालय का यह सौन्दर्य आँखों के रास्ते मन में उतर ही रहा था कि- ’’ हम श्रीनगर पहुँचने वाले हैं । सभी यात्री अपने बेल्ट बाँध लें । ’’ के उद्घोष ने सचेत किया । अब हम नीचे उतर रहे थे । चारों ओर पहाड़ों से घिरा, एक थाल सा श्रीनगर नीचे पसरा था और उसके भीतर का सारा मंजर माचिस की डिब्बियों सा नजर आ रहा था । मगर जैसे-जैसे हम नीचे उतरे, उनका आकार बदलने लगा और हमारा विमान श्रीनगर हवाई अडडे पर उतर गया ।
अब हम श्रीनगर में थें । चारों ओर पहाड़ों से घिरी और चिनारों से भरी-भरी एक खूबसूरत घाटी, शिवालिक की पहाड़ियाँ, उसके चारों ओर चिनार, देवदार, चीड़ और फड़ के घने जंगल और बीच में फैली डल झील । पूरे श्रीनगर को अपने में समेटती यह झील, मुझे भोपाल ताल की याद दिला रही थी । यूँ तो इसमें और भोपाल ताल में एक बात के सिवा और कोई समानता नहीं है और वह है इनका अपने शहर की पहचान बन जाना । भोपाल भी तो अपने ताल के कारण जाना जाता है । और डल तो श्रीनगर की पहचान ही है ।
हमारे रुकने की व्यवस्था, हमारी सुरक्षा के दृष्टिकोण से राजभवन के पास एक अतिथि गृह में की गयी थी । लगभग आधे घंटे में हम वहाँ पहुँच गये । बहुत ही सुन्दर जगह थी । हमारे तीन तरफ अपनी ऊँचाईयों से आकाश को चूमती शिवालिक की चोटि़याँ और वहाँ से कुछ दूर मगर, अपनी गहराईयों में मगन डल झील । उसकी झलकियाँ मन को विभोर कर रही थी । वहाँ अन्य प्रान्तों से आये विद्वानों से मुलाकात हुई । अरुणाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, केरल, कर्नाटक और महाराष्ट्र के साथ-साथ हमारे अपने मध्य प्रदेश से आये अनेक विद्धवान मौजूद थे ।
अतिथि गृह के उस परिसर में चिनार ही चिनार थे । नये और पुराने चिनार । सबसे ऊँचाई पर एक चबूतरे से घिरा एक पेड़ अपने भीतर डेढ़ सौ वर्षों का इतिहास समेटे था । हम उसी के इर्द-गिर्द बैठ गये । वहाँ से डल झील की झलक हमें लुभा रही थी, मगर नीचे जाने की मनाही थी । हम बन्दूकों के साये में थे । रात घिरने लगी और धीरे-धीरे पहाड़, झील और जंगल सब कुछ अँधेरे में सिमट गये ।
दूसरे दिन प्रथम सत्र में माननीय राज्यपाल एम.एन. वोहरा ने कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए प्रमुख अतिथियों का सम्मान किया । दूसरे सत्र में विषय पर आधारित संगोष्ठी थी । विभिन्न प्रान्तों से आये प्रतिनिधियों ने अपने-अपने प्रान्त के संत साहित्य पर अपने आलेख पढ़ें । मैंने छत्तीसगढ़ के संत साहित्य पर अपना आलेख पढ़ा और डॉ. विद्या बिन्दु सिंह जी का यह भ्रम भी दूर किया कि गुरु घासीदास जी का जन्म बाँदा में हुआ था । मैंने गुरु घासीदास जी की जन्म स्थली गिरौदपुरी का विवरण दिया । दो दिनों तक चली इस संगोष्ठी में कश्मीर की संत कवियत्री ललद्यद से लेकर बंगाल के बाउल गीत, मलयालम और कन्नड़ के संत साहित्य पर आलेख पढ़े गये ।
संगोष्ठी स्थल तो सुरक्षा के घेरे में था । मगर शहर में लगातार घटनायें हो रही थीं । लाल चौक में किसी दिन एक, तो किसी दिन एक से अधिक लोगों के मारे जाने की खबरें आ ही जाती थीं । इसी दिन निशांत बाग में जुबिन मेहता का कार्यक्रम था, जिसके विरोध का स्वर भी उठ रहा था, अजीब सा माहौल था एक ओर तो हम सब साहित्य और मानवता की बातें कर रहे थे और दूसरी ओर मनुष्यों की हत्या हो रही थी । फिर भी ? कार्यक्रम की विशेष उपलब्धि कश्मीर के साहित्यकारों से मुलाकात रहीं । उनसे मिलकर कश्मीर को समझने का अवसर मिला । कश्मीरी, हिन्दी के लेखक निंदा नवाज, सतीश, विमल । कश्मीर विश्वविद्यालय की प्राध्यापक दिलसाद जिलानी जी एवं कश्मीरी रेडियो से जुड़ी नसरीन से मिलना सुखद रहा । नसरीन, रेडियो कश्मीर से जुड़ी हैं । उनसे कश्मीर की स्थिति पर भी बात हुई । बातचीत के दौरान वहाँ लड़कियों की स्थिति, उनकी शिक्षा का प्रसंग छिड़ा और यह जानकर अच्छा लगा कि वहाँ लड़कियाँ अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाने में अग्रणी हैं । खासकर उन परिवारों की लड़कियाँ, जिनके परिवार आतंक और कट्टरवाद् का कहर झेल रहे हैं ।
अगले दिन सुबह-सुबह पहलगाम जाने का कार्यक्रम था, मगर निकलते-निकलते बारह बज गये थे । श्रीनगर से कुछ आगे बढ़ते ही पहाड़ पीछे छूट चले थे । धान के बड़े-बड़े खेत नजर आ रहे थे, मक्के के खेत भी थे । कहीं-कहीं खाली जमीन भी नजर आ रही थी । बस चालक मोहम्मद आरिफ ने बताया कि ये केसर के खेत हैं, मौसम में यहाँ केसर की खेती होती है । फिर कुछ आगे जाकर मक्के और धान के खेत पीछे छूट चले और हिमालय की ऊँची-ऊँची चोटियाँ फिर पास आने लगीं । मगर हम सब की चाहत थी, सेब का बगीचा । यह सेब का मौसम भी था । मोहम्मद आरिफ ने बताया था कि पहलगाम के रास्ते में सेब के असंख्य बगीचे मिलेंगे, हमें उसी का इंतजार था और फिर सेब के पेड़ नजर आने लगे । पहले इक्का-दुक्का किसी-किसी घर में । और फिर शुरु हुआ बड़ें बगीचों का सिलसिला, जहाँ सड़क के दोनों तरफ, पेड़ों पर लदे कच्चे-पक्के सेब के गुच्छे । अब हम सेब के बगीचों के बीच से गुजर रहे थे । और फिर हमारे आग्रह पर हमारी गाड़ी रुकी ।
हदे निगाह तक सेब के घने बगीचे । बस से उतरते ही सब के सब बगीचों में घुस गये । बगीचे की रखवाली करने वाले लोगों ने सहयोग दिया और साथ ही ताकीद की कि सेब न तोड़े, गिरे हुए सेब जरुर उठा लें । मगर इन्सान की फितरत ! हममें से एक सज्जन ने सेब तोड़ लिये और उन्हें एक सेब का पचास रुपये हर्जाना देना पड़ा । हम लोगों ने बगीचे से गिरे हुए सेब उठाये । ताजे, सुन्दर और इतने रसदार सेब, कि दाँत गड़ाते ही रस चू पड़ा। याद आया अपने शहर में बिकने वाला रस विहीन सेब । जी भरकर सेब खाकर हमारा काफिला आगे बढ़ चला । रास्तें में छोटे-छोटे गाँव आते रहे । स्कूल से लौटते बच्चे, जिनमें लड़कियाँ ही अधिक थी। कोई हमें देखकर मुस्कराती, कोई खिल-खिलाकर हाथ हिलाती, बला की खुबसूरत कश्मीरी लड़कियाँ । मन को तसल्ली हुई चलो बच्चे पढ़ तो रहे है मगर गाँव की औरतों और युवतियों के चेहरे पर गहरी उदासी भी नजर आयी ।
अब हमारी बस अखरोट और अंजीर के जंगल से गुजर रही थी । सड़क के किनारे-किनारे अखरोट के पेड़ और उसमें फले हुए हरे-हरे अखरोट । कहीं-कहीं लोग अखरोट तोड़कर झाबे में इकट्ठा कर रहे थे, तो कहीं उसका छिलका उतार कर उसे रोड पर हीं सुखा रहे थे । हम फिर रुके, कच्चे अखरोट के लिये । सड़क के किनारे कुछ युवक बाँस से अखरोट तोड़ रहे थे और महिलायें उसे बीनकर झाबे में रख रहीं थीं । मैंने एक युवती से एक अखरोट माँगा, तो वो बोली कुछ नहीं मगर मुझे आश्चर्य से देखने लगी । शायद उसे मेरी भाषा समझ में नहीं आयी । यही हाल मेरा भी था । उसका साथी युवक मुझसे कुछ कह रहा था । मगर मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था । तभी एक युवक ने झाबे से दो अखरोट निकाले और मेरे हाथों पर रख दिये । हरे-हरे कच्चे अखरोट । मैंने उसके हरे छिलके उतारे तो उसमें से हल्के भूरे रंग का अखरोट निकल आया । उसे तोड़ने का कोई साधन न था, सो उसे पर्स में डाल लिया, जो रायपुर तक मेरे साथ आया ।
हम फिर चल पडे़ ! अब सड़क और घुमावदार हो चली थी । जंगल भी अपना रंगरुप बदल रहा था । पहले अखरोट और अंजीर के जंगल, फिर उससे ऊपर चीड़ के और सबसे ऊपर देवदार के जंगल । हम जैसे-जैसे ऊँचाईयों पर जा रहे थे, देवदार के वन और सघन हो रहे थे । अपनी बाँहें फैलाये, हर आने वाले को अपने आगोश में भर लेने को आतुर, देवदार। चढ़ाई और चढ़ाई । फिर चढ़ाई चढ़ने के बाद अब उतराई थी वैसे ही तीखे मोड़ अब देवदार के वन पीछे हो चले थे । छोटे-छोटे गाँवों से गुजरते अब हम पहलगाम के करीब थे। दिन का दूसरा पहर था । शाम सी उतरने लगी थी । पहाड़ों पर तो वैसे भी दिन जल्दी ही ढलता है ।
पहलगाम । हिमालय की ऊँची-ऊँची चोटियों से घिरा लिद्दर नदी के संग बहता सुन्दर शहर । पहलगाम आते ही लिद्दर की कलकल ने मन मोह लिया था । हमारे पहुँचते ही घोड़े वालो के हुजूम ने हमें आ घेरा । सवारियों के लिये आपस में लड़ते-भिड़ते कश्मीरी युवक । गरीबी और बेकारी की मार झेलते ये युवा आपस में ही उलझने लगे थे । हर कोई चाह रहा था कि सवारियाँ उसके साथ चलें । सभी मिनी स्वीटजरलैंड दिखाने की बात कर रहे थे, मगर वहाँ का किराया अधिक था । हमारे पास समय भी कम था सिर्फ आधे घंटे, सो अधिकांश लोगों ने नीचे नीलकंठ मंदिर और लिद्दर के किनारे घूमने का फैसला किया । मगर मैंने और नलिनी जी ने उस मिनी स्वीटजरलैंड को देखने का फैसला किया । यूँ तो मैंने भारत में कई जगह मिनी स्वीटजरलैंड देखा था । हिमांचल प्रदेश में कई जगह ऐसी हैं, जिन्हें मिनी स्वीटजरलैंड कहा जाता है । घोड़े पर बैठने का भी कोई शौक नहीं था, मगर घोड़े वालो की आपसी खींचतान, सवारियों के लिये उनकी जद्दोजहद देखकर मैंने फैसला किया कि मुझे जाना ही चाहिये ; वहाँ तक, जहाँ तक इनका घोड़ा जाता है । ताकि इसी बहाने इस आफ सीजन में इनकी कुछ मदद हो सके । वैसे भी इनकी जीविका पर्यटन ही तो है ; जो कुछ ही महीनों का होता है । बाकी समय वही खालीपन और खालीपन तोड़ता है । कभी खुद को, तो कभी समाज की व्यवस्था को । हमने और नलिनी जी ने घोड़े ले लिये । घोड़े लेते ही फोटो वालों ने घेर लिया और पास में कैमरा होते हुए भी हमने उनसे फोटो भी खिंचाई ।
अब हमारे घोड़े चढ़ाई की ओर बढ़ चले थे । हमें लगा था कि हमारे साथ दो घोड़े वाले चलेंगे, मगर एक ही व्यक्ति दोनों घोड़ों को नियंत्रित कर रहा था । हमें डर लगा और हमने माँग की कि वो किसी और को भी अपने साथ ले ले । ‘‘ मैडम जी आप डरो नई । ये अमारा रोज का काम है । अम पन्दरा साल से ये काम करता । “ उसने हमें आश्वस्त तो किया ; मगर हमारा डर गया नहीं । खड़ी चढ़ाई थी और रास्ता बहुत सँकरा था । हर मोड़ पर मन काँप-काँप जाता । ‘‘मैडम जी आप घोड़े को नइ, नजारा देखो, तो डर नइ लगेगा ।” और मैंने देखा कि मेरे दोनों ओर अपार सौन्दर्य बिखरा पड़ा था और मैं अपने भय मे ही डूबी थी । अब मैने उसकी बात मान ली थी । मैंने देखा देवदार के घने वनों से होकर गुजरती पतली सी सर्पाकार पगडंडी के दोनो ओर देवदार के ऊँचे-ऊँचे वृक्ष थे और नीचे पगडंडी के आर-पार जाती उनकी जड़े एक अलग ही सौन्दर्य रच रही थीं । कहीं-कहीं तो ये जड़े एक दूसरे में उलझ कर अनोखे दृश्य भी बना रही थीं । एक पेड़ की जड़ें उभर कर उसी पेड़ के इर्द-गिर्द ऐसे लिपट गयी थीं, मानों शेषनाग ही कुंडली मार कर बैठा हो ।
जिस घोड़े पर मैं थी उसका नाम बादशाह था और वह आगे चल रहा था । नलिनी जी के घोड़े का नाम राजा था और वह पीछे चल रहा था । घोड़े वाला हम दोनों के बीच में था । अब मैंने नीचे, रास्ते को देखना बंद कर दिया था और उस अनुपम सौन्दर्य में डूब चली थी । अब तक देखी फिल्मों के कई दृश्य आँखों में उतर आये थे और जो दृश्य आँखों में ठहर गया था वह था “ जब जब फूल खिले ” का दृश्य । घोड़े पर सवार नंदा और घोड़े की बाग थामें शशि कपूर । तभी नलिनी जी ने कहा-“उर्मिला जी कुछ याद आया -‘‘ एक था गुल और एक थी………..। ‘‘ इसमें कोई आश्चर्य नहीं था कि हम दोनों एक ही स्तर पर सोच रहे थे । यह तो प्रकृति के इस सौन्दर्य और फिल्म का कमाल था कि हमारी सोच एक ही धरातल पर ठहर गयी थी । अब हम और ऊपर की ओर बढ़ रहे थे और अब रास्ता बहुत ही संकरा हो चला था । इतना कि उधर से लौटती सवारियाँ सामने आतीं, तो लगता कि अब घोड़े जरुर टकरा जायेंगे । मगर घोड़े वाले के टूह-टूह कहते ही घोड़े सधी चाल से, जरा हट कर राह बदल कर आगे बढ़ जाते । मैंने घोड़े वाले से पूछा कि ऐसे आमने-सामने आ जाने पर ये आपस में लड़ते नहीं हैं । “ नई मेडम जी । ये इंसान थोड़े न हैं । ” और उसकी बात मन में गहरे तक उतर गयी थी । कितनी सच्चाई थी इस छोटे से वाक्य में ।
फिर वह बड़ी सहजता से अपने और सैलानियों से जुड़े किस्से सुनाने लगा । एक मोड़ पर आकर राह कुछ चौड़ी हो गई थी । वहाँ बंजारों का डेरा था । बहुत सी भेड़े चर रही थीं, कुछ औरतें और लड़कियाँ लकड़ियाँ चुन रही थीं और कुछ खरगोश के बच्चे लियंे सैलानियों को घेर रही थीं कि वे खरगोश के साथ फोटो खिंचा लें, ताकि उन्हें पैसे मिल सकें। एक लड़की ने हमें भी घेरा । घोड़े वाले ने भी घोड़े रोक दिये, मगर हमें देर हो रही थी, इसलिए हम लौटते समय रुकने का वादा करके आगे बढ़ गये ।
और कुछ देर बाद हम मिनी स्वीटजरलैंड में थे । उसने घोड़े को रोका और हमें बड़ी सहजता से उतारा । हमारे नजरों की सीमा तक चारों ओर आकाश छूती चोटियाँ थीं, देवदार के जंगल थे और बीच में था हरा भरा घास का मैदान । ऊपरी चोटियों की बर्फ पिघल चुकी थी, मगर उनके बीच-बीच में अटके बादल बर्फ का आभास दे रहे थे । कुल मिलाकर दृश्य बहुत सुन्दर था । सर्दियों में जरुर यह स्थान मिनी स्वीटजरलैंड ही लगता होगा ।
लौटते समय और भी बहुत सी बातें बतायी थीं उसने । अब वह हमसे खुल चला था। मैंने उससे कोई कश्मीरी लोकगीत सुनाने का आग्रह किया, तो उसने कहा कि कोई कश्मीरी लोकगीत तो उसे आता ही नहीं । हाँ फिल्मी गीत जरुर सुना सकता हूँ और फिर वह “ भुंबरो भुंबरो श्याम रंग भुंबरो ” गाने लगा था । और मैं सोच रही थी कि हमारा लोक, जो कभी इतना समृद्ध था । अब लुप्त हो रहा है । कश्मीर ही नहीं, देश के हरेक प्रांत से। लोकगीतों और लोक भाषाओं का इस कदर विलुप्त होना चिन्ता का विषय है । मगर आज इसकी चिन्ता किसे है ? पढ़े-लिखे और बुद्धिजीवी कहे जाने वाले लोग ही अपने लोक से कट रहे हैं, ऐसा नहीं है । हमारे गाँव भी इसकी गिरफ्त में है । कहीं ये भूमंडलीकरण की मार हमारी संस्कृति को निगल न ले । देर तक सोचती रही मैं ।
फिर ये घोड़ों का धंधा ‘‘ तुम्हारा पुश्तैनी धंधा है ?
जीं ! मेरे अब्बा भी घोड़े चलाते थे । उन दिनों तो अच्छी कमाई हो जाती थी । मगर अब तो सीजन में भी हम अकसर खाली ही रहते हैं । ‘‘
‘‘ फिर कोई और काम क्यों नहीं करते ?
“ कौन सा काम मैडम जी । यहाँ और काम ही क्या है ? यहाँ तो कुदरत भी साल में एक बार ही मेहरबान होती है । यहाँ के खेत एक ही फसल देते हैं । यहाँ के पेड़ भी साल में एक बार ही फलते हैं । आप लोग भी तो सीजन में एक ही बार आते हो । कहते हुए उसकी आँखों में उदासी सी तिर आयी थी ।
“ कितनी पढ़ाई की है तुमने ? मैंने पूछा –
चार क्लास ”
“ बस ! मगर आज के जमाने में चार क्लास तो कुछ भी नहीं है । आगे क्यों नहीं पढ़ें ? ”
‘‘ कैसे पढ़ते मेडम जी ! अम पढ़ते तो घर का करचा कैसे चलता । अमारे गाँव में कोई नहीं पढ़ता । सब तीन-चार क्लास तक पढ़ लेते हैं बस । ‘‘
‘‘ क्यों ? आगे पढ़ने का मन नहीं करता ? पढ़ लिख कर अच्छी नौकरी करने का तुम्हारा मन नहीं होता ? ‘‘ अब वह खामोश हो गया था । उसने मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया था । मगर उसकी आँखें दूर जंगल में कुछ टटोल रहीं थीं । मैं कुछ ऐसा न पूछ बैठूँ, जो नहीं पूछना चाहिए – ये सोचकर नलिनी जी ने मुझे आवाज दी । मैंने पलटकर पीछे देखा, तो उनकी आँखें मुझे बरज रही थीं । मैंने फिर कुछ नहीं पूछा था । मगर उसकी आँखों में उतर आये जंगल ने मुझे देर तक परेशान किया । कितना त्रासद है। ये प्रकृति का अकूत वैभव और इनकी आँखों में ऐसा सूनापन । मगर प्रकृति का सौन्दर्य भी तो तभी मोहता है जब तन मन तृप्त हो । मेरी आँखों में श्रीनगर से लेकर पहलगाम तक का मंजर घूम रहा था । पूरे रास्ते एक भी बड़ा व्यवसायिक परिसर नहीं मिला था । बस छोटे-छोटे उद्योगों के निशान ही नजर आये थे, जिनमें लकड़ी और पत्थर का काम होता था । आज के इस भौतिकवादी युग में यह नाकाफी है । तभी तो ? मगर कोई सोचता कहाँ है । तभी ……………?
अब मेरा ध्यान प्रकृति के उस अनुपम सौन्दर्य से हट गया था । मैं उन परिस्थितियों पर ठहर गयी थी, जिन्होंने इस स्वर्ग को ग्रस लिया है । मेरा मन हुआ कि आगे कुछ और पूँछू मगर – “ मैडम जी आप वहाँ किसी से आतंकवाद के बारे में मत बात करना । ये सब के सब आतंकी हैं ”- अतिथि गृह के पास रहने वाली महिला ने चेताया था । वह कश्मीरी ब्राम्हण थी । जो जम्मू में रहती थी, मगर जन्मभूमि उससे छूट नहीं पा रही थी, सो बीच-बीच में आ जाया करती थी । मुझसे कहते हुए उसकी आँखों में सूनापन के साथ-साथ एक चिनगी भी थी । कितना त्रासद होता है विस्थापन, यह उसकी आँखों से झलक रहा था । सोचते हुये मैंने घोड़े वाले युवक को गौर से देखा सीधा-साधा लगा था मुझे । क्या सचमुच ये आतंकवादी होगा । सोचा मैंने । और है भी, तो क्या दोष केवल इसीका है ।
‘‘ लो मैडम जी । आपका ठिकाना आ गया । कहते हुए वो अब सामान्य था । उसके चेहरे पर कोई आक्रोश या तनाव का चिन्ह नहीं था । हम बस स्टैण्ड पर आ चुके थे । जहॉ हमारी बसें पार्क थीं । मैंने उसे घोड़े का किराया दिया तो – ‘‘ और अमारा बकशीश । ‘‘ उसके बोलने क ढंग ऐसा था कि मैं अपनी उन चिन्ताओं में भी मुस्कारा उठी थी । और उसे पच्चास रूपये और दिये । यहाँ से हमें मटन जाना था । नाम सुनकर अजीब लगा । पूछा भी मगर कोई इस नाम का कारण नहीं बता पाया ।
अब रास्ते के दोनों ओर गहरा अंधेरा था । बीच-बीच में छोटे -छोटे गाँव आते, तो रोशनी की झलक सी मिलती । हमारी बस अंधेरे को चीरती आगे बढ़ रही थी । मटन आते-आते सात बज चुके थे । मंदिर परिसर में प्रवेश करते हुए एक जलकुंड नजर आया, वहाँ हाथ-पैर धोकर हम आगे बढ़े, तो आगे दूसरा कुंड था । यह पहले कुंड से कुछ बड़ा था । और आगे बढ़ने पर एक और कुंड था, जो चारों ओर दीवारों से घिरा था, और दीवार पर लिखा था – यहाँ अपने पितरों का श्राद्ध करें । पहले के जमाने में इतनी दूर से गया जाना शायद संभव नहीं रहा होगा । इसीलिए यह वैकल्पिक व्यवस्था की गयी होगी । सोेचते हुए सबके साथ-साथ मैं भी आगे बढ़ती रहीं । अब हमारे सामने कुछ सीढ़ियों के पार ऊँचाई पर सूर्य मंदिर था । श्वेत घोड़ों से जुता रथ, हमें नीचे से ही नजर आ रहा था । यानि मार्तण्ड मंदिर और मन में ’मटन’ का अर्थ खुलने लगा । मार्तण्ड से मतंड और फिर होते होते मटन हुआ होगा । भाषा विज्ञान इसे ही मुख सुख कहता है । मंदिर से होकर हम गुरूद्वारे पहुँचे । उस समय वहाँ लंगर में चाय और मठरी मिल रही थी । अब तक सभी को चाय की तलब भी हो आयी थी, सो चाय और मठरी का आस्वाद लेकर हम फिर चल पड,़े श्रीनगर की ओर । श्रीनगर पहुँच कर खरीदारी की बारी आयी । हम लोग कहीं जायें और खरीदारी न करें यह तो संभव ही नहीं है, सो हमारी बस फिर एक मेवे की दुकान पर रूकी और सबने अखरोट, बादाम और कहवा खरीदा । और ठगे भी गये वैसे ही जिस तरह देश के हर प्रांत में बाहरी लोगों को ठगा जाता है । यहाँ भी हमें ठगा गया और तीन सौ रूपये किलो मिलने वाला मामोरी बादाम, हमने सात सौ रूपये किलो में खरीदा । लगभग सभी ने खरीदा । गाजियाबाद से आये महेश पान्डेय ने कहा भी कि आप लोग लुट रहे हैं, इस कीमत में तो यह दिल्ली में भी मिल जाता है । मगर तब तक सब खरीद चुके थे । हमारे ड्रायवर की दुकान थी ये और हमने उस पर विश्वास किया था मगर ………. ।
अगले दिन फिर नाश्ते के बाद हमें गुलमर्ग और फिर बाबा ऋषि जाना था मगर निकलते निकलते आज फिर समय लग गया । कुछ नाश्ते के वक्त तक भी तैयार नहीं हो पाये थे । आज भी निकलते-निकलते ग्यारह बज गये थे, जो लोग तैयार थे वे भुनभुना रहे थे । मगर निकलना तो सबको साथ ही था ।
अब हम गुलमर्ग की ओर बढ़ रहे थे । रास्ते में छोटे-छोटे शहर और गाँव आने लगे थे । धान के बडे़-बडे़ खेत । फसल लगभग तैयार थी । शहरों में कुछ सरकारी इमारते भी थीं । हर इमारत की एक विशेषता थी कि उनमें हरे रंग का इस्तेमाल जरूर हुआ था । खासकर दरवाजों, खिड़कियों, बुर्जों और जालियों में । शहरों में बर्तन, कपड़े और सब्जियों की दुकाने वैसी ही थीं जैसी देश में हर जगह होती हैं । मगर बर्तनों में फर्क था । यहाँ देकची नुमा खाना पकाने के बर्तनों के बाहर हरे रंग का लेप लगा था । वैसे ही, जैसे चूल्हे के जमाने में हमारी नानी या दादी बटुली को बाहर से गीली मिट्टी का लेप लगाकर उस पर कंडे की राख की परत चढ़ाया करती थीं, जिसका उद्देश्य बर्तनों को जलने से बचाना था । शायद इस लेप का उद्देश्य भी यहीं होगा । जंगल में लकड़ी की कमी तो है नहीं । बस अपनी रफ्तार पर थी मगर चलती बस में भी एक चीज थी जो बारबार ध्यान खींच रही थी और वह थी – समोवार । हर दुकान के बाहर टंगी थी वह । ताँबे का बना समोवार । कहवा बनाने का बर्तन । पहले ये मिट्टी से बनती थी । घड़ों की तरह ऑंवों में पकायी जाती थी । तब ये कुम्हारों की आय का प्रमुख स्त्रोत रही होगी, क्योंकि कहवा तो कश्मीर का प्रमुख पेय है । लोग आज भी मिट्टी के समोवार में बने कहवे की याद करते हैं । मगर अब ? अब मेरी नजरें राह में कुम्हार का आवॉं ढूंढ रही थीं, मगर वह कहीं नहीं था । बदल रहे है हम । मगर…? मेरी ऑंखों में मेरे गॉंव के कुम्हार की सूनी ऑंखें उतर आयी थीं । और साथ ही उभरे थे धूल खाते घड़े, जिनकी जगह अब फ्रिज ने ले ली है । घड़े की जगह फ्रिज ? मिट्टी के समोवार की जगह तांबे का समोवार ? दीये की जगह बिजली से चलने वाली झालरे ? इन सब ने मिलकर ऑवा की ऑच और कुम्हारों की ऑस बुझा दी है । विकास जुरूरी है, मगर हमारी संस्कृति से जुड़ी इन कलाओं का, घरेलू उद्योगों का बचा रहना भी तो जरूरी है ।
अब मोड और तीखे हो चले थे । पहाड़ अब फिर करीब आ रहे थे । पहले चीड़, फड़ और फिर अधिक ऊॅचाई पर देवदार के जंगल । हम अब ऊँचाई पर थे । देवदार के सघन वनों को छूकर आती हवायें, बहुत सुकून दे रही थीं । स्कूली बच्चे आज भी दिखायी दे रहे थे जिनमें लड़कियॉं ही अधिक थीं ; और कुछ नकाब पोश युवतियॉं भी । जो शायद सरकारी इंटर कालेज में पढ़ती होंगी । उनकी यूनीफार्म का रंग देश के अन्य भागों की तरह आसमानी और सफेद था – आसमानी कुरता, सफेद सलवार और सफेद चुन्नी । मगर चेहरा नकाब से ढॅंका हुआ । नकाब का आलम तो ये था कि कश्मीर विश्वविद्यालय की प्रोफेसर भी नकाब में थीं । यह शायद दूसरी तरह का आतंक था, जिसकी शिकार घरेलू या कम पढ़ी लिखी औरतें ही नहीं, बल्कि उच्च शिक्षित औरतें और लड़कियॉं भी थी । मगर इसे उन्होेंने मन से स्वीकार लिया है कि शेष भारत से उनकी परिस्थितियाँ अलग हैं । और इन्हें इसी तरह ही रहना है ।
लगभग तीन बजे हम गुलमर्ग पहुँचे । आज फिर हमंे एक घंटे ही दिये गये थे और हम आज फिर घोड़े वालों से घिरे थे । मगर एक घंटे में पैदल जाकर घूमना संभव नहीं था सो घोड़े लिये । आज हम सभी घोड़े पर थे, नलिनी जी, विद्या बिन्दुजी, और मैं । आज मैं जिस घोड़े पर थी उसका नाम था बादल । पक्की सड़क पर घोड़ों की टाप एक अलग सा समा बाँध रही थी । हमें एक स्थान पर उतरना था, जहाँ से घाटी की सुन्दरता देखी जा सकती थी । मगर हममें से कोई नहीं उतरता । आगे चलकर मंकी हिल आया, जहाँ घने जंगल के बीच बने कॉटेज बहुत सुन्दर लग रहे थे । मैंने अपने घोड़े वाले से पूछा – ’’ इसे मंकी हिल क्यों कहते हैं ? क्या यहॉं बहुत बन्दर हैं ? ’’
’’ नइ मेेमसाब । जिन्दा बन्दर तो नइ है । पर वो देखो उधर ’’ और उसने जंगल की तरफ इशारा किया- इसीलिए इसे मंकी हिल कहते हैं । ’’
और मेरी नजरों ने उस इशारे का पीछा किया, तो देवदारों के जंगल से नीचे एक चट्टान थी जिसका आकार बंदर जैसा था । ऐसा लग रहा था मानों कोई बंदर बैठकर इतमिनान से नीचे का दृश्य निहार रहा हो । मैंने बार-बार, कई बार देखा उसे । अगर समय होता तो ऊपर जाकर उसे छूकर देखती मगर ….? हम चलते रहे, कुछ आगे जाकर पोलो ग्राउण्ड था और उससे कुछ ही दूरी पर एक पार्क था, जिसमें बड़ा सा घास का मैदान था और थी एक कृत्रिम झील । कुल मिलाकर यह पार्क और गुलमर्ग बहुत आकर्षक नहीं था । इसलिये हम शीघ्र ही लौट चले । लौटते समय मैंने घोड़े वाले से सवाल किया- ’’ इसका नाम तो गुलमर्ग है, मगर गुल का तो यहॉं नामोनिशान नहीं है ? ’’
’’ गुल होता है मेमसाब । जून-जुलाई में खूब होता । ये सारा मैदान गुल से भरा रहता है ’’ – उसने सड़क के किनारे निचले हिस्से की ओर इशारा किया । मैंने देखा सड़़क के दोनों ओर खाली और उजाड़ सी जगह थी । लग ही नहीं रहा था कि वहॉं फूल भी खिलते होंगे । मगर खिल भी सकते हैं, फूलों की घाटी की तरह ।
अब हम एक ऊँचे टीले पर चढ़ रहे थे । अपने आप को साधे, पीछे की ओर तने हुए। टीले पर बहुत सी हरी हरी घास उगी थी और कई घोडे़ चर रहे थे । बादल भी घास चरने की इच्छा से रूका, मगर घोड़े वाले ने टूह टूह कहकर एक छड़ी मारी और वह अपनी राह पर चल पड़ा । मगर वह बार-बार घास में मुंह मारने की कोशिश करता और बदले में छड़ी खाकर फिर अपनी राह चल पड़ता । कितना मुश्किल होता होगा सामने घास हो और चरने की इजाजत न हो ….।
मैंने नबी से कहा- ’’ थोड़ी देर चर लेने दो बेचारे को। ’’ मेमसाहब अभी घास चरेगा तो क्या कमाइ करेगा । ’’ और उसने सामने वाले घोड़े को टोहका – टूह, टूह और वह तेज गति से चल पड़ा और उसके पीछे बादल भी । अब उतराई थी । एकदम खड़ी उतराई । डर लग रहा था मगर नबी हमें आश्वस्त कर रहा था । वह अब बादल के साथ-साथ ही चल रहा था, शायद उसे डर था कि बादल कहीं घास के लिए रूक न जाय ।
’’ कितनी कमायी हो जाती है ? ’’ – मैंने नबी से पूछा ।
’’ सीजन में तो एक दिन में दो-तीन हजार कमाता । ’’
’’ बस । ’’
’’ इदर बहुत घोड़े वाले हैं मेमसाब । ’’ बहुत मशक्कत करने के बाद सवारी मिलती है । ’’
’’ अब तो लोग इधर आते भी कम हैं न । ’’ – कहकर मैंने उसे देखा । उसके चेहरे पर उदासी सी आ गयी थी । फिर एक आक्रोश की लहर सी उठी और ……।
‘‘ मेमसाब सब पालटिकस है । ये नेता लोग का खेल है । इनके कारण से अम परेशान होता । आपको मालूम हय, इदर जब भी सांति होता, ये इंडिया वाले फिर से गदर करवा देते हैं। गदर करने वाले इनके अपने लोग हैं मेमसाब । इनको तो अपना फायदा चाहिये । बस । ’’ कहते हुए वह कुछ देर को उत्तेजित हो उठा था और मेरे कानों में एक वाक्य अटक गया ’’ वो इंडिया वाले – ’’
कल भी जब हम पहलगाम पहुॅँचे थे, तब घोड़े वाले आपस में बातें कर रहे थे – इंडियन सवारी हैं । ‘‘ यानि इंडिया एक अलग देश है इनके लिए । मन में कुछ चुभा मगर मैंने कुछ कहॉं नहीं । मगर मन देर तक परेशान रहा । अब हम बस स्टॉप पर पहुँच गये थे । किराये के साथ बख्शीश लेकर नबी ने हमसे विदा ली । कहवा पीकर हम भी चल पड़े थे। रास्ते में हमने बगीचे के बाहर से सेब खरीदे । कुछ लोगों ने घर ले जाने के उद्देश्य से बड़ी-बड़ी पेटियाँ लीं ।
हमें बाबा ऋषि होते हुए लौटना था बाबा ऋषि वहाँ भी सीढ़ियाँ थी । लगभग पचास-साठ सीढ़ियों के बाद ऊपर बाबा ऋषि की दरगाह थी, जहाँ हर दरगाह की तरह मन्नत के तमाम धागे बँधे हुए थे । कहीं-कहीं चूड़ियाँ भी बंधी थीं । शायद सुहागनों ने अपने सुहाग के लिए मन्नतें माँगी होगीं । वहाँ लोग मन्नते मॉंग रहे थे, मन्नत के धागे बाँध रहे थे। कुछ महिलायें वहाँ बैठकर रो रोकर अपना दुःख बाबा से कह रही थीं । वहाँ बाबा के प्रसाद के रूप में अगरबत्ती की भभूत मिली । और बताया गया कि यहाँ इसी परिसर में मिट्टी का चूल्हा है, जिसमें बाबा खाना पकाया करते थे । उसकी मिट्टी आप लोग जरूर लीजिए । सारे दुःख और चर्मरोग दूर हो जायेंगे । हममें से कुछ ने वहाँ से मिट्टी ली और कुछ ने उस चूल्हे को हर कोण से देखा-परखा । यह आस्था का मामला था । जहाँ कोई तर्क काम नहीं करता ।
रात में खाने के समय तक हम अपने अतिथि गृह में थे । हमें सेब और बैगन की सब्जी के साथ चाँवल, रोटी और अखरोट की चटनी मिली । सेब की सब्जी बहुत ही स्वादिष्ट थी । कच्चे सेब को दो टुकड़े करके बैगन और खड़ी हरी मिर्च के साथ बनाया गया था । हरी मिर्च उतनी तीखी नहीं थी, सो सबने बड़े चाव से वो सब्जी खायी । हम छत्तीसगढ़ के लोग तो वैसे भी खट्टी सब्जियों के शौकीन होते हैं । चटनी जरुर अलग सी लगी थी बिना खटाई के, मूली और अखरोट की चटनी ।
अगले दिन श्रीनगर और उसके आस पास घूमने का कार्यक्रम था । केरल वाले लौट गये थे । अब हम कुछ लोग ही बचे थे । सोचा शुरूवात अल सुबह की जाय । तय हुआ कि सुबह छः बजे शंकराचार्य की तपस्थली चला जाय । सुबह-सुबह उठने के आलस्य में आधे लोगों ने कन्नी काट लिया और हमें डराया भी कि बहुत ही ऊंचाई पर है, बहुत सीढ़िया हैं मगर हम लोगों का दृढ़ निश्चय था कि हमें जाना ही है हम सुबह छः बजे निकले चक्करदार रास्ते से होकर हमारी बस अब और ऊपर जा रही थी । बादलों के बीच से गुजरती बस अब और ऊपर जा रही थी । फिर बस ने तपस्थली से कुछ पहले ही हमें उतार दिया, वहाँ से पैदल चलकर हमें ऊपर जाना था । यहाँ से 1 कि.मी. पैदल चलकर फिर सीढ़ियाँ चढ़नी थी । खड़ी चढ़ाई की सीढ़ियाँ थीं वो भी आठ दस नहीं, दो सौ मगर जाना तो था ही । सीढ़ियों के नीचे भारतीय सेना तैनात थी । महिला सैनिक के द्वारा गहन तलाशी के बाद ही ऊपर जाने की इजाजत मिली । पहली सीढ़ी पर कदम रखते ही मैंने ऊपर देखा, तो लगा कि ऊपर तक पहुॅंचना संभव नहीं हो पायेगा क्योंकि मेरे पैरों में मोंच थी मगर अपने साथियों को देखा उनमें से अधिकांश साठ के पार थे, विद्या बिन्दु जी तो सबसे बड़ी लगभग 65 वर्ष की थीं, मगर वे सीढ़ियॉं चढ़ने को तत्पर थीं । सो मेरा भी हौसला बढ़ा और कदम भी।
अब बादल नीचे और हम ऊपर थे । इन सीढ़ियों की खासियत यह थी कि हर आठ-दस सीढ़ी के बाद एक चौड़ी सीढ़ी थी और वहाँ पत्थरों से बनी रैलिंग भी इतनी चौड़ी थी कि उस पर आसानी से बैठा जा सके । और वहाँ से ऊपर जंगल और नीचे घाटी का दृश्य तो क्या कहना । हम बादलों के बीच में चल रहे थे । सो रूक-रूक कर, ठहर- ठहरकर बादलों में डूबते उतराते हम शंकराचार्य की चोटी पर पहुँच गये थे, वहाँ से श्रीनगर बहुत सुन्दर लग रहा था । बादलों की रजाई ओढ़े श्रीनगर को मैं देर तक निहारती रही । मगर शंकराचार्य की तपस्थली के लिए अभी और सीढ़ियाँ चढ़नी थीं । एकदम खड़ी और ऊंँची-ऊँची लगभग तीस सीढ़ियाँ चढ़नी थीं । खड़ी और ऊँची-ऊँची तीस सीढ़ियाँ ? मन झिझक रहा था, मगर हमारे पहुॅंचते ही बादल जरा सा सरक कर बगल हो जाते वैसे ही जैसे हम किसी अपने को राह देते हैं । मेरे लिए वह दृश्य अनुपम और अविस्मरणीय है । और वहाँ पहुँच कर तो सारी थकान ही चली गयी थी । स्वर्ग ! इसलिये यह धरती का स्वर्ग कहलाता है । यहाँ से श्रीनगर का सौन्दर्य, अनुपम और अकथनीय था ।
शंकराचार्य की तपस्थली । एक बहुत छोटी सी गुफा । छोटा सा गुफा द्वार था जिसमें झूककर प्रवेश करना था। मगर भीतर एक छोटे कमरे जैसी जगह थी । शंकराचार्य की रूद्राक्ष की माला, त्रिशूल, डमरू उनके आराध्य शिव का प्रतिरूप शिव लिंग और साथ में तबला, हारमोनियम और वीणा । सब कुछ इतना साफ सुथरा और करीने से सजा हुआ जैसे तपस्या से निवृत्त होकर वे अभी अभी गुफा से बाहर गये हों ।
वहाँ से लौटकर हम नाश्ते के लिए एकत्र हुए । नाश्ते में रोज की तरह आज भी छोले-भटूरे ही था । शायद यह वहाँ का प्रिय नाश्ता हो या फिर बनाने में आसानी होती हो ।
आज हमारा अंतिम दिन था और हमें श्रीनगर और उसके आसपास – खीर भवानी, मुगल गार्डन, निशात बाग चश्मे शाही और चार चिनार जाना था । नाश्ते के बाद हम सबसे पहले खीर भवानी गये, देवी का प्राचीन मंदिर और शक्ति पीठ । यहाँ देवी को उनके नाम के अनुरूप दूध चढ़ाया जाता है और वहाँ मंदिर की ओर से खीर का प्रसाद वितरित होता है । यहाँ परिसर में स्थित भोजनालय में हमने दोपहर का खाना भी खाया । दाल, चावल, बैंगन की सब्जी और कडम का अचार । इस अचार के विषय में पूछने पर पता चला कि यह गाँठ गोभी का अचार था । कश्मीर में यहाँ के मौसम के चलते आम तो होता ही नहीं, इसीलिए यहॉं आम के अचार का चलन नहीं है । शायद इसीलिए इतने दिनांे से खाने या नाश्ते में कभी अचार नहीं परोसा गया था । उसी होटल में हमें गाँठ गोभी के पत्तों का साग भी परोसा गया । साग तो वैसा ही था, जैसा हमारे यहाँ बनता है, बस उसे रसदार रखा गया था। कश्मीरियों का प्रिय साग और अचार था यह । इसलिए सब उसकी तारीफ कर रहे थे । उन्हें क्या मालूम था कि हमारे छत्तीसगढ़ में कितने तरह के साग होते हैं । कितने तरीकों से उन्हें बनाया जाता हैं । मैंने अपने यहाँ की भाजियों का जिक्र किया और छत्तीसगढ़ की लाल भाजी और बोहार भाजी की विशेषताऐं बतायीं, तो लोग चकित रह गये ।
खाना खाकर हम मुगल गार्डन के लिए निकले । मुगल गार्डन ! चारों ओर पहाड़ियों से घिरा और फूलों से भरा-भरा एक बहुत सुन्दर बगीचा । और उसके बीचोबीच पूरे मुगल गार्डन को दो भागों में बाँटती फव्वारे की एक लम्बी कतार । मेरी आँखों में आरजू फिल्म के अनेक दृश्य उभर,े जो यहॉं फिल्मायें गये थे । खासकर वह गीत जो साधना पर फिल्माया गया था – ’’ बेदर्दी बालमा तुझको, मेरा मन याद करता है….। ’’ यह गीत उस समय फिल्माया गया था, जब यहॉं बर्फ का मौसम था इसीलिए बगीचे और पेडों़ पर, फव्वारों के दोनों ओर पथ पर बर्फ ही बर्फ नजर आती है । हम देर तक वहाँ घूमते रहे, मगर पूरा गार्डन घूम नहीं पाये, क्योंकि समय आज भी कम था । इसके बाद निशात बाग । नीचे से सीढ़िया फिर सुन्दर सा गार्डन फिर कृत्रिम झरना फिर गार्डन इसी तरह उसके हर एक पैदान पर उसकी ऊँचाई और बढ़ती जा रही थी । इसके तीन ओर पहाड़ियाँ है और सामने की ओर डल झील । सचमुच बहुत ही शांत सौंदर्य है इसका । चश्में शाही जाते-जाते शाम हो चली थी । अभी चार-चिनार और डल में शिकारों की सैर भी करनी थी । एक बहुत खूबसूरत बगीचा है चश्में शाही । निशात बाग और मुगल गार्डन की अपेक्षा छोटा मगर बहुत सुन्दर था। फूल ही फूल थे वहाँ । तरह तरह के फूलों से भरी लम्बी क्यारियाँ मन मोह रही थी । मगर बहुत कम समय था हमारे पास ।
अब शिकारों के सैर की बारी थी । हाउस बोट देखना था, मन तो वहाँ रह कर देखने का भी था, मगर न तो किसी और ने साथ दिया और न ही आयोजकों ने इजाजत दी । सो देखकर ही संतोष किया । फिल्मों में देखा तो पहले भी था, मगर अब रूबरू देखने का अवसर था । लकड़ी के सुन्दर घर, सुन्दर ड्राईंग रूम, बेडरूम से सजे धजे पाँच सितारा, तीन सितारा, चारा सितारा हाऊस बोटों की अपनी निराली ही शान थी, मगर अधिकांश हाऊस बोट खाली थे और अपने मालिकों की हालत बयाँ कर रहे थे । जब हम वहाँ पहुँचे तो उनके मालिकों के चेहरों पर एक चमक कौंधी । वे हमें उत्साहपूर्वक अन्दर ले जाने लगे, मगर हकीकत जानते ही उनके चेहरे बुझ से गये । बाहर से जगमगाते इन हाउस बोटों की यही हकीकत थी । वहाँ सबसे अलग, एक छोटा सा हाउस बोट था जिसके मालिक थे मो. अब्बास । मैंने उन बुजुर्गवार से पूछा – “ सीजन में तो यहॉं बड़ी भीड़ रहती होगी । ” तो वे कहने लगे – अब कहाँ सैलानी आते हैं बेटा । एक जमाना था, जब सीजन से छै महीने पहले ही हाउस बोट बुक हो जाते थे । मगर अब तो एक-एक सैलानी के पीछे दस दस लोग दौड़ते हैं । आपस में खींचतान लड़ाइर्, झगड़ा और कभी-कभी तो मारपीट भी । मैं तो वो सब कर नही पाता तो….. । ’’ कहते हुए उनके चेहरे पर दर्द की असंख्य रेखायें उभर आयी थीं । मैं देर तक देखती रही उन रेखाओं को । फिर डल पर निगाह डाली, अब वह भी तो पहले जैसी नहीं रही । अपने भीतर न जाने कितना दर्द समेटे हुए डल भी तो अब घास-पात और सिवार से भर गयी है ।
हमें चार चिनार भी जाना था, मगर नहीं जा पाये । कुछ लोगों ने डल लेक स्थित बाजार का रूख किया और खरीदारी की । लौटते तक दस बज चुके थे । अगले दिन सुबह सुबह हमें अपने घर के लिए निकलना था । सो खाना खाकर हम सीधे कमरे में गये । रोज की तरह आज गपशप में लगना संभव नहीं था । सारा सामान बिखरा हुआ था, उसे समेटते-समेटते एक बज गये । कमरे की साथी भी मेरे साथ जागते रहीं । नलिनी जी की फ्लाइट दो बजे दोपहर में थी, फिर वे भी अपना सामान सहेजने लगीं । विद्या, बिन्दुजी हमसे बाते करती रहीं । उनकी फलाइट दसरे दिन थी शाम को ।
सुबह पाँच बजे निकलने का तय था । आते समय मजबूरी में हवाई मार्ग चुना था मगर लौटते समय सड़क मार्ग से लौटना तय किया और उस पर अंत तक दृढ़ रही । मैं, डॉ. रामचंद्र राय, उनकी पुत्री वर्षा राय और जोधपुर विश्वविद्यालय के चार छात्र । हमने इनोवा लिया और जम्मू की राह पर चल पड़ें । श्रीनगर अतिथि गृह से निकलते ही बारिश हमारी हमराह हुई । श्रीनगर से लेकर जम्मू तक लगातार बारिश होती रही । कही तेज तो कहीं मध्यम और कहीं-कहीं सिर्फ फुहारें । अब श्रीनगर से लेकर जम्मू तक हिमालय का अपार सौंदर्य हमारे साथ था । तीखे मोड़ गहरी खाईं और ऊँची-ऊँची हरी भरी चोटियाँ और फिर उस पर रिमझिमी वर्षा । बादल तेजी से उड़ रहे थे । वे इतने सघन थे कि दो चार फुट से आगे का रास्ता ही नजर नहीं आ रहा था, मगर हमारा ड्रायवर कुशल चालक था, वर्षों का अभ्यास था उसका । इसलिए वों बहुत ही सहज था । रास्ते में जहाँ कहीं गाँव या शहर आता, वहाँ सेना के जवान तैनात मिलते । कहीं किसी टपरे जैसे होटल के पीछे तो कही किसी छत पर ।
सड़क के दोनों ओर चीड़ और अनार के जंगल थे । अनार इतने अधिक फले थे कि उन्हें जरा सा हाथ बढ़ाकर तोड़ा जा सकता था । मगर ड्राइवर ने हमें बताया कि ये जंगली अनार हैं, बहुत खट्टे होते हैं, इनकी चटनी बनायी जाती है । सड़क किनारे नागो और रसभरियों के पेड़ भी थे, मगर उनका मौसम जा चुका था । अब वे पेड़ पर नहीं, बाजार में थे । लगभग नौ बजे काजीगुण्ड आया, एक छोटा सा शहर । यहाँ हमने नाश्ता किया । आलू का पराठा और दही । यहाँ मेवों की बहुत सी दुकाने थी । हम तो श्रीनगर से बादाम और अखरोट खरीद ही चुके थे, फिर भी भाव जानने के लिए पूछा, तो चकित रह गये ! जो बादाम हमने सात सौ रूपये में खरीदा था, वह यहाँ अढ़ाई सौ रूपये किलो था और अखरोट तीन सौ रूपये किलो वाला डेढ सौ रूपये किलो । अपने यूँ ठगे जाने पर तकलीफ हुई, क्योंकि हमारे बस ड्राइवर ने बहुत एहसानों के साथ हमें कम दाम में मेवे खरीदवाये थे । हम सभी को दुःख हुआ मगर ……।
यहाँ से लगभग एक घंटे का सफर तय हुआ ही था कि हमारी गाड़ी का टायर पंचर हो गया । यह एक बहुत छोटी सी जगह थी । यहाँ एक छोटा सा ढाबा था, जिसमें ग्राहक तो कोई नहीं था, बस सेना के जवान ही बैठे थे । हम भी गाड़ी से उतरकर उन्हीं के पास बैठ गये । दो फौजी छत पर ड्यटी पर तैनात थे । एके-47 से लैस बिल्कुल चौकन्ने । बाकी आराम कर रहे थे । बातचीत में पता चला कि सारे के सारे फौजी नीचे मैदानी भाग के रहने वाले हैं । कोई हरियाणा का था, कोई उत्तर प्रदेश का तो कोई राजस्थान का । लगभग एक घंटे के बाद हमारी गाड़ी का टायर ठीक हुआ, तो हम आगे बढ़े । अब गाड़ी अपने रफ्तार पर थी। हमारे साथ के लोग ऊँघ चले थे और मैं हिमालय के उस कश्मीरी सौन्दर्य को निहार रही थी, जो कभी मेरे सपनों में था । मगर अब सामने ! ऊँची-ऊँची चोटियों से ऊपर उठकर बादल कभी ऊपर उठकर उन्हें आच्छादित कर लेते, तो कभी उनसे टकराकर बरस जाते । गाड़ी की गति धीमी हो चली थी । अब धारासार वर्षा हो रही थी । पहाड़ों पर वर्षा तो मैंने तो पहले भी देखी थी, मगर इस कदर सघन कि हाथ को हाथ न सूझे, खाई पहाड़ और सड़क सब एकजई हो उठे थे । गाड़ी की हेड लाइट जलाने के बाद भी राह नजर नहीं आ रही थी, मगर ड्राइवर की अभ्यस्त ऑंखें उसमें भी अपनी राह देख रही थीं । अब बादलों के गुच्छे गाड़ी के भीतर घुसने की कोशिश कर रहे थे । बहुत दूर तक ऐसा ही मंजर रहा, फिर बादल बिरल होने लगे और पानी भी थम गया था ।
सड़क के किनारे कई स्थानों पर भुट्टे बिक रहे थे बिल्कुल ताजे भुट्टे । एक जगह रूककर हमने भुट्टे खरीदें ; बचने वाला एक छोटा सा बच्चा था, करीब आठ दस बरस का, मगर पूरा व्यवसायी । जोधपुर विश्वविद्यालय के शोधार्थियों ने मोल भाव करना चाहा, मगर वह अड़ा रहा कि दस रूपये का एक । हमने आठ भुट्टे खरीदे । मैं गाड़ी में बैठी देख रही थी उसे, और सोच रही थी कि जरूरतें बच्चों को बच्चा भी नही रहने देतीं; वक्त से पहले ही दुनियादारी बता देती हैं ।
अब बारिश रूक चली थी । राम वन आ गया था । राम इधर भले ही न आये हों मगर उनकी सेना यहाँ आज भी मौजूद थी । सड़क के दोनों ओर बन्दर ही बन्दर । कहीं वो अपने परिवार के साथ धूप का आनन्द ले रहे थे, तो कहीं माँ अपने बच्चे के जुँये बीन रही थी । कोई डाली पर झूला झूल रहा था, तो कोई खिखियाकर अपने साथियों को डरा रहा था । सड़क के किनारे बैठा एक बन्दर चिप्स के खाली पैकेट को उलट पलट रहा था, जो खाली होकर भी फूला हुआ था । बिल्कुल भरे हुये पैक पैकेट की तरह । बन्दर होशियार होते हैं मगर आदमी ? ऊधमपुर तक रास्ते भर बन्दरों का हुजूम नजर आता रहा ।

अब हम तीखे मोड़ से गुजर रहे थे और उसके ठीक सामने नदी के उस पार ऊँची -ऊँची चोटियों से घिरा नीला सरोवर सा नजर आ रहा था । हम बहुत दूरी पर थे, मगर वह सरोवर हमें बहुत बड़ा नजर आ रहा था । वह कोई बाँध था । मैंने ड्राइवर से उसका नाम पूछा, मगर वह बता नहीं पाया । हमारी गाड़ी अब चढ़ाव पर थी और हर मोड़ पर वह डैम नजर आ रहा था । फिर धीरे-धीरे वह दूर होने लगा ।
अब बनहिल आने वाला था, मगर मुझे तो इंतजार था जवाहर सुरंग का । बहुत सुना था इसके बारे में । और फिर इंतजार खत्म हुआ । सुरंग के बाहर उसकी लम्बाई लिखी हुई थी । आने और जाने के लिए अलग-अलग सुरंग । अब हम सुरंग में प्रवेश कर रहे थे । बरसात के कारण सुरंग में पानी भर गया था और हमारी गाड़ी पानी की छींटे उड़ाती आगे बढ़ रही थी । सुरंग में बहुत अंधेरा था, इतना अंधेरा कि कुछ कुछ दूरी पर जलती लाइट की रोशनी भी कम पड़ रही थी । बहुत देर के बाद कुछ दूरी पर एक वृत सा उभरा अब सुरंग समाप्त होने वाली थी । हम फिर तीखों मोड़ों से गुजर रहे थे ।
पटनी टॉप आने वाला था । यहाँ से हिमालय का अनूठा सौन्दर्य निहारा जा सकता है । सर्दियों में यहाँ से हिमाच्छदित वादियों का सौन्दर्य कई गुना बढ़ जाता है । पटनी टॉप तक मैं पहले भी आ चुकी थी । इसकी ऊँचाई श्रीनगर से भी अधिक है । और सर्दियों में तो यह चारों ओर हिमाच्छादित चोटियों से घिरा बर्फ का उपवन सा प्रतीत होता है । आज हमारे पास पटनी टॉप जाने का समय नहीं था । हमारे साथ जो छात्र थे, उनकी ट्रेन छः बजे थी ; और यहाँ से कई घंटे का रास्ता अभी शेष था । उस राह में सड़क चौड़ीकरण हो रहा था। फेारलेन सड़क बनाने की प्रक्रिया में खाई को पाटकर सड़क बनाने की कोशिश जारी थी । इसके लिए पता नहीं कितने पेड़ काटे गये होंगे । हमारे यहाँ छत्तीसगढ़ में भी तो न जाने कितने पेड़ सडक चौड़ीकरण की भेंट चढ़ गये हैं । विकास से जुड़ा पर्यावरण का यह विनाश तो अब हमारी मजबूरी है । यहाँ भी बन्दरों की बहुतायत थी । तरह-तरह के क्रियाकलापों में व्यस्त थे वे । कोई अपने परिवार के साथ मस्त था, तो कोई बेहद उदास सा सड़क के किनारे बैठा था । मानों इस विकास में उसका सब कुछ उजड़ गया हो ।

उधमपुर आ रहा था । मुझे याद आया कि वर्ष 1996 में जब मैं यहाँ आई थी, तब कई जगह हमारी गाड़ी की तलाशी ली गयी थी । इस बार ऐसा नहीं हुआ । हमें बस एक स्थान पर रोका गया । शायद पहले से अब हालात कुछ बेहतर हुए हैं । मगर आँखों में श्रीनगर के लाल चौक की घटनायें घूम उठीं । जिस दिन हम वहाँ पहुँचे थे, उसके दूसरे दिन तीन युवकों को गोली मारी गयी थी । जुबिन मेहता के कार्यक्रम के विरोधी कुछ लोग घायल हुए थे । पहलगाम और गुलमर्ग जाते समय खेतों में, पहाड़ों के निचले हिस्सों में, लोगों के घरों की छतों पर और झाड़ियों में तैनात सेना के जवान आँखों में उभर आये थे। और साथ ही साथ उभरी थी हाउस बोट और शिकारा वालों की असंख्य मायूस आँखें । अकूत सौन्दर्य है यहाँ । प्रकृति ने अपने दोनों हाथों से संवारा है इसे । मगर आज ? आज यह सौन्दर्य मन को बाँधता नहीं, बल्कि खौफ जगाता है ।
हम कश्मीर में आठ दिनों तक रहे । हमने कश्मीर में सब देखा, जिसके लिए यह विख्यात है । मगर एक दहशत, एक भय हर वक्त तारी था हम पर । हर शख्स को हम शक की निगाह से देखते थे और वे ? वे भी तो सहज नहीं थे । उनकी आँखों में वह भाव नहीं उमड़ा था, जो किसी अपने को देख कर उमड़ता है । इन्हीं विचारों के बीच जम्मू आ गया था । प्लेटफार्म नंबर एक पर जवानों से भरी ट्रेन खडी थी, जवान उतर रहे थे । यहाँ से इन्हें चिनारों की घाटी में जाना था । उनकी हिफाजत के लिए । क्या सचमुच अब बारूद ही, एक मात्र उपाय है ? और क्या इसकी गंध से चिनारों की हरीतिमा बरकरार रह पायेगी ? मैं देर तक सोचती रही और इन्हीं सोचों के बीच ही ट्रेन आ गयी थी । उसमें सवार होकर मैं लौट रही थी ।
जाते समय मैं अकेली थी, मगर लौटते समय मैं अकेली नहीं थी । मेरे साथ था कश्मीर का अगाध सौन्दर्य और साथ ही साथ थे कई सवाल ? सवाल ! जिसके जवाब तलाशनेे हैं मुझे ! आपको ! और हम सभी को ।

उर्मिला शुक्ल

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