दो सत्य कथाएँः अपने अपने दर्दः शिबेन कृष्ण रैना, शैल अग्रवाल


कश्मीर और क्रिकेट
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कश्मीर में क्रिकेट खेल को लेकर भड़काने वाली बातों का इतिहास कोई नया नहीं है।हमारे समय में भी भारत-पाक क्रिकेट खेल के दौरान यदि पाक टीम भारत के हाथों हार जाती थी तो स्थानीय लोगों का गुस्सा ‘पंडितों’ पर फूट पड़ता था। उनके टीवी/रेडियो सेट तोड़ दिए जाते,धक्का मुक्की होती आदि।भारत टीम के विरुद्ध नारे बाज़ी भी होती।और यदि पाक टीम जीत जाती तो मिठाइयां बांटी जाती या फिर रेडियो सेट्स पर खील/बतासे वारे जाते।यह बातें पचास/साठ के दशक की हैं।तब मैं कश्मीर में ही रहता था और वहां का एक स्कूली-कॉलेज छात्र हुआ करता था।(भारतीय टीम में उस ज़माने में पंकज राय,नारी कांट्रेक्टर,पोली उमरीगर,गावस्कर,विजय मांजरेकर,चंदू बोर्डे,टाइगर पड़ौदी,एकनाथ सोलकर आदि खिलाड़ी हुआ करते थे।)कहने का तात्पर्य यह है कि कश्मीर में विकास की भले ही हम लम्बी-चौड़ी दलीलें देते रहें,भाईचारे का गुणगान करते रहें या फिर ज़मीनी हकीकतों को जानबूझकर दबाये रखें,मगर असलियत यह है कि लगभग चार/पांच दशक बीत जाने के बाद भी हम वहां के आमजन का मन अपने देश के पक्ष में नहीं कर सके हैं।सरकारें वहां पर आयीं और चली गयीं मगर कूटनीतिक माहौल वहां का जस का तस है। कौन नहीं जानता कि वादी पर खर्च किया जाने वाला अरबों-खरबों रुपैया सब अकारथ जा रहा है।’नेकी कर अलगाववादियों की जेबों में डाल’ इस नई कहावत का निर्माण वहां बहुत पहले हो चुका था।यह एक दुखद और चिंताजनक स्थिति है और इस स्थिति के मूलभूत कारणों को खोजना और यथासम्भव शीघ्र निराकरण करना बेहद ज़रूरी है।कश्मीर समस्या न मेरे दादाजी के समय में सुलझ सकी, न पिताजी के समय में ही कोई हल निकल सका और अब भी नहीं मालूम कि मेरे समय में यह पहेली सुलझ पाएगी या नहीं!आगे प्रभु जाने।

डॉ0शिबन कृष्ण रैणा
Senior Fellow(Hindi),Ministry of Culture
(Govt.of India)
2/537(HIG)Aravali Vihar,
Alwar(Rajasthan)
301001
Contact:09810265348 and 01442360124

हमारा काश्मीर
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आप कहाँ से हैं?
पाकिस्तान से?
नहीं, भारत से।
और आप?
पलटकर मैंने पूछा,
आजाद काश्मीर से।
तुरंत ही उसने जबाव दिया।
पर आजाद कश्मीर नामकी तो कोई जगह ही नहीं।
कहाँ से? मैंने फिर पूछा ।
उसने बिना जबाव दिए मेरी तरफ देखा और वापस अपने काम में जुट गया, मानो मुझे याद दिला रहा हो -देखो, मैं डॉ. हूँ और तुम मरीज, वह भी दिल का। इस समय तुम्हारी जान मेरे कब्जे में है। अभी भी मैंने तुम्हारे दिल के अंदर तार और कैमरा डाल रखा है । कुछ भी कर सकता हूँ!
पर मैं चुप कहाँ रहने वाली थी, भारत का दर्द, भारत की बात मेरी अपनी बात थी, भले ही यहाँ इंगलैंड में हो रही हो और इन नाजुक हालात में हो रही हो।
काश्मीर में कहाँ से?
दोबारा पूछने पर उसने कहा- अनंतनाग से।
पर आनंतनाग तो भारत में ही है। मैं जा चुकी हूँ। बेहद खूबसूरत। काश्मीर और भारत दोनों हमारे हैं, हमारे यानी मेरे और आपके।

मेरे स्वर में औपचारिक विनम्रता के साथ निर्णायक दृढता थी। मुझे आश्चर्य हुआ अपनी निडरता पर। हृदय की जांच मुकम्मल हो चुकी थी। उसने प्यार से मेरा हाथ थपथपाया और कलाई से ट्यूब निकाल दिया।


शैल अग्रवाल
1ए, ब्लैकरूट रोड, सटनकोल्डफील्ड
वेस्ट मिडलैंड्स, य़ू.के.
shailagrawal@hotmail.com