काश्मीरः यादों के झरोखों से -शैल अग्रवाल


(डल लेक, 1958)

मानव द्वारा निर्मित हर यंत्र , हर अविष्कार से मानव खुद अधिक जटिल, सक्षम व सशक्त है। स्मृतियों की क्षमता तो किसी भी हार्ड ड्राइव से अधिक और अशेष है। तभी तो करीब-करीब 52 साल पुरानी काश्मीर की यादें आज भी चलचित्र सी ही स्पष्ट हैं… सूरज की पहली किरण से झिलमिल फूलों की घाटी अनंतनाग… खूबसूरत डैफोडिल्स और भांतिभांति के क्रोकस। हजारों महकते फूल, जिनका भारतीय नाम नरगिस है , पता नहीं अभिनेत्री नरगिस अधिक नाजुक थी या वो घाटी में बिखरे नरगिस के फूल पर दोनों में गजब का आकर्षण… कोई सानी नहीं उस नैसर्गिक रूप की। धरती पर लाल पीले और सफेद..कई कई रंगों की अल्पना पुरी हुई थी आँखों के आगे। इतने सारे फूल एक साथ कभी नहीं देखे थे-‘ केसर के खेत हैं ये। ’ कहा था तब बगल में बैठे पति ने हुलसकर अपनी नवविवाहिता से। नरेन्द्र 16 वर्ष की आयु में अपने स्कूल सहपाठियों के साथ पहले भी काश्मीर आ चुके थे परन्तु उस खूबसूरत वादी से वह मेरा पहला परिचय था।

पूरा मन ही केसरिया हो चला।

तराई में बिखरा वह घास का रंग तक बेहद चटक और लुभावना था, ऊदा-ऊदा और ओस से भीगा हुआ । हरियाली जहाँ आंखों को चैन दे रही थी वहीं चोटियों पर बिखरी बर्फ पूरे वातारण को सद्यस्नाता सी स्निग्धता से भर रही थी। पहली बार आने पर भी सबकुछ बहुत प्रिय और मनभावन …अपना-सा लग रहा था। जम्मू में रघुनाथ मंदिर के पंडित फरुक्खाबाद के सभी पूर्वजों के नाम की फहरिस्त निकालकर एक अजीब गरिमा, दायित्व और पवित्रता से मन भर चुके थे और अब हम मात्र सैलानी नहीं अगली-पिछली पीढ़ियों के लिए भी जिम्मेदार महसूस कर रहे थे परिवार और दोनों कुलों से जुड़ चुके थे। दर्शकों के रजिस्टर में हमारे नाम भी लिखे पंडित जी ने, क्या पता आगे कभी हमारे वंशज भी आएँ वहाँ और उन्हें भी इतना ही अच्छा लगे जितना अपने पूर्वजों और बड़ों के नामों को देखकर हमें लगा था।…उस समय क्या पता था कि क्षण भंगुर इस दुनिया में कुछ भी स्थाई नहीं । क्रोध…हमारी ईर्षा, हमारा स्वार्थ मानव को ही नहीं, मानवता को भी निगले जा रहा है। सुना है अब तो न तो वे नामों के रिकौर्ड ही बचे हैं और ना ही कई मंदिर भी काश्मीर में।

अस्सी और नब्बे के दौर में एक ऐसा विध्वंसकारी और नासमझ दौर आया था इस पवित्र और खूबसूरत वादी में जब कई सांस्कृतिक धरोहर इमारतें टूटीं, इतिहास से भरपूर छेड़छाड़ हुई। पहाड़ी पर बसे एक देवी के मंदिर भी गए थे हम उस दिन अनंतनाग में । सुनते हैं अब वह भी नहीं रहा।…

कहाँ भटक गए , यात्रा की शुरुवात पर ही … एक ऐतिहासिक दर्द है यह भी तो पर हर भारत प्रेमी का…

कैसा होगा कश्मीर जिसे धरती पर स्वर्ग की संज्ञा दे डाली है कवियों ने…मन की उत्सुकता चरम पर थी उस वक्त और आंखों से ही नहीं हर हाव-भाव से पढ़ी जा सकती थी। सैलानी मन एक अभूतपूर्व उत्साह से उफन रहा था। मनोरम नजारे एक-के-बाद-एक, खुद को हर मोड़ पर अनावृत किए जा रहे थे, मानो कार की यात्रा नहीं, एक खूबसूरत रंगीन फिल्म चल रही हो आँखों के आगे। पूरी तरह से भरमाई-लुभाई और कौतुक से भरी पलकों ने रास्ते भर झपकने का नाम तक न लिया और हर दृश्य को बावरी-सी खुद में सोखती चली गईं, कभी न भूलने के लिए।

आगे एक बचकाना कौतुक और हुआ, जिसकी याद आज भी गुदहुदाती है और खुदसे अलग नहीं कर पाई हूँ । कर भी नहीं सकती, इतना छेड़ते हैं पतिदेव इसे लेकर अभी भी। उम्रभर वो बर्फ के प्रति सम्मोहन रहे या न रहे, पर इसी बर्फ के साथ ही तो पूरी जिन्दगी गुजरी है मेरी, पर वैसा सम्मोहित करता, कौतुक भरा दृश्य तो दुबारा नौ-दस साल बाद , स्विटजरलैंड की टिटलिस चोटी पर ही दिखा था, जब सफेद, बेदाग पाउडर सी बर्फ, वैसे ही जमीन पर इधर उधर बिखरी हुई मिली थी।

धवल और हीरे सी चमकती चोटियों की और स्की रिजौर्ट की बात छोड़ दें, तो अधिकांश जगह नीचे आते आते या तो यह पाले-सी पतली परत बनकर पानी सी चमकने लगती है, या फिर मोटे मोटे पत्थरों के ढेर बनी किनारे पर पड़ी मुँह बिसूरती दिखती हैदिखती है या फिर मोटी ऊनी सफेद चादर-सी सबकुछ ढक देती है, पर एक एक दाना अलग-अलग नमक सी खिली कम ही दिखती है । जब भी खुलकर खेलती है हमारे साथ, तो कुछ ही दिनों में हम हाहाकार करने लग जाते हैं, भले ही हर साल ही पूरे उत्साह के साथ बर्फ की धमाचौकड़ी में शामिल हो जाते हों, इसका इंतजार करते हों ! जाने कितने फावडे भरभरकर बर्फ खुद अपने आगे पीछे के बगीचे से हटा चुकी हूँ मैं, कितने स्नोमैन को बच्चों के साथ मिलकर पतिदेव का हैट और स्कार्फ पहना चुके हैं । सबसे हास्यास्पद तो तब होता है जब स्नोमैन पिघलने लगता है और कैरट की अकड़ी नाक एक ओर लुढकने लग जाती है और हैट दूसरी ओर।

उस दिन श्रीनगर पहुंचने ही वाले थे कि कोने-कोने बिखरे सफेद पाउडर-के छोटे-छोटे ढेर दिखने लगे थे, तेज धूप में लपलप चमकते पर पानी या नमी का कहीं नामो-निशान नहीं।

इसके पहले न तो नमक की झीलें देखी थीं और ना ही इतनी बारीक पाउडर सी पिसी बर्फ ही , वह भी चमकीली धूप में और सामने सड़क पर यूँ किनारे-किनारे बिखरी हुई, जहाँ पूरा यातायात जारी था। वैसे भी गंगा किनारे रहने वाली मैं, मेरा बर्फ से परिचय सिर्फ नैनीताल के जरिए ही तो था, जहाँ अधिक गिरने पर वह कंबल की तरह तल्ली ताल और मल्ली ताल पर बिछी दिखती थी, जिसपर हम बच्चे खुश होकर गोल गोल घूमने लग जाते थे। यूँ किनारे की हुई लकीरों में नहीं, पहाड़ों पर सफेद रंग की पतली परत सी नहीं दिखी थी कभी मुझे बर्फ वहाँ पर। बर्फ गिरी देखी तो पहाणों को भी सफेद कंबल ओढ़े ही पाया था, यूँ इक्की-दुक्की लकीरों में नहीं। अनायास ही मुँह से निकला – कैलशियम रौक्स ? फिर तो पति के मुंह से हंसी का जो फव्वारा छूटा, आज तक उसकी यादें मनोरंजन का विषय हैं पूरे परिवार के लिए। ..शादी के पहलॆ सन 65 में शांति निकेतन जाते हुए धनबाद के पास चलती ट्रेन से देखी अबरक की खानों का रंग-बिरंगा जादू सिर से उतरा नहीं था शायद और मेरी जिज्ञासा व कल्पना में कई-कई रंग भर देती है प्रकृति आज भी। उस दृश्य की दौड़ती-भागती यादों ने अपना देश कितना विविध और सुंदर और विविध है, पहली बार समझाया था मुझे…यूँ तो सारा भूगोल व इतिहास तुरंत ही जान लेना चाहती है मन में छुपी उत्सुकता और अक्सर जोश में बालसुलभ काल्पनिक निर्णय भी ले लेती है, पर उस दिन मैं सच से जितना दूर थी , पहले या बाद में फिर कभी नहीं । किशोरावस्था छोड़े मात्र एक ही बरस तो बीता था उस वक्त । आश्वस्त थीं कि प्रकृति का एक और अनमोल खजाना आ गया था आँखों के आगे। पर पति की मजाक उड़ाती मुस्कान ने पलभर में ही मन के हुलसते कौतुक को शांत कर दिया।

बर्फ से ढकी हजारों पहाड़ियाँ देख चुकी हूँ अब तक, पर आजभी जैसे ही हिमाच्छादित पहाड़ियाँ सामने आती हैं , चाहें ऊंची हों या नीची, तुरंत ही ये बच्चों से कहते हैं ये-देखो- देखो, तुम्हारी मम्मी की कैलशियम रौक्स!

बहुत सी यादें हैं उस मनोरम यात्रा की स्मृति कैनवस पर कई-कई रंगों से उकेरी हुई। खट्टी-मीठी, कड़वी , सारे स्वाद सहेजे… कितने देश घूम चुकी हूँ, पर यादों के झरोखों से झांकता काश्मीर, हिमाच्छादित चोटियाँ, देवदार और पाइन के लम्बे घने पेड, उनकी छाँव में वे लम्बी-लम्बी घुड़ सवारियाँ… बर्फ पर बारबार किसी न किसी बहाने गुल मर्ग, खिलनमर्ग और सोनमर्ग में वह लुढ़कना पुड़कना, स्लेजिंग और स्कीयिंग की अधकचरी पर पूरी ईमानदार और उत्साही हमारी कोशिशें। डल में पावर बोट के साथ विंड सर्फिंग और तैरने के नए-नए प्रलोभन के तहत, डल में करीब करीब डूब जाना… आज भी उतना ही स्पष्ट ही तो है सबकुछ , जितना कि 52 साल पहले 1967 में था, स्विटजरलैंड, नौर्वे , स्वीडेन , इटली के आल्प्स कोई भी जगह आज तक, सुंदरता में उस पहले अनुभव की बराबरी नहीं कर पाई…शायद हर पहले की बात ही कुछ और होती है!

डल लेक तक पहुंचते-पहुँचते शाम हो चली थी और अंधेरा घिरने लगा था। हम दोनों की मनःस्थिति भी पूरे सम्मोहन की-सी स्थिति में पहुँच चुकी थी…काश्मीर के सौंदर्य से पूर्णतः अभिभूत, जबकि अभी खिलनमर्ग और गुलमर्ग वगैरह कुछ देखा ही नहीं था। इतनी खूबसूरत वादी और झील पहले कभी और कहीं नहीं देखी थी। नैनीताल की नैनी झील बहुत छोटी थी इसके आगे, जहाँ गरमी की छुट्टियों में हम कभी-कभी जाया करते थे और जो पहुंचते ही नीलम सी चमकने लग जाती थी, आँखों को एक निराली ठंडक-सी देती। पर डल के आगे बहुत छोटी लग रही थी उस वक्त वह। हाँ, आसपास की हरियाली की वजह से डल का नीलापन हरे रंग को भी संजोए हुए था, असल में रंगों का विष्फोट था उस वक्त आँखों के आगे…रंग-बिरंगे फूल और उतनी ही रंग बिरंगी पोशाकें, साथ मे आकाश गंगा सा फैला-बिखरा बलखाता विस्तार खूबसूरत हरे-नीले रंग के पानी का, जो अपने आप में बेहद अनूठा अनुभव था। सुन्दर सजे-धजे शिकारों पर सजे-धजे लोग घूमते दिख रहे थे चारो तरफ—अधिकांशतः नवविवाहित लाल चूड़े और जेवरों में लदी-फंदी किशोरियाँ अपने सजीले गर्वीले दूल्हों के साथ । दूल्हा तो अपना भी सजीला और गर्वीला ही था पर आज जब सोचती हूँ तो अपनी सादगी और स्वभाव पर आश्चर्य होता है-सारे गहने और मेकअप का सब सामान वगैरह , कुछ साथ नहीं लाई थी। न तो उस सबकी आदत ही पड़ पाई थी तबतक और ना ही शौक ही लग पाया था। इन्हें संभालूगी या घूमूंगी, सोचकर सब घर पर ही छोड़ दिया था। बालसुलभ उत्साही और सैलानी मन तो सिर्फ घूमना चाहता था। यादों के एलबम संजोना चाहता था, आजीवन उलटने-पलटने को। …परन्तु मौसम और माहौल का पूरी तरह से जायजा ले पाऊँ, इसके पहले ही कुछ भगदड़ सी दिखी और शोरगुल सा हुआ। अभीतक हंसते-मुस्कुराते लोग अब भयभीत इधर-उधर बेतरतीब दौड़ रहे थे और पटाकों के कुछ छुटपुट धमाकों ने पूरी तरह से उस सम्मोहन से तुरंत ही जगा दिया मुझे। ठीक सामने, सड़क के दूसरी ओर जो शयद स्थानीय बस अड्डा था, एक टूरिस्ट बस को आग लगा दी गई थी। कुछ पत्थरबाजी भी हो रही थी वहाँपर। एक बार फिर मेरा अव्यवहारिक मन भय से अधिक दुखी हो चला था। सन 65 में बनारस में हुए उस विद्यार्थी आंदोलन और तोड़फोड़ की दुखद यादें अभी मन से गई नहीं थीं , जहाँ ऐसे ही बस जलाई गई थी और कनवोकेशन रद करके हमारी स्नातक की डिग्रियाँ हमें डाक से भेजी गई थीं। कितनी तैयारी की थी हम सहेलियों ने न सिर्फ एक सी साड़ी खरीदी थी, एक से स्वेटर भी तो बुने थे…पर सब व्यर्थ। क्यों इतना नुकसान करते हैं ये तोड़फोड़ करते लोग , देश का…देशवासियों का…उनके सपनों का…. देखूँ, जानूँ, इसके पहले ही दोनों कानों को हथेलियों से दबाए, नरेन्द्र करीब-करीब घसीटते से , शिकारे वाले का अनुसरण करते पास खड़ी नाव तक ले गए मुझे और कुछ ही पलों में हम एक बेहद खूबसूरत और आरामदेह शिकारे के अंदर थे। शिकारा क्या मानो एक परीलोक ही था। कुछ ही मिनटों में गरम -गरम स्वादिष्ट खाना हमारे सामने था और हम चुपचाप खाना खाकर सो गए…वही सही था उस वक्त। सारे खतरे और यात्रा की थकान ने हमारे घूमने को हौसले को पस्त कर दिया था। शिकारे वाले का कहना था कि घूमना सुरक्षित नहीं । कल जैसा भी हो देख लेंगे। पर शिकारे के अंदर हम पूर्णतः सुरक्षित थे उसके अनुसार…डर की कोई बात नहीं थी। जान दे देगा वह हमारे लिए पर हमारा बाल तक बांका न होने देगा…। उसका भय और जुनून दोनों ही संक्रामक थे और विचलित कर रहे थे, क्योंकि डर और असुरक्षा तो उस वक्त वहाँ चारो तरफ हवा की तरह व्याप्त हो चुकी थी।

सुबह आंखें खुलीं तो शहर मे कर्फ्यू लग चुका था जो सिर्फ कुछ घंटों के लिए ही खुलने वाला था। अब मुख्यतः हम उस शिकारे में कैद थे। शिकारे वाला बहुत ध्यान रख रहा था हमारा और इन हालात पर बेहद शर्मिंदा भी था पर हमारे मन को एक बेचैन भय कुतरने लगा था और हम अब पूरी तरह से असुरक्षित महसूस कर रहे थे । अपने ही देश में ऐसा अनुभव, मन वाकई में क्रुद्ध भी था और बेचैन भी। बारबार ससुर जी की आग्रह भरी सलाह याद आने लगी थी, शिमला, दार्जिलिंग, या नेपाल कहीं भी चले जाओ , काश्मीर के हालात सही नहीं हैं इसवक्त। पर हम दोनों को तो काश्मीर ही आना था…आखिर भारत में ही तो है काश्मीर …भारत का अभिन्न हिंसा…हमारी दलील थी उनके आगे और अंततः उन्होंने हारकर अनुमति दे ही दी थी, पर हमें क्या पता था कि सिर मुंडाते ही ओले पड़ेंगे यहाँ पर।

सुबह सुबह गरम कश्मीरी कहवे का प्याला पीकर नीचे ही रखा था कि हमारी दुविधाओं का अंत करते, संतोष जीजी और विद्यासागर जैन जीजाजी हमें अपने घर लेने आ पहुँचे और जबर्दस्ती मिनटों में सारा सामान समेटकर ले भी आए। दिल्ली से जीजाजी (नन्दोई जी) का फोन उनके पास इस आग्रह के साथ रात को ही आ चुका था कि हमें वह वहाँ शिकारे पर अकेला किसी भी हालत में न रहने दें वर्तमान उन हालात में।

संतोष जीजी ( नन्दोई जी की बड़ी बहन) का घर श्रीनगर के सर्वाधिक संपन्न और सुरक्षित इलाके में था और हमारी ननद रानी की आंखों में उनके नवविवाहित भइया-भाभी वहीं पर सुरक्षित थे इस माहौल में। यह भी एक सौभाग्य ही था कि दिल्ली, जोरबाग में जीजी-जीजाजी के पास हमारे हर ठहरने वाले स्थान की बुकिंग के डिटेल और संपर्क नंबर नरेन्द्र ने छोड़ दिए थे। उस वक्त संतोष जीजी के यहाँ उनकी छोटी बहन श्री जीजी अपने बच्चों के साथ और उनकी ननद भी पहले से ही मौजूद थीं। घर पूरा मेहमानों से भरा और मौज-मस्ती व पर्यटन का माहौल वाला था। अगली सुबह ही हम सब श्रीनगर के घुटन भरे वातावरण से दूर सोनमर्ग के लिए निकल गए। कश्मीर का हर रूप नया और लुभाना था। सोनमर्ग भी अपवाद नहीं। पहाड़ी नदी को घोड़े पर चढ़कर पार करना फिर सामने की बरफ की पहाड़ी पर हंसते-हंसते दौड़कर चढ़ जाना आज भी यादों के एलबम में कल सा ही तो सजा हुआ है। पर ऊपर पहुँचते ही, ढंड से कांपने लगी थी मैं । खद्दर का वह पतला चूड़ीदार पजामा उस ठंड के लिए पर्याप्त नहीं था शायद। जब ठंड और बर्दाश्त नहीं हुई तो तुरंत ही कोट को उतारा और बोरी की तरह बिछाकर उसी पर बैठकर मिनटों में फिसलती-सरकती नीचे तलहटी में वापस आ गई ।

मुड़कर देखा तो पीछे-पीछे नरेन्द्र भी आ रहे थे और थोड़ी ही देर में बाकी सब भी पहुँच गए।


( सोनमर्ग, एक कश्मीरी परिवार के साथ, 1967)

सभी का आनंद खराब करना तकलीफ दे रहा था मन को,पर जब सभीने कफ की उलटियाँ करते देखा तो खिलनमर्ग और गुलमर्ग आदि का सारा प्रोग्राम कैंसिल करके हम वापस श्रीनगर लौट आए। फिर तो अगले दो दिन मेरे तेज बुखार की गफलत में ही निकले। बेहोशी जैसी नींद में बस सोती रही और मेरे जगने का इंतजार करते, ये सब ताश खेलते रहे।

दो दिन कब और कैसे निकल गए, कुछ पता नहीं। तीसरे दिन रात को आठ बजे के करीब जब आँख खुलीं तो बगल केकमरे से हँसने और बात करने की आवाजें आ रही थीं। सोचा कि उसी पहले दिन की शाम होगी , पर सबने याद दिलाते हुए बताया कि पूरे दो दिन से नहीं उठी, बस सोती रही हूँ ।

हरेक की जुबां पर एक ही सवाल था उस वक्त, अब कैसी हो ?

एक शर्मीली ठीक हूँ , कहकर मैं भी चुपचाप उनके खेल में शामिल हो गई थी, पर ससुराल के रिश्तेदारों में आग की तरह यह बात फैल गई कि नरेन्द्र की बीबी बड़ी नाजुक और अभी बच्ची ही है । नरेन्द्र तो पूरे जोरू के गुलाम हैं, वगैरह वगैरह। बीबी की बहुत सेवा करते हैं। स्पंज करते हैं, कपड़े बदलते हैं, बिस्तर में ही खिलाते-पिलाते हैं, बाल तक काढ़ लेते है। बजाय तारीफ और सहानुभूति के उन बातों में ईर्षा का पुट अधिक लगा। विशेष कुछ याद नहीं, सिवाय इसके कि यह सब सुनकर, शर्म नहीं, बहुत अच्छा लगा था। शायद थोड़ा-थोड़ा कुछ खराब भी क्योंकि वाकई में नरेन्द्र ऐसे नहीं, बेहद अकड़ू हैं। जोरू के गुलाम पति तो मुझे खुद पसंद नहीं, पर राक्षस पति भी नहीं और नरेन्द्र राक्षस नहीं हैं। हर बीमारी हारी में इनका सहानुभूति भरा समर्पित देवतुल्य स्वभाव देखा है मैंने। हमेशा जरूरत पड़ने पर पूरी सहानुभूति और लगन से साथ दिया है। जरूरत पड़ने पर स्त्री-पुरुष जैसी कोई अकड़ या सीमा नहीं रही। यही वजह थी कि उन शुरुवाती दिनों में ही मन ने पति की तरफ दोस्ती का हाथ ब़ढ़ा दिया था तुरंत ही। उसदिन से आजतक हर मुश्किल की घड़ी में चट्टान से ही साथ खड़े हैं हम।

अगली सुबह खुशनुमा थी। शहर का वातावरण भी सामान्य हो चला था और कर्फ्यू हट चुका था। और हम भी एकबार फिर वापस अपने उसी शिकारे में लौट आए थे और अगले तीन दिन जी भरकर डल लेक और श्री नगर घूमे भी। दिलशाद गार्डेन में झरनों के किनारे घूमते और फोटो खिंचाते समय तो मानो हमारे अंदर खुद राजकुमार और राजकुमारियों की आत्मा आ बसी थी। नेहरू पार्क , महाराजा कर्ण सिंह की पैलेस …ट्यूलिप गार्डेन सभी कुछ घूमा और जी भरकर घूमा । परी महल देखा , जो श्रीनगर से 11 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जिसकी रचना मुगल शासक शाहजहां के बेटे दारा शिकोह के द्वारा 17वीं शताब्दी में की गई थी। कहा जाता है कि यहां पर पहले बौद्ध मठ हुआ करता था बाद में इसका इस्तेमाल ज्योतिष कुल के लिए किया गया। परी महल डल झील के किनारे और ‘चश्मे शाही बाग’ के ठीक ऊपर ही है।

चश्मे शाही बाग श्रीनगर का पहला मुगल बाग है, जिसकी रचना सन 1632 में शाहजहां के कश्मीर प्रांत के गवर्नर अली मर्दान खान ने करवाई थी। 1 एकड़ में फैला यह बाग श्रीनगर का सबसे छोटा मुगल बाग है। जिसको रॉयल स्प्रिंग के नाम से भी जाना जाता है। और इस बाग से डल झील का नजारा देखने लायक होता है।

नागिन झील भी गए जो ‘ज्वेल इन द रिंग’ के नाम से भी जानी जाती है। चारों तरफ पेड़ों से घिरी हुई यह झील अपने साफ-सुथरे नीले रंग के पानी के कारण नागिन झील के नाम से जानी जाती है। और यह झील डल झील का ही एक भाग है। यह झील अपनी गहराई और पानी के कम प्रदूषित होने के कारण स्विमिंग और वाटर स्पोर्ट्स के लिए भी काफी जानी जाती है। यहीं पर अति उत्साह के कारण नरेन्द्र डूबते-डूबते बचे थे और तुरंत सहायता की वजह से एक बड़ा हादसा टल गया था।

निशात बाग का अर्थ होता है खुशियों का बाग। यह बाग डल झील के पूर्वी तट पर स्थित है जिसकी रचना सन 1633 में नूरजहां के भाई ‘हसन आसिफ खान’ ने करवाई थी। 46 एकड़ में फैला हुआ यह बाग श्रीनगर का सबसे बड़ा मुगल बाग है। और यह बाग भी श्रीनगर से 11 किलोमीटर की ही दूरी पर स्थित है।

कश्मीरी भाषा में बल का अर्थ होता है जगह और हजरत बल अर्थात हजरत की जगह । हजरतबल की दरगाह श्रीनगर में स्थित एक प्रसिद्ध और खास दरगाह है। इसे कश्मीर का सबसे पवित्र तीर्थ भी माना जाता है। लोग मनौती लेकर आते हैं और इसकी जाली की दीवार में काला धागा बांधते है। इच्छा पूरी होनेपर पुनः जाकर धागा खोलना होता है। चादर भी चढ़ाई जाती हैं। माना जाता है कि इसमें इस्लाम के नबी पैगंबर मोहम्मद की दाढ़ी का एक बाल रखा हुआ है और इसीलिए यह जगह मुस्लिम लोगों के लिए विशेष आस्था का प्रतीक है।

शंकराचार्य का मंदिर शंकराचार्य पहाड़ी पर स्थित है। कहते हैं कि इस मंदिर की रचना 371 ईसा पूर्व राजा गोपादत्त ने करवाई थी। समुद्र तट से करीब 1100 फीट की ऊंचाई पर बना यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है, और ऐसा माना जाता है कि पहले इस मंदिर का नाम गोपादारी था। फिर जब आदि गुरु शंकराचार्य अपनी कश्मीर यात्रा के दौरान इस जगह पर रुके, तब से इस मंदिर का नाम शंकराचार्य मंदिर रख दिया गया।

जब हम निशातबाग घूमने जा रहे थे तो शायद मेरी सादी वेशभूषा को देखते हुए नरेन्द्र के मेडिकल स्कूल के एक प्रोफेसर जो संयोग से उस वक्त उसी बस में मौजूद थे और जो मुझसे मिलने को बेहद उत्सुक भी थे, क्योंकि उन्होंने मुझे नरेन्द्र की पत्नी नहीं, सहपाठिनी समझ लिया था। मेरे बारबार बताने पर भी कि मैं उनकी पत्नी ही हूँ, अभी महीने भर पहले ही हमारी शादी हुई है और हम दोनों अकेले ही आए हैं यहाँ पर घूमने, वह मुझसे पुनः पुनः पूछते रहे, क्या कोई और भी साथ आया है हमारे या हम अकेले ही घूम रहे हैं । हद तो तब हुई , जब यह बताने पर कि शादी बनारस में पिछले महीने हो चुकी है हमारी, उन्होंने फिर पूछा तो क्या मित्तल ने बनारस जाकर शादी कर दी तुम दोनों की और किसीको बुलाया भी नहीं। अब आगे और कुछ पूछना या बताना व्यर्थ था उन्हें कि वह जिन मित्तल का जिक्र कर रहे थे उनका नाम तो सुना था पर मैं उनसे मिली तक नहीं कभी। हाँ, यह वही मित्तल थे, जिनके नीचे नरेन्द्र पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहे थे और जिनकी चार-चार बेटियाँ थीं, यह बात मैं अवश्य जानती थी। और यह भी कि नरेन्द्र पर स्नेह था उनका। नरेन्द्र जो चैरी लेने उतरे थे, जब वापस बस पर चढ़े तो प्रोफेसर साहब भी तुरंत ही उठकर अपनी सीट पर जा बैठे। बाद में जब नरेन्द्र से उनके बारे में पूछा और पूरा वाकया उन्हें सुनाया तो हंसकर नरेन्द्र बोले -जानती हो विद्यार्थियों के बीच इनका निकनेम क्या है-कद्दू!

गुरु को भगवान मानने वाली मेरी बुद्धि को यह निश्चय ही अनूठा धक्का था। फिर याद आया रोज रटकर आने वाली एक अध्यापिका को मैंने भी तो ऊबकर तोतामुखी नाम दे दिया था और हम सहेलियों के बीच यह नाम काफी प्रचलित भी हो गया था।

एक और ऐसी ही हास्यास्पद घटना थी श्रीनगर की जब हम मैटिनी शो में साधना की एक नई रिलीज-शायद अनीता नाम था , देख रहे थे और टिकट चेकर ने हमें भागे हुए विद्यार्थी समझकर हॉल छोड़ने को कहा था । वह तो गनीमत थी कि नरेन्द्र के पास उनका ड्राइविंग लाइसेंसे था जो सिद्ध कर सका कि वे पच्चीस के हैं और मेरा नया नया बना पासपोर्ट भी था जो हालही में दिल्ली से लिया था हमने, जो मेरे शादीशुदा और बीस साल की होने की गवाही दे रहा था। अब वह खुद शर्मिंदा था और सौरी कहकर तुरंत चला भी गया। उसके बाद तो हम लोग हर जगह पासपोर्ट और ड्रिविंग लाइसेंस के साथ ही जाते थे, जाने कब जरूरत पड़ जाए और कहाँ लोग सबूत मानने लग जाएँ…ऐसे ही चुटकुलों से गुजरते, प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेते श्रीनगर का वह पहला हफ्ता कब निकल गया हमें पता ही नहीं चल पाया। इतिहास को उलटते पलटते, खूबसूरत नजारों में डूबते-उबराते हम जो चार हफ्ते के लिए आए थे, दस हफ्ते तक वापस लौटने का नाम न लिया हमने और काश्मीर का चप्पा-चप्पा जी भरकर घूमे। अमरनाथ और खैबर पाथ भी हो आए होते, अगर अचानक की बर्फवारी और लुढके पत्थरों ने रास्ता न रोक लिया होता और हमें आधे रास्ते से ही वापस न लौटना पड़ता।

यात्रा का अगला पडाव खूबसूरत पहलगाँव था और वहाँ पहुंचकर हमने नदी किनारे खड़े सारी सुविधाओं से लैस तम्बू में चार दिन को अपना डेरा डाला। यह तम्बू, बहती नदी के किनारे बसे होने की वजह से पहलगाँव का मुख्य आकर्षण थे उन दिनों । कई फिल्मों की शूटिंग हुई है वहाँ पर। पहलगांव क्लब भी उसी आहते में है जहाँ खानापीना और हाउजी आदि तरह तरह के मनोरंजक कार्यक्रम होते रहते थे हर शाम। बनारस जैसे छोटे शहर की लड़की जिसका वास्ता सिर्फ घर और पढ़ाई से ही रहा था, यह सब कुछ नया और अचरज से भरा हुआ था।

कहते हैं जुआरी जब पहली बार जुआ खेलता है तो किस्मत जबर्दस्त साथ देती है, मेरे साथ भी उसदिन कुछ वैसा ही हुआ। क्लब में घुसते ही पहली ही पचास रुपए की हाउजी की टिकट ने पांच सौ जिता दिए। पर वह रुपए मुझे अपने पास नहीं रखने थे-बाबूजी का कहना बारबार याद आ रहा था कि हराम का एक पैसा भी अपने पास मत रखना, वरना मेहनत की कमाई भी साथ ले जाएगा। सो अगले दिन ही जीत की पाई-पाई खर्च कर दी फुटकर तोहफों में…अपने लिए नहीं दूसरों के लिए। पाँच सौ रुपए शायद बहुत होते थे तब। भाई-बहन और देवर जिठानी सबके लिए छोटे छोटे तोहफे आ गए उन पैसों में। एक और फायदा हुआ पहलगांव क्लब जाने से उसदिन, वहीं हमारी पहचान गोयल दम्पति से हुई , जो न सिर्फ कानपुर से थे और हमारे पास के ही टेन्ट में ठहरे हुए थे अपितु उनकी पत्नी भी बनारस की ही थीं…नरियल बाजार से। फिर तो दोस्ती ऐसी छनी कि अगले तीन चार हफ्ते हम साथ-साथ ही घूमे। पहले दिन ही गोयल साहब ने जिद करके खूबसारा टमाटर और धनिया व हरी मिर्च डालकर औमलेट बनाया और बेहद जिद व प्यार के साथ खिलाने की कोशिश भी की। शाकाहारी परिवार में पली-बढ़ी मेरे लिए वह एक कठिन पल था , उनकी भावनाएँ आहत न हों , इसलिए निगल तो लिय़ा पर दुबारा नहीं खाया , उनके बारबार यह कहने पर भी नहीं- कि फर्क तो नहीं, कुछ भी नहीं। बिल्कुल चीले जैसा ही तो स्वाद है इसका भी। अब सोचती हूँ तो हंसी आती है कितनी जिद और बचपना था तब मुझमें। पहली गर्भावस्था में जब बहुत एनीमिक हो गई थी तो पति के आग्रह पर भी तो आमलेट खाना शुरु किया ही था। अब तो खूब चाव से, जाने कितने आमलेट खा और खिला चुकी हूँ।

अगले दिन शाम को उन्होंने हमें चाय पर बुलाया था, जहाँ जाकर पता चला कि शागिर्द फिल्म की शूटिंग चल रही थी और अभिनेता जौय मुखर्जी व सायरा बानू भी आएंगे चाय पीने हमारे साथ। थोड़ी निराशा तब हुई जब जौय मुखर्जी तो आए और साथ चाय भी पी, पर सायरा बानू का कोई अतापता नहीं था। वह शूटिंग खतम होते ही पता नहीं कहाँ चली गईं। मिसेज गोयल ने जौय मुखर्जी के साथ कई फोटो खिंचवाई। हम से भी पूछा, पर मैंने हंसकर मना कर दिया। वह सब बचपना मेरे तबके स्वभाव और गरिमा से कतई मेल नहीं खाता था।


( मिसेज गोयल के साथ, गुलमर्ग 1967)

मिसेज गोयल शायद फिल्मों में ही डूबी रहती थीं और मेरा इक्की दुक्की फिल्मों को छोड़कर फिल्मों से कोई खास लगाव ही नहीं था उन दिनों। पर जिन्दगी मनमानी की ही तो हमेशा इजाजत नहीं देती, क्या पता था कि छह महीने बाद ही, लखनऊ में जिठानी के भाई की शादी में अपने देवर के साथ कोल्ड कौफी पीने के लालच में और शादी के भीड़भाड भरे घर से शांति के लिए, वही शागिर्द फिल्म चार दिन में चार बार, रोज ही मैटिनी शो में देखनी पडेगी…वह भी मुझे, जो शायद ही कभी कोई फिल्म दोबारा देखने का धैर्य जुटा पाती है। एक बार तक तो कई फिल्म पूरी देख नहीं पाती । यदि फिल्म बांधे नहीं तब तो हरगिज ही नहीं। जो अच्छी लगती है, बस वही फिल्म पूरी देखती हूँ और याद भी रख पाती हूँ। वरना तो बूढ़ों की तरह बचपन से ही ऊंघने या इधर-उधर विचारों में भटकने का सिलसिला चालू हो जाता है। पर यह शागिर्द फिल्म आज भी यादों में अलग ही है, विशेषतः आई . एस जौहर और सायरा बानो का अभिनय। फिर वह शादी भी तो विशेष शादी थी, जिसके लिए मैं अपनी जिठानी को मना नहीं कर पाई थी, जिनके मायके लखनऊ में मैं उनके और अपने देवर के सिवाय किसी को नहीं जानती थी। किसी से कुछ कह या पूछ नहीं पाती थी। और जिसकी वजह से नरेन्द्र के इंगलैंड पहुंचने के सात महीने बाद इंगलैंड पहुँची थी, जिसका नरेन्द्र ने कई सालों तक उलाहना दिया था कि काम के डर से इंगलैंड आना डालती रही थी मैं, या आना ही नहीं चाहती थी।

पर, रिश्तेदारी तो निभानी ही पड़ती है और जिठानी का हुक्म भी मानना ही पड़ता है।

पारिवारिक जिम्मेदारियों को ढोना. हम औरतें कैसे छोटी उम्र से ही सीख लेते हैं शायद ही कोई पुरुष कभी समझ पाए! वैसे भी, इतनी बुरी भी नहीं थी वह कौमेडी…उस फिल्म की भी और मेरे लिए उन जटिल परिस्थितियों की भी।…

गोयल दम्पति से मुलाकात के बाद हमारी वह काश्मीर यात्रा एक नया और नाटकीय रूप ले चुकी थी। हर दूसरे दिन उनमें आपस में नोकझोंक हो जाती और मिसेज गोयल रूठकर कहीं दूर जा बैठतीं। तब गोयल साहब नरेन्द्र को मनाने भेजते। नरेन्द्र सहज ही उन्हें मना भी लाते और कुर्सी पर बैठते ही वह बहुत ही प्यार व मलाल के साथ कहतीं- ‘ इतना सुंदर और समझदार लड़का हाथ से निकल गया । मेरी बहन भी शादी की ही उम्र की है, पर हमें तो कुछ पता ही नहीं चल पाया ।‘
तब नरेन्द्र सबकी नजरें चुराकर मेरी तरफ आंख मारते और हाथ पीठ की ओट करके अपने हाथ में ले लेते…पता नहीं मुझे या खुद को ही आश्वस्त करने लगते थे शायद।…

एक और समस्या थी, शादी के सात साल हो चुके थे और अभी तक उनकी गोद नहीं भरी थी। हर मन्दिर और दरगाह में वह पूजापाठ व धागा बांधने जातीं। हम भी घूमे थे साथ साथ ही पर न हमने धागा बांधा ना ही चौक लीपा। हाँ कई बार यह खयाल अवश्य आया कि हंसू या रोऊं इन अनोखे अपरिचित बंधनों पर।

एक बार को कानपुर में छोड़कर, उसके बाद फिर कभी मुलाकात नहीं हुई थी गोयल दम्पति से सन 78 तक, जब भांजी तनु की शादी में हम दोनों लड़की के मामा मामी थे और वही हमारे काश्मीर वाले गोयल युगल लड़के, यानी दिलीप जी के। फिर तो तुम यहाँ कैसे …और आप यहाँ कैसे कहकर जी भरकर गले मिले थे दोनों ममिया ससुर एक दूसरे से।

वाकई में गोल गोल ही तो है और गोलगोल घुमाती भी है जिन्दगी, जहाँ मिले बिछुड़ जाते हैं और बिछुड़े यूँ ही अचानक फिरसे मिल जाते हॆं। और हम इस सबके बीच, मात्र एक दर्शक… स्वाइशों के पुतले…अपने राग-रंज में पूरी तरह से डूबे-भीगे।

आज भी तो कहीं भी घूमूँ, यही तो कहता पाती हूँ खुदको-

‘ हमारा काश्मीर भी इससे कम सुंदर तो नहीं।‘….

शैल अग्रवाल

(हम दोनों, पहलगांव, 1967)

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shailagrawal@hotmail.com