अपनी बातः काश्मीर-यथार्थ की धरती पर

आज 31 अक्तूबर 2019 है और भारत के लिए तो अपने आप में यह तारीख कई तरह से महत्वपूर्ण हो चुकी है , अनगिनित संभावनाओं से पूर्ण।…
आज ही के दिन भारतवासी और भारत प्रेमियों का एक असाध्य स्वप्न साकार हुआ है। जो पिछले सत्तर वर्ष से संभव ही नहीं था, क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जी ने काश्मीर के मुद्दे को अपने हाथ में ले लिया था। अन्य रियासतों की तरह सरदार पटेल को नहीं सुलझाने दिया था और तभी से यह एक ऐसा अंतर्राष्ट्रीय मसला बन गया जो दिन-प्रतिदिन और पेचीदा होता चला गया। सरदार बल्लभभाई पटेल को इस बात का मरते दम तक मलाल रहा। वह नेहरू जी की तरह मात्र स्वप्न दृष्टा नहीं थे अपितु सपनों को हकीकत में बदलने के लिए हर संभव कोशिश करते थे। आज उसी लौह पुरुष का जन्मदिन है और आज से ही जम्मू और काश्मीर, लद्दाख के साथ अब भारत के ही दो अलग-अलग प्रांत बनकर अस्तित्व में आ चुके हैं। इनके सुख-दुख हमारे हैं, इनकी खुशियाली और विकास भी हमारी साझी जिम्मेदारी है अब।

सरदार पटेल का 144 वां जन्मदिन है आज , वही सरदार पटेल जिन्होंने 562 बिखी रियासतों को जोड़कर एक माला में पिरोया और अखंड व आधुनिक भारत की नींव रखी। सरदार पटेल को इससे बेहतर श्रद्धांजलि नहीं दी जा सकती । हमने अब अपनी भ्रांतियों के जालों को तोड़ने की शुरुवात कर दी है इन सकारात्मक कदमों से और देश के सर्वांगणीय विकास की योजना शुरु हो चुकी है।… एक नासूर जो सिर दर्द बन चुका था उसकी सफाई और उपचार के प्रति, देश की एकता के प्रति निश्चय ही एक सार्थक कदम है यह। विवेक ने साथ दिया तो शीघ्र ही यह दुःखता कराहता काश्मीर भी अपने पके लाल सेवों की तरह समृद्ध और खुशहाल प्रांत होगा भारत का। यथार्थ की धरती पर ही खुशियों की इमारत खड़ी की जा सकती है, वरना अकबर और बीरबल के किस्सों की तरह पिछले सत्तर साल से ईंट ला, गारा ला जैसे जुमले हवा में तैर ही रहे थे।

कहते हैं कि अगर नीयत साफ हो तो भगवान या अल्लाह भी साथ देता है, और हम सभी जानते हैं कि भारत ने यह कदम खूब सोच-विचारकर, पूरी नेक-नीयति से काश्मीर व भारत की प्रगति व समृद्धि के लिए ही लिया है। अब इसके चहुमुखी विकास , इसके हर सुख-दुख के लिए भारत ही पूर्णतः उत्सुक और जिम्मेदार होगा क्योंकि अब यह हमारा अपना अंग है।

चन्द रियासतें जैसे काश्मीर भारत का हिस्सा होकर भी, भारत में पूर्णतः विलय नहीं हो पाई थीं, क्योंकि हमारी व्यव्स्था और कानून में कुछ ऐसी श्रुटियाँ रह गई थीं, जिनकी वजह से खुद हमारे अपने ही घर में गैरों का अतिक्रमण रहा और जिसकी भरपाई हमने सत्तर साल की। तत्कालीन भारत के प्रधान मंत्री ने काश्मीर का मुद्दा जो अपने हाथ में लिया तो भारत की ढुलमुल राजनीति व पड़ोसी देशों को षडयंत्र के चलते यह अशांति और अनैतिक आक्रमणो, और अवैध गोरिल्ला लड़ाइयों का प्रशिक्षण केन्द्र बनकर रह गया।

नेहरू जो स्वप्न दृष्ठा और आदर्श वादी थे , अपनी अंतर्राष्ट्रीय छवि का भी ध्यान रखते थे। काश्मीर को एक अजीबोगरीब उलझी हुई स्थिति में छोड़ गए। काश्मीर भारत का हिस्सा था तो पर वास्तव में नहीं । भारत से वहाँ का झंडा अलग था, कानून अलग था और भाषा तक अलग थी। कश्मीरियों के अलावा अन्य वहाँ रह-बस नहीं सकते थे। आए दिन के असंतोषी तहस-नहस और हिंसा दैनिक जीवन का हिस्सा थी। बाहरी ताकतें भाई को भाई के शिलाफ लड़वा रही थीं और हम बस अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों से अपने निजी देश की समस्या का हल ढूंढते और मांगते, परेशान हो रहे थे। एक दो वर्ष नहीं, पूरे सत्तर साल तक यह दुस्वप्न जैसी ढुलमुल स्थिति चली।

परन्तु यह भी एक अलौकिक आशीर्वाद और समकालीन नेताओं की सूझबूझ ही है कि सरदार पटेल के 144 वें जन्म दिन पर उनकी मृत्यु के 69 साल बाद उनका वह अखंड भारत का अधूरा सपना पूरा हुआ, जिसकी चाह हर शांतिप्रिय भारतीय को जाने कबसे थी। पटेल और गांधी, जिन्होंने एकता के महत्व को समझा और समझाया, इन्होंने न सिर्फ अखंड भारत का सपना देखा , अपितु भरसक प्रयास किया कि धर्म और भाषा के आधार पर नफरत की दीवारें न खड़ी हो पाएँ, कि वैष्णव जन तो तेने कहिए जो पीर पराई जाणे रे…कि विविधता में भी भारत एक रहे, श्रेष्ठ रहे। और एर बहुत सही निर्णय है यह भी भाररत सरकार का कि अबसे हम 31 दिसंबर को एकता दिवस के रूप में मनाएंगे । प्रेम-प्यार की यह माला टूटने न पाए यह जिम्मेदारी भी अब हम सभी की है।

जहाँ एक तरफ भारत में जुड़ने की बात हो रही है, वहीं दूसरी तरफ यहाँ ब्रिटेन में टूटने की। और इसके लिए भी यहाँ के प्रधान मंत्री ने यही 31 अक्तूबर का दिन ही चुना था।

तीन वर्ष पूर्ऴ करीब-करीब यहाँ की आधी जनसंख्या ने यूरोपियन संगठन से बाहर आने के लिए मत दिया और तभी से एक विभ्रम और अवसाद-सी स्थिति है ब्रिटेन में चारो तरफ जैसी कि किसी भी संबंध विच्छेद के वक्त होती है फिर यह निर्णय तो यूँ ही बहसबाजी में आमंत्रित हो गया था, जनता उसके दूरंगामी नतीजों पर गुनन-मनन तक नहीं कर पाई थी। पर अब लोग असुरक्षित और नाखुश हैं नौकरियों को लेकर, दवाइयों की सप्लाई को लेकर । कन्जरवेटिव पार्टी के तीन-तीन प्रधानमंत्री, डेविड कैमरन, टैरेसा मे और अब शायद बौरिस जौन्सन भी ब्रेक्सिट की भेंट चढ़ चुके या चढ़ेंगे, पर राजनेताओं के कानों पर फिरभी जूँ नहीं रेंगती । ब्रेक्सिट करना है तो करना है, बस यही एक धुन दिखती है , भले ही आयरलैंड और स्कौटलैंड सब अलग हो जाएं और यूनाइटेड किंगडम बस इंगलैंड और वेल्स ही रह जाए।

फिर भी आज इसी 31 अक्तूबर को ही ब्रिटेन किसी भी शर्त पर यूरोपियन संगठन से बाहर आएगा ऐसा वादा था वर्तमान प्रधान मंत्री बौरिस जौन्सन का। मरूँ चाहे मारूँ जैसा प्रण लिया था उन्होंने । 31 खतम होने को है परन्तु अभी भी इस समस्या का कोई हल नहीं दिखता। बौरिस जौन्सन की हर आस अमेरिकन राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प पर टिकी है और वे 12 दिसंबर को चुनाव की घोषणा कर चुके हैं।

इस सारे विभ्रम को देखकर याद आया कि यह 31 अक्तूबर शैतान की पूजा का भी दिन है- जिसे हैलोईन कहा जाता है। एक सेल्टिक त्योहार जब मान्यता है कि दुष्ट आत्माओं का प्रभाव रहता है चारो तरफ और उन्हें डरावनी पोशाक पहनकर, डरावने मेकअप के साथ डरावे व भगाने का प्रयास किया जाता है। तो क्या इसीलिए प्रधान मंत्री ने यह तारीख चुनी थी? पर क्या यह संभव भी है? इतना आसान है!

दुष्टात्माएँ तो हैं और हमेशा रहेंगी, कभी हमारे अपने तो कभी दूसरों के दिमाग और मन में और आपसी व्यवहार से सबको दिखेंगे भी हैं । फिर भी इनके खिलाफ कोई कुछ नहीं कर पाता। धुनिया भर में बिखरे , धधकते-सुलगते, असंतुष्ट कोने गवाह हैं इस चीज के।

आश्चर्य नहीं कि इस त्योहार ने एक फन त्योहार का रूप अधिक ले रखा है। हौरर पार्टीज में ब्लडी केक परोसे ही जाते रहेगें और लोग देर रात तक आग के इर्दगिर्द खाते-पीते और नाचते भी रहेंगे ही…

दूसरों की समृद्धि, विकास और ऐश्वर्य भरमाता है और इसकी लालसा भटकाती है।

चीन की विकास की बड़ी-बड़ी बातों और अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक उपलब्धियों के बावजूद , अभी भी पूर्व से पश्चिम की तरफ आकर्षण और पलायन कम नहीं हुआ है। आज भी युवाओं के सपनों की मंजिल ये पाश्चात्य देश ही हैं, भले ही वहाँ तक पहुंचने का रास्ता उन्हें सीधे मौत के मुंह में ही क्यों न ले जाता हो। 39 चीनी नागरिकों का यूँ एक लौरी के बंद बक्से में बल्गेरिया से ब्रिटेन पहुंचने की कोशिश और इस प्रयास में उसी डिब्बे में दम तोड़ देना एक हृदय विदारक और असंतोषजनक घटना है।

उत्तेजनाओं के भ्रम में नहीं, यथार्थ में जीना सिखलाना होगा हमें अपने युवाओं को और यह भी कि डर बाहर के भूत-प्रेतों से नहीं, अधिक अंदर के विकारों से ही रहता है। जब-जब दूसरों के अधिकारों पर अतिक्रमण होगा , असंतोष बढ़ेगा और युद्ध भी होंगे। अंत दुखद ही होगा , चाहे वह महत्वाकांक्षा से हो या फिर लालच से…या फिर मात्र भेड़चाल में ही।

देखना यह है कि कैसे भगा पाते हैं हम इन ईर्षा ,डाह और अंधी महत्वाकांक्षा के भूत-प्रेतों को अपनी इस दुनिया से! कहीं धर्म के नाम पर स्कूल में बच्चे मारे जा रहे हैं तो कहीं नौकरी के चक्कर में आए दूसरे प्रांतों के गरीब ट्रक-ड्राइवर।

मानवीय हृदय हीन इस संहार को धरती से, जिसे हमने सारी दया-ममता से विहीन करके मौत की कगार पर ला खड़ा किया है, हटाना और मिटाना आज हम सबकी जिम्मेदारी है। मिलजुलकर रहें तो यह धरती जो सभी की है, सभी के लिए एक संतोष और शांति से भरे जीवन की संभावना रखती है, बिल्कुल हमारे अपने हरे भरे काश्मीर की तरह या फिर किसी भी अन्य देश की तरह ही।

‘लेखनी’ के वर्षांत का यह अंक इसी काश्मीर पर है। काश्मीर जो भारत का शीष मुकुट है और शीष मुकुट का क्या स्थान व इज्जत होती है , हम सभी जानते हैं। धारा 144 के बाद अब कैसे और क्या- क्या अपेक्षाएँ हैं हमारी काश्मीर से, काश्मीर की हमसे… क्या बदलाव देखना चाहते हैं वे और हम वहाँपर, कैसे हम अपने इस मुकुट और स्वर्ग की सुन्दरता, शांति और खुशियाली में इजाफा कर सकते हैं , भय और तनाव मुक्त कर सकते हैं इसे…एक मुद्दा और विचार जो अब हम सभी की मिलीजुली प्राथमिकता है ।

लेखनी ने अपनी रचनाओं; कहानी, कविताओं और आलेखों द्वारा ये चन्द सवाल उठाए हैं, जबाव ढूँढने की कोशिश की है। उम्मीद है हम समझने की कोशिश करेंगे शांति और सहानुभूति…अपनेपन के साथ और अंक आपको पसंद आएगा।

लेखनी के अंग्रेजी खंड की सामग्री क्रिसमस पर और पाश्चात्य देशों में इसके महत्व पर संजोई गई है , और हमें पूरा विश्वास है कि आपको उतना ही आनंद देगी , जितना कि हमने इस पर श्रम किया है।

अगले अंक का विषय हमने हमसभी की चिर-परिचित ‘आभासी दुनिया’ पर रखा है। इसके नफे और नुकसान के बारे में सोचेंगे और बिचारेंगे हम मिलजुलकर। हमारी जीवन पर पड़ते इसके प्रभाव पर भी। फिर देर किस बात की कलम उठाएँ और बीस दिसंबर तक अपनी रचनाएं हमें हिन्दी या अंग्रेजी जिस भी भाषा में चाहें भेज दें। पता वही है, shailagrawal@hotmail.com

सदा की भांति अंक पर आपकी प्रतिक्रियाओं का हमें इंतजार रहेगा।
शैल अग्रवाल

1ए, ब्लैकरूट रोड, सटनकोल्डफील्ड
वेस्ट मिडलैंड्स, य़ू.के.
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