माह के कविः मदन सोनी

सुनो….

सहज नहीं है आजकल
मुह फेर कर जी लेना ….
भीतर से चश्में के
झांकती आँखों को सब पता है ….
बालकनी के गमलों में
तुलसी के पौधे संग
उग आयें हैं मिर्च के पौधे भी …!!
.
गुलाब के उस पौधे की बात क्या करू
जिक्र जिसका मेरी कविताओं में
अक्सर तुम्हारे जिक्र संग होता आया है ..
लाल चींटियों ने …
घर अपने बना लिए है उसमे … !!
..
सूखते पौधे में
पानी डालने से डर लगता है अब
चींटियाँ मर ना जायें कहीं…
पौधे का क्या…..?
बर्दाश्त है उसका यूँ सूखना …
पर
सहज भी नहीं है तुम्हारी यादों से
मेरा यूँ ”मुह चुरा लेना”……..!!
.
अक्सर बात होती है घर में …
चाय पत्ति और शक्कर की
महंगा हो गया है जीना …
सूकून से कोई किसी को
याद भी नहीं कर सकता
.
रोज गली में खेलते शरारती बच्चे
हवा निकाल जातें है साईकिल की
गुठनो में दर्द है…!
खिसियाकर बच्चों के सामने..
रोने को जी करता है…..!!
.
बेबस नहीं हूँ …
पेंशन अभी आती है
सब कुछ तो है घर में मेरे
बस्स चिड़ियाएँ ही अब नहीं आती
घोंसला बनाने….!
सहज नहीं है आजकल जीना
भीतर से चश्में के
झांकती आँखों को सब पता है .. ! सुना तुमने ??

सुनो….

सुनो ..??
.
सीने पर कंपकंपाती उंगलियां
ढूंढती है
कुर्ते के टूटे हुए उस
”दर्द” के बटन को
हाँ ”’दर्द का बटन.”.! …
जो नजाने कब टूट गया …
तुम्हारे चुपचाप चले जाने के बाद !
खुशियाँ बहुत है री
तेरे इस आँगन में
बस्स्स..
एक दर्द का अहसास
धुंधला सा गया है
दर्द ..??
वो, बटन टाँकते वक्त
चुभी सुई सा दर्द
जिसमे छिपी होती थी
अपार दाम्पत्य सुखानुभूति..!
सभी कुछ तो है यहाँ ..
टिकटिक करता घडी का पेंडुलम
चहकती चिड़ियाएं ..महकते पोधे
बच्चों संग फलता फूलता परिवार
और वो आइना भी ..
जहाँ तुम रोज माँगा करती थी
माथे की मांग में सिन्दूर की
लम्बी रेखा खींच…
मेरे जीवन दीर्घ की लम्बी दुआएं…!
.
सुनो ..?/
संभाल कर रक्खी है
मैंने तुम्हारी धरोहर
वो कांच की चटकी हुयी
कच्ची हरी चूड़ियाँ .. 🙁 🙁
.
नहीं नहीं ……मैं कहाँ रोया…
क्यों रोने लगा भला …..??
अच्छा – अच्छा ,
अच्छा सुनो ?/
संभाल कर रखी है ..मैंने
तमाम जरी की साड़ियाँ
जैसा कहा था तुमने …
दे दी है सब की सब तुम्हारी बहु को !
.
तुम्हारा बेटा….
अक्सर चिढ़ाता है मुझे
बूझ -जानकर लाता है तोड़
अपनी कमीज का बटन
कहता है ..
अम्मा होती तो टांक देती
बटन ,…अबतक
और
”’ सुधा ” (तुम्हारी बहु )
चुपचाप मुस्कुरा
लपक ,
टांक देती है
बटन
उसकी कमीज में ..!
.
तुमने पूछा नहीं …..??
मुझे चिड कैसे होती है ?/
अक्सर मैं ,
सुनता हूँ दोनों की बातें
तेरा बेटा ,
कहता है बहु से ‘
मत टांकना जल्दी से कभी
बाबूजी के कुर्ते का बटन
भूल जायेंगे ” माँ ” को
याद रखेंगे हमेशा
बहाने बटन के ……मेरी माँ को !
.
पगला है..
मना भी करता है
और
कमरे में छिप
सुबकता भी है चुपचाप
.
जानता जो है….
सीने पर कंपकंपाती
मेरी उंगलियां
जब भी , ढूंढती है
कुर्ते के टूटे हुए
”दर्द” के उस बटन को
तुम
यही कहीं
मेरे और उसके
बेहद आस पास
करीब ही तो होती हो …………….. सुना तुमने ??

सुनो….

सुनो …!!
पांच वक्त की इबादत ….
अजान देते लाऊड स्पीकर
मंदिर में बजती घंटियों का हल्का शोर
और
दिनभर कोलाहल करता..
ये मेरा शहर
चुप हो गया है ….अचानक ….!!
……..
स्तब्ध है पूरा शहर
स्तब्ध है,
शोर के अचानक थम जाने से …
ताँगे -रिक्शों वाहनों की चिल्ल- पों
स्कूल जाते बच्चों को खिल खिलाहट
चोपड पर
दरीबे में पान बेचते लोगों के
उस शोर के थम जाने से ,
अभ्यस्त रहा है जिसका
हर एक बाशिंदा मेरे शहर का
…..
दहशतगर्दो ने
एक बार फिर ,
पासा फेंक.. धर्म का
ईमान को दहलाने की कोशिश की है
धधक चुकी है बस्तिया …
झुलसते लोग ..
..
विचारों को भी न जाने क्या हुआ है
छुप गयें है धर्म और लिबासों की ओट में
खुश नहीं हूँ मैं …
कत्तई खुश नहीं
अखबारों की सनसनी खेज कतरनों को देख कर
पढता हूँ ….सोचता हूँ और फिर
माथा पीट लेता हूँ इंसानी सोच पर
दहशत गर्दी मे लिपटा हुआ मेरा शहर
छटपटा रहा है गलतियों से उबार जाने को
न जाने कब सुकून की हवाएं दस्तक देंगी
कर्फ्यू में पाबंद मेरे शहर के दरवाजों पर ……सुना तुमने ??

सुनो….

बाबू जी की थाली ……………..
घर के बर्तनो का बंटवारा
करते हुए माँ की आँखों में दर्द उभरा ….
यादें टीस दे गयी ….
आचार की बरनियों को ओंधा देख कर ..!
बड़ी सी दो कढ़ाई जबरन छीन ली बड़की बहु ने
छिनती भी क्यों नहीं ..आखिर …
बड़ा घर जो था उसका ….
तीन -चार बेटे बहु जो थे घर में उसके …
मंझली दो ने अपने अपने हिस्से में
ले ली कुछ बड़ी कुड़चने और मुरादाबादी लोटे
पीतल के कुछ बड़े बर्तन, थालियां ….
छुटकी चुप …..
गुस्साई सी ले गयी …
गर्द में लिपटी……………. ” बाबू जी की थाली ”’ …
कुछ कटोरियाँ , एक सुपारी दान और
तड़की हुयी ,,,,आचार की वो तमाम बरनियां……
बरसों बाद माँ घर में आयी है …..
देख रही है …..शायद कुछ ढूंढ़ रही है
बर्तनो में ……दालान में ,,,,,,टांड पर
बहु …??
अरी छुटकी …..अबके बरस ….आचार न डाला तूने ….???
नहीं माँ …..( खाने की थाली पकड़ाते हुए छुटकी ने कहा )
माँ चुप है समझती है वक्त के इस फेर को
देख कर आयी है ….कल ही
बड़ी के घर …छत पर कडाहिया ओंधे मुह पडी है ..
तीन बहुएं …..घर के भीतर …
कब अलग हो गयी …पता ही न चला ……
मंझलियों ने बेच डाले है
पुराने बर्तन पीतल के भाव
छुटकी ने भी शायद …….??
माँ ?? खाना दूँ ….??
नहीं री ……. नहीं ……..कुछ नहीं बस्स्स अब ……….
सुपारी दान हाथ में पकडे …
(जानें कब डबडबाती आखों से ..दो बूँद गिर गयी चुपचाप …….
माँ को खाना परोसी गयी बाबूजी की उस ”कांसे की थाली ”में )………………….
सुना तुमने ??

सुनो….

बंधन….
..
पता नहीं कब कैसे, किसने बांधे ये बंधन…??
किसी ने तो बांधे होंगे..
तुम्हारे और मेंरे बीच
संवेदनाओं में लिपटे, ”अदृश बंधन.”..!
.
हर्फ़..??
हाँ शायद, वे हर्फ़ ही थे…..
अपने अपने मन की , गीली मिटटी में उकरे
न जाने कब ….
एक दुसरे की भावनाओं के हाथ थाम
वे मिला गए हमको…
बाँध गये चुपचाप ..एक दुसरे से….!
.
तुम्हे तो याद होगा न उन हर्फों का सफरनामा..??
मैं भी कहाँ भूला पाया हूँ..
.
सुना है, नजरें कमजोर हो गयी है तुम्हारी
और अक्सर तबियत भी रहती है …..बिगड़ी बिगड़ी सी
सांसों का तरन्नुम भी बिगड़ जाता है
उन्मान्दी खांसी की बेवजह दखलंदाजी से…!
.
मत रुकना चलती रहना बस..
बैठ जाना गर गुठनों का दर्द बढ़ जाये कहीं
मत भर लाना आंख्ने …अकेलेपन की नमी से
.चल रहा हूँ मैं भी …
बस कुछ काम अभी अधुरें है ….
.
सुनो..??
बालकनी की मुंडेर के उसी कोने में
गुलाब का वो पौधा
अभी सूखा नहीं है….
उम्मीदों की कोपलें अब भी फूटती है
कुछ कलियाँ भी यदा कदा चटकती है
उनकी सुर्खियत याद दिलाती है बरबस मुझे तुम्हारी
.
भूलूँ भी तो कैसे ? . बंधा हूँ बन्धनों में..
न जाने किसने बांधे होंगे ये बंधन..??
”बंधन”…!!
.बिना किसी ”गाँठ” के. !!!! …. सुना तुमने ??

सुनो….

देखा तुमने …??
रचनाओं के इस कोलाहल में
शब्दों का अर्थ भी हमें ही बताना होता है ..
बताना होता है कि…
कैसे कांपते हाथों से.
एक एक शब्द को ….
मन कि सहमती से यहाँ उकेरा हमने ……।
…….
दर्द को शब्दों में ढालना..
ढाल कर दर्द को ..लोगों तक लाना …….
दर्द को समझाना
और दर्द को खुद ही पुन: पी जाना…
आसान है क्या ?? ….
..
मुझे ही देख लो ..
कितनी ही कोशिश कर लूं
मेरे शब्द …
बया कर ही देतें है ….दर्द ..
दर्द ….
जो भिगो देता है अक्सर …….
मुझे …..मेरे उस रूमाल को…….
.जो मेरी जेब से.. अक्सर गायब रहता है ..
आश्चर्य ..है न ….!!
.हाँ, मगर सच है.ये ..
वो रूमाल मैं…
अक्सर भूल जाता हूँ वहां …
जहा मैं किसी के आंसूं पोंछता हूँ
सच….
और .बड़ी विचित्र बात है ये कि ..
मेरे आंसूं पोंछने वाला ..
मेरा ”कोई अपना” तो क्या ….
”मेरा रूमाल” भी
समय पर मेरे पास नहीं होता है …….
….
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मदन सोनी