मंथनः साहित्यकार और सामाजिक प्रतिबद्धता- अज्ञेय

साहित्यकार की सामाजिक प्रतिबद्धता का सवाल, मुझे लगता है, पुराना पड़ गया है। मैं सोचना चाहता था कि यह उन सनातन प्रश्नों में से एक है जो कभी पुराने नहीं पड़ते और जिसका जवाब हर साहित्यकार को अपने जीवनानुभव में बल्कि अपने-आप में और अपने ज्ञान के आधार पर खोजना पड़ता है; लेकिन जिस रूप में और जिस अर्थ में यह प्रश्न सनतन होता वह पह रूप और वह अर्थ आज इस प्रश्न का नहीं रहा है। आज अधिकतर लोग इस सवाल के दो अधूरे उत्तर पा चुके हैं, जो दोनों ही अपने अधूरेपन के कारण और उस अधूरेपन में मिल जाने वाली निर्भ्रान्तता के आभास के कारण खतरनाक हैं।

एक उत्तर यह है कि क्यों कि मेरी निष्ठा अपने प्रति है और साहित्य के प्रति है, और यह निष्ठा साधना का एक रूप होने के कारण दूसरे किसी का उस में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है, इस लिए सामाजिक प्रतिबद्धता का कोई मतलब नहीं है, कोई प्रासंगिकता नहीं है। निःसन्देह एक अर्थ में और एक परिधि में ( या यों भी कह सकते हैं कि एक परिधि के बाहर व्यापक क्षेत्र में ) यह बात सही है; लेकिन कहां सही है, इस की ठीक पहचान न होने से यह निष्कर्ष साहित्यकार को एक अँधेरी सुरंग के मुँह पर लाकर खड़ा कर देता है जिसके आगे केवल बढ़ता हुआ अँधेरा है। उस अँधेरे में हाथ-पैर पटकने का (या चीखने का भी) एक उपयोग हो सकता है और व्यक्ति के विकास में योग भी हो सकता है। लेकिन वह रास्ता साहित्यकार का रास्ता नहीं है। जो लेखक इस उत्तर से संतुष्ट है उस ने सम्प्रेषण के अनिवार्य लक्ष्य से अपने को काट लिया है। साहित्यकार के लिए दूसरे तक पहुँचना जरूरी है, बल्कि दूसरे तक पहुँचना ही उस का लक्ष्य है और वही उस के कर्म को अर्थ और संगति देता है; और वह दूसरा उस सुरंग के भीतर नहीं है।

दूसरा उत्तर यह है कि साहित्यकार समाज की उपज है, समाज में होता है और इस अर्थ में समाज का देनदार है। उसे समाज के लक्ष्यों में योग देना चाहिए और समाज की प्रगति के साथ प्रतिबद्ध होना चाहिए। यह उत्तर भी अपनी सीमा में ठीक है; लेकिन इस में विकृति वहां है जहाँ यह मान लिया जाता है कि जो सामाजिक लक्ष्य है और प्रगति की जो दिशा है उस का निर्धारण साहित्यकार को अपने विवेक से नहीं करना है बल्कि उसका संकेत, उस का आदेश उस को दूसरों से मिलने वाला है—ऐसे दूसरों से जो अपने को ही समाज मानते हैं, कम-से-कम इस अर्थ में कि सामाजिक प्रगति का निर्धारण करने का अधिकार वह अपना मानते हैं और साहित्यकार के विवेक को इस मामले में स्वतंत्र मानने को तैयार नहीं हैं। अर्धात् सामाजिक प्रतिबद्धता वहाँ उन निर्धारकों के लक्ष्यों के साथ प्रतिबद्द हो जाती है। अँधेरी गुफा का रूपक यहाँ लागू नहीं होता। लेकिन दूसरों के लक्ष्यों के साथ प्रतिबद्धता साहित्यकार के लिए एक मानसिक गुलामी का स्वीकरण है जो इस लिए और भी घातक है कि लक्ष्य निर्धारण करने वाले इन दूसरों का उद्देश्य साहित्यिक नहीं है, सांस्कृतिक भी नहीं है, आर्थिक अथवा प्रशासनिक व्यवस्था को छोड़ कर किसी दूसरे अर्थ में ’ सामाजिक ’ भी नहीं है। यह हो सकता है कि उन के आर्थिक लक्ष्य अच्छे हों और देश की आर्थिक समृद्धि के लिए उपयुक्त हों ; यह भी हो सकता है कि उन के प्रशासनिक उद्देश्य देश में शान्ति-व्यवस्था और स्थायित्व लाने वाले अथवा अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को सुधारने वाले हों। लेकिन दो सच्चाइयों को किसी तरह अनदेखा नहीं किया जा सकताः पहली यह कि जो प्रतिबद्धता चाही गयी है वह सामाजिक नहीं है बल्कि चाहने वाले दल अथवा समुदाय अथवा समाज के साथ बँधी हुई है (यानी इसी अत्यंत सीमित अर्थ में ’ सामाजिक है), और उसी की सत्ता को बनाए रखने के लिए है। यानी अगर वह दल या समाज सत्ताधीन है तो वह प्रतिबद्धता यथास्थिति के पक्ष में है, और अगर वह बाहर है और सत्ताकामी है तो वह प्रतिबद्धता यथास्थिति के विरुद्ध है और ’ क्रान्तिकारी’ है। लेकिन दोनों स्थितियों में है वह सत्ता के लक्ष्य की अधीनता ही।

दूसरी सच्चाई यह है कि प्रतिबद्धता की इस अवधारणा में साहित्यकार के विवेक के लिए कोई गुंजाइश नहीं रखी गई है। साधारण नागरिक के , अथवा नागरिक होने के नाते साहित्यकार के लिए यह अनिवार्य हो कि वह सत्ता से अपने सम्बंध के बारे में निर्णय करे, लेकिन क्या साहित्यकार की हैसियत से साहित्यकार के लिए ऐसी प्रतिबद्धता अनिवार्य है। और अगर है भी तो इस परिणाम पर साहित्यकार को अपने स्वाधीन विवेक से पहुँचना है या कि कोई दूसरा ( चाहे अपने को समाज कह कर ही) उस से वह माँग करने का अधिकार रखता है कि तुम्हें हमारे साथ प्रतिबद्ध होना होगा ?

मैं जब साहित्यकार हूँ तब सँप्रेषण का तो एक व्रत ही मैने ले लिया है। यह मेरा उत्तराधिकार है कि मैं दूसरे तक पहुँचूँ , दूसरे तक वह मूल्यबोध पहुँचाऊँ जिन के बारे में मेरा सहज विवेक मुझे आश्वस्त करता है कि ये मूल्य उस पूरे समाज के जीवन को अधिक गहरा, समर्थ, समृद्ध और अर्थवान बना सकते हैं। इन मूल्यों के सम्प्रेषण का, उन की चेतना जगाने का, मेरा अक्षुण्ण अधिकार और अपरिहार्य कर्तव्य ही मेरी सामाजिक प्रतिबद्धता है; और यह प्रतिबद्धता किसी भी वर्ग, दल, समूह अथवा प्रतिष्ठान के हित अथवा सत्ता से निरपेक्ष है।

इस बात को मैं यों भी कह सकता हूँ कि साहित्यकार के नाते मेरी सामाजिक प्रतिबद्धता जिस समाज के साथ है वह मुझ में है और मेरी अपेक्षा में ही अस्तित्व रखता है, ठीक वैसे ही जैसे कि मैं उस समाज में हूँ और उस की अपेक्षा में ही बना रह सकता हूँ।

इस बात का संदर्भ शायद स्पष्ट करने की आवश्यकता हो। साहित्य एक सम्प्रेषण है तो वह सम्प्रेषण की प्रक्रिया का एक माध्यम भी है। इस वाक्य को लोग आसानी से इस लिए स्वीकार कर लेंगे कि वे सोचेंगे कि भाषा की बात हो रही है, क्यों कि यही तो सम्प्रेषण का माध्यम है। लेकिन असल में बात भाषा तक सीमित नहीं है, बल्कि साहित्यिक सम्प्रेषण की बात मुख्यतया भाषा के बारे में है ही नहीं। साहित्यिक सम्प्रेषण का माध्यम वह समाज है जिस में सम्प्रेषण की यह प्रक्रिया सम्पन्न होती है।

इस माध्यम की ओर आज किसी का ध्यान नहीं है। समाज, सामाजिक परिवेश, सामाजिक परिवर्तन और सामाजिक प्रतिबद्धता की इतनी चर्चा के बीच यह बात अनदेखी रह जाती है कि समाज सम्प्रेषण का माध्यम हैऔर समाज को इस माध्यम के रूप में देखे-समझे बिना न साहित्य को समझा जा सकता है, न साहित्यिक रचना प्रक्रिया को, न समाज में साहित्यकार की स्थि को। स्वयं भाषा का और साहित्य विधाओं का विकास भी बहुत दूर तक इस पर निर्भर करता है कि सम्प्रेषण के माध्यम के रूप में समाज कहाँ और कैसे बदल रहा है। समाज केवल आर्थिक सम्बन्धों के एक जाल का नाम नहीं है। आर्थिक सम्बन्ध जितना महत्व रखते हैं, कम-से-कम उतना ही महत्व संवेदना के जाल का भी है और इस बात का भी महत्व है कि विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न संवेदन अतिरिक्त सजग हो उठते हैं या कि उनकी सजगता सीमित हो जाती है। हिन्दी का आलोचक ही नहीं, प्रतिबद्धता की बहस में लगा साहित्यकार भी मानो इस बात को भूल जाता है कि , रचना क्यों कि सम्प्रेषण से अलग नहीं है, इस लिए लगातार इस सम्प्रेषण माध्यम (अर्थात् समाज) की स्थिति के बारे में सजग रहना और उसी के अनुरूप अपनी भाषा को ढालना, विधाओं के अपने उपयोग को परिवर्तित करना और इस या उस संवेदन या संवेदन-पुंज को उभारना या अधिक संयमित करना साहित्यकार का सहज और स्वाभाविक कर्म है। रचना परिस्थिति में से उपजती है; और परिस्थिति सब से पहले उस सम्प्रेषण माध्यम की स्थिति है जिस में रचना हुई है और जिस के बीच तथा जिसके द्वारा वह दूसरे तक पहुँचेगी। संप्रेषण का यह देश-कालगत सन्दर्भ समाज का संवेद्य रूप है। अगर इस अर्थ में समाज साहित्यकार में और साहित्यकार समाज में नहीं है तो उस के चिन्तन के आर्थिक अथवा ऐतिहासिक आधार अर्थशास्त्री अथवा इतिहासकार की दृष्टि में कितने भी सही हों, वह समाज के साथ जुड़ा नहीं है।यह तो हो सकता है कि उस समाज की मेरी अर्थात् किसी भी लेखक की पहचान अचूक न हो या अधूरी हो। जिस हद तक ऐसा होगा उस हद तक मेरा ( अर्थात् किसी भी लेखक का) साहित्य भी निर्बल, कम प्रभावशाली और कम टिकाऊ होगा। यह भी हो सकता है कि मेरी प्रत्यभिज्ञा को अधिक विशद करने में दूसरों का सहयोग भी हो सके, दूसरों के मार्ग-निर्देश में मैं अपना रास्ता अधिक अच्छी तरह पहचान सकूं। लेकिन यह मेरा रास्ता तभी होगा जब मेरी पहचान में यह मेरा रास्ता हो। अगर वह मुझे स्वयं अपना रास्ता नहीं दीखता तो केवल प्रतिबद्धता के नाम पर उस पर बढ़े चलना, जहां तक सर्जना का प्रश्न है, अन्धेन नीयमाना इव अन्धाः वाली स्थिति स्वीकार करना होगा। और मैं समझता हूँ कि इस मामले में उपनिषद् की बात एकदम सही है कि अविध्या जिस अंधकार-लोक में गिराती है, विध्या उससे भी अधिक दुर्भेध्य अन्धकार में गिरा सकती है। समाज की सही पहचान के बिना, और अपने विवेक की आग में उसे शोधे बिना, तो तथाकथित सामाजिक प्रतिबद्धता होगी। वह साहित्यकार के साथ समाज को भी अँधेरे गर्त की ओर खींच ले जाएगी। सारे संसार का और स्वयं हमारे देश का भी, अधिक लम्बा नहीं, पिछले दशक का ही इतिहास इस बात का ज्वलंत प्रमाण है कि प्रतिबद्धता सत्तासीन दल के साथ हो अथवा सत्ताकामी दल के साथ, वह एक विशेष प्रकार की अवसरवादिता का ही दूसरा नाम है;वह सामाजिक प्रतिबद्धता तो नहीं ही है। और साहित्यकार अवसरवादी नहीं है, वह मूल्यनिष्ठ हो कर समाज के साथ प्रगाढ़ रूप से प्रतिबद्ध है।

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

(7-3-19911-1987)
कुशीनगर देवरिया में जन्मे अज्ञेय का अपनी मौलिक व प्रगतिशील सोच और संवेदनशील शैली की वजह से साहित्य में अनूठा स्थान है। एक गहरी और विचारोत्तेजक सोच के बाबजूद भी अज्ञेय जी की भाषा बहुत ही सहज थी और मन को छूती थी।

कुछ प्रमुख कृतियां—हरी घास पर क्षण भर, बावरा अहेरी, इंद्र धनु रौंदे हुए, आंगन के पार द्वार, कितनी नावों में कितनी बार।

कितनी नावों में कितनी बार- नामक काव्य संग्रह के लिए 1978 में भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित। आंगन के पार द्वार- के लिए 1964 का साहित्य अकादमी पुरस्कार।