दो लघुकथाएँः पहुँच-शैल अग्रवाल

पहुँच-1

मुतव्वा, वह दिल फेंक था। गोरी, फिरंगी टांगों पर कभी-कभी बेंत मार देना अच्छा लगता था उसे। कभी किसी काफिर खातून की बिन्दी हटवा देता तो कभी काले बालों को ढकने को डांट देता। मुफ्त का मनोरंजन भी होता था उसका और रुतवे व ताकत का अहसास भी। पर उस दिन तो गज़ब ही हो गया, जब उस फिरंगनी ने उसी की बेंत से उसे जरा-सा छूने पर ही खूब पीटा और बदचलनी का इल्जाम लगाया सो अलग। खूब बदनामी हुई खुलेआम, भरपूर बेइज्जती की बीच बाजार में। पर कुछ कर भी तो नहीं पाया वह। भीड़ जमा हो चुकी थी और सब उस औरत की ही तरफदारी कर रहे थे। फिर इसके पहले कि वह उसे किसी भी अपराध में फंसाए, वह फिरंगनी यह जा वह जा ..वापस अपने वतन लौट भी गई थी, जहाँ तक उसकी कोई पहुंच नहीं थी और वह भली भांति जानता था कि यह ताकत और रुतबे की दुनिया- बस पहुँच का ही तो खेल है सारा…

पहुँच-2

“ कल जुमाँ है और तीन सर कलम होंगे चौराहे पर। देखने आना जरूर, डॉक्टर। तुम्हारा मरीज करीम भी है। वी. आइ .पी. पास लाया हूँ तुम्हारे लिए, बिल्कुल आगे का।”

“क्या…?”आश्चर्य और भय से खुले मुंह को बड़ी मुश्किल से बन्द कर पाया वह । ‘ना’ कहने तक की हिम्मत नहीं हुई। पता नहीं क्या अर्थ ले ले सामने खड़ा वह पुलिस अधिकारी। वैसे भी इन देशों में कब मौसम पलट जाए, किसी को पता नहीं चल पाता । …पर वह कैसे जा सकता था… एक एक जख़्म खुद अपने हाथों से सिले हैं उसने उस मरीज के। अन्य मरीजों की तरह ही जी-जान लगाकर स्वस्थ करा है उसे भी। घंटों रोज हंस-हंसकर बातें हुई हैं उससे – कैसे शरीर में ताकत वापस आए, खून बढ़े आदि-आदि विषयों पर।.18 साल का खूबसूरत युवक और अब यह…! क्रूर, बेहद क्रूर…सजा की कौन कहे, उसे तो उसके जुर्म तक के बारे में कुछ नहीं पता। निर्णय हो चुका था पर…

कांपते हाथों से उसने कार्ड जेब में रखा और लड़खड़ाते कदमों से चुपचाप घर लौट आया। जल्दी जल्दी में सब कैसे कर पाया-नहीं जानता ,पर अपनी पहुँच और पदवी की बदौलत कर ही लिया था उसने सारा इन्तजाम और अगले दिन ही वे वापसी जहाज पर सवार लौट रहे थे, सपरिवार और सकुशल उनकी क्रूर पहुँच से दूर, बहुत दूर।….

शैल अग्रवाल