कविता धरोहरः मुक्तिबोध

पूंजीवादी समाज के प्रति

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इतने प्राण, इतने हाथ, इनती बुद्धि
इतना ज्ञान, संस्कृति और अंतःशुद्धि
इतना दिव्य, इतना भव्य, इतनी शक्ति
यह सौंदर्य, वह वैचित्र्य, ईश्वर-भक्ति
इतना काव्य, इतने शब्द, इतने छंद –
जितना ढोंग, जितना भोग है निर्बंध
इतना गूढ़, इतना गाढ़, सुंदर-जाल –
केवल एक जलता सत्य देने टाल।
छोड़ो हाय, केवल घृणा औ’ दुर्गंध
तेरी रेशमी वह शब्द-संस्कृति अंध
देती क्रोध मुझको, खूब जलता क्रोध
तेरे रक्त में भी सत्य का अवरोध
तेरे रक्त से भी घृणा आती तीव्र
तुझको देख मितली उमड़ आती शीघ्र
तेरे ह्रास में भी रोग-कृमि हैं उग्र
तेरा नाश तुझ पर क्रुद्ध, तुझ पर व्यग्र।
मेरी ज्वाल, जन की ज्वाल होकर एक
अपनी उष्णता में धो चलें अविवेक
तू है मरण, तू है रिक्त, तू है व्यर्थ
तेरा ध्वंस केवल एक तेरा अर्थ।

अशक्त
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क्या हमारे भाव शब्दातीत हैं ?
या तुम्हारा रुप भावातीत है ?
हम न गा सकते तुम्हारा गीत हैं
वह हृदय गम्भीर, नीरव सिक्त है !

यह विशद जीवन कि जो आकाश-सा
या कि निर्झर-सा चपल लघु तीव्र है,
क्या पूर्ण है ? क्या तृप्ति पाता शीघ्र है,
वह ग्रीष्म-सा है या मदिर मधुमास-सा ?

हम लिखें कविता विरह पर, दु:ख पर
या मधुर आराधना पर, युद्ध पर;
या रचें विज्ञान जीवन के बने-
प्रश्नमय जो अंग सन्तत क्रुद्ध पर ?

खींच लें हम चित्र जीवन में बहे
रम्य मिश्रित रंग-धारा के नवल,
चकित हो लें, उल्लसित हो लें कभी
दुख ढो लें, तत्व-चिन्ता कर सकल

किन्तु यह सब तो सतह की चीज़ है,
भार बन मेरे हृदय पर छा रही ।
या कि बहते सरित के ऊपर तहें
बर्फ़ की जमती चली ही जा रहीं ।

पान्थ है प्यासा, थका-सा धूप में
पीठ पर है ज्ञान की गठरी बड़ी,
झुक रही है पीठ, बढ़ता बोझ है
यह रही बेगार की यात्रा कड़ी ।

अर्थ-खोजी प्राण ये उद्दाम हैं,
अर्थ क्या ? यह प्रश्न जीवन का अमर
क्या तृषा मेरी बुझेगी इस तरह ?
अर्थ क्या ? ललकार मेरी है प्रखर ।

जब कि ऐसा ज्ञान मेरे प्राण में
तृप्ति-मधु उत्पन्न करता ही नहीं,
जब कि जीवन में मधुर सम्पन्नता,
ताज़गी, विश्वास आता ही नहीं;

जब कि शंकाकुल तृषित मन खोजता
बाहरी मरु में अमल जल-स्रोत है,
क्यों न विद्रोही बनें ये प्राण जो
सतत अन्वेषी सदा प्रद्योत हैं ?

जब कि अन्दर खोखलापन कीट-सा
है सतत घर कर रहा आराम से,
क्यों न जीवन का बृहद् अश्वत्थ यह
डर चले तूफ़ान के ही नाम से !

नूतन अहं
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कर सको घृणा
क्या इतना
रखते हो अखण्ड तुम प्रेम ?
जितनी अखण्ड हो सके घृणा
उतना प्रचण्ड
रखते क्या जीवन का व्रत-नेम ?
प्रेम करोगे सतत ? कि जिस से
उस से उठ ऊपर बह लो
ज्यों जल पृथ्वी के अन्तरंग
में घूम निकल झरता निर्मल वैसे तुम ऊपर वह लो ?
क्या रखते अन्तर में तुम इतनी ग्लानि
कि जिस से मरने और मारने को रह लो तुम तत्पर ?
क्या कभी उदासी गहिर रही
सपनों पर, जीवन पर छायी
जो पहना दे एकाकीपन का लौह वस्त्र, आत्मा के तन पर ?
है ख़त्म हो चुका स्नेह-कोष सब तेरा
जो रखता था मन में कुछ गीलापन
और रिक्त हो चुका सर्व-रोष
जो चिर-विरोध में रखता था आत्मा में गर्मी, सहज भव्यता,
मधुर आत्म-विश्वास ।
है सूख चुकी वह ग्लानि
जो आत्मा को बेचैन किये रखती थी अहोरात्र
कि जिस से देह सदा अस्थिर थी, आँखें लाल, भाल पर
तीन उग्र रेखाएँ, अरि के उर में तीन शलाकाएँ सुतीक्ष्ण,
किन्तु आज लघु स्वार्थों में घुल, क्रन्दन-विह्वल,
अन्तर्मन यह टार रोड के अन्दर नीचे बहाने वाली गटरों से भी
है अस्वच्छ अधिक,
यह तेरी लघु विजय और लघु हार ।
तेरी इस दयनीय दशा का लघुतामय संसार
अहंभाव उत्तुंग हुआ है तेरे मन में
जैसे घूरे पर उट्ठा है
धृष्ट कुकुरमुत्ता उन्मत्त ।

मेरे अन्तर
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मेरे अन्तर, मेरे जीवन के सरल यान,
तू जब से चला, रहा बेघर,
तन गृह में हो, पर मन बाहर,
आलोक-तिमिर, सरिता-पर्वत कर रहा पार !
वह सहज उठा ले चला सुदृढ़ तपते जीवन का महा ज्वार,
उसके द्रुत-गति प्रति पदक्षेप से झंकृत हो उठ रहा गान,
जो नव्य तेज का भव्य भान ।

घर की स्नेहल-कोमल छाया में रहा महा चंचल अधीर ।
वे मृदुल थपकियां स्नेह-भरी,
वे शशि-मुसकानें शुभंकरी,
सब को पाया, सब को झेला पर स्वयं अकेला बढ़ा धीर ।
जीवन-तम को संगीत-मधुर करता उर-सरि का वन्य नीर,
ऐसा प्रमत्त जिस का शरीर, उन्मत्त प्राण-मन विगत-पीर !!

यह नहीं कि वह था तुंग पुरुष
जो स्वयं पूर्ण गत-दु:ख-हर्ष
पर ले उस के धन ज्योतिष्कण जो बढ़ा मार्ग पर अति अजान ।
उसके पथ पर पहरा देते ईसा महान् वे स्नेहवान् ।
छाया बनकर फिरते रहते वे शुद्ध बुद्ध सम्बुद्ध-प्राण ।।
यह नहीं कि करता गया पुण्य,
उसका अन्तर था सरल वन्य,
तम में घुस कर चक्कर खा कर वह करता गया अबाध पाप ।
अपनी अक्षमता में लिपटी यह मुक्ति हो गयी स्वयं शाप ।
पर उसके मन में बैठा वह जो समझौता कर सका नहीं,
जो हार गया, यद्यपि अपने से लड़ते-लड़ते थका नहीं;
उस ने ईश्वर-संहार किया, पर निज ईश्वर पर स्नेह किया ।
स्फुरणा के लिए स्वयं को ही नव स्फूर्ति-स्रोत का ध्येय किया
वह आज पुन: ज्योतिष्कण हित
घन पर अविरत करती प्रहार,
उठते स्फुलिंग
गिरते स्फुलिंग
उन ज्योंति-क्षणों में देख लिया
करता वह सत्य महदाकार !
सन्नद्ध हुआ वह ज्वाल-विद्ध करने को सारा तम-पसार,
वह जन है जिसके उच्व-भाल पर
विश्व-भार, औ’ अन्तर में
नि:सीम प्यार !!

-गजानन माधव मुक्तिबोध