कविता आज और अभी

1.
यह भोर सुहानी लगती है!

शीतलता की छाँह गहे ,
फूलों के खिलने का मौसम,
लालिमा भरी किरणें नभ पर,
गुंजित विहगों का मृदु सरगम,
सुख का सारा सम्भार लिए-
यह भोर सुहानी लगती है,
अनुरंजित हो हर दिशा दिशा ,
और मुक्त पवन निर्बाध चले,
सपनो के सुरभित आँगन में,
अभिलाषाओं के सुमन खिलें,
स्मृतियों का संसार लिए –
यह भोर सुहानी लगती है,
मन की सारी ऊर्जा लेकर,
हम कर्म करें-जागृत होकर,
नैतिक आदर्शों की थाती,
स्वीकार करें गर्वित होकर ,
संकल्पों का सम्मान लिए-
यह भोर सुहानी लगती है,- –

2.
सिंक रही हैं भावनाएं रोटियों सी

सिंक रही हैं भावनाएं रोटियों सी,
गोल घिरते जिन्दगी के व्यूह इतने,
हर मोड़ पर ज्यों घूमती है गोल रोटी
फिर भी कोई आस मन की अनबुझी सी,
सिंक रही हैं भावनाएं रोटियों सी,
मै घुमाती हूँ समस्याओं के पट पर,
उलझनें आटे सी कोमल और गीली,
भूख सी फैली हुई है आंच मन की,
सिंक रही हैं भावनाएं रोटियों सी,
कल फिर खिलेगा क्षुधा का विकराल सूरज,
फिर सजेगा घर का कोई एक कोना,
थालियों में सज उठेंगी कामनाएं,
फिर कोई सपना दिखाती प्यास होगी,
सब्जियों सी काटती हूँ,दर्द की हर रात बीती,
सिंक रही हैं भावनाएं रोटियों सी.
दाल पकती ज्यों कोई भूली कहानी,
हास हल्दी का.., नमक सी पीर जग की,
प्रार्थनाएं छौंक सी बेवक्त उठतीं,
घुट रही साँसों में जीवन की उदासी.
सिंक रही हैं भावनाएं रोटियों सी.
यह रसोईं है मेरे सपनो की दुनिया,
-मधुरता कविता में निशि दिन घोलती हूँ,
चाकुओं को धार देती ,सोचती हूँ,
कर रही हूँ धार पैनी अक्षरों की
और गढ़ रही हूँ गीत कोई स्वप्न दर्शी,
सिंक रही हैं भावनाएं रोटियों सी. —-

पद्मा मिश्रा

***

ये जिन्दगी

जीने की जिद्दो जहद की अजीब दास्तान हैं ये ज़िंदगी
कुदरत की राहों के मुसाफ़िर की पहचान हैं ये ज़िंदगी
किस्मत के खेल की आधी हक़ीकत आधा फ़साना हैं ये ज़िंदगी
जीवन जीने का सिर्फ एक बहाना हैं ये ज़िंदगी
जीने का एक बहाना हैं ये ज़िंदगी

इन्द्रधनुषी ख्वाहिशों के पंख लगाकर आकाश में उड़ना हैं ये ज़िंदगी
वक्त की आंधी से उम्मीदों का पत्तों की तरह बिखरना हैं ये ज़िंदगी
कठिनाइयों की ऊंची लहरों के बीच चट्टान बनकर डटे रहना हैं ये ज़िंदगी
जीवन के हर टेड़े मोड़ पर नदी बनकर लगातार बहना हैं ये ज़िंदगी
जीवन धारा में बहते ही जाना हैं ये ज़िंदगी

बनते बिगड़ते उलझते रिश्तों का हिसाब हैं ये ज़िंदगी
दिल में दफ़न जज्बातों की बंद किताब हैं ये ज़िंदगी
गर्दिशों के अंधेरों में उठते संघर्षों का सैलाब हैं ये ज़िंदगी
अपमानों के चुभते काँटों के बीच महकता गुलाब हैं ये ज़िंदगी
जन्म जन्मान्तरों के अच्छे-बुरे कर्मों का जबाब हैं ये ज़िंदगी
अपने कर्मो का प्रतिबिम्ब हैं ये ज़िंदगी

दर्द में डूबी डबडबाई आँखों में अटका पानी हैं ये ज़िंदगी
टूटे दिलों में छुपी मोहब्बत की रौशनी हैं ये ज़िंदगी
अपनों के दिये गहरे जख्मों की निशानी हैं ये ज़िंदगी
हमारी तुम्हारी अधूरी कहानी हैं ये ज़िंदगी,
एक अनकही कहानी हैं ये ज़िंदगी

बार-बार हार के बाद जीतने का जूनून हैं ये ज़िंदगी
बार-बार खोने के बाद हासिल करने का हौसला हैं ये ज़िंदगी
समय की ठोकरों से बार बार टूट कर, हर बार जुड़ना हैं ये ज़िंदगी
मौसम की तरह पल-पल बदलते रहना हैं ये ज़िंदगी
कभी ना समझ आने वाला एक कठिन इम्तेहान हैं ये ज़िंदगी
सच मुच एक उलझी हुई सी, अनबूझ पहेली हैं ये ज़िंदगी

ईश्वर का दिया अद्भूत नज़राना हैं ये ज़िंदगी
सुख-दुख के दो पहियों से जीवन रथ को चलाना हैं ये ज़िंदगी
जीवन की कशमकश की कश्ती का किनारा हैं ये ज़िंदगी
सुनहरे सतरंगी सपनों का मीठा तराना हैं ये ज़िंदगी
अपनों से मिलने और बिछुड़ने का अफ़साना हैं ये ज़िंदगी
सब कुछ छोड़कर अनंत में विलीन हो जाना हैं ये ज़िंदगी

डॉ. मनीष श्रीवास्तव

***

1.
खड़े होने की बराबर जगह
वह खड़ा हुआ तो मुझे लगा
उसका कद कितना ऊँचा था
मुझसे तो ऊँचा था ही
काफी ऊँचा था
वह पुरुष था
और मेरी औरतना दृष्टि
पुरुषों को बक्श कर
अतिरिक्त ऊँचाई
तृप्त होती तो थी
पर तभी
जब व्यवहार पुरुषोचित हो
अगर वो बक्शें
औरत को भी कुछ ज़्यादा कद
कंधे से कन्धा मिलाकर
खड़े होने की बराबर जगह…..

2.
स्त्रियों पर कवितायेँ

अंत ही नहीं था स्त्रियों पर कविताओं का
अनंत लिखी जा रही थी
स्त्रियों पर कवितायेँ
स्त्रियां भी थीं
कवितायेँ लिखने लिखवाने वालों में
पर कविता से बाहर
और दरअसल उसके भीतर भी
इतनी पैनी दृष्टि थी उनकी
खोज बीन जांच पड़ताल की
किसी शंका ग्रस्त प्रेमी का सा मिज़ाज़ लिए
वो जाने किस सामाजिक दृष्टि
अथवा मत की स्थापना में प्रयत्न शील थीं
क्योंकि बहुत कम मिलती थी
उनके पास हमदर्दी
स्त्रियों के निजी दायरों के लिए…….

पंखुरी सिन्हा

***

1.
आदमी
हज़ारों की भीड़ में भी,
अकेला है आदमी!
आदमी ही आदमी को,
नहीं मानता है आदमी!
संवेदनायें खो गईं,
चोरी क़त्ल बढ़ गये,
कोई भी दुष्कर्म करते,
डरता नहीं है अब आदमी।
भगवान ऊपर बैठ कर
ये सोचता होगा कभी…………..
ऐसा नहीं बनाया था मैंने,
जैसा बन गया है आदमी!
स्वार्थ की इंतहा हुई ,
भूल गया दोस्ती, रिश्ते, नाते,
वक़्त बुरा आया तो,
उन्हे ही पुकारता है आदमी!
निर्दोष सज़ा पाते रहें,
बेल पर दोषी छुटें…..
गवाह मार दिये जायें,
तो क्या करेआदमी!
पोलिस ढ़ीली ढ़ाली हो,
सुबूत ढूँढ़ न पाये
मासूम सूली पर चढ़े,
तो क्या करे आदमी!

2.
उठो जसोदाबेन…
जब पति पत्नी का रिश्ता
ही ना समझा उसने,
बुरे से बुरे वक़्त में भी
हाथ नहीं पकड़ा जब उसने,
ना रिश्ते को जोड़ा और ना तोड़ा ही उसने,
फिर किस मुंह से चुनावी दस्तावेज़ में,
पत्नी का नाम लिखा दिया,
जसोदाबेन अब उसने !

उठो, जसोदाबेन!
तोड़ दो इस बंधन को,
टूटे हुए रिश्ते से आज़ाद करो
ख़ुद को……..
एक बोझ जो काँधे पर
लादे हुए हो
उठो, उठाकर फेंक दो उसको!
इतना तो सम्मान करो
उस नारी का…
जिसको मार मार कर जीती रहीं,
उस नारी की ख़ातिर
तोड़ के बेड़ी
आज़ादी की ओर बड़ों
उठो, जसोदाबेन!

आज़ादी तन की ही नहीं
मन की भी होती है ।
मन के बंधन तोड़ के
तन-मन बंधन मुक्त करो
उठो जसोदाबेन !
– बीनू भटनागर

***

1.
सतरंगे चित्र

देखा है मैंने-फूल की डहडही
लाल पटलियों को,
क्रमशः गुलाबी होते और सफेद
अन्त में, बिल्कुल निर्मल

देखा है मैंने-अंदर ही अन्दर
भीषण ज्वार-भाटे को समोए,
ऊपर से बिल्कुल शान्त
जैसे बिना लहर का समुद्र

देखा है मैंने- बन्द द्वार भीतर
तमाम लटके कपड़ों के पीछे
एक सोया जीवित पक्षी सुरक्षित-
पर घायल
अपने को ढूँढते व्याघ से बेखबर

देखा है मैंने खालीपन-तमाम कथाओं से भरा
रहस्यों से मुक्त
खालीपन- जिसमें
मात्र कुछ गर्दा बटोरने के
साधन के अवशेष-

मैंने सोचा था मैंने क्या नहीं देखा है, सबकुछ तो देखा है-
पर जाकर देखा तो दिखा- कुछ नहीं है-जो देखा था
वह वायु पर वायु निर्मित चित्र थे
सूर्य की उजली किरणों में चमकते सतरंगे।

2
गुलाब और जहरीले बाड़

मैंने कहानियाँ सुनी हैं
बबूल, झरबेर एकबन, हिंगुआ के कटीले झाड़ियों वाले जंगल की।
मैंने किस्से सुने हैं-
मरुतीर्थ हिंगलाज से लेकर दस्तोवस्की और नीत्से तक के।
और मैंने सच्चाई देखी है-
कि मैं विदेशी गुलाबों के बगीचे में पहुंच गई हूँ
गुलाब के पौधों में जहरीले बाड़
गुलाब का सौंदर्य, बहुत भीनी महक

अद्भुत रंगीनी मादक-
ज़हर-
ज़हर का नशा-झूठा सुख
और ज़हर से ज़हर का उतरना
बिल्कुल सच।

-आशा गुप्त

***