बाल-बाटिका/लेखनी संकलन


माँ जब मैं बड़ा हो जाऊं
पहन के वर्दी पायलट बन जाऊं
साथ चलोगी ना मेरे…
ऊँचाइयों से ना तुम डर जाना
काले बादलों से भी ना घबराना
कालीन हैं ये बस
उड़ते जहाज के नीचे
साथ चलोगी ना मेरे…
दुनिया की हम सैर करेंगे
आइस्क्रीम और पीजा खाएँगे
छोड़ के चूल्हे-चौके के
सारे झंझट फिर पीछे
साथ चलोगी ना मेरे !
हम चांद पर भी जाएंगे
पर अपनी धरती को पहले
स्वर्ग बनाएंगे,
हम ही से तो सारी उम्मीदें
और सपने हैं इसके
हम ही तो नौनिहाल हैं इसके
साथ चलोगी ना मेरे!
शैल अग्रवाल

लाल गुब्बारा
छूट हाथ से लाल गुब्बारा
ऊपर-ऊपर उड़ता जाता
उछलें-दौड़े मम्मी-पापा
हाथ किसीके ना ये आता
इतने ऊंचे पहुंचकर तो
बहुत लगेगा इसको डर
कैसे अकेला ये रह पाएगा
नीचे कब यह आ पाएगा?

रो-रोकर चुनमुन ने
घर को सिर पर है उठाया
तब मम्मी ने गोदी में लेकर
खूब उसे यूँ समझाया-
‘आते को बांहों में ले लेना
जाते को हंसकर विदा है देना
रीत यही तो जीवन की आना जाना मिलना बिछड़ना
उतरेगा अब एक नए घर
और नये दोस्त बनाएगा, भूलो तुम भी इसको अब
तभी खुश यह रह पाएगा ! ‘
शैल अग्रवाल

आओ फूलों से रंग चुरा लें
तितलियों के पंख लगा लें
चिड़ियों की चहचह में डूबें
भरें उड़ान फिर बचपन की

मां की लोरी में जो सोई
सपनों की झोली में जो खोई
ढूँढे फिर वही जादू की छड़ी
सारे दुःखों को छू मंतर कर लें
भरें उड़ान फिर बचपन की

बचपन जो हंसता गाता
दोस्तों पर कुर्बान हो जाता
हार जीत और प्यार मनुहार
सब में ही जीना सिखलाता
मीठा मीठा प्यारा प्यारा
बचपन ना यह रोने से शरमाता
अपनी जिद पर जब अड़ जाता
फिर झट से खुद मन भी जाता
उस बचपन को गले लगाकर
भरें उड़ान फिर बचपन की

श्वेत बिन्दु थे झिलनिल सपने
माँ की आँखों में नितनित चमके
उनको कहीं हम भूल ना जाएँ
सूरज को बस्ते में रखकर
मां ने नित नित संग जो भेजे
दुनिया में उनसे उजाला फैलाएँ
सबको अपने गले लगाएँ
आओ हम जी भरकर जी लें
भरें उड़ान फिर बचपन की

उड़उड़ आए हैं बादल काले
रिमझिम बरसें नदिया नाले
सूरज चंदा और अनगित तारे
बहते झरने नदियों में मुंह देखें
संग इन्ही के हम दौड़ें भागें
धरती आसमाँ की दूरियाँ नापें
भरें उड़ान फिर बचपन की।
शैल अग्रवाल

खरगोश
दरवाज़े में ताला
खरगोश गया शाला
ज़ोर ज़ोर नगाड़ा
खरगोश पढ़े पहाड़ा
दो एकम दो दो दुनी चार
बड़ी ज़ोर से गुज़री कार
दो तिया छे दो चौके आठ
पूरा कर लो अपना पाठ
जल्दी जल्दी पढ़ी कहानी
एक था राजा एक थी रानी
गुरूजी हँस बोले शाब्बाश
खरगोश बोला कर दो पास

-दीपिका जोशी

मेंढ़क दफ्तर कैसे जाए

सूट पहनकर,बूट पहनकर,
और लगाकर टाई।
जाना था दफ्तर, मेंढ़क ने,
अपनी बाईक उठाई।
किक पर कूदा उचक उचककर,
पूरा जोर लगाया।
पर बेचारा मेंढ़क बाईक,
चालू न कर पाया।
अब तो था लाचार पहुँच वह,
कैसे दफ्तर पाए।
टर्राने के सिवाय उसे अब,
कुछ भी समझ न आये।
प्रभुदयाल श्रीवास्तव


मच्छर गाथा
हाथ हथौड़ा मारा हमको,यह कैसी बेमानी है।
मच्छर हैं तो क्या होता है,आखिर हम भी प्राणी हैं।
लहू डंक भर ही पीते हैं,यह तो बड़ा गुनाह नहीं।
इन्सानोंको हम लोगों के ,जीवन की परवाह नहीं।
मच्छर मार युद्ध हर घर में,घर घर यही कहानी है।
लिए हाथ में गन के जैसे ,चीनी रेकिट बैठे हो।
बाज मांस पर झपटे हम पर,आप झपटते वैसे हो।
हाय!हमारी नस्ल मिटाने, की क्यों तुमने ठानी है।
आतंकी जब घुसें देश में,तब तो कुछ न कर पाते।
मच्छर दानी में हम घुसते,तो हथ गोले चलवाते।
यह कैसी तानाशाही है,यह कैसी शैतानी है।
बची खुची जो कसर रही है,आल आउट पूरी कर दे।
अपनी जहरीली गैसों से,मौत हमारे सिर धर दे।
अब सिर के ऊपर से भैया,सचमुच निकला पानी है।
इसका बदला हम भी लेंगे,रक्त बीज बन जाएंगे।
मारोगे तुम एक अगर तो,सौ पैदा हो जाएंगे।
कभी नहीं अब इंसानों के,मुंह की हमको खानी है।
प्रभुदयाल श्रीवास्तव

सुबह के अखवार में

क्या- क्या छपा,लिखा क्या- क्या है,
सुबह के अखबार में।
एक राह चलती महिला का,
छीना हार झपट्टे से।
स्कूटी से जाती लड़की,
फँस कर गिरी दुपट्टे से।
कुत्ता मरा एक मंत्री का,
जूड़ी ताप बुखार में।
शाला की बस गिरी खाई में,
बच्चे दबकर मर गए बीस।
पिटी एक बच्ची टीचर से,
चुका न जो पाई थी फीस।
चाँदी चढ़ गई सोना लुढ़का,
रंगों के त्यौहार में।
मुनियाँ यह सब पढ़ती है तो,
उसे अजूबा लगता है।
रोज- रोज अखवारों में क्यों,
उल्टा सीधा छपता है।
क्या सचमुच में ऐसा होता,
होगा इस संसार में !

प्रभुदयाल श्रीवास्तव

है धरती जैसा ही चंदा

मम्मी तुम हमको बहलातीं
चंदा को मामा बतलातीं
टीचर ने हमको समझाया
क्या है सारा भेद बताया
समझ गये हम गोरखधंधा
है धरती जैसा ही चंदा
मानव उस पर जा बैठा है
सारा रहस्य वह पा बैठा है।

शशिकांत

स्कूल में लग जाये ताला

स्कूल में लग जाये ताला
अब से ऐसा ही हो जाये
भले किसी को पसंद न आये ।

स्कूल में लग जाये ताला
दे बस्तों को देश निकाला
होमवर्क जुर्म घोषित हो,
कोई परीक्षा ले न पाये ।

दिन भर केवल खेलें खेल
जो डाँटे उसको हो जेल
खट्टा-मीठा खारा-तीता,
जो चाहे जैसा वह खाये ।

हरदम चले हमारी सत्ता
हो दिल्ली चाहे कलकत्ता
मालिक हैं अपनी मर्जी के
हर गलती माँ-बाप को भाये ।

मौसी-मामी, नाना-नानी
रोज सुनायें नयी कहानी
हम पंछी हैं, हम तितली हैं
गीत हमारा ही जग गाये ।
जय प्रकाश मानस


चलो चलें अब झील पर
टांग दे बस्ता कील पर ।
चलो चले अब झील पर

पकडें मछली बंसी डाल
सीपी-घोघा रखें संभाल
नजर रहे पर चील पर ।

जा बैठें फिर नाव में
घूमें पानी के गाँव में
नाविक काका की अपील पर ।

उतरे विदशी पक्षी पहुना
खुश हैं कितने उमंग दुगुना ।
घर से सौकडों मील पर ।
जय प्रकाश मानस

सोखा किसने पानी

नदी किनारे पेड साल का
उस पर बैठा पंडूक
सोखा किसने सारा पानी
कहता वह, सुन-सुन, रूक-रूक ।

नदी किनारे पेड नीम का
उस पर बैठी कोयल
सोखा किसने सारी पानी
कहता वह, हम तो घायल ।

नदी किनारे पेड आम का
उस पर बैठी मैना
सोखा किसने सारा पानी
कहती वह, मैं ना, मैं ना ।

नदी किनारे पेड पीपल का
उस पर बैठा तोता
सोखा किसने सारा पानी
कहता वह, काश न होता ।

नदी किनारे पेड ताड का
उस पर बैठा कौआ
सोखा किसने सारा पानी
कहता वह, आदम भैया ।
जय प्रकाश मानस

मेरा प्यारा घर

एक छोटे से गाँव में
बादलों की छाँव में
मेरा प्यारा घर…

बूढे पर्वत के पीछे
घाटी में सबसे नीचे
दूर से आये नजर…

वनफूलों से गमकता
हरी किरनों से दमकता
स्वागत को तत्पर…

आँगन में तुलसी मैया
पास बंधी श्यामा गैया
बाँचे तोता अक्षर…

पेड़ झूम, मुस्काते हैं
पंछी आपस में गाते हैं
आओ मीत इधर…

कभी तितलियों के फेरे
भौंरे आते शाम-सबेरे
यहाँ कहाँ मच्छर…

सपनों में नित आता है
अपने पास बुलाता है
परदेश रहा अगर…

जय प्रकाश मानस

गाय

कितनी भोली, कितनी प्यारी
सब पशुओं में न्यारी गाय
सारा दूध हमें दे देती
आओ इसे पिला दें चाय।
डां. शेरजंग गर्ग


अगर

खूब बड़ा-सा अगर कहीं, संदूक एक मैं पा जाता,
जिसमें दुनिया भर का चिढ़ना गुस्सा आदि समा जाता।
तो मैं सबका क्रोध, घूरना, डाँट और फटकार सभी,
छीन-छीनकर भरता उसमें, पाता जिसको जहाँ जभी।
तब ताला मजबूत लगाकर उसे बंद कर देता मैं,
किसी कहानी के दानव को बुला कुली कर लेता मैं।
दुनिया के सबसे गहरे सागर में उसे डुबो आता,
तब न किसी बच्चे को कोई कभी डांटता धमकाता।
रमापति शुक्ल

कैसे तुमने जाल बुना है

मकड़ी रानी, मकड़ी रानी
बतलाओ तो प्रश्न हमारा
कैसे तुमने जाल बुना है
इतना सुन्दर, इतना प्यारा
जिससे जाल बुना वो धागा
भला कहां से लाती हो
बुननेवाली जो मशीन है
वो भी कहाँ छुपाती हो?

एक प्रार्थना तुमसे मेरी
है छोटी सी सुनो जरा
मैं पतंग का धागा दे दूँ
मेरे कपड़े बुनो ज़रा !
लक्ष्मीशंकर बाजपेयी


कोयल

डाल हिलाकर आम बुलाता
तब कोयल आती है।
नहीं चाहिए इसको तबला,
नहीं चाहिए हारमोनियम,
छिप-छिपकर पत्तों में यह तो
गीत नया गाती है!

चिक्-चिक् मत करना रे निक्की,
भौंक न रोजी रानी,
गाता एक, सुना करते हैं
सब तो उसकी बानी।

आम लगेंगे इसीलिए यह
गाती मंगल गाना,
आम मिलेंगे सबको, इसको
नहीं एक भी खाना।

सबके सुख के लिए बेचारी
उड़-उड़कर आती है,
आम बुलाता है, तब कोयल
काम छोड़ आती है।

-महादेवी वर्मा

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