संवादः भाषा, सृजन तथा संवेदना-मैथिली प्र. राव और शैल अग्रवाल

प्रिय मैथिली जी,
(डा. मैथिली प्र. राव प्रोफ़ेसर – हिंदी विभाग, बेंगलूरु mythili.rao@jainuniversity.ac.in )
आपको आने वाले प्रोजेक्ट के लिए बहुत-बहुत शुभकामनाएं। आप द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर संलग्न हैं ।
जहाँ तक मेरी बात है मैं खुद को परिस्थितियों के प्रवाह में बहा भारतीय मूल का एक ऐसा बीज मानती हूँ जो विदेशी मिट्टी में तो जा रुपा, परन्तु आज भी अपने उन्ही मूल रूप-गुण के साथ खड़ा है । थोड़ा बहुत परिवर्तन नई मिट्टी की वजह से भले ही हुआ हो पर खुशबू आज भी वही भारतीय ही है।
मेरे लिए देश और अपनी संस्कृति , भारत से जुड़े रहना आती-जाती सांस की तरह सहज और स्वाभाविक प्रक्रिया है। और बचपन से ही लिखना या खुद को अभिव्यक्त करना भी, कभी शब्दों के माध्यम से तो कभी रंगों के । इसमें सायास कुछ भी नहीं। वस्तुतः सायास शब्द एक चुनौती भरी प्रक्रिया रही है मेरे सृजन में। भारत से भौतिक दूरी अवश्य है पर दूर हो पाना संभव नहीं। अकेली संतान थी इसलिए मानती हूँ कि मां-बाप की मृत्यु के बाद और आज उम्र के इस पड़ाव पर आकर वह कसक और तीव्रता कम हो गई है, पर मिटी नहीं है। 51 वर्ष हो चुके यहाँ पर रहते-रहते पर आज भी भारत की मिट्टी में वापस पहुंचने का कोई मौका नहीं छोड़ती। अपने को भाग्यशाली मानती हूँ कि देश निकाला ( सर्जन पति के साथ शादी के तुरंत बाद, बीस वर्ष की उम्र से यहाँ पर रह रही हूँ।)तो मिला पर कम-से-कम अभी तक तो साल में एक बार भारत वापस बुला ही लेता है।

1.आपने अंग्रेजी के बजाय हिंदी में ही लिखना क्यों पसंद किया ?
उत्तरः चाहती थी कि ब्रिटेन और भारत- दोनों ही देश एक दूसरे के बारे में समझें और जानें, आपसी मन-मुटाव और गलत-फहमियाँ दूर हों, इसलिए दोनों ही भाषा में लिखना शुरु किया। फिर यहाँ पर अपने भी मन और मुख से विलुप्त होती हिन्दी को जीवित रखने का यही एक तरीका समझ में आया और हिन्दी का पलड़ा भारी हो गया । परिवार में नियम बनाया कि हम घर के अंदर अधिकतम बच्चों से हिन्दी में ही बात करेंगे । नियम अभी भी ज्यों-का-त्यों है और नतीजा यह है कि परिवार की तीसरी पीढ़ी भी हिन्दी बोलती-समझती है। बचपन से ही सभी शिक्षकों को मुझसे यही अपेक्षा थी कि मैं हिन्दी में लिखूँ और लिखूंगी। शायद अवचेतन मन में उन्हें सम्मान देना भी एक वजह रही होगी। वैसे अंग्रेजी में भी काफी लिखा है परन्तु हिन्दी में लिखा आप सच कह रही हैं, उससे बहुत ज्यादा है क्योंकि हिन्दी में जो लिखा उसमें वार्तालाप भारत से था और अंग्रेजी में जो लिखा वह यहाँ ब्रितानी समाज के लिए।

2.आप जहां रहती हैं वहां आपको लोग एक हिंदी लेखक के रूप में अधिक जानते हैं या आपकी वृत्ति के कारण ?
उत्तरः हिंदी लेखक के रूप में भारतीय और लेखक के रूप में स्थानीय।

3.क्या आप मानती हैं की भाषा का भाव-सम्प्रेषण का कोइ सम्बन्ध है ? इसका कोइ उदाहरण ?
उत्तरः जैसे चोट लगने पर मुंह से उप्फ् या हे माँ या फिर हे भगवान निकलना…
भाषा की मुख्य जरूरत ही यही है। जब आदि मानव का सिर्फ आंसू और मुस्कान व स्पर्ष आदि से काम नहीं चला होगा , जरूरतों की अभिव्यक्ति चित्र या इशारों में नहीं हो पाई होगी, तभी तो भाषा का जन्म और क्रमबद्ध और सामूहिक विकास हुआ होगा शब्दों और भावों के आपसी पूरे संप्रेषण और प्रवाह के साथ ।

4. भाषा का सम्बन्ध अस्तित्व से किस प्रकार प्रस्फुटित होता है ?
उत्तरः नदी-सी अस्तित्व की चट्टान तोड़कर जनमती है भाषा। भावों का आवेग जितना तीव्र या कोमल होगा , जिस रस में डूबा होगा वैसी ही भाषा स्वतः हो जाती है।नौ रसों में नौ तरह की भाषा स्वतः और अनायास रच जाती है। साहित्य ही नहीं जन-जीवन में भी तो यही होता है। एक सच है यह कि जो बात मन से निकलती है वही मन तक पहुँच पाती है।

5. एक प्रवासी के लिए भाषा तथा राष्ट्रीयता की समझ कैसी होती है ?
उत्तरः मेरी समझ में अभिन्न है। भारत में हिन्दी भूलकर अंग्रेजी में बात करने से आप अपने को सुसभ्य महसूस कर सकते हैं, पर विदेश में रहकर नहीं। अपनी भाषा और संस्कृति को भूलना विदेशी परिवेश में गद्दार और तुच्छ ही नहीं कईबार गरिमाहीन महसूस करवाता है।

6. आपके द्वारा सृजित साहित्य में आपने कहीं पर भी भाषा से जुड़े इन तत्वों को स्थान दिया है ?
उत्तरः बारबार और कई जगह पर। मेरी कहानी ‘बसेरा’ इसी भारतीयता के प्रस्थापन पर है, जहाँ अमलतास के पेड़ को यहाँ की मिट्टी में रोपना और फलने-फूलने देना नायिका के लिए भारतीय मूल्यों को रोपने और स्थापित करने की ललकार बन जाता है। निबंध संग्रह लंदन पाती में इस विषय पर दो-तीन निबंध हैं। मेरे उपन्यास शेष-अशेष व मिट्टी दोनों में ही मानवीय संवेदनाओं और रिश्तों की जटिलता के साथ यह विषय भी बारबार और मजबूती से उठा है। कई कविताएँ भी हैं इस विषय पर।
मेरी पत्रिका लेखनी ने भारत के अलावा प्रवासी पर भी कई संस्करण निकाले हैं और हिन्दी पर भी।
अधिकांश इन रचनाओं को मेरी वेव साइट http://www. Lekhni.net पर पढ़ा जा सकता है। आप वहाँ से चाहे जितने उदाहरण ले सकती हैं। यह पत्रिका मैं पिछले 13 साल से निकाल रही हूँ और अभी तक 125 अंक आ चुके हैं लेखनी के।
प्रवास में खुद में भारतीयता को समेटे रखने में भाषा एक प्रमुख और जोड़े रखने का कार्य करती है क्योंकि भाषा ही तो आपको याद दिलाती रहती है कि आपसे सभीकुछ नहीं छूटा। आपके भावों और विचारों की संवाहिका है। आपके संस्कार और इतिहास का डी.एन. ए. है। अंततः एक यही तो हमारे साथ अंतर्मन में रची बसी रह जाती है जिसे परिस्थितियाँ और दूरियाँ तक नहीं धो-पोंछ पातीं।
यदि आप कुछ और जानना और पूछना चाहें तो निःसंकोच लिखें।

शुभेच्छु,
शैल अग्रवाल