पर्यटनः सुरम्य यात्रा लक्षद्वीप कीः गोवर्धन यादव


एक प्रसिद्ध कहावत है कि जीवन में बचपन एक बार और जवानी भी केवल एक बार ही आती है, लेकिन कमबख्त बुढ़ापा कुछ ऐसा होता है जो एक बार आया तो फ़िर लौटकर नहीं जाता. जीवन की यह अन्तिम अवस्था है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता. यदि आप नौकरीपेशा रहे हैं और सेवानिवृत्त होकर पेंशन का लाभ ले रहे हैं, तो स्वभाविक है कि आपके मित्रों की भीड़ काफ़ी पीछे छूट चुकी होती है. मिलने-जुलने वालों की संख्या में काफ़ी कमी आ चुकी होती है. आप अपने आपको थका-सा और एकाकी महसूस करने लगते हैं. अचानक आए इस परिवर्तन से आपके स्वभाव में भी अन्तर आने लगता है और आप अपनी खीज परिवार के लोगों पर उतारने लगते हैं. और एक दिन ऐसा भी आता है कि आपकी उपेक्षा होने लगती है. यदि ऐसा होने लगे तो समझिए यह आपकी दुर्गति होने का समय आ चुका है. ऐसी स्थिति का निर्माण न हो, इसके लिए आपको काफ़ी सचेत रहने की आवश्यक्ता है. अच्छे मित्रों की तलाश करना शुरु कर दीजिए. ऐसे मित्र जिनमें जीजिविषा कूट-कूटकर भरी हो. जो सकारात्मक ऊर्जा के धनी हों,ऐसे लोगों का साथ पकड़िये और हो सके तो सत-साहित्य से जुड़ जाइये. हर आदमी की अपनी कोई न कोई अभिरुचि या अभिलाषा रहती है, जो समय के अभाव में या कारणवश आप पूरी नहीं कर पाए हों, तो उसे आगे बढ़ाइये. प्रसन्नचित रहिए और मित्रों की टोली के साथ किसी रमणीय स्थान को खोज कर, देशाटन पर निकल जाइए. प्रकृति का सानिध्य और वातावरण आपमें एक नई ऊर्जा भर देगा. आप अपने जीवन से प्रेम करने लगेंगे. प्रसन्न रहने लगेंगे और अपनी प्रसन्नता के चलते लोगो के बीच आकर्षण का केन्द्र बने रहेंगे. आपकी पूछ-परख बढ़ जाएगी. सच मानिए, अगर आप ऐसा कर सके तो निश्चित जानिए कि आपसे बढ़कर प्रसन्न्चित और सुखी कोई हो ही नहीं सकता.

सन 2002 मेरे लिए खुशी का पैगाम लेकर आया. डाक सहायक के पद से पदोन्नत होकर मुझे एच.एस.जी.1 पोस्टमास्टर होने का सौभाग्य मिला. इस समय तक मेरी सर्विस साढ़े सैतीस साल की हो चुकी थी और परिवार की लगभग सभी जवाबदारियों से मैं मुक्त हो चुका था. करीब छः माह तक पद पर बने रहने के बाद मैंने स्वेच्छिक सेवानिवृत्ति इस सोच के साथ ले लिया था कि शेष समय मुझे साहित्य-साधना में लगा देना चाहिए. कक्षा नौ का विद्यार्थी रहते हुए मेरा झुकाव साहित्य की ओर हो चुका था और इन दिनों मैं कविताएं लिखने लगा था. सेवानिवृत्ति के ठीक बाद मेरे मित्र स्व.प्रमोद उपाध्याय जी मेरे घर आए और मुझसे मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिन्दी भवन भोपाल चलने का आग्रह करने लगे. उस दिनों यहाँ पावस व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया था. कार्यक्रम के अंत में मेरी मुलाकात हिन्दी भवन के मंत्री-संचालक श्रद्धेय कैलाशचन्द्र पंत जी से हुई. उन्होंने मुझसे हिन्दी भवन से जुड़ने का आग्रह किया. मैंने उनके आग्रह को स्वीकार किया और इस तरह मैं विगत सतरह सालों से हिन्दी के उन्नयन और प्रचार-प्रसार के लिये प्राणपण से काम कर रहा हूँ. इस जुजून ने मुझे काफ़ी कुछ दिया. जिसकी की मैंने कभी कल्पना तक नहीं की थी. मुझे मान मिला…सम्मान मिला..अनेकों साहित्यकारों से मिलने और मित्रता कायम करने के अवसर मिले और कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़ने.और देश-विदेश की यात्राएं करने का सौभाग्य भी मिला आज मेरे चार कहानी संग्रह, एक कविता संग्रह, एक लघुकथा संग्रह सहित करीब बीस ई-बुक्स बन चुकी है. मेरी कई कहानियों और कविताओं का अनुवाद कई भाषाओं में हुआ तथा मेरी अनेक रचनाएं देश-विदेश के अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हो चुकी हैं. लगभग पांच सौ पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं. यात्राओं से अनेक फ़ायदे हुए. मारीशस के लब्ध-प्रतिष्ठ सहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का मैंने साक्षात्कार लिया. इसी तरह न्यु-जर्सी अमेरिका की प्रख्यात कहानीकार सुश्री देवी नागरानी जी ने मेरा साक्षात्कार लिया. कभी-कभी मैं सोचता हूं कि काश मैं सेवानिवृत्ति नहीं लेता तो शायद ही मुझे इस प्रकार के अवसर मिल पाते. सकारात्मक सोच रखने का ही प्रतिफ़ल है कि मैं काफ़ी कुछ हासिल कर पाया.

इसी घुमकड्ड़ी के चलते मेरी मुलाकात प्रो.राजेश्वर अनादेव जी से हुई. वे पीजी कालेज से सेवानिवृत्त प्राचार्य हैं. सकारात्मक ऊर्जा के धनी है. अब तक आप चौतीस-पैतीस देशों की यात्रा कर चुके हैं. एक यात्रा पूरी नहीं हो पाती कि वे दूसरी यात्रा की रुपरेखा बनाने लगते है. इनके साथ मुझे नेपाल, भुटान, इण्डोनेशिया, मलेशिया, बाली सहित देश के अनेक भु-भागों की यात्राएं करने का अवसर मिले. लक्ष द्वीप के बारे में मैं काफ़ी कुछ पढ़ चुका था. मन में एक नहीं, अनेकों बार यहाँ जाने के विचार बनते-बिगड़ते रहे, लेकिन जाना नहीं हो पाया. अपने मन की पीड़ा को मैंने श्री अनादेवजी से उजागर करते हुए कार्यक्रम बनाने को कहा. उन्होंने हामी भरी और इस तरह लक्षद्वीप जाने के कार्यक्रम तय हो पाया.. इस यात्रा में मित्र अनादेवजी, उनकी पत्नि श्रीमती अनिता अनादेव सहित गौरीशंकर जी दुबे, नर्मदा प्रसाद कोरीजी और मैं स्वयं साथ थे. अमरावती के मित्र जयन्त ढोले जी, उनकी धर्मपत्नि श्रीमती सुषमा ढोले जी हम लोगों के साथ नागपुर से आ जुड़ थे.

लक्षद्वीप जाने से पूर्व हमने कुछ जानकारिय़ाँ इंटर्नेट से प्राप्त की थी. ज्ञात हुआ कि इस द्वीप पर पहुँचने के दो ही साधन है. या तो आपको सफ़र पानी के जहाज से जाना होता है या फ़िर हवाई जहाज से. जाने से पूर्व पर्यटक को उसके स्थानीय पुलिस स्टेशन से इस आशय का प्रमाण-पत्र लेना होता है कि वह क्रिमिनल किस्म का नहीं है. इस प्रमाण-पत्र के आधार पर ही आपको वहाँ जाने की अनुमति प्राप्त होती है और वहाँ पहुंचने के बाद द्वीप स्थित पुलिस स्टेशन पर आपको अपनी उपस्तिथि दर्ज करवानी होती है. बाद में यह भी ज्ञात हुआ कि पानी के जहाज अभी नहीं चल रहे हैं और वे रिपेयरिंग के लिए कुछ समय तक रोक दिए गए हैं. हमारे पास एक ही विकल्प बचा था कि हम हवाई यात्रा करते हुए वहां पहुँचे. पर्यटक को द्वीप में चार दिन से ऊपर रुकने नहीं दिया जाता है. साथ ही यह भी ज्ञात हुआ कि कोच्ची से सप्ताह में केवल एक दिन ही हवाई जहाज यहाँ के लिए उड़ान भरता है. यह भी पता चला कि लौटते समय हवाई जहाज कोच्ची की जगह कोझिकोड के लिए उडान भरेगा. ऐसी विकट परिस्थिति में हमने नागपुर के “स्वस्तिक टूर्स एन्ड ट्रेवल” ( Swastic Tours and Travels, Plot No. 10, Dandige Lay 0ut, Shankar Nagar 440010). के संचालक श्री निनाद आल्मेलकर जी ( मोबा.9421706506) का सहारा लिया और हमने अपने हिसाब से कार्यक्रम निर्धारित किए. श्री आल्मेलकर जी ने अपने सहायक श्री प्रमोद झाड़े (7620107238) को हमारे साथ यात्रा पर भिजवाया, ताकि हमें कोई असुविधा न हो.

हमारे साथ इस यात्रा में अन्य प्रदेशों से श्री अनन्त रालेगांवकर जी, एन.श्रीरामन, श्रीमती पुषा श्रीरामन, सुश्री वीणा महाडिकर जी, सुश्री शालिनी डोणे जी, श्री साकेत केलकरजी, श्री सर्वोत्तम केलकरजी, सुश्री शर्मिन कौटो (Sharmeen Couto), सुश्री स्मिता श्रीवास्तवजी, सुश्री चित्रा परांजपे जी एवं दीपक गोखले जी भी शामिल थे. ये सभी अलग-अलग रुट से कोच्ची पहुँचे थे.
(Photo Group-All members)

17/19-01-2020 ( सुवर्ण जयंति एक्स. रात्रि 11.30)

17 तारीख की शाम को हम छिन्दवाड़ा से नागपुर के लिए रवाना हुए. सुवर्ण जयंती एक्स.नागपुर रात्रि साढ़े ग्यारह बजे पहुँचती है. लगातार दो दिन की यात्रा के पश्चात हम दिनांक 19 जनवरी की सुबह छः-साढे छः बजे के करीब कोच्चि पहुँचे. शहर की प्रख्यात थ्री-स्टार होटेल सारा (SARA) में हमें रुकवाया गया. चुंकि हमारे पास आज का दिन ही शेष था, अगली सुबह हमें शीघ्रता से तैयार होकर कोच्चि एअर-पोर्ट पहुँचना था. अगत्ति के लिए फ़्लाईट सुबह साढ़े नौ बजे की थी. अतः हमने इस अल्पावधि में कोच्ची शहर के कुछ प्रसिद्ध स्थलों को देखने का मानस बनाया.

इस अल्पावधि में हमने फ़ोक क्लोर म्युजियम (FOLK CLORE MUSIUM), सेंट फ़्रांसिस जेवियर चर्च ( SAINT FRANCIS ZAVIER) , साइनेगोग जिव्ज मन्दिर (यहूदियों का प्रार्थना स्थल) -SYNEGOG JEWS TEMPLE- तथा डच पैलेस ( DUTCH PALACE) देखा और दोपहर को हमने “फ़ोर्ट क्वीन” होटेल में सुस्वादु भोजन का आनन्द लिया.

ज्ञात हो कि पुर्तगाली नाविक वास्को डी गामा 8 जुलाई 1497 में भारत की खोज में निकला था. 20 मई 1498 को वह केरल तट के कोज्जीकोड जिले के कालीकट के कप्पाडु ( Kappadu near Kozhikode (Calicut), in Malabar Coast (present day Kerala state of India), on 20 May 1498. पहुँचा था. 1502 में वह पुनः दूसरी बार भारत आया था. लंबी बिमारी के बाद उसका निधन सन 1524 में हुआ. उसके मृत शरीर को कोच्चि के संत फ़्रांसिस चर्च में दफ़नाया गया था. सन 1539 में पुर्तगाल के इस हीरो के शरीर के अवशोषों को निकालकर पुर्तगाल के विडिगुअरा (VIDIGUEIRA ) में दफ़नाया गया.

20-22 जनवरी–अगत्ति.द्वीप

बीस जनवरी की सुबह आठ बजे हमने होटेल सारा छोड़ दिया और सीधे एअरपोर्ट पहुँचे. सुबह साढ़े नौ बजे की इंडियन एअरलाईन की फ़्लाईट अगत्ति के लिए थी. कोच्ची (कोचीन) से अगत्ती तक की उड़ान में महज एक घंटा तीस मिनट लगते हैं. उड़ते हुए हवाई जहाज अगत्ति द्वीप इस तरह दिखाई देता है.

(वायुयान से कुछ इस तरह दिखता है अगत्ति द्वीप )
अगत्ति एअर्पोर्ट हम छिन्दवाडा के साथी

अगत्ति द्वीप

हवाई अडडे से कुछ ही दूरी पर सैलानियों के लिए हट्स बने हुए हैं. मीलों दूर-दूर तक फ़ैली, चांदी-सी चमचमाती मखमली रेत के मध्य ये हट्स बने हुए हैं. इस मखमली रेत पर चलना एक अलग ही तरीके का अहसास दिलाता है. जगह-जगह ऊगे नारीयल के असंख्य पेड़ और पास ही लहलहाता-समुद्र आपको किसी दिव्य लोक में ले जाने के लिए पर्याप्त है. इतना अलौकिक दृष्य जिसे शब्दों में नहीं बांधा जा सकता. दूर-दूर तक फ़ैली नीले पानी की चादर, क्षितिज पर रंग बिखेरता सूरज, सफ़ेद झककास रेत और रंग-बिरंगी मछलियाँ अगत्ती की असली पहचान है. यदि संयोग से उस दिन पूर्णिमा हो तो इस द्वीप के सुन्दरता को देखकर आप मंत्रमुग्ध होउठेंगे.

सूर्यास्त के समय का मनभावन दृष्य

कुछ अन्य जानकारियां अगत्त्ति द्वीप की.

भारत के दक्षिण-पश्चिम में स्थित अरब सागर में कमल-सा खिला एक भु-भाग है, जिसे लक्ष द्वीप के नाम से जाना जाता है. यह स्थान भारत की मुख्यभूमि से लगभग 400 किमी.की दूरी पर अवस्थित है. लक्षद्वीप की उत्पत्ति प्राचीन काल में हुए ज्वालामुखीय विस्फ़ोट से निकले लावा से हुई है. समस्त केन्द्र शासित प्रदेशों में यह सबसे छोटा है. इस द्वीप-समूह में कुल 36 द्वीप हैं, परन्तु केवल दस द्वीपों पर जनजीवन है, शेष निर्जन पड़े हुए हैं. पर्यटक को इन द्वीप-समूह में जाने से पूर्व केन्द्र से अनुमति लेनी होती है. विदेशी सैलानियों को केवल दो द्वीपों पर ही जाने की इजाजत मिलती है.

दुनिया के सबसे शानदार उष्णकटिबंधीय द्वीप प्रणालियों में से एक, लक्षद्वीप केरल तट से 220-440 किमी दूर है. द्वीप पारिस्थितिकी और संस्कृति की एक अनमोल विरासत प्रदान करते हैं. द्वीपों की अनूठी विशेषता इसकी प्रवाल भित्ति है. 4200 वर्ग किलोमीटर समुद्र के धन में समृद्ध लैगून का, 32 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में 36 द्वीपों में फैल गया है. लक्षद्वीप में पानी के नीचे का दृश्य कालीडोस्कोपिक और लुभावनी है. लैगून स्विमिंग, वायु-सर्फिंग, डाइविंग, स्नोर्केलिंग और कायकिंग जैसे पानी के खेल के लिए उत्कृष्ट क्षमता प्रदान करता है. कोई आश्चर्य नहीं, लक्षद्वीप तेजी से भारत की अपनी एक तरह की आधिकारिक खेल-प्रकृति पर्यटन क्षेत्र के स्थान बनता जा रहा है. सभी द्वीप सफेद मूंगा, रेत द्वारा आच्छादित है. इसका क्रिस्टल पानी और प्रचुर मात्रा में समुद्री जीवन इन द्वीपों की सुंदरता को बढ़ाता है. नीले समुद्र के विशाल विस्तार में यह द्वीप पन्नों की तरह दिखाई देता है.

अगत्ति की कुल जनसंख्या सात हजार है. सभी इस्लाम को मानने वाले लोग हैं. जैसा की हमें बताया गया कि यहाँ करीब तीस मस्जिदें और तीन सरकारी स्कूल हैं और कई मदरसे हैं. इनका मुख्य व्यवसाय मत्स्याखेट, नारियल की खेती करना और नौकायन है. वैन चालक रऊफ़ ने हमें बतलाया की यहाँ की आम बोलचाल की भाषा “जसरी” है जो कन्नड और मलयालम मिश्रित है.

दूसरे दिन हमे बंगारम द्वीप पर ले जाने से पूर्व तलापैनी द्वीप पर ले जाया गया, जो बंगारम से कुछ ही मील की दूरी पर अवस्थित है.

तलापैनी आइलैण्ड

यहाँ तीन द्वीप हैं जिनमें आबादी नहीं है. इनके चारों ओर लैगून की सुंदरता देखने लायक है. कूमेल एक खाड़ी है जहाँ पर्यटन की पूरी सुविधाएँ उपलब्ध हैं. यहाँ से पित्ती और थिलक्कम नाम के दो द्वीपों को देखा जा सकता है. इस द्वीप का पानी इतना साफ है कि, आप इस पानी में अंदर तैरने वाले जीवों को आसानी से देख सकते हैं. साथ ही यहाँ आप तैर सकते हैं, रीफ पर चल सकते हैं, नौका में बैठकर घूम सकते हैं और कई वाटर स्पोर्ट्स का आनंद ले सकते हैं.

बंगारम आइलैण्ड.
अन्य द्वीपों से यह सबसे खूबसूरत द्वीप है. यह बेहद ही शांत द्वीप है. इसकी शांति पर्यटकों को अच्छी खासी पसंद आती है. यहाँ नारियल के सघन वृक्ष आपका मन मोह लेते है. डालफ़िन, कछुए, मेंढक और रंग-बिरंगी मछलियाँ यहाँ देखी जा सकती है. मन मोह लेने वाले इस द्वीप पर हमने बहुत सारा समय आनन्द में बिताया और इसी के किनारे एक विशालकाय टैंट के नीचे बैठकर हम सब पर्यटकों ने सुस्वादु भोजन का आनन्द लिया. और अगत्ति द्वीप द्वीप के लिए रवाना हो गए. चुंकि हमारे लिए 22 जनवरी की रात हमारे लिए अन्तिम रात्रि थी, अगली सुबह हमें वापिस लौट जाना था. इस अन्तिम पड़ाव पर हम सब शांत समुद्र के किनारे बैठकर शेर-शायरी और सुन्दर गीतों और कविताओं का आनन्द उठाते रहे

23-01-2020
22 तारीख की रात को ही हमने अपना सारा सामान पैक कर लिया था. सुबह के चाय-नाश्ते के बाद हम अगत्ति एअरपोर्ट पहुँचे. इस बार की उड़ान कोच्ची की न होकर कोझिकोड के लिए थी. इस बात की सूचना पहले ही प्रसारित कर दी गई थी, कि कोच्ची एअरपोर्ट मरम्मत के लिए इस दिन बंद रखा जाएगा. कोझीकोड पहुँच कर हम उस स्थान को देखना चाहते थे, जहाँ वास्को डी गामा अपनी लंबी यात्रा के दौरान कप्पाडु ( Kappadu ) पहुँचा था. चुंकि हमारे पास समय की काफ़ी कमी थी. और हमें शीघ्रता से कोझीकोड रेल्वे स्टेशन पहुँचना था. यहाँ से जनशताब्दी एक्सप्रेस से हमारे सीटें ऎल्लपी के लिए आरक्षित हो चुकी थी. अतः बीच में रुक पाना संभव नहीं था. ऎलप्पी रुककर “बेकवाटर” का हम आनन्द उठाना चाहते थे. अतः ऎलप्पी के लिए हमने अपनी सीटें पहले से ही आरक्षित कर रखी थी.

“गोकुलम” में हमने रुकने के लिए आवास का पहले ही रिजर्वेशन करवा लिया था. गोकुलम के संचालक श्री जिपसन काफ़ी मिलनसार एवं प्रसन्नचित्त व्यक्ति हमें मिले. 23 तारीख की रात को श्री अनादेव जी हाईपर एसीडीटी से पीढ़ित हो गए थे और उन्हें किसी योग्य डाक्टर को दिखाया जाना जरुरी था, चुंकि हमारे लिए ऎलप्पी एकदम नया शहर था. हमारे पास शहर के बारे में ज्यादा जानकारी भी नहीं थी. मित्र जिपसन श्रीमती अनादेव और अनादेव जी को अस्पताल लेकर गए और पूरा ईलाज करवाने के बाद ही देर रात गोकुलम पहुँचे थे. श्री जिपसन की मिलनसारिता, अथक परिश्रम और आत्मीय सहयोग और उनके सेवाभाव के लिए हम जितनी भी प्रशंशा करें, कम ही प्रतीत होगीं. हम उनके इस मधुर सहयोग को जीवन भर नहीं भूल पाएंगे.

केरल में आलाप्पुड़ा (ऎल्लपी) एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है. आलाप्पुड़ा के अप्रवाही जल ( BACK WATER) केरल के सबसे लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण में से एक हैं. वार्षिक नेहरू ट्राफी बोट रेस को देखने के लिए आलाप्पुड़ा एक प्रमुख प्रवेश द्वार है. आलाप्पुड़ा रेलवे स्टेशन आलाप्पुड़ा और इसके आसपास पर्यटकों के पर्यटक आकर्षणों का दौरा करने के लिए एक प्रवेश द्वार के रूप में कार्य करता है. इसके अलावा यहाँ पर 52 ट्रेने रूकती हैं जिनमे 8 ट्रेने यहाँ से खुलती हैं एवं 8 ट्रेने यहाँ पर अपनी यात्रा का समापन करती हैं।

पूर्व के वेनिस के रूप में विख्यात अलाप्पुझा हमेशा से ही केरल के समुद्री इतिहास को जानने का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है. आज यह खूबसूरत गंतव्य अपने नौका दौड़, बैकवॉटर, समुद्री तटों, समुद्री उत्पादों और कॉयर उद्योग के लिए काफी ज्यादा प्रसिद्ध है. यह शहर कोट्टायम से 46 किमी, कोच्चि से 53 और त्रिवेन्द्रम के 155 किमी दूरी पर स्थित है. केरल के साथ यह भारत के भी मुख्य पर्यटन गंतव्यों में गिना जाता है. केरल में अलाप्पुझा के बैकवाटर सबसे लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण हैं.

इन बैकवाटरों में एक हाउसबोट क्रूज बुक किया जा सकता है. यह स्थल कुमारकोम और कोचीन को उत्तरी और कोल्लम से दक्षिण में जोड़ता है. अलाप्पुझा के बीच परिवार और दोस्तों के साथ पिकनिक मनाने के लिए सबसे खास स्थान माने जाते हैं. यह पूरा क्षेत्र समुद्र और पहाड़ियों से घिरा हुआ है जो यहां आने वाले सैलानियों को एक यादगार अवकाश बिताने का मौका प्रदान करता है. पर्यटन के मामले में इसे भारत का बैकवाटर पैराडाइज कहा जाता है. जहाँ आप एक आरामदायक सफ़र का लुत्फ़ उठा सकते हैं. कुट्टानाद की भौगोलिक विशेषताओं के साथ यहाँ के धान के खेत इसे एक शानदार और मनोरम स्थल बनाने का काम करते हैं. फोटोग्राफी के लिए यह एक आदर्श स्थान है. यहाँ की चार प्रमुख नदियां मीचिल, अचंकोविल, पम्पा और मणिमाला प्रवाह इस स्थान को ट्रैवलर्स के लिए एक हब बनाने का काम करती हैं. प्राकृतिक सुंदरता में चार चांद लगाते यहाँ के नारियल के पेड़ काफी मनोरम दृश्य प्रदान करने का काम करते हैं.

25 –जनवरी.-2020
चौबीस तारीख की रात्रि को हमने अपना सारा सामान पैक कर लिया था. अहल्या एक्स. सुबह साढे आठ बजे ऎल्लेप्पी से रवाना होती है. यहाँ से सीधे नागपुर के लिए हमने अपनी सीटें पूर्व में ही आरक्षित करवा ली थी. शाम साढ़े पाँच बजे के लगभग यह नागपुर पहुँची. नागपुर से बस द्वारा हम छिन्दवाड़ा साढ़े नौ बजे पहुँच गए थे.
और अन्त में.
लक्षद्वीप से लौटकर आए हुए हमें अभी ज्यादा समय नहीं बिता है. दस दिन के इस रोमांचक सफ़र की मधुर-स्मृतियाँ आज भी चमत्कृत करती है. चमत्कृत करते हैं वे अद्भुत क्षण, जब हम पूरब से सूरज को निकलता देख रोमांचित होते थे तो वहीं उसे अस्ताचल में जाता देख, इस आशा के साथ लौट पड़ते थे कि अगली सुबह फ़िर सूरज एक नया उजाला, एम नया संदेशा लेकर फ़िर नीलगगन में अवतरित होगा. खिलखिलाता-दहाड़ता समुद्र और समुद्र के बीच कमल सा खिला द्वीप, जिसकी चांदी-सी चममचाती मुलायम रेत पर विचरण करना और नारियल के पेड़ के पेड से बंधे झूले में जी भरके झूलना. रह-रह कर याद आते हैं वे क्षण जब हम सब मिलकर द्वीप पर फ़ैली असीम शांति के बीच सहभोज का आनन्द उठाते है. याद आते हैं वे क्षण जब हम नौका विहार करते हुए समुद्र के तल में फ़ैली शैवाल के सघन बुनावटॊं को देखकर रोमांचित होते थे.

हम धन्यवाद ज्ञापित करते है स्वस्तिक ट्रेव्ह्लर के संचालक श्री अल्मेलकर जी के प्रति कि उन्होंने यात्रा को सुखदायक बनाने के लिए अपने सहायक श्री प्रमोद जी झाड़े को हमारे साथ भिजवाया. न सिर्फ़ भिजवाया बल्कि नागपुर स्टेशन पर स्वयं मिलने आए और हम सबलोगों को यादगार गिफ़्ट सौगात में दी. हम धन्यवाद ज्ञापित करते हैं ऎल्लपी के होटल “गोकुलम” के संचालक श्री जिपसन जी के प्रति कि उन्होंने अपने समय में से समय को चुराते हुए हमें भरपूर सहयोग दिया. श्री जिपसन की मिलनसारिता- उनमें कूट-कूट कर भरी सहयोग की भावना को हम कभी भुला नहीं पाएंगे. हम धन्यवाद ज्ञापित करते हैं उन सभी महानुभावों को जो हमारे सहयात्री बने और इस यात्रा को अविस्मर्णिय बनाने में अपना सहयोग दिया.
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गोवर्धन यादव
(संयोजक म.प्र.राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, जिला इकाई,छिन्दवाड़ा)
103 कावेरी नगर,छिन्दवाड़ा (म.प्र.)
480001
09424356400
ईमेल-goverdhanyadav44@gmail.com
08-02-2020.