कहानी समकालीनः मुक्ति-डॉ. कीर्ति अवस्थी

मेरा मोबाइल तेज़ी से बजे जा रहा था। मैंने ऊँघते हुए देखा तो यह शिंजिनी का फोन था। नींद में होने के कारण मैंने फोन उठाना जरूरी न समझा। लेकिन एक बार कट जाने के बाद उसने दोबारा फोन किया। अब उठाना जरूरी था वरना वह फिर फोन करेगी। मैंने ‘हैलो’ बोला तो उधर से आवाज आई,
‘हैप्पी एनिवर्सरी डियर’
मैंने भी अनमने तरीके से कहा, ‘सेम टू यू’
इतना बोल कर मैंने फोन काटा।
शिंजिनी, मेरी पहली पत्नी जिससे मेरा तलाक हुए पाँच साल हो गए हैं। इन पाँच सालों में वह कभी भी मेरा जन्मदिन और शादी की दोनों सालगिरहों पर बधाई भेजना नहीं भूलती थी। दोनों का मतलब है- मेरी दूसरी शादी, जिसमें उसने बड़ी ख़ुशी से शिरकत की थी। शिंजिनी शायद दुनिया की पहली ऐसी औरत थी, जो अपनी सौतन को देखकर खुश होती थी। मेरी शादी के तीन साल बाद ही मेरा तलाक हो गया क्योंकि उन सालों में कभी भी उसे बहुत खुश नहीं देखा था, जैसा कि एक विवाहिता को होना चाहिए। मैंने अपना पूरा प्रयास किया कि उसे किसी प्रकार का कोई कष्ट न हो किंतु गृहस्थी की गाड़ी अकेले नहीं चलती। मेरे अनवरत् प्रयासों के बावजूद एक दिन अचानक ही मुझे तलाक का नोटिस मिल गया। वैसे उसकी सूचना उसने मुझे पंद्रह दिन पहले दे दी थी पर मैंने उसे मज़ाक में लिया। मैं अवाक् और घर वाले सुन्न, मानो हम दिवालिया घोषित कर दिए गए हों। हमारी शादी घरवालों ने तय की थी इसलिए सब चकित थे। शिंजिनी को तरह-तरह से मेरे सास-ससुर ने, मेरे माता-पिता ने समझाने का प्रयास किया लेकिन वह न जाने किसके कहने में आ गई थी? पहले तो मुझे लगा कि उसके किसी और से संबंध हैं इसी कारण वह मुझे छोड़ रही है। लेकिन इन पाँच सालों में मेरा यह संदेह भी दूर हो गया क्योंकि वह अभी भी अकेली ही थी।
दूसरी तरफ मेरी दूसरी पत्नी- परिणीता। शिंजिनी से एकदम अलग सीधी-सादी एकदम घरेलू। अगर मैं यह कहूँ कि शिंजिनी से अलग होकर मैं ज्यादा सुखी था, तो गलत नहीं होगा लेकिन यह सवाल अक्सर सताता है कि वह अगर कोशिश करती तो हम अच्छे पति-पत्नी बन सकते थे। बड़ा ही अजीब रिश्ता है मेरा उसके साथ। मेरे या परिणीता के जन्मदिन पर वह बधाई संदेश, कार्ड और फूल हमेशा भेजती थी। उसे पता था कि मुझे गुलाब बेहद पसंद हैं इसलिए फूलों में हमेशा गुलाब ही आते और कुछ दिन घर में सजने के बाद घर से बाहर हो जाते बिल्कुल मेरे और उसके रिश्ते की तरह। एक बात और थी कि मेरी और उसकी शादी की सालगिरह पर वह हमेशा मुझे डिनर पर बुलाती। हम किसी रेस्तरां में मिलते, साथ डिनर करते और अपने-अपने घर चले जाते। परिणीता ने इसका कभी विरोध नहीं किया पर मुझे समझ नहीं आता था कि मैं उस संबंध की जयंती मनाता था या पुण्यतिथि! बस उसके बुलावे पर चला जाता। उसके हिसाब से शादी का रिश्ता नहीं चला, तो क्या हुआ? दोस्ती तो चल सकती है। हालाँकि मुझे ऐसी दोस्ती समझ नहीं आती कि आपका हमसफर, आपका हमबिस्तर होकर आपका दोस्त बनने को कहे। इसका क्रम तो कुछ ऐसा होना चाहिए कि पहले दोस्ती, फिर हमसफर, फिर हमबिस्तर लेकिन यहाँ सारा कुछ बिगड़ा है। मैं आज तक नहीं जान पाया कि ज़्यादा बिगड़ा किसका हुआ उसका या मेरा?
जब मेरी उसके साथ शादी हुई, तो हमारी पहली रात को मैंने उसे एक सोने की चेन भेंट की। उसने बिना किसी दिलचस्पी के उसे तकिए के नीचे रख दिया और थकान के कारण सोने की गुज़ारिश की। नई-नई शादी के मस्त माहौल में मैंने उसकी बात मान ली। हम दोनों ही अलग-अलग करवट लेकर सो गये और इस तरह से हमारा कोई भी संबंध नहीं बना। धीरे-धीरे समय बीता और हमारा संसर्ग भी हुआ। मैं जितना उसमें डूबता गया, वह उतना ही मुझसे दूर होती रही। मैंने इसे उसका स्वभाव मानकर स्वीकार भी कर लिया था लेकिन शायद वह ऐसा कर पाने में खुद को असफल पा रही थी। अब मेरे कुछ भी कहने पर वह मुझे खुद वह काम करने की हिदायत दे देती। शुरू-शुरू में, जब मैं उसे हमारा बेडरूम साफ रखने की बात करता, तो वह उलटे मुझे ही ऐसा करने को कह देती। मैं कभी माँ से चाय माँगता तो वह मुझ पर ही खीझ उठती,
‘अरे! कुछ काम खुद भी कर लिया करो। हर समय दूसरों पर निर्भर रहते हो।’
इसी तरह छोटी-छोटी बातों ने जाने कब बड़ा कारण बना दिया? और उसका अंजाम तलाक के रूप में सामने आया। अब वह अपने माता-पिता से अलग, मुझसे अलग एक फ्लैट में रहती है- एकदम अकेली। किसी फर्म में एच.आर. हो गई है। उम्मीद है कि ख़ुश ही होगी। आज शाम उसने फिर मेरे साथ डिनर करने का कार्यक्रम बनाया था। मैं तय समय और जगह पर पहुँच गया। वह पहले से मेरा इंतजार कर रही थी। हल्के हरे रंग की साड़ी में खूबसूरत लग रही थी। हमने खाना मँगाया और इधर-उधर की बातें करने लगे। मैं तड़प रहा था, उससे एक सवाल करने के लिए कि आखिर क्यों उसने बिना किसी वजह के मुझे छोड़ दिया? उसने मेरा चेहरा देखते ही समझ लिया कि मैं क्या पूछना चाहता हूँ? वह बोली,
‘तुम परिणीता के साथ खुश तो हो न!’
मैंने हाँ में सिर हिलाया। उसका चेहरा गंभीर हो गया आँखें और गहरी होती चली गईं। फिर धीरे से बोली,
‘तुम जानना चाहते हो कि मैंने हमारा रिश्ता क्यों तोड़ा?… मैंने शादी करके समझा था कि यही जीवन है, ऐसा ही होता है लेकिन बाद में महसूस हुआ कि मैं शादी और उससे जुड़ी जिम्मेदारियाँ नहीं निभा सकती। मेरी स्पर्धा हमेशा तुमसे रही कि तुम पुरुष हो इसलिए तुम पर कोई बंधन नहीं और मैं स्त्री, तो घर के कामों में खटती रहूँ। मुझे हर औरत के भाग्य पर क्रोध आता है कि क्यों उसे यह सब करना पड़ता है? यही मेरे साथ भी हुआ, मुझे एक ऐसा घर चाहिए था, जो सिर्फ और सिर्फ मेरे इशारे पर चले और तुम्हारे साथ यह कतई मुमकिन नहीं था लेकिन मेरी इस सोच को मैं तुम पर लाद नहीं सकती थी। तुमने पूरी कोशिश की थी हमारा रिश्ता बनाए रखने की पर ये, वो मंजिल नहीं जो मुझे चाहिए थी। मैं घुट रही थी बिस्तर की सिलवटों में, किचन के जूठे पड़े बर्तनों में, वॉशिंग मशीन के गंदे कपड़ों में और तुमसे जुड़े रिश्तों के बीच जबरदस्ती मुस्कराने में। मेरी इस घुटन से बाहर निकलने का तरीका था- तुम्हें आज़ाद करना। सच यह है कि तुम्हारी आज़ादी में मैंने अपनी उस घुटन से मुक्ति पाई है।’
इतना बोलने के बाद उसने एक गहरी साँस ली, मानो किसी धूल भरे कमरे से बाहर निकली हो।

–0–

डॉ कीर्ति अवस्थी
दूरभाष: +91638605747
जन्मतिथि : 07 मई,1981
जन्म स्थान: ग्राम बैंती, तहसील शिवगढ़, जिला रायबरेली, उत्तर प्रदेश, इंडिया
शिक्षा: एम. ए. (अंग्रेजी, शिक्षाशास्त्र एवं हिंदी) बी.एड., पी-एच.डी. (अंग्रेजी)
प्रकाशन: कहानी संग्रह ‘सुबह का चाँद’ (2019)
विभिन्न राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में शोध पत्र, स्तरीय साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में कहानियों का प्रकाशन
सम्मान: प्रज्ञा साहित्य सम्मान (2019)
मुसन्निफ़ ए अवध सम्मान (2020)
संप्रति: अध्यापन (अंग्रेजी), बाल विद्या मंदिर सीनियर सेकेंडरी रेजिडेंशियल/डे स्कूल, चारबाग लखनऊ, उत्तर प्रदेश, इंडिया
संपर्क: 6 सी, पार्क हाऊस, ला मार्टिनियर कॉलेज कैंपस, पार्क रोड, लखनऊ 226001 उत्तर प्रदेश, इंडिया