कहानी समकालीनः दोस्ती एक अटूट बंधन-डॉ.ज्योत्सना सिंह

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे से ब्याह कर आई पढ़ी लिखी नन्दिनी ने दिल्ली शहर में पहली बार कदम रखा था। घर की हालत ज्यादा अच्छी नहीं थी पिताजी ने नन्दिनी की परवरिश और शिक्षा पर ध्यान दिया था लड़की पराये घर चली जाऐगी, कभी कोई भविष्य में परेशानी आयी तो अपनी योग्यता और सूझबूझ से अपने घर परिवार को भली-भाँति सहारा दे सकेगी । छोटे से कस्बे के तौर-तरीके और घर से मिले संस्कार से नन्दिनी का मिलनसार स्वभाव सदैव सबको भाता था । हंसमुख साफ सुथरा गोरा चेहरा मीठी बातें सबके कानों में रस घोलती थी,साथ ही जरूरत मंद और अभाव ग्रस्त व्यक्तियों,वृद्ध जनों की सेवा में सदैव तत्पर रहने वाली नन्दिनी आज अपनी ससुराल में अकेली पड़ गई है। परिवार में दो भाई मनीष,साहिल और सास । छोटा भाई साहिल नागपुर में कम्पनी में लगा हुआ है। पिछले साल दिल का दौरा पड़ने से ससुर साहब का निधन हो गया था। सास अकेली थी मगर अपनी नौकरी में व्यस्त रहती, महाविद्यालय में पुस्तकालयाध्यक्ष के पद पर कार्यरत थी। नन्दिनी के पति मनीष प्रशासनिक पद की परीक्षा की तैयारी के लिए इलाहाबाद चले गए थे उनका नन्दिनी के प्रति कभी कोई आत्मिक लगाव नहीं रहा, जब भी आते माँ से भाइयों से खूब हँसकर मिलते पर नन्दिनी के पास कभी नहीं जाते और न ही कभी कोई बात पूछते और न अपनी बताते ,मनीष का पास में होना न होना बराबर था। नन्दिनी हमेशा हीनभावना में ग्रसित यही सोचती न जानें मुझमें क्या कमी है, मनीष ऐसा व्यवहार क्यूँ करते हैं कई बार हिम्मत जुटाकर नन्दिनी ने अपनी सास से पूछने की कोशिश की मगर सास चुप्पी साध लेती कुछ न कहती ।एक दिन मनीष घर में अकेला,मौका पाकर नन्दिनी ने मनीष से पूँछा क्या बात है आप की इस बेरुखी का कारण क्या है,कोई गल्ती हो तो बताऐं सुधारने की कोशिश करूँगी, गिड़गिड़ाते हुए नन्दिनी बोली प्लीज कुछ तो बताऐं .. मनीष झल्लाते हुए बस बहुत हो गया मैं तुम्हें पसंद नहीं करता माँ के कहने पर जबरन शादी की गई है यह शादी मेरी मर्जी से नहीं हुई है, अब इसके आगे एक भी शब्द मत पूँछना ज्यादा परेशान करोगी फिर लौट कर कभी नहीं आऊंगा, मेरा तुम्हारा कोई रिश्ता नहीं है तुम स्वतंत्र हो। इतना कहकर मनीष गाड़ी उठाकर बाहर निकल गया। नन्दिनी का रो-रो कर बुरा हाल नन्दिनी अवसाद से ग्रस्त हो गई बस दिन घर के कामों में लगी रहती,अकेली पूरे-पूरे दिन क्या करे समझ नहीं आता था। किससे पास बैठे,किससे बात करे गिनती के दो जन सास और नन्दिनी।घर के सब सदस्य सुबह की पहली चाय के साथ अपनी-अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो जाते थे। एक दिन अचानक नन्दिनी की तबियत बिगड़ गई नन्दिनी की सास ने पास के अस्पताल में महिला डॉक्टर को दिखाया उसने सारा चैकअप कर नन्दिनी की सास से कहा इसका बिशेष ख्याल रखना माँ बनने वाली है कोई सदमा या अकेलापन न रहे अच्छा वातावरण बनाए रखना माँ और बच्चे दोनों के लिए आवश्यक है। इसका पति कहाँ है उससे जरूरी बात करनी है नन्दिनी की सॉस ने कहा बेटा बाहर है कभी कभार आता है । डॉक्टर ने पूरी बात सुनकर कहा अच्छा ठीक है नन्दिनी की टिपीकल कंडीशन है आप ध्यान रखिएगा। वैसे चिन्ता की कोई बात नहीं है दवाइयाँ दे दी हैं।
समय बीत चला नवॉ महीना भी लग गया मायके से सब मिलने आये पिताजी भाई बहन सब खुश थे ।लेकिन नन्दिनी के पति के पास वक्त नहीं था न तो डॉक्टर से मिलने का और न पत्नी का ख्या़ल रखने का। समयावधि पूरी होने पर नन्दिनी के बेटा हुआ ,सब बहुत खुश से आसपास के लोग भी बधाइयां देनें आऐ जो भी आता मनीष के बारे में पूछता , ऐसी कौन सी पढ़ाई है जो बहन जी आपका बेटा आज भी नहीं आया।नन्दिनी की सास कुछ न कहती।
पूरे मोहल्ले का ख्या़ल रखने वाली खूबसूरत नन्दिनी अपनी मासूम हँसी खो चुकी थी गुम-सुम उदास असुरक्षित भयभीत मायके के बीते पलों को याद करती रहती।माँ पिताजी अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होकर बहुत खुश थे।बेटी आज ससुराल में बहुत खुश है ईश्वर की कृपा से भरा पूरा परिवार है ,बेटा भी आ गया है।सब सम्पन्नता है ,बस घर की देखभाल करना है सब सज्जन लोग है हमारी बिटिया बड़ी किस्मत वाली निकली , छोटे से कस्बे से बड़े से शहर में पहुंच गई। नन्दिनी की पीड़ा से सब अनजान थे वह रोती ईश्वर से पूछती हे प्रभू यह मेरा सुख है या मेरी सजा़।अगर सजा़ है तो इसकी बज़ह क्या है? कहते है न एक दरवाजा बन्द होता है तो दूसरा दरवाजा खुल जाता है
समय बीतता चला गया, आज नन्दिनी का बेटा तीन चार साल का हो गया समय का पता ही नहीं चला,समय कैसे निकल गया,बच्चे के एडमिशन के लिए माता-पिता दोनों का होना आवश्यक था,पर मनीष आज भी नहीं आया। सासू माँ ने कहा नन्दिनी बाहर निकलो अपने बच्चे के लिऐ ,हम कब तक सहारा देंगे, हमनें अपनी जिम्मेंदारियाँ निभाई अब वक्त तुम्हारा है तुम्हें सब अकेले देखना है ,क्या माँजी अकेले क्यूँ ? नन्दिनी ने प्रश्नात्मक लहजे से पूँछा माँजी बताओ न प्लीज क्या बात है ? नन्दिनी की सास ने लम्बी साँस खींचते हुए धीरे से बोली कल रात मनीष का फोन आया था,हमनें उससे कहा बच्चे के एडमीशन के लिए तुम्हारा आना जरूरी है उसनें स्पष्ट रूप से मना कर दिया। तब पता चला कि जिसके मकान में रहता था उसी मकान मालिक की लड़की के साथ मनीष ने हम सब की मर्जी के बिना शादी कर ली है सोचा था ,बच्चे के आने के बाद सब सही हो जायेगा मगर…. अब कुछ हाथ में नहीं बचा, हिलकी लेते हुए नन्दिनी माँजी शादी कब की , कह रहा था अभी यहाँ से जाने के बाद…..। थोड़ी देर तक सन्नाटा छा गया ,फिर नन्दिनी की सास ने ढ़ाढ़स बँधाते हुऐ बोली तुम्हें ही बच्चे को अकेले सम्भालना है,हिम्मत रखना है, बच्चे का एडमीशन पास के विद्यालय में करवा दो जिससे तुम्हें आने जानें में परेशानी नहीं होगी,ऑटो या बस की भी जरूरत नहीं है यहाँ से लगभग 10 मिनट का रास्ता होगा आज जाकर देख लो ठीक लगे तो एडमीशन करवा दो ।ठीक है माँजी ।
अब नन्दिनी के पास बच्चे को लाने और ले जाने का काम मिल गया और बाहरी दुनिया से सम्पर्क भी बढ़ा ।धीरे-धीरे आसपास के पड़ोसियों को जानने लगी,मिलते- जुलते ,हाल-चाल भी पूछ लेती थी अब सबको पहचानने भी लगी थी किसी को स्वभाव से किसी को नाम से पिछले दो दिन से बगल वाली आन्टी नहीं दिखाई दे रही हैं, अक्सर आन्टी नन्दिनी से और नन्दिनी आन्टी से हाल चाल पूछ लेती थी ।कई बार आंटी पोर्च में जबर्दस्ती बिठा लेती थी अपनी पुरानी यादें अंकल की नौकरी के दौरान जीवन के उतार चढ़ाव से सम्बंधित अपनी सारी बातें बताने लग जाती थी, एक दो मिनट से अब आधा आधा घंटा लग जाता आंटी का हाल सुनने में। आंटी से जबरन माफी माँगकर उठना पड़ता था। दो दिन नन्दिनी का मन नहीं लगा उसकीआँखें आंटी को खोज रही थी किससे पूछे घर पर अकेली आंटी अभी पिछले दो वर्ष पहले ही अंकल का निधन हो गया था आंटी अकेली पड़ गई थी। जब भी कोई बात करती हर बात में अंकल को जरूर याद करती। मन नहीं माना कदम पोर्च को पारकर घंटी की ओर बढ़े और हाथों ने इशारा पाकर घंटी बजाई दरवाजा नहीं खुला इंतजार कर लौटने लगी तभी अंदर से कुछ आवाज आई और दरवाजे की सिटकनी खुली आंटी ने थकी लड़खड़ाती हुई आ्वाज में कहाँ अन्दर आ जाओ। नन्दिनी ने कहा जी आंटी आप को क्या हुआ अचानक आंटी ने कहा बेटा लगता है मेरा भी समय नजदीक आ गया है।दो दिन हो गए हैं तेज बुखार सिरदर्द से सिर फटा जा रहा है आज फोन कर दिया है शाम तक बेटा बहू आ जायेगें। अभी आफिस की छुट्टियाँ है इसीलिए कुछ दिनों के लिए वो दोनों बाहर गये हैं। नन्दिनी ने कहा लेकिन आंटी आप हमेशा ही अकेली दिखती हो। हाँ सही कहा बेटा बहुऐ साथ में रहना कहाँ चाहते है हर किसी की किस्मत तुम्हारे सास ससुर जैसी नहीं होती है। यह सुनकर नन्दिनी को अपना अकेला पन याद आ गया और मन ही मन सहम गई।फिर नन्दिनी ने पूछा आंटी दवाई लानी हो तो बता दो, आप कहो तो खिचड़ी या दलिया बना दूँ ,फिर मुझे जल्दी भी जाना है ,घड़ी पर नजर डालते हुए कहा। आँटी ने कहा आधा कप काफी बना दो बस,जी आँटी कहकर रसोई में आई सामने कवर्ड से काफी की शीशी निकाली बड़ी सी शीशी में बस दो डेले काफी के मिले एक को उसमें से फटाफट घोलकर काफी बना कर आंटी को दी,आंटी की आँखें नम हो गई कुछ न कहा चुपचाप काफी पकड़ ली धीरे -धीरे पीने लगीं ,नन्दिनी ने काफी शीघ्रता से पी और घर की ओर फटाफट चल दी ।
धीरे धीरे नन्दिनी को आस पड़ोस के सब अपने से लगनें लगे सबके घर जाना आना सबकी मदद करना उसकी दिनचर्या में समाहित हो गया।सब उसको पसंद करते जिससे मिलने नहीं पहुँच पाती वो सब घर पर मिलने आ जाते। नन्दिनी के जीवन में काफी बदलाव आ गया था। नन्दिनी ने अपने प्रयासों मायके के जैसा खुशनुमा माहौल बना लिया था वो अपनी दिनचर्या से खुश थी पर संतुष्ट नहीं। उसे अपना खाली पन अभी भी डंसता था। कभी समय मिलता तो वह अपनी डायरी में कुछ विशेष पलों को जरूर सहेजती। लेखन की इसी आदत ने नन्दिनी का रूख कविता कहानियों की तरफ मोड़ दिया। कभी कभार स्थानीय काव्य गोष्ठियों में जाती अपने जीवन के यथार्थ अनुभवों को कविताओं के माध्यम से प्रस्तुत करती लोग बड़े प्रभावित होते उसे कार्यक्रमों में आमंत्रित करते ,नन्दिनी की कवितायें सीधे लोगों के दिलों में उतरती। एक दिन नन्दिनी एक बड़े आयोजन में कविता की पंक्तियाँ कुछ इस तरह पढ़ी ….

हृदय बसी पीड़ा मेरे मन की
जीवन रीता जाए
छल रही गागर नैनन की
होठ रहे झुठलाए

और आँखों से लुढ़कते आँसुओं को छुपाते हुऐ धीरे से जबरन मुस्कान होठों पर दिखाते हुए कविता को पूरा कर अपने स्थान पर बैठ गई। कार्यक्रम में पधारे मुख्य अतिथि के रूप में प्रशासनिक अधिकारी अजय कुमार नन्दिनी की प्रत्येक गतिविधि को बड़े गौर से देख रहे थे,उनका पूरा ध्यान नन्दिनी पर था। कार्यक्रम समापन के बाद नन्दिनी के पास बोले नन्दिनी जी मैं आप की कविता से बहुत प्रभावित हुआ हूँ,एक बात कहूँ आप अन्यथा न लेना क्या हम दोस्त बन सकते हैं। नन्दिनी ने बड़े शान्त भाव से अजय कुमार के चेहरे की ओर देखा और कुछ न बोली। अजय कुमार ने फिर बोले अगर आप इस काबिल नहीं समझतीं है तो कोई बात नहीं है ….नन्दिनी ने कहा सर ऐसी कोई बात नहीं है…. अजय ने कहा फिर क्या बात है यदि आप चाहें तो अपना नम्बर मुझे दे दें ,ठीक है सर।
एक दिन शाम को मोबाइल पर घंटी बजी नन्दिनी ने फोन उठाया,उधर से आवाज आई नन्दिनी जी पहचाना आपने एक दो सेकंड चुप रहने के बाद अचानक नन्दिनी के मुँह से निकला अजय सर आप…हाँ नन्दिनी अजय ने कहा ….पहचान लिया तुमने मुझे अच्छा लगा,कही तुम इन्कार कर देती तो,शायद मेरी सारी उम्मीदें खत्म हो जातीं । नन्दिनी ने प्रश्न किया कैसी उम्मीदें सर….? बताता हूँ नन्दिनी पहले तुम वादा करो जो मैं पूछूँगा सच सच बताओगी …तुम्हारे सच बताने में ही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर छिपा है। नन्दिनी ने कहा क्या बात है सर पूछिए पूरी कोशिश करूँगी आपके प्रश्न का उत्तर दे सकूँ। यह हुई बात नन्दिनी, तुम सच बताना अजय ने फिर अपनी बात दोहराते हुए कहा, उधर से नन्दिनी कि आवाज आई ठीक है सर…… अजय तुम्हारे कविता के पीछे छिपे आँसुओं की वज़ह क्या थी इतना दर्द…मैं तो तुम्हें सुनने के बाद तुम्हारी कविता में ही डूब गया अभी तक भूल नहीं पाया हूँ आँसुओं में डूबी आँखों को …..।
फोन से सिर्फ एक हल्की सी हिलकी की आवाज आई लगता नन्दिनी के रोने की आवाज थी कि फोन टू टू कर कट गया। अजय को समझ नहीं आ रहा था कि फोन दुबारा लगाऊँ या नहीं लगाऊँ। फोन लगाने से नन्दिनी कहीं बुरा न मान जाए यह सोचकर अजय कुर्सी खींचकर उस पर बैठ गया।थोड़ी देर बाद मोबाइल की घंटी बजी अजय कुर्सी से उठा बड़े अनमने मन से मोबाइल को उठाया नन्दिनी का नाम देखकर आँखों में चमक आ गई झट से हैल्लो किया नन्दिनी सॉरी फोन उठाने में वक्त लगा …हाँ अब कैसी हो नन्दिनी। ठीक हूँ अजय जी नन्दिनी ने बड़े शान्त स्वर में कहा।नन्दिनी प्लीज मै तुमसे मिलना चाहता हूँ मना मत करना।पास के कॉफी हाउस में आज शाम …ठीक है न,नन्दिनी कुछ तो बोलो। हाँ ठीक है आओगी न पक्का… कोशिश करूँगी ….कोशिश नहीं, तुम्हें आना होगा…… हाँ ठीक है आ जाऊँगी।
अजय नीले गहरे रंग की शर्ट और काले रंग का पेन्ट पहनकर आ गया,इत्तेफाक से नन्दिनी की साड़ी भी नीले गहरे रंग की थी अजय ने नन्दिनी को देखा उसकी साड़ी को देखा ,देखता रह गया सेम पिन्च नन्दिनी ।नन्दिनी ने उसकी शर्ट को देखा फिर अपनी साड़ी की ओर देखकर धीरे से मुस्कुराई और बोली थैन्यू अजय जी।अजय हमारी पंसद मिलती है न आखिर हमारी पसंद आप के चेहरे पर मुस्कान ले ही आई। अजय ने दो कॉफी का आर्डर दिया साथ में स्नैक्स… नन्दिनी की देखते हुए अजय नन्दिनी कुछ अपने बारे में बताओ.. क्या बताऊँ अजय जी सबसे पहले ‘जी’ हटा दो ,केवल अजय ? दूसरी बात अपनी उदासी की वज़ह बताए…।
अजय मेरा अकेलापन ही मेरी उदासी है …तुम सोच रहे हो शादीशुदा हूँ घर परिवार है फिर भी अकेलापन? सच्चाई तो यह है कि मैं अपने अकेलेपन से लड़ लड़कर टूट चुकी हूं।हसबैंड कभी भी साथ नहीं थे बस छोटे से बच्चे के सहारे जीवन बीत रहा है वो हँसता है तो हँसती हूँ वो रोता है तो रोती हूँ। जब तक वो साथ है तब तक जीने की वजह भी है कल को वो बड़ा हो जाएगा बाहर चला जाएगा ।मेरी जीने की वज़ह भी खत्म हो जाएगी…
अजय बीच में ही बात को काटते हुए ..ऐसे क्यूँ कह रही हो तुम चाहों तो जीने की वज़ह हमेशा तुम्हारे पास रहेंगी…. आज से तुम्हारी हर परेशानी हमारी परेशानी है तुम वादा करो कभी उदास नहीं रहोगी और न ही रोओगी। तुम मुझे अपना मानो या न मानो मेरे लिए तुम मेरी जिन्दगी हो शायद एक नज़र की चाहत इसे ही कहते हैं।मेरे लिए तुम पहली और आखिरी चाहत हो मुझे हमेशा तुम्हारा इंतजार रहेगा…।
नन्दिनी ने घर आकर दबी जुबान से अपनी सासू माँ को अजय के बारे में सब कुछ बताया,और कहा कि माँ बेटा भी कभी-कभी पूछता है अपने पिता के बारे में,समाज में स्त्री का अकेले रहना बहुत मुश्किल है माँ, आप उचित रास्ता बताओ मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है,ठीक है नन्दिनी तुम खुद समझदार हो अपना भला-बुरा अच्छे से समझती हो जो निर्णय लेना सोच समझ कर लेना,कानून के दायरे में लेना ठीक है माँ। माँ आप भी आज अजय से मिल लीजिए। थोड़ी देर बाद दरवाजे पर घंटी बजी नन्दिनी ने दरवाजा खोला और अपनी सासू माँ को आवाज लगाई माँ बाहर आओ । सासू माँ ने बाहर आकर देखा और बोली अजय नन्दिनी ने सर हिलाते हुए हाँ माँ …सोफे की तरफ इशारा करते हुए बोली बैठिये बेटा, नन्दिनी ने सब कुछ तुम्हारे बारे में बताया यह हमारी बहू नहीं बेटी की तरह से है इसका तुम ध्यान रखना पहले से ही बहुत दुखी हैं इसे और दुख न देना, मेरी जिद से ही इसे इतनी बड़ी सजा मिली है, इसके बीते दिनों को तो लौटा नहीं सकती पर जो समय बचा है इसकी झोली में खुशियाँ डालना चाहतीं हूँ यही मेरा प्रायश्चित होगा। नन्दिनी की सास ने नम आंखों से नन्दिनी का हाथ अजय के हाथों में थमा दिया।
कुछ दिन बाद …..नन्दिनी फोन पर, कहाँ हो अजय टाइम हो गया है बेटे को स्कूल से लाना है मेरा जाना सम्भव नहीं है…ठीक है नन्दिनी तुम फोन रखो मैं लेकर आता हूँ।नन्दिनी फिर थोड़ी देर से अरे अजय सुनों कुछ फल भी लेते आना तुम्हारी पसंद का शेक बनाऊँगी आज शाम खाना साथ में ही खायेंगे ठीक है नन्दिनी बस थोड़ी देर से तुम्हारे पास ही आ रहा हूँ। नन्दिनी अजय जैसा जीवन साथी पाकर बहुत खुश थी,अजय के प्रेम भरे मित्रतापूर्ण व्यवहार ने नन्दिनी को नव स्फूर्ति नव चेतना और जीने की वज़ह दे दी।

■■
डॉ ज्योत्सना सिंह राजावत
सहायक प्रध्यापक( संस्कृत)
जीवाजी विश्वविद्यालय
ग्वालियर मध्यप्रदेश भारत