कविता नव हस्ताक्षरः जुलाई-अगस्त 2020


बिट्टू
वो नन्हाँ सा हँसता खिलखिलाता फ़रिश्ता ,
ज़िन्दगी में खुशी की वो एक फ़ुआर,
खिलोनों के बीच में बेंठा ,बुनता एक निराली दुनिया,
बड़े लोगों- सी बातें बनाता , वो सबको हँसाता,
है कृष्णा का एक स्वरुप,
अपनी सारी डिमांड प्यार से रखता, हमें मनाता
कभी नए कपड़े , कभी नए जूतों से खुश होता
कभी माँगता चॉकलेट , तो कभी नए खिलोने,
नये वस्त्र धारण किये, लगता कृष्ण सा मनमोहक
घुटने चलता, हकलाता, डांस करता,
रखता सबका पूरा ख्याल,
प्यार और मासूमियत से भरा,
उस तोते में है मेरी जान,
जितना करू उसके लिए, लगता मुझे उतना ही कम,
जिन्दगी में बहुत कुछ सिखाता,
परेशानियों का हँसकर सामना करना,
“जिंदगी कितनी सुँदर है, जीना है पूरी तरह” -एहसास वही मुझको कराता
मेरी दुनिया में उजाला वो लाता,
भुल गयी मैं अपने सारे ग़म उसकी दुनिया में खोकर,
खुशकिस्मत है वो, जिसके घर में हो एक छोटा सा फ़रिश्ता,

परिचय :
नाम: ज्योति चौहान
जन्म स्थान :-डेल्ही ,मूलत: उत्तर प्रदेश की है
शिक्षा : दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं, साथ ही रसायन-शास्त्र में स्नातकोतर,शिक्षा में स्नातक , पुस्तक- विज्ञानं तथा सुचना तकनिकी में स्नातक,और कंप्यूटर में पी.जी.डी.सी.ए
व्यवसाय :- एक वहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत . नोएडा में अनुसंधान और विकास विभाग में एक वैज्ञानिक के रूप में काम कर रही हूँ.


कोहरे में कैद ज़िन्दगी
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अभी- अभी ही संदेश आया-
‘ गुंजन विधवा हो गई’
इस खबर ने सुनहरे ख़्वाबों को
कोहरे- सा ढक लिया।
अभी – अभी मेरे सामने ही तो
उसका किसलय फूटा था
उसने गुलाबी लालिमा के साथ
इस दुनियावी आब को स्पर्श किया था
और अभी शंखध्वनि गूंजी
कि उसे सौंपा जा चुका
एक अनजान पुरुष को ताउम्र के लिए।
अभी तो उसकी अरुणाई निखरी भी नहीं थी
अभी तो दुधिया दाने सुगंध बिखेर ही रहे थे
अभी तो उसने जीवन महसूस भी नहीं किया
और अभी ही उसके प्रासाद में
दीमक का प्रवेश।
अपने सपनों को आंचल की कोर में बांधे
वह भले ही मां की देहली पार की
ससुराल की चौखट ने
उसे खुलने से पहले ही बिखेर दिया।
दारू का नशा व कुत्सित- वृत्ति का उबाल
उसका हर लम्हा नारकीय कर गया
अभी तो वह आयी थी यहां
अपनी देह पर उस हैवान की क्रूर- छाप लेकर
मां का विदा- उपदेश
वह अपनी आत्मा के मृत्योपरान्त भी निभा रही थी
परंतु अमानुषी जीवन- जंग में
वह ख़ुद ही हार गया।
अभी पता चला
उसकी कराह का हक भी छीन
कुछ आनुवंशिक क्रूर
उसकी सांसें भी खींच लिए।
अभी तो उसके बचपन का प्रभात
यौवन की चढ़ाई भी नहीं चढ़ा
कि उसका जीवन, बिन संध्या ही
तमिस्राधीन हो गया।
मेरी आंखों में वह पल
अब भी जिंदा है
जब पूरे स्कूल में उसकी दौड़ का
कोई सानी नहीं था
वह समय, जब पूरा गांव
उसकी प्रतिभा पर मुस्कुरा उठा था
विधायक ने ख़ुद पुरस्कार सौंप
यशस्वी होने का आशीर्वाद दिया था
कितना सुखद था वह क्षण
जब उसके गले की मिठास
और पांवों की थिरकन ने
सभी को मोह लिया था।
अभी – अभी खंडित संसार व सूनी मांग
देखकर पूरा गांव
कातर हो उठा।
अब बाईस साल की गुंजन
दो बच्चों का भविष्य-भार थामे
दो साल से विधवा-जीवन ढोने को अभिशप्त है।

किसमत्ती चौरसिया ‘स्नेहा’
शोध छात्रा
हिंदी विभाग,
इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद।
ग्राम- कनेरी, पोस्ट- फूलपुर, जिला- आजमगढ़, उत्तर प्रदेश

जीवन में रस घोले हिन्दी

मन की गाँठें खोले हिन्दी।
जीवन में रस घोले हिन्दी।।

मैं भी बोलूँ, तुम भी बोलो।
मन से जन-जन बोलें हिन्दी ।।

जीवन में रस घोले हिन्दी।

धरती बोले, अम्बर बोले।
सरिता बोले, सागर बोले।।
बूँद बोले, महासागर बोले।

पवन बोले, सुमन बोले।
झूम-झूम के ‘सावन’ बोले।

मन का ताला खोले हिन्दी।
जीवन में रस घोले हिन्दी।

माँ है हिन्दी, बहन है हिन्दी।
हमारी रहन-सहन है हिन्दी। ।

रस से भी है मीठी हिन्दी
फिर भी हमसे रूठी हिन्दी –

हम गैरों को गले लगाते हैं
अपनों को समझ न पाते हैं

हिन्दी माँ सब कुछ सहती है
और बच्चों से कहती है-

सीख सको तो सीखो,
गाओ शत्-शत् भाषी गीत।
लेकिन भूलकर भी मत भूलना
हिन्दी और संस्कृत

जो अपनों को भूल जाता है
उसे संसार भूल जाता है

जो अपनों को ठुकराता है
वह शरण कहाँ पाता है ?

भारत माँ का सुहाग है हिन्दी
चूड़ी, कंगन और है बिन्दी

हिन्दी में पढ़ो, हिन्दी में लिखो
हिन्दी में गाओ गीत।
‘सावन’! समृद्ध भाषा-भाव निरेख
मुस्कुराये संस्कृत ।।

तनोपवन में मन-मयूर
झूम-झूमकर बोले हिन्दी ।
जीवन में रस घोले हिन्दी।।
जीवन में रस घोले हिन्दी।।

सुनील चौरसिया ‘सावन’
प्रवक्ता केंद्रीय विद्यालय टेंगा वैली अरुणाचल प्रदेश।
ग्राम -अमवा बाजार, पोस्ट-रामकोला, जिला-कुशीनगर, उत्तर प्रदेश।
9044974084

समन्वय गीत

मिल के रहॆं, मिलते रहॆं,
मिल कर रहें, मिलते रहॆं,
हम मिलें, दिल मिलें,
हम मिलें, दिल मिलें,
दिल मिलें तो, सब मिलें,
सब मिलें तो, रब मिलें,
मिल कर रहें, मिलते रहें॥

आगे बढ़ें सब बढॆं,
सब पढ़ें तो, सब बढ़ें,
सब बढॆं, बढ़ते रहें,
सब बढॆं तो, बुद्ध हॅंसें,
मिल कर रहें, मिलते रहें॥

बेटी पढ़ें, बेटे पढ़ें,
बेटी बढ़ें, आगे बढ़ें,
हेट घटे, लव बढे,
लव बढे तो, जीसस हॅंसें,
मिल कर रहें, मिलते रहें॥

योगा करें, मिल के करें,
सब करें, डेली करें,
फिट करें, तन को करें,
तन को करें, मन को करें,
मिल कर रहें, मिलते रहें॥

तन मन जो अपना फिट रहे,
तन मन जो अपना फिट रहे,
तो शिव हसें, कृ्ष्ण हसें
मिल कर रहें, मिलते रहें॥

जाति हटे, नाति बढे,
कर्ज हटें, फर्ज बढें,
मर्ज घटें, दर्द बटें,
दर्द हटें तो, अल्लाह हसें,
मिल कर रहें, मिलते रहें॥

समन्वय करें, सब करें,
दिल में करें, मन में करें,
आज करें, कल करें,
समन्वय बढे तो, विश्व बढे,
विश्व बढे, बढता रहे,
दगें रहें ना, पगें रहें,
बढते रहे, बस बढते रहें,
मिल कर रहें, मिलते रहें॥

राम भी हैं, अल्लाह भी हैं,
नानक, जीसस भगवान ही हैं,
नफरत घटे, गुस्सा घटे,
रौनक बढे, दौलत बढे,
शैतान मरे, इंसान जीए,
इंसान जीए, हँस कर जीए,
मिल कर रहें, मिलते रहें,
मिल कर रहें, मिलते रहें॥

हरि प्रकाश, सचिव, विश्व समन्वय संघ राजघाट,
नई दिल्ली – 110002.
Mobile No 9350218833