आकलनः हाशिये की आवाज़- कुमार सुशांत

“हाशिये की आवाज़ का कोलाहल”
‘हाशिये की आवाज’ कविता संग्रह सुशील कुमार का चौथा कविता संग्रह है। इस संग्रह में उनकी 2012 से 2017 तक की कविताएं हैं। इस संग्रह में कुल 75 कविताएं हैं। अगर इन पाँच वर्षों को माह में बदल दिया जाए तो हम पाते हैं कि 60 माह में उन्होंने 75 कविताएं लिखी है। अतः हम कह सकते हैं कि उनकी कविता लिखने की गति बहुत धीमी रही है। मेरा मानना है कि लिखने की रफ्तार भले धीमी हो लेकिन लेखन उच्च कोटि का होना चाहिए। यही बात हम ‘हाशिये की आवाज’ संग्रह में देखते हैं। इस संग्रह में उनकी कविताओं का स्तर, उनके पहले के तीन संग्रहों से कहीं ज्यादा बेहतर है। संग्रह में सुशील कुमार बेहतर कविता लिखने की होड़ अपने समकालीन कवियों से कम और खुद से ज्यादा करते दिखाई देते हैं। उनकी लड़ाई खुद से है ना की किसी और कवि से।

‘हाशिये की आवाज’ , जैसा नाम है वैसा ही इस संग्रह की कविताएं भी है। हाशिए पर खड़े लोगों का प्रेम, पीड़ा, दुख-द्वंद, आत्मसंघर्ष और प्रतिरोध इस संग्रह की कविताओं के मूल में है। उन्होंने हाशिए पर पड़े लोगों और विषयों को केंद्र में लाकर उनकी आवाज मुखर करने की कोशिश की है। आज कोरोना महामारी के कारण सबसे ज्यादा मुसीबत मजदूरों पर पड़ा है। करोड़ों मजदूर ‘लॉक डाउन’ के चलते बेरोजगार हो गये हैं। कई मजदूर तो पैदल ही अपने घरों की ओर चल दिए हैं। सरकार ने उन्हें खाने-पीने का आश्वासन तो दिया लेकिन न्यूज़ चैनल रोज ही उनके आश्वासन को ‘ढाक के तीन पात’ साबित कर रहे हैं। कई मजदूर तो लौटने के क्रम में, रास्ते में ही भूख से मर गये। ऐसी स्थिति में ‘सुशील कुमार’ की कविता ‘ये हाथ’ की
प्रासंगिकता बढ़ जाती है। कविता की शुरूआत में वे मजदूरों ( शोषित वर्ग ) के बारे में बतलाते हैं और मध्य में शोषण करने वालों के कृत्यों को उजागर करते हुए मजदूरों की मेहनत को दिखाते हैं और अंत आते-आते शोषक वर्ग को चेतने की हिदायत दे देते हैं। कविता देखें,

“ये हाथ हुनरमंद और मेहनती हैं
जिसने दुनिया को जीने के लायक और सुंदर बनाया
जहाँ रात
लोग आराम से सो सकते हैं
और जगे दिन
पृथ्वी की लय पर चल सकते हैं

जिन कायर पाजी हाथों ने
सपने तोड़े हायाएँ की
बलात्कार किए शोषण किए
क्या मालूम उनको-
उनकी दुनिया
उनकी सड़कें
उनके फूलदान
उनके कारों और बूटों की चमक
उनकी इमारतें
उनकी बोतलें उनके कंडोम
उनके कोट और कॉलर
उनके बाथरूम की नक्काशियाँ
उनके डिस के स्वाद
उनकी खिदमत के सारे इंतेजामात
इन उंगलियों के बेतरतीब चलने से बनती है
जो कभी उनके बटुए
उनके टेटुए तक पहुँच सकती है”1( पृष्ठ-11 )

इस ‘लॉकडाउन’ में कहीं-कहीं मजदूर ( शोषित वर्ग ) मालिकों ( शोषक वर्ग ) में संघर्ष भी देखने को मिल रहा है। सूरत में मजदूरों ने अपने मालिकों से अपने हक के लिए रूपये और जरूरी सुविधाएं ( रोटी, कपड़ा और मकान ) की माँग की लेकिन मालिकों ने देने से मना कर दिया। परिणामतः कुछ मजदूर संगठित होकर उनके दफ्तरों में तोड़-फोड़ किये। जिस दिन पूरी दुनिया के मजदूर ( शोषित वर्ग ) संगठित होकर अपने हक के लिए शोषक वर्ग से लड़ने लगेंगे उस दिन नया सूर्य उगेगा। वह सूर्य बदलाव का सूर्य होगा।

सुशील कुमार बड़े रेंज के कवि हैं। एक बानगी ‘मेरा कवि’ शीर्षक कविता के आगे की कुछ पंक्तियों में देखिए,

“कौन है असली कवि मेरा-
घर से बाहर तक की खुशहाली
जो रोपता है अपने खेत में
जो दफ्तरों के पखाने-घर साफ करता है
जो जूते गाँठता है, बाल काटता है सड़कों पर
दिन-दुपहरी जो फेरी लगाता है धूप में जरूरत की चीजों की
जो ढाबों में जूठन धोने-पोछने का काम करता है
जो अपने सब जरूरी काम छोड़ बुढ़िया को सड़क पार कराता है
जो अपने कलेवा का पहला कौर भगवान को नैवेद्य चढ़ाने के बजाय
बच्चों के मुंह में डालता है

उन्हीं जनबातों से होती हुई कविता पहुँचती है मुझ तक
जिसके पसीने से बनता है
एक भावदृश्य एक रूप
कविता में

वही होगा मेरा असली कवि” 2 ( पृष्ठ-12 )

उपर्युक्त कुछ पंक्तियों में ही कवि ‘सुशील कुमार’ किसान, मेहतर, मोची, नाई, फेरीवाला, मजदूर, एक अच्छा इंसान, और आधुनिक सोच से भरे पिता तक पहुँच जाते हैं। यह उनकी रेंज को दिखलाता है। इसी कविता में वे आज के छद्म कवियों पर प्रहार करते हुए कहते हैं -:

“बंद कमरों में जो इनकी रौनकें चुराता है
सड़कों पर इनकी खुशहाली के जो भाषण देता है
सजे हुए कालीनों-मंचों पर जो इनके गीत गाकर तालीयाँ बटोरता है
क्या होगा वह मेरा कवि”3 ( पृष्ठ-12 )

सुशील कुमार को बोलने और अपना हक माँगने वाले श्रमिक तो अच्छे लगते ही हैं लेकिन उससे भी ज्यादा उन्हें विद्रोह करने वाले श्रमिक प्रिय हैं। उन्हें श्रमिकों की तनी हुई मुट्ठियाँ भीचें हुए दाँत, खड़ी नसें, पसीने से तर ललाट, कानूनदारों से बहस करते और विद्रोह के लिए बड़े-बड़े डेग भरते गरीबों को देखकर खुशी होती है। उन्होंने ‘चुप रहते हो तुम तो अच्छे नहीं लगते’ कविता में उन्होंने लिखा है,

“जलसे के विरुद्ध जुलूस की शक्ल लेती भीड़
कुर्सियाँ तोड़ने वालों के विरुद्ध तुम्हारे
लहराते हुए हाथ और अनैतिक बयान ही
इन दिनों अच्छे लगते हैं।”4 (पृष्ठ-20)

सुशील कुमार निराशावादी नहीं बल्कि आशावादी हैं। उन्हें विश्वास है कि एक दिन बदलाव जरूर आएगा और श्रमिक वर्ग अपना अधिकार पायेगा। उनकी ही भाषा में कहूँ तो, ( ‘कविता की रात’ नामक शीर्षक कविता )

“ठहरो तो, अंधेरा जरूर मिटेगा
रात के साथ परछाइयाँ भी
गुम हो जाएगी दिन के निकलने से”5 ( पृष्ठ-22 )

बड़े लोग छोटे लोगों का शोषण करते हैं। उनके शोषण पर ही उनकी ठाट-बाट का इंतजाम होता है। हमारा समाज जाति व्यवस्था पर आधारित है। बड़े घरों में जन्में बच्चे बचपन से ही शोषण करने के तरीकों को घर के ही बड़े- बुजुर्गों से सीखते हैं। यह परंपरा कई पीढ़ियों से पुश्त-दर-पुश्त चली आ रही है। इस क्रिया व्यापार को कवि ने ‘बड़े लोग’ शीर्षक कविता में व्यक्त किया है,

“अपने राजा-महाराजाओं के ‘कॉलेज’ में
सीखते हैं अपने बड़े-बुजुर्गों से हमें दुहने
हमें नियंत्रित करने और थपथपाने के गुर
हम पर समय की मार देना
अपनी आदतों को और धार देना सीखते हैं
और बड़े हो जाते हैं”6 ( पृष्ठ-26 )

सुशील कुमार की कलम में स्याही नहीं, तेजाब है। उनकी कविता लोगों को झकझोड़ती है और सोचने पर विवश करती है। उनकी कविता पढ़कर व्यक्ति तिलमिला उठता है। खुद कवि होने के बावजूद भी वे कवियों से ही प्रश्न पूछते हैं और बाद में उत्तर देते हुए यह भी बतलाते हैं कि आज के कवियों को क्या करना चाहिए । ‘एक चुटकी नमक और कविता’ शीर्षक कविता में उन्होंने लिखा है,

“ओ कवि
रोटी पर कविता लिखते तुम्हें शर्म नहीं आती
क्या एक चुटकी नमक जुटा सकती है
तुम्हारी कविता ?

तुम्हारी कविता से
न दुख कम होता है
ना दो जून की रोटी ही मिलती
फिर कवि, क्यों नाम लूटते हो अपना
तालीयाँ क्यों बोलते हो
कविता में जाने से पहले आओ कवि
काम पर चले
ईक्कीसवीं सदी में भूख पर
कविता लिखते हुए तुम्हें शर्म आनी चाहिए”7 ( पृष्ठ -21)

उपर्युक्त पंक्तियों के अंत में आज के छद्म कवियों को लगाई यह फटकार बहुत ही जरूरी है। आज के कवि पुरस्कार के पीछे भागते हैं और अपने कर्म से दूर रहते हैं। उन्हें कम समय में ज्यादा प्रसिद्धि चाहिए। महाकवि बनने की लालसा लिए आज के कुछ छद्म कवि ( अनिल जनविजय, कालीचरण और सिद्धार्थ बल्लभ जैसे लोग ) दिल्ली के गढ़ और मठ तोड़ने की बात करते हैं । लोक और जनाक्रोश की बात करते हैं। लेकिन गढ़ और मठ तोड़ने के नाम पर अपना गढ़ और मठ बनाते हैं। सुशील कुमार को मालूम है कि गढ़ों और मठों से जुड़कर कुछ नहीं होगा। अंत में केवल उनके शब्द ही उन्हें बचाएंगे इसलिए उन्होंने ‘शब्द सक्रिय रहेंगे’ शीर्षक कविता में लिखा है,

“शब्द भी कहीं न कहीं सक्रिय रहेंगें कवि की आत्मा में
और वह बीज वह गीत वह बच्चा वह पत्ता
वह रंग वह आशा, आँख वह हाथ जैसी चीजें कवि के
शब्द बनकर
कहीं ना कहीं जीवित रहेंगी कविता में”8 ( पृष्ठ-31 )

आधुनिकता की आँधी में व्यक्ति मशीन बनता जा रहा है। वह खुद को अभिजात्य कहलाने में गर्व महसूस करता है। मोबाइल युग ने चिट्ठियों को खत्म कर दिया है।अब चिट्ठियों की जगह एस.एम.एस.आते हैं। फोन ने लोगों को करीब ला दिया है। पहले जब लोग चिट्ठी लिखते थे तो उसमें शिष्टाचार के नियमों – प्रणाम, आदरणीय, आपका विश्वासी जैसे शब्दों – का पालन करते थे। लेकिन फोन पर अब लोग बिना शिष्टाचार के नियमों के ही बात करते हैं। आजकल लोग बिना हाल-समाचार पूछे सीधे विषय पर ही बात करने लगते हैं। इस बात का गहरा दुख कवि सुशील कुमार को है। उन्होंने ‘चिट्ठियाँ नहीं आतीं’ कविता के अंत में चिट्ठी नहीं आने का दुख प्रकट करते हुए लिखा है,

“फिर खोलता हूँ घर की चिट्ठियों के पुलिंदे
बरसों पहले जिन्हें संभाल कर लिया था दराज में
उन पर पड़ी धूल की मोटी परत झाड़ता हूँ
और सोचता हूँ-
घर का प्यार और संस्कार कब तक बचा पाऊँगा भला
दिन-दिन तार-तार हो रही चिट्ठी-पत्री की इन लिखावटों
में ?”9 ( पृष्ठ-51 )

गाँव के लोग कमाने के लिए शहर में लगातार पलायन करते जा रहे हैं। गाँव में केवल बूढ़े रह गये हैं। आधुनिकता की आंधी में गाँव भी बदल गया है। लोग अपनी जड़ों को भूलते जा रहे हैं। गाँव में पगडंडियों की जगह पक्की सड़कों ने ले ली है। अब गाँव में प्रत्येक पर्व में गीत-संगीत नहीं होता है। रीति-रिवाजों को भी लोग भूलते जा रहे हैं। बहुत दिनों बाद जब कवि अपने गाँव जाता है तो अपने गाँव में पुराने गाँव को ढूंढने की कोशिश करता है लेकिन उसे पुराना गाँव मिलता नहीं है। वे दुख से आहत होकर ‘लौट आओ समय धार’ कविता में लिखते हैं,

“आया हूँ बरसो बाद अपना गाँव
पर ढूँढ नहीं पा रहा अपना वह गाँव
बहुत बदला-बदला सा लगता है यह गाँव
थमें हुए स्वर, गीत-संगीत, रीति-रिवाज

कहाँ है इस गाँव में मेरा गाँव ?” 10 ( पृष्ठ-53 )

सुशील कुमार की चिंता वाजिब ही है। पलायन केवल मनुष्यों का ही नहीं हो रहा है। पक्षी भी शहरों से थोड़े-बहुत बचे-खुचे जंगलों की ओर पलायन कर रहे हैं। नये बन रहे हाईवे के किनारे भी पेड़ों की अंधाधुंध कटाई जारी है। शहरों में मोबाइल टावरों और बिजली के खुले तारों से बेजुबान परिंदों की जान जा रही है। कवि की चिंता है कि बच्चों को कौआ, मैना, तोता, गौरैया की कहानी कैसे सुनाएंगे क्योंकि आज के बच्चे तो उन्हें ( पक्षियों को ) देख ही नहीं पा रहे हैं। वे उस कहानी पर विश्वास कैसे करेंगे !,

“कैसे बहलाऊँ बच्चों का दिल
कि किन मैनों-गौरैयाओं-तोतों की
कहानी सुनाऊँ उसे
देखो नहीं जनम से जिन्हें अब तक
कौवे-चुनमुन भी
कहाँ उतरते आँगन में
दाना टूँगने ?
न जाने कौन देश
किस वन-नदी
किस घर-आँगन-गाँव-बहियार
की तलाश में
पलायन कर रहे
पंछी टोलीयों में !
पहाड़ से उतरती आड़ी-तिरछी ये पगडंडियाँ
नदी तक आते-आते न जाने कहाँ बिला जाती है”11 ( पृष्ठ-54 & 55 )

‘हाशिये की आवाज’ संग्रह के अंतिम भाग में सुशील कुमार प्रकृति की ओर मुड़ते दिखाई देते हैं। सुशील कुमार झारखंड में रहते हैं जो छोटा नागपुर के पठार पर स्थित है। झारखंड में जंगल भरे पड़े हैं। जंगल-झाड़ को उन्होंने बेहद करीब से देखा है। उनकी कविताओं में भी जंगल की सुंदरता देखने को मिलती है,

“बलुई नदी पार कर रहे
मवेशियों के खुरों की आवाज
पहाड़ी बालाओं के गीतों के स्वर
गड़ेरियों की बाँसुरी की धुन
घाट पर धोबिनों के कपड़े फटीचने की आवाजें
चाक पर घूमती मिट्टी की चकरघिन्नी के सुर
घुमकुरिया में माँदर की थाप
महुवे और जंगली फूलों की गंध
पंछियों का शोर
जंगल की सरसराहट” 12 ( पृष्ठ-67 )

सुशील कुमार जब जंगल का चित्रण करते हैं तो वहाँ अकेलापन नहीं होता। दरअसल वे जंगल के जीवन का वर्णन करते हैं। वहाँ केवल एकांत नीरवता नहीं होती है। वहाँ मवेशियों, पहाड़ी बालाओं, गड़ेरियों, धोबिनों, पंछियों, जंगली फूलों और महुओं की गंध होती है अर्थात वहाँ प्रकृति और मनुष्य का रिश्ता होता है। प्रकृति और मनुष्य के रिश्ते से ही सृष्टि टिकी हुई है। आज मनुष्य प्रकृति के साथ छेड़छाड़ कर रहा है और अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति का दोहन आवश्यकता से अधिक कर रहा है। परिणामस्वरूप प्रकृति भी मनुष्य से बाढ़, भूस्खलन, भूकम्प आदि के रूप में बदला ले रही है। राहत की बात यह है कि स्वार्थी लोगों के खिलाफ आदिवासी और कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आवाज उठाई है और प्रकृति को बचाने के लिए आगे आए हैं। ‘जंगल के सौदागरों को घेरने की तैयारी’ शीर्षक कविता में सुशील कुमार लिखते हैं,

“पहाड़ी बस्तियों में रात-बेरात डुगडुगी बज रही
केंदु पत्ते महुवे के ढेर पर
तीर-तरकश का अभ्यास चल रहा
बिरसा का गीत गा रहे जंगलवासी
पहाड़ से इस बसंत के निकलने से पहले ही “13 ( पृष्ठ-68 )

आज लोग नदी से ज्यादा बालू निकाल रहे हैं। बाँध बनाने से नदी में पानी की कमी हो गई है। नदी के नाम पर कछार के दर्शन होते हैं। बालू की ढूहें दिखाई देती है, कहीं-कहीं तो नदी में बालू भी नहीं दिखाई देती। पंछियों को पीने के लिए नदी में पानी नहीं है। नदी में मछली भी नहीं बची है। इसलिए कवि एक बार नदी के दुख पर मनुष्य को गौर करने के लिए बोल रहे हैं।’

“चीख भी सुनो
इतनी उदास नदी
इतनी मंद उसकी धार
और महसूसों रेत भारी नदी में
दुख की तेज धार “14 ( पृष्ठ-70 )

प्रकृति प्रेम के कारण ही सुशील कुमार ‘नेतरहाट’ और ‘बारिश पहाड़ और भूख’ कविता में नेतरहाट की सुंदर प्रकृति का वर्णन करते हैं लेकिन साथ ही साथ वहाँ की यथार्थ स्थिति से भी लोगों को भी अवगत करा देते हैं,

“डाक बंगलों में टूरिस्ट बारिश का मजा ले रहे
‘डिश’ में मुर्गे के भुने गोश्त
खानसामा ‘सर्व’ कर रहे
शैलानियों के बीच कुछ परियाँ
नेतरहाट के जलजीवन को कैमरों में कैद कर रहीं
तभी फेंके गए जूठन पर भूख से बिलबिलाते कुत्ते
इतने बेतरह टूट पड़े
जैसे अकाल मच गया हो नेतरहाट में
पंछियों का बेतरतीब झुंड भी झपट पड़ा !”15 ( पृष्ठ-75 )

कवि सुशील कुमार ने ऐसी ही यथार्थ की स्थिति का वर्णन काठ-घर बेतला में ठहरा हूँ कविता में किया है। जहाँ हिरणों को डर आदमजात से होता है। लोग जंगल में हाथी देखने जाते हैं पर उन्हें पक्षी और चील देखने को मिलता हैं। जंगल में सागवान के पेड़ कट रहे हैं, जंगल सपाट हो रहा है फिर भी लोग बचे-खुचे जंगलों को देखने जाते ही हैं। कवि बहुत ही विस्मय के साथ लिखता है कि,

” फिर भी काठ-घर में ठहरा हूँ
अपने मित्र के साथ बेतला
के नेशनल पार्क में
पूरे संतोष से कि कुछ तो है
आप भी इस अभयारण्य में
जो बेतला के बहाने इस उष्मयी साँझ को
जून के पावस को डुबोकर
क्लांत वन-गाथा को बयां कर रही है !”16 ( पृष्ठ-80 )

संग्रह के मध्य में आते-आते कवि की कविता में दुःख का वर्णन दिखाई देने लगता है जो संग्रह के अंत मे मुखरता से प्राप्त करता है। इसका कारण यह है कि दुख से भरी कविताएं 13 मई 2017 के बाद लिखी गई है। 13 मई 2017 के दिन सुशील कुमार के सबसे छोटे भाई का देहांत कोलकाता में रोड एक्सीडेंट में हुआ था। कवि ने अपने भाई को अपने बच्चे की तरह पाला था। उसे पढ़ाया-लिखाया और इनकम टैक्स ऑफिसर बनाया। ऐसे योग्य भाई के चले जाने पर कवि को गहरा धक्का लगा। छोटे भाई के ऊपर उन्होंने एक छोटी कविता लिखी- ‘जिंदगी एक लौ की तरह’ इस कविता में उन्होंने जीवन के यथार्थ को वैज्ञानिकता के साथ उद्घाटित किया है,

“एक शून्य से बड़ा नहीं है ब्रह्मांड
न एक बूंद से अधिक महासागर
एक न एक दिन यौगिक टूटकर
तत्व में विलीन हो जाता है
फिर भी जब तक रूप है,
यौवन है, ऋतु और श्रृंगार है धरती पर
– जिंदगी एक लौ की तरह जलती है
थरथराती और भभकती है
फिर बुझ जाती है।”17 ( पृष्ठ-43 )

उपर्युक्त कविता, कविता संग्रह के ठीक मध्य में है। अब संग्रह के अंत की एक कविता ‘विदा मत कहना’ की कुछ पंक्तियों को देखिए जो गंगा में छोटे भाई अमर की अस्थि-प्रवाह की घटना को याद करते हुए उन्होंने लिखा है,

“विदा मत कहना
कहना – आऊँगा फिर,
इस उम्मीद में
जीवन बचा है सदियों से धरती पर “18 ( पृष्ठ- 94 )

यहाँ भी हम देखते हैं कि कवि दुखी होता है, पर निराशवान कभी नहीं होता। वह हमेशा आशावान रहता है। उन्हें मालूम है कि उम्मीद पर दुनिया कायम है। संग्रह की अंतिम कविता ‘आँसू’ है। इस कविता को कवि अपनी माँ के लिए लिखते हैं जिन्होंने अपने सबसे छोटे बेटे को खोया है। बेटे को खोने के बाद एक माँ की क्या स्थिति होती है, उसी का वर्णन इस कविता में किया गया है,

“जिन आंखों में कभी आँसू नहीं आते
वे पथरा जाती हैं
पत्थर के नकली आँखों में आँसू कहाँ आते हैं ?
सूरदास के बंद कोटरलीन गह्वर में
संताप के आँसू छलकते कभी देखा होगा तुमने!”

जिंदगी का सबसे बड़ा हादसा है
असली आँखों का दुख से पथरा जाना
आँसुओं का न निकलना उससे
बल्कि टप-टप
सीधे हृदय-पात्र में गिरना
और
एक दिन उसका
दुख की गहरी झील बन जाना”19 ( पृष्ठ-96 )

इस तरह हम पाते हैं कि ‘हाशिये की आवाज’ कविता संग्रह में पशु-पक्षी, जंगल, नदी, स्त्री, किसान, मजदूर, आदिवासी, सर्वहारा वर्ग के लोगों की चिंता, लेखन के क्षेत्र की विसंगतियाँ, आधुनिकता के कारण उपजी विसंगतियाँ, ( जैसे- मोबाइल के आने से चिट्ठियों का लोप होना, संस्कारों में गिरावट आदि ) पर प्रकाश डाला गया है।

कवि की भाषा सरल,सुबोध और सुगम्य है जिसके कारण कवि अपनी बात आसानी से सम्प्रेषित करने में सफल हो जाता है। कविता में देशज शब्दों का प्रयोग देखने को मिलता है जिससे अनपढ़ व्यक्ति भी अपने को कविता से जोड़ पाता है।

सन्दर्भ:
1.सुशील कुमार, हाशिये की आवाज, ISBN -978-93-88839-62-4, प्रकाशक – लोकोदय प्रकाशन प्रा.लि., 65/44, शंकर पुरी, छितवापुर रोड, लखनऊ-226001,दूरभाष – 9076633657, ईमेल – lokodayprakashan@gmail.com. संस्करण – प्रथम, मुद्रक – प्रिंटपल्स प्रा.लि., पृष्ठ – 11
2. वही, पृष्ठ – 12
3. वही, पृष्ठ – 12
4. वही, पृष्ठ – 20
5. वही, पृष्ठ – 22
6. वही, पृष्ठ – 26
7. वही, पृष्ठ – 21
8. वही, पृष्ठ – 31
9. वही, पृष्ठ – 51
10.वही, पृष्ठ – 53
11.वही, पृष्ठ – 54 & 55
12.वही, पृष्ठ – 67
13.वही, पृष्ठ – 68
14.वही, पृष्ठ – 70
15.वही, पृष्ठ – 75
16.वही, पृष्ठ – 80
17.वही, पृष्ठ – 43
18.वही, पृष्ठ – 94
19.वही, पृष्ठ – 96

कुमार सुशान्त
फोन : 8961111747.
पता – 17/2; रजनी कुमार सेन लेन
फ्लोर – द्वितीय, फ्लैट संख्या – 203,
पोस्ट-ऑफिस – हावड़ा
जिला – हावड़ा
पुलिस स्टेशन – हावड़ा
राज्य ( स्टेट ) – पश्चिम बंगाल
पिन कोड – 711101.