परिचर्चाः मन की शांति-बीनू भटनागर

मन की शाँति एक बड़ा भ्रामक वाक्याँश है। हिंदी में रिलैक्स के लिये मुझे सबसे नज़दीकी शब्द’’ शाँत हो जायें ‘’ही लग रहा है। अक्सर हम किसी को क्रोध या तनाव में देखते हैं तो यही कहते हैं ‘’शाँत हो जाओ’’ या’’ रिलैक्स हो जाओ।‘’तनाव या क्रोध सबको होता है, जीवन की अनिश्चितताये, असफलतायें, ईर्ष्या इत्यादि के कारण तनाव और क्रोध बढ़ता है। जीवन में दूसरों को बदलने की कोशिश, जीवन से अत्यधिक अपेक्षायें करना भी इनका कारण होता है।
सबसे पहले व्यक्ति को अपनी क्षमताओं सीमाओं का अनुमान लगाना चाहिये, फिर छोटे छोटे लक्ष्य बनाने चाहियें जो आपकी क्षमताओं के अनुकूल हों, सीमाओं में निहित हो, फिर उस दिशा मे परिश्रम करना चाहिये । सफलता मिलती है तो दूसरा लक्ष्य बनाये, सफल नहीं है तो विश्लेषण करें कि कहीं लक्ष्य ही तो ग़लत नहीं था। ग़लत निर्णय होते हैं, यदि लगे निर्णय ग़लत था तो पुनः विचार करके राह बदलें।
आप कुछ भी करें तनाव ज़िंदगी का हिस्सा है, व्याकुलता ज़िंदगी का हिस्सा है इससे बचा नहीं जा सकता सामंजस्य बनाया जा सकताहै। क्रोध और तनाव को दबाना ही नहीं सुलझाना ज़रूरी होता है।
कभी किसी विशेष व्यक्ति से तारीफ़ पाने या उनको ख़ुश करने के लिये नहीं, बल्कि ख़ुद को ख़ुश रखने के लिये काम करें। इसका ये मततलब नहीं है कि आप स्वार्थी हैं। आप अच्छा खाना बनायें क्योंकि आपको उससे ख़शी मिलती है ना कि इसलिये कि आपको पति या घर के सदस्य से तारीफ़ सुननी है, तारीफ मिले तो स्वीकारें, ख़ुश होकर। घर या दफ्तर के काम अपने ऊपर क्षमताओं से ज्यादा न डाले। समय प्रबधंन सीखे। अपने शौक पूरे करने के लिये समय निकालें। ख़र्चा आमदनी देखकर करें, कुछ बचत करना ज़रूरी है।
जैसे शारीरिक स्वास्थ्य के लिये थोड़ा व्यायाम और संतुलित भोजन ज़रूरी है वैसे ही मानसिक स्वास्थ्य के लिये भी ज़रूरी है। योग क्रियाओं और ध्यान को मनोविज्ञान मान्यता देता है। यदि कोई प्रशिक्षक मिल जाये तो अपनी आयु और स्वास्थ्य के अनुसार योग को दिनचर्या में शामिल करें।कोई खेल या व्यायाम नहीं तो कुछ देर टहलने की आदत डालें।पेट साफ़ रखें नहीं तो अम्लता होजाती है जिससे व्याकुलता बढ़ती है।
कोई भी कला यदि आपको आती है तो उसका विकास करें, गाना गायें ज़रूरी नहीं है कि आपको गायक या गायिका बनना है, संगीत सुनना पसंद है तो सुने, बाग़बानी, पेंटिंग लेखन कुछ भी करें ये ज़रूरी नहीं है कि उस शौक के लियें आपको प्रतियोगितायें जीतनी हैं। प्रतियोगी होने के लिये कड़ा तनाव झेलना पड़ता है, ऐसी कोशिश तभी करें जब मानसिक तौर पर इसके लिये तैयार हों।
तनाव मुक्त रहने के लिये प्रकृति से दोस्ती की जा सकती है, सुबह का सूरज, रात में तारों भरा आकाश या कभी पेड़ पौधों को निहारना, किसी गिलहरी के करतब देखना भी सुकून दे सकता है। कभी कभी अपनी आर्थिक स्थिति के दायरे में रहकर पर्यटन या शापिंग करना भी सुकून देता है, पर दायरे से बाहर जाकर देखा देखी ये सब करने से तनाव बढ़ता है।
कुछ लोग तनाव दूर करने के लिये आध्यात्मिकता का सहारा लेते हैं ,पर इसका असर प्रतिकूल भी हो सकता है।आधायात्मिक होने के नाम पर हर धर्म, हर क्षेत्र में गुरु बने लोग आपको आध्यात्मिकता के नाम पर मोहित कर सकते है, लगेगा कि तनाव कम होता है, पर होता नुकसान है ।आपके निर्णय लेने की क्षमता और विवेक मरता जाता है, और आप इन गुरुओं पर पूर्ण रूप से निर्भर हो जाते हैं। इस प्रकार की भक्ति एक प्रकार का नशा है, जिससे दूर रहना चाहिये।आध्यात्मिक गुरु और भक्तों का रिश्ता मदारी और झमूरे के रिश्ते जैसा हो जाता है।
आप अपनी दिनचर्या में कुछ समय पूजा पाठ के लिये रखें तो लाभदायक हो सकता है, परन्तु धार्मिक अनुष्ठानो या रोज़ रोज़ मंदिरो में जाकर समय बिताने से कुछ हासिल नहीं होता, पलायनवादी प्रवृत्ति के लोग ही ऐसा करते हैं।
कुछ परिस्थितिया, कुछ चीज़े, कुछ लोग भले ही हम पसंद न करते हों लेकिन उन्हे न छोड़ सकते हैं न बदल सकते है, उन्हे स्वीकार करना बहुत ज़रूरी है।स्वीकार करने के बाद संभव हो तो कुछ बदलाव कर सकते है। आपका रंग काला है, तो आप गोरे नहीं हो सकते, आप मोटे हैं तो पतले होने कीकोशिश कर सकते हैं पर पहले आपको स्वीकारना पड़ेगा कि आप मोटे है, और मोटा होना आपके व्यक्तित्व का हिस्सा है।अब आप पतले होने के लिये कोशिश करें।
अपने भाई बहन बच्चे या आपके माता पिता हो सकता है वैसा व्यवहार न करते हों जैसा आप चाहते हैं, पर आप रिश्तों को तोड़ नहीं सकते, बदल नहीं सकते,ऐसे में छोटी छोटी बातों को नजर अंदाज करने से बेहतर कोई विकल्प नहीं है। जब हमे खुद को बदलना मुश्किल लगता है तो दूसरों को बदलने की कोशिश तनाव ही देगी।
तनाव जब ज़रूरत से ज्यादा बढ़ने लगे, अवसद या व्याकुलता बेक़ाबू होने लगे क्रोध के कारण मार पीट या तोड़ फोड़ होने लगे तो मनोचिकित्सक और मनोवैज्ञानिक दोनों से संपर्क करने की आवश्यता हो सकती है।
बीनू भटनागर