गीत और ग़ज़लः लकी निमेष


करे हैं काम वो इस धूप में जलती सी इक औरत
ग़मों को झेल लेती है सभी, गहरी सी इक औरत

बडों का मान रखती है झुकी रहती है कदमों में
कि रिश्तों के दरख़्तों पे लगी टहनी सी इक औरत

थकी जाती है सारे दिन घरों के काम में लेकिन
सजन के वास्ते पल में सजी सवंरी सी इक औरत

सभी इल्ज़ाम दुनिया ने इसी पर थोप रक्खे हैं
खड़ी रहती है दरवाजे पे वो सहमी सी इक औरत

चटकती धूप में सबके लिए रोटी बनाती हैं
जला देती है अपने ख़्वाब वो सुलगी सी इक औरत

तुझे अब भूलना अच्छा रहेगा
करू ना याद तो कैसा रहेगा

अरे नादान क्या तू कर रहा है
बुरा होगा अगर गुस्सा रहेगा

मुझे ना पा सकेगा उम्रभर तू
हमेशा जो अगर झूठा रहेगा

मुझे इल्ज़ाम चाहे लाख दे दे
तुझे ही पर सदा घाटा रहेगा

ग़ज़ल मैने कही तेरे लिये है
मेरे शे’रो में तू आता रहेगा

तुझे हर हाल में सच बोलना है
कि सच से कब तलक बचता रहेगा

माँ हो साथ मेरे तो दुआ भी साथ देती है
जब तक हाथ सर पे है खता भी साथ देती है

जाने क्या असर है माँ के हाथो में खुदा जाने
ममता से खिला दे तो दवा भी साथ देती है

कुछ भी हो नही सकता भले तूफान हर सू हो
माँ जब सामने हो तो हवा भी साथ देती है

फैलेगीं हवाओं में बहारें इस कदर तेरे
माँ के साथ होने से फ़िजा भी साथ देती है

रहमत जान ले तू भी ‘लकी’ माँ की दुआओं की
सर पे हाथ रखते ही क़ज़ा भी साथ देती है

बहुत पछतायें तुझसे रूठके हम
रहेगें खुश तुझे अब छोडके हम

हमें आवाज़ ना दे ठीक है सब
करें भी क्या भला अब लौटके हम

ज़ुदा होने का हमको शौक़ ना था
अलग तुझसे हुए कुछ सोचके हम

नही अब शौक़ तेरे दिल में क्या है
बहुत ही थक गये है पूँछके हम

किसी भी काम का रिश्ता नही था
चले आये वो रिश्ता तोड़के हम

उसे क्या शौक़ हमको प्यार करता
हुए बदनाम उसको चाहके हम

लकी निमेष
रौजा- जलालपुर
ग्रैटर नौएडा
गौतम बुद्ध नगर
मोः-9012032408