कहानी समकालीनः परछांइयाँ-शैल अग्रवाल

‘ ओ.के. बाय माँ। लौटकर मिलते हैं फिर। इंतजार मत करना मेरा। दो तीन दिन के लिए स्विटजरलैंड जा रही हूँ विशेष के साथ।‘

सामने दीवार पर हवा की ताल पर हिलती डुलती टहनियों की परछांइयों की तरह ही पलपल दृश्य बदल रहा था अब उसकी आँखों के आगे। बेटी कब बौय फ्रैंन्ड के साथ दोनों गालों पर चुम्मी देकर चली गई, पता ही नहीं चल पाया उसे ।

बालकनी से ही हाथ हिलाकर बाय कहकर विदा कर दिया सुकन्या ने बेटी को और जाती कार को वहीं से खड़ी-खड़ी देखती रही जबतक कि कार आंखों से ओझल न हो गई।

रास्ते बदल देने से सफर तो नहीं खतम हो जाता।

अक्सर उसे लगता कि समंदर के पार दूर कहीं किसी और देश से कोई उसे आवाज़ दे रहा है। और तब एक उसी जगह पर घंटों मूर्ति-सी ठिठकी खड़ी रह जाती सुकन्या।

अब तो सांझ के सुनहरे आंचल पर रात ने तारे टांकने शुरु कर दिए थे और हवा में भी थोड़ी ठंडक बढ़ चली थी, फिर भी वहीं बालकनी में खड़ी सुकन्या जाने क्या-क्या बंद आंखों के साथ बेवजह ही समझ और सुलझा रही थी।

कितना समय बदल चुका है-एक आह होठों से फिसली तो चश्मे तक को धुंधला गई। तीस वर्षीय बेटी धीरा पिछले आठ साल से विशेष के साथ है परन्तु शादी के नाम पर कान पर जूँ तक नहीं रेंगती । एक ही जवाब -जल्दी क्या है, पूरी जिन्दगी पड़ी है। उसके जमाने में तो तीस वर्ष के व्यक्ति को युवा नहीं, अधबूढ़ा कहा जाता था। ऐसे ही खुश और मस्त रहें दोनों। न समाज की कोई रोकटोक और ना ही जीवन शैली पर ही प्रतिबंध…आजाद पंछी से बिचरते हैं, बिना किसी जिम्मेदारी या बोझ के।

सुकन्या ने बालकनी के दरवाजे अन्दर से बन्द किए और वापस कमरे मे आ बैठी। टेलिविजन वगैरह कुछ नहीं खोला। थोड़ी देर पहले ही धीरा और विशेष के ठहाकों से गूंजते कमरे में अब सन्नाटा पसरा पड़ा था। हाँ, एक लम्बे-लम्बे बालों वाली, दुबली-पतली सी, जानी-पहचानी, महत्वाकांक्षी और जहीन सोलह साल की किशोरी जरूर जाने कब परछांइयो-सी आ बैठी थी बगल में। कितना भी समय बदले,पर यह नहीं बदली है। आ ही आ जाती है अक्सर उसे अकेला पाकर, सवाल-जवाब करती, कुछ भी बूझती-समझाती-सी।

‘ बोलो, क्या ऐसा संभव था तुम्हारे समय में…संभव है आजभी तुम्हारी सोच और व्यवहार में? है इतनी हिम्मत तुम्हारे पास!अगर फिरसे वही मौका मिले तो क्या जी पाओगी इसी निर्भीकता और सच्चाई से तुम? ‘

‘नहीं।‘ उसकी उदास नजरें अब अंगूठे के साथ बेमतलब ही जमीन कुरेद रही थीं।

‘फिर क्यों सजाती हो यह परछांइयों का मेला रोज-रोज?‘

‘ पता नहीं।‘

अंधेरे में भी चेहरे पर पुती ग्लानि की परछांई उतनी ही साफ दिखाई दे रही थी ड्रेसिंग टेबल के आदमकद शीशे मे उसे, जितनी की अपनी मांग में चमकती लम्बी सिंदूर की लक्ष्मण रेखा। जिस मानसिकता में उसे बड़ा किया गया था, मिलना-जुलना, यूँ साथ-साथ घूमना तो दूर शादी से पहले लड़के-लड़की आपस में बात तक कर लें तो तूफान मच जाता था।

‘ खबरदार, जो फिर कभी उससे बातें कीं या उसकी तरफ देखा तक। आँखें नोंच लूंगी। तेरे लायक नहीं है वह, ना ही उसका खानदान । जान-बूझकर खाई में नहीं गिरने दूंगी। मां हूँ आखिर तेरी।‘-ऐसी अनगिनित धमकियाँ थीं चारो तरफ , बहाने और चेतावनियाँ थीं, जात-पांत और उंच-नीच की खाइयाँ थी।

पर फिर उसने क्यों नहीं कुछ कहा, क्यों नहीं रोका अपनी बेटी को?‘

बावरी है क्या वह! वह समय दूसरा था। आज रिश्तों का रूप बदल रहा है-यहाँ तक कि शादी जैसी परंपरा में भी वह निष्ठा और समर्पण नहीं रहा। हर तरफ बराबरी की मांग है। कार को भी लोग कम टेस्ट ड्राइव करते होंगे, जितना कि संबंधों को करते हैं अब!

अगले पल ही खुद अपनी ही सोच उसे बेमानी-सी जान पड़ी । निभाने से नहीं, रिश्ते तो निखरते ही हैं परखने से, जीने से।

अंधेरा घिर आया था कमरे में और खुद अपनी ही परछांइयों निगलने लगी थीं अब उसे। परछांइयाँ जो युग-युगान्तर के बाद भी एक-दूसरे को ढूंढ ही लेती हैं, सवाल जबाव करती हैं। पल पल छोड़ते और तजते रहते हैं हम इन्हें। इनके मेले से छुटकारा पाना इतना आसान भी तो नहीं। कितना भी बदला समझें , पर समय लागातार ही तो सब कुछ समेटता व सहेजता चलता है, सीखने और समझाने को, नया रूप, नया आकार देने को। नए-नए खेल रचाता रहता है यह। नित नित बनाता और बिगाड़ता है यह हमें ।

यह दुनिया चलती रहती है ऐसे ही और इसके साथ-साथ, वक्त के परदे में इन परछांइयों में छुपे हम भी।

सामने दीवार पर उसकी सोती-जागती आंखों के आगे लगातार ही वे परछाँइयाँ हंसती-रोती रहीं, मिलती और बिछड़ती रहीं, और सुकन्या मूक, फालिज की मारी-सी, देखती रही निष्पलक। काश् वह भी पति के साथ इटली चली ही गई होती, कितना तो कहा था सुधीर ने। इस अकेलेपन से तो बच ही जाती। पर अच्छा लगता है यह अकेलापन भी तो उसे…अच्छा ही नहीं, जरूरी है उसके लिए। इसीके सहारे तो सुलझा पाती है खुदको।

सुकन्या ने बत्ती जला दी। पल भर को कमरा रौशनी से भर गया। टेलिविजन की सारी चैनल उलट पलट लीं। मन को बांधे रखे, ऐसा कहीं कुछ नहीं था। बन्द कर दिया उसने उसे भी। अब चारो तरफ शांति ही शांति थी। और तब फिसल जाने दिया शाम को उसने वैसे ही उसी सन्नाटे में, उँगलियों के पोर से, आँखों के छोर से। जब बस में साथ चलना, पकड़ पाना, है ही नहीं, तो परेशान क्यों होना ! जरूरत ही नहीं। बड़े रहे हैं उसके जीवन में हर निर्णय के लिए । उनसे बड़ी न तो वह कभी हो पाई है और ना ही कभी उसने कोशिश ही की है। वयस्क होकर भी नहीं, बूढ़ी और पैंसठ की होकर भी नहीं। बाप नहीं तो पति, पति नहीं तो बेटा, कोई-न-कोई छतरी तनी ही रही है सदा सिर पर धूप-बरखा से बचाने के लिए। लोग कहते हैं कि बेहद भाग्यशाली है वह।

उसके जैसी लड़कियाँ दोनों कुलों की चादर ओढ़े ही जीती-मरती हैं… न चाहते हुए भी एक ठंडी आह सुकन्या के ओठों से फिसल ही गई।

रौशनी में खेलते-खेलते कब वापस अंधेरा उसे निगल गया , चाहकर भी ध्यान नहीं दे पाई थी वह, सहेज समेट नहीं पाई है कुछ भी। न खुद को और ना ही उलटी बहती समय की धार को।

जीवन की तरह ही तो बीतता चला जाता है सबकुछ और ध्यान तक नहीं जाता हमारा इन छोटी-छोटी बातों पर। वैसे भी, जरूरत ही क्या है, जब कोई दखल ही नहीं, तो सोचना भी क्या और किसलिए? परछांइयों का क्या.. बेहद ही .गैर जरूरी होता है जीवन में इनका अस्तित्व, बिल्कुल वैसे ही, जैसे कि उसका था। फिर यह उमड़ती बदली क्यों …बरसों बाद बेवजह की बूंदाबांदी किसलिए? जी चुकी है वह तो अपना जीवन। अब फिर अफसोस किस बात का, कोई भी अभाव नहीं जीवन में। रही बात मन की तो इसे तो कभी-कभी संभालना ही पड़ता है।

किंतु उसके मन ने तो मानो आज न संभलने की कसम ही खा ली थी। जो वह भूलना चाहती थी, बस उसे ही सोचने की जिद पर उतर आया था।

कोई रिश्ता नहीं था उसका उसके साथ। तब भी नहीं और आज भी नहीं। बस एक पुरानी किताब थी जिसे पढ़ा और उठाकर रख दिया गया। रिश्ते भी तो निर्णय की गांठ से ही बंध और जुड़ पाते हैं। जाने कैसे बस यूँ ही इंतजार करने लग गई थी वह तो उसका। जुड़ने लग गई थी सोच में उससे। वह भी तो बिल्कुल इन्ही परछाइयों-सा घूमता रहता था इर्दगिर्द ही। मन-ही मन चाहना दूसरी बात है पर परवाह नहीं की थी कभी उन्होंने एक दूसरे की । मौका ही नहीं मिला। दिया भी नहीं था उन्होंने किसी को कुछ कहने या सोचने का। ऐसी-वैसी लड़की नहीं थी वह। आते-जाते मिल भी जाता तो रास्ता तक बदल देती थी वह तो! पर कुछ तो था उस अटपटे-से रिश्ते में जिसे दोस्ती तक का नाम देने का अधिकार नहीं था उसके पास। दबा-ढका-सा वह वक्त…सामने आता तो भागने को मन करता और नहीं होता तो उसी का इंतजार करती रह जाती सुकन्या। शायद वह उम्र ही ऐसी थी…रोमियो-जूलियट-सी। वह भी तो दिन रात पीछा करता था। पानी में भीगता, कड़ी धूप में तपता. पल पल, हर जगह बस उसी का इंतजार करता ही दिखता उसे। खयाल मात्र से मन मे चैन नहीं आजभी। न कोई संपर्क, न बातचीत, बस एक उतावला और ठीठ शर्म का अहसास और पलपल का इंतजार, सुकन्या के मन में आजभी तो वही पलपल धधकता हुआ-सा सवाल बना बैठा है वह।

अधिक न जी पाया था पर उनका वह लगाव … हद और मर्यादा की किसी लक्ष्मण रेखा के पार पांव ही नहीं उठे। कोई बढ़ावे की औक्सीजन ही नहीं मिली। कम गर्व नहीं था पर उसे इस बात का भी-कितनों के पास है इतना संयम और विवेक! सभ्य घर की शरीफ लड़की सुकन्या, उसके लिए उचित नहीं था यह सब। कोई देखेगा तो क्या सोचेगा- बात तक करने में डरती थी वह तो। एक भय सामने पड़ते ही बिच्छुओं-सा सौ-सौ डंक देने लग जाता था। और तब कैसे भी लंबे-लंबे डगर लेती खुश्क गले के साथ सहेलियों के झुंड में जा छुपती थी वह। आंखें भरकर कभी देखा तक नहीं कि दूर हो गए थे वे। वह आया भी था मन जानने, पर उसने ही बात नहीं की थी उससे। उसके लिए नहीं था वह सब…उसका इस खेल से कोई लेना देना नहीं। जरा सी भी बदनामी से मां-बाप को कितनी तकलीफ मिलेगी, भलीभांति समझती थी सुकन्या। फिसल जाने दिया उसने उसे आंखों से, जीवन से, भले ही यादों से आजीवन उबर नहीं पाई है वह। आज भी यदाकदा तैर ही आती हैं। किंतु-परन्तु के ये अजगर आज भी पूरा-का पूरा ही निगल जाते हैं उसे और उस बेरहम निर्णय की गुणवत्ता पर प्रश्नचिन्ह उठाते हैं, विशेषतः तब जब बेटी धीरा और विशेष की खुली और आजाद जीवन-शैली को देखती है। बिना किसी पाप-पुण्य के भ्रम के..बन्धन के जीते हैं आज के बच्चे। न कोई भय, न कोई चिन्ता। आखिर एक ही तो जीवन मिलता है ।

पर तब सोच ऐसी नहीं थी। बात-बात पर नजरें और हर कदम पर प्रतिबंध थे। जाने किसकी साजिश और सलाह थी वह कि उस रात, बिना किसी अपराध, बिना किसी प्रमाण के ही बहुत बेइज्जत करके निकाल दिया गया था उसे उसके जीवन से। दबदबा था परिवार का। चुपचाप रातो रात ही चले गए सब जाने कहाँ, कोई पता नहीं चलपाया था फिर। और फिर अब यूँ इस तरह से, इतने वर्ष बाद एकबार फिरसे उसका मिल जाना…फिर वही सब बातें। जैसे वह ढूंढती थी, वह भी ढूंढता रहा था उसे। उम्रभर दीवानगी की हद तक- पर क्यों, दोनों ही जानकर भी नहीं जानना चाहते थे । पीटर पैन की तरह बड़े ही नहीं हुए थे दोनों, शायद। क्या वाकई में सच कह रहा है …पर झूठ क्यों बोलेगा, आखिर वह भी तो नहीं भूल पाई है!

‘ मिलूंगी तुम्हें जरूर ही। कहाँ और कैसे –पता नहीं…शायद किसी नए जनम में, नए रूप में। बस इतना वादा करो कि पहचान लोगे। छोड़कर नहीं जाओगे इसबार।‘

जाने किस भावावेश में रुँधे गले से लिख गई थी वह।

आखिर साबित क्या करना चाहती है, क्यों कह या लिख रही है यह सब, नहीं जानती थी। पर अब कुछ सच या झूठ नहीं शेष था। बस वे दो ही थे वहाँ कम्प्यूटर की स्क्रीन के सामने, हजारों मील की दूरी के बाद भी एक-दूसरे के बेहद समीप। और एक अकूत शांति में लिपटा मन पतंग सा खुले आकाश में उड़ रहा था स्वीकृति के उस अकेले अमूल्य पल में। इसी की तो तलाश थी उसे । पर ज्यादा देरतक वह भी बर्दाश्त नहीं कर पाई । डर गई । मन ने धिक्कारा भी-कायर कहीं की। फिरभी जल्दी-जल्दी बातचीत निपटा दी उसने। कुछ तो शर्म करे उम्र का, सिर पर बिखरी चांदनी का।

वह बिलखता रहा -क्या हम बूढ़ों को दोस्ती तक का अधिकार नहीं, सुकन्या !

अगले दिन खुद को संयत करती, इसके पहले ही चैट विंडो में टिक-टिक करती उंगलियों ने एकएक बात, एकएक परिस्थिति का आदान-प्रदान कर लिया। हर मनोभाव को उस तक पहुंचा दिया। फिर तो यह रोज की ही दिनचर्या थी। वाकई में एक निश्चल और नई दोस्ती पनप रही थी दोनों के बीच। एक नयी आजादी, नए हल्केपन को महसूस करने लगे थे दोनों। बेफिक्र और बिना किसी अपराध बोध के। इस उम्र में न तो रोमांस होता है और ना ही बदनामी , जानती थी या फिर विश्वास करने की कोशिश कररही थी बूढ़ी काया में छुपी सोलह वर्षीय सुकन्या।

‘ क्या मैं वाकई में तुम्हारे लायक नहीं था , बोलो।…अनगिनित परीक्षाओं से गुजरा हूँ आजीवन एक बस इसी हीन-भावना के तहत।..मेरे इस संशय का समाधान करना ही होगा तुम्हें।‘

‘लायक नहीं होते, तो यह सब हासिल नहीं कर पाते, जो तुमने किया है। बेहद गर्व है मुझे तुमपर।‘

‘हंसी आती है पर मुझे खुदपर। दिए तले अंधेरे जैसे इस जीवन पर…काश पहले तुमने यह सब कह दिया होता‘…वह फिरसे भावुक हो चला था, ‘ तो आज बात ही कुछ और होती।‘

उसके मन की नमी को एक-एक शब्द में महसूस कर पा रही थी सुकन्या, पर बढावा नहीं देना चाहती थी इस खतरनाक मोड़ पर बिखरी फिसलन को…इस भ्रम को।

‘ तो आज हम भी लड़ रहे होते अन्य पति-पत्नियों की तरह ।‘ बात मजाक में हंसकर उड़ाने की कोशिश की थी तब उन्होंने।

‘ कितनी भी कोशिश करें, मानें या न मानें, पर एक बात तो है कि धागे वह हमेशा अपने ही हाथों में रखता है।‘ अब वह भी दार्शनिक हो चली थी। ‘वरना क्या जरूरत थी हमारी यूँ इतने वर्ष बाद, यहाँ पर इसतरह से वापस मिलने की। याद नहीं आता कि इतनी बात हमने पहले कभी की थी। कुछ भी विशेष तो नहीं जानते थे हम एक दूसरे के बारे में। अब क्या जरूरत है इसकी…क्या चाहता है आखिर भगवान हमसे…इस रिश्ते से!‘

सवाल पूछता जलता जबाव तुरंत ही दूसरी तरफ, हजारों मील दूर, उसकी आंखों के आगे था।

‘शायद इस तकलीफ , इस द्वन्द को हमेशा के लिए मिटाने को ही मिलाया है विधना ने हमें। अब मिल गई हो तो या तो विदा लूंगा या फिर विदा दूंगा। फिरसे नहीं खोने दूंगा पर मैं अब तुम्हें।‘

उसकी जिद और उम्मीद दोनों ही टूटी नहीं थी और साथ-साथ एक पूर्ण पटाक्षेप. आसन्न अंत का अहसास भी। फिर भी बांध लेना चाहता था वह उसे अपने भविष्य के साथ।

‘ देवदास और पारो नहीं हैं हम। फिर देखो, वह भी कहाँ मिल पाए थे, संभव ही नहीं है यह सब कहानी किताबों के अलावा और कहीं…कल्पना और सपनों के अलावा। तुम्हारा परिवार, मेरा परिवार…क्या कहूंगी मैं, क्या कहेंगे वे और क्या कहोगे तुम उनसे कि कौन हूँ मैं… कौन हो तुम …क्या है, या था यह रिश्ता ?‘

‘ मित्र …मेरी सबसे प्यारी मित्र…पहला प्यार… बहुत इज्जत करता हूँ तुम्हारी।‘

एक एक शब्द भावभीना था और बच्चों सा मचल रहा था अब उसकी आँखों के आगे।

वह उन शब्दों की गहराई को महसूस करना चाहती थी। पर सिवाय एक असंभव जिद भरे आग्रह के कुछ और महसूस नहीं कर पाई। एकबार फिर कहीं उससे दूर छुप जाने का मन किया उसका। शर्म और जिल्लत का वह पुराना अहसास वैसे ही बना रहा, जितना कि नया एक सुख और संतोष का भी था पर अब। हे भगवान, यह कैसी उलझन आ गई है संयमित और शांत जीवन में…मार्ग दर्शन करो । आँखों से आंसू बह रहे थे और उंगलियाँ फिर टिक-टिक-टिक वापस की बोर्ड पर कुछ लिख रही थीं।

‘ हम इस समय के नहीं हैं, और ना ही हो सकते हैं। आज और अभी विदा लेती हूँ मैं तुमसे, इस पूरे जनम के लिए। तुम्हारा घर नहीं तोड़ना चाहती। अपना भी नहीं। ताकत बनना चाहती थी तुम्हारी, पर तुमने मुझी को अपनी कमजोरी बना लिया। बस अहसास में ही मिलेंगे अब हम। पुकारना और आ जाऊंगी । कभी तुम्हारे गमले का फूल बनकर जिसे तुम प्यार से सींचोगे या फिर सुबह की वो नम धूप की किरण बनी, जिसे ओढ़े तुम घंटों बैठे रहोगे । या फिर शायद तुम्हारे चश्मे में ही… देखना, बैठी ही रहूँगी तुम्हारे साथ और आसपास हमेशा-हमेशा के लिए, कभी तुम्हारी उंगलियों से बारिश की बूंदों-सी खेलती तो कभी तुम्हारे बालों को पवन सी सहलाती। छोड़कर नहीं जा रही, बस इस दुख और उलझन से विदा ले रही हूँ।‘

शुक्रवार को ही फैसला कर लिया था कि अब वह वापस रौबिन से कभी नहीं मिलेगी। इस आभासी दुनिया में भी नहीं। बात तक नहीं करेगी, पर न जाने किन धागों से लिपटी, वह शनैः शनैःपुनः उसी की तरफ खिंचती चली जा रही थी।

अगले दिन शनिवार की सुबह-सुबह ही फोन आ गया था जूलिया का…जूलिया रौबिन की पत्नी-

‘ मुझे नहीं पता तुम रौबिन को कबसे जानती हो, तुम्हारा उसका क्या रिश्ता है पर पत्नी होने के नाते सबकुछ जानने का हक है मेरा। वक्त-बेवक्त उसका यूँ तुम्हारा इन्तजार करना, किशोरों की तरह आधी-आधी रात में फोन देखना कि तुम्हारी मैसेज तो नहीं है…क्या अच्छा लगता है यह सब, अब इस उम्र में?‘

संक्षिप्त परन्तु दृढ़ ‘नहीं।‘ कहकर उसने फोन रख दिया। वाकई में उसके धागे कुछ ज्यादा ही उलझ चुके थे और सुलझाना मतलब उन्हें तोड़ना ही था। शर्म और ग्लानि से बेवजह ही मन बेहद बेचैन हो गया एकबार फिर। वह सहेली सान्ड्रा की तरह गैर जिम्मेदार और स्वार्थी तो नहीं ही बन सकती कि किसी और के पति को उसकी बगल से ही ले उड़े और फिर अपनी खुशी के लिए पुरानी चद्दर की तरह बदल दे उनका जीवन।

उठी और चौके से लाया पानी का गिलास एक ही घूँट में गटागट पी गई। पर सामने स्क्रीन पर रौबिन की मैसेज उतनी ही ढीठ उतनी ही बेताब थी ।

‘ इतनी गंभीरता से मत लो, ना ही इतनी निर्मम ही बनो, खुद पर भी और मुझ पर भी। अब हम किशोर-किशोरी तो नहीं। समझदार वयस्क हैं। नदी किनारे खड़े ढहते वृक्ष। अंतिम दिनों को जीते। संभाल लूंगा मैं सब कुछ। तुम्हारे हजारो मित्रों मे मैं भी बस एक मित्र ही तो हूँ। बात तो कर ही सकते हैं हम…कहो, करते रहेंगे …इसमें बुराई नहीं। घर नहीं तोड़ रहे हम, न तुम्हारा और ना ही मेरा। अगर बात करके तसल्ली मिलती है, शांति मिलती है, तो इतनी स्वतंश्रता तो होनी ही चाहिए। इस संकुचित सोच से बाहर निकलो। दिन ही कितने हैं हमारे पास…देखना चाहता हूँ फिरसे वही मीठी मुस्कुराहट चेहरे पर, वही चमक तुम्हारी और अपनी आंखों में। कहो, बस एकबार अवश्य मिलोगी तो मुझसे।‘

किसी रुक्मणि के कान्हा से खामख्वाह जुड़ना और उलझना, दोनों ही बातें उसके स्वभाव में नहीं थीं। …बिना किसी वादे या ढाढस के उसने बिना जबाव दिए ही चुपचाप कम्प्यूटर बन्द कर दिया। भ्रम और जाल दोनों ही मजबूत होते जा रहे थे। वह जकड़न अपने चारो तरफ महसूस कर रही थी। राधा या जूलियट नहीं थी वह, और ना ही वह कान्हा… परन्तु उस भ्रम को जीने का खतरा पूरा था अब।

अगली सुबह फिर उसकी चार पांच मैसेज थीं-क्या बनाया है आज सुबह नाश्ते में? रात को सोईं ठीक से या नहीं…कहीं मैने सपने में आकर तंग तो नहीं किया ? वगैरह…वगैरह…और वह ब्योरेबार उसकी हर बात का जवाब लिखने बैठ गई।

‘ नहीं तुम सपने में नहीं आए थे और मेरे पति व तुम्हारी पत्नी आने भी नहीं देते।‘

‘ जानता हूँ कि असल बात तो यही है कि आजभी मैं तुम्हारी दोस्ती तक के लायक नहीं । सभी ने समझाया था मुझे। और तुम्हारे वह अभिभावक, उन्होंने तो मेरी मां के सामने ही मुझे ईंट का टुक़ड़ा मारकर भगाने की कोशिश की थी बिल्कुल वैसे ही जैसे कि एक कुत्ते को भगाते हैं। प्यार में जानवर ही तो हो गया था मैं। पर मेरी नजर के आगे पलपल माँ के ग्लानि और शर्म से काले पड़ते चेहरे ने उबार लिया था उस दिन मुझे। कितना भटक गया हूँ, इसका एहसास दिला दिया था उसी पल। सोचा था भूल जाऊंगा सब कुछ। पर कहाँ…सोचता ही रहा एकबार पूछूंगा तो जरूर ही तुमसे कि क्या तुमने भी वह दर्द, वह तड़प महसूस की थी कभी, या मैं अकेला ही बेवकूफ-सा जूझता रहा था उस दर्द, उस बेचैनी से ?’

अब सदमे में आने की उसकी बारी थी। पर दोबारा वही भूल नहीं करना चाहती थी सुकन्या जिसकी वजह से इतनी जिल्लत सहनी पड़ी थी इसे। इतने बरस, इतने दुख, आगे अब और दुख नहीं देना चाहती थी वह उसे। मोह-धागों में जकड़ना नहीं, मुक्ति देना चाहती थी वह।

स्तब्ध आखों के आगे प्याज के छिलकों -सी रिश्तों की नई-नई परतें खुल रही थीं और अपनी ही धुन में वह बोले जा रहा था।

‘फिर जो भी सामने आया, स्वीकार लिया मैंने। परिवार की जिम्मेदारी थी मुझपर । बड़ा बेटा हूँ। हारता कैसे…पर भूल नहीं पाया कभी तुम्हें। बहुत प्यार करती है पत्नी । बहुत ख्याल रखती है मेरा। निश्चय ही जैसे कि तुम्हारा परिवार भी रखता ही होगा तुम्हारा।‘

सिर छुकाकर स्वीकार लेती है वह भी तो सबकुछ।

‘ हाँ। अच्छा लगा जानकर कि तुम खुश हो जिन्दगी से । और दुख हुआ जानकर कि मेरी वजह से तुम्हें वह सब सहना पड़ा, जिसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकती थी। पर मैं न तब ही तुम्हारी कोई मदद कर पाई और न आज ही कर पाऊंगी। भ्रम में मत रहना। बहुत कायर और वैसे ही असमर्थ हूँ आज भी। तुम्हारी क्या मैं तो अपनी भी मदद करने लायक नहीं रही कभी। माफी मांगती हूँ हर तकलीफ के लिए जो तुमने मेरी वजह से सही, सह रहे हो। जानते हो न कि इन परछांइयों का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता, इनके बस में तो कुछ भी नहीं। और वह भी तब जब कभी ये अपनी हैं, और कभी दूसरों की भी। पलपल ही हमारे साथ-साथ चलती हैं ये।‘

और फिर वह चुप हो गई । भारी मन से चैट बन्द कर दी उसने।

एक ठंडा आंसू अब उसकी आँखों में अटका पड़ा था और एक संतुष्ट मुस्कान होठों पर। पल भर को ही सही, एक बोझ-सा उतर गया था मानो मन से।

आज वह वाकई में बड़ी हो गई थी…इतनी बड़ी कि सच को स्वीकार सके। पहचान सके। जिन्दगी में वह कल भी एक खयाल…एक भ्रम ही था और आज भी है। यूँ ही रहेगा सदा । उसके जीवन में…फिल इन ब्लैंक-सा…आधा-अधूरा और अस्पष्ट।

पर इस जमाने की न होकर भी वह इसी जमाने की ही तो है। इसीमें जिन्दा है, सांसें ले रही है। क्रौस वर्ड की गुत्थी की तरह ही चाहे तो मिनटों में सुलझा सकती है वह इसे, पर डरकर नहीं। चाहे या न चाहे, यूँ ही मिलते और बिछुड़ते रहेंगे वे। जैसा कि दो मित्रों में होते रहना भी चाहिए। इन अंधेरी परछाइयों का क्या, ध्यान दो या न दो, ये तो साथ रहेंगी ही, रहती ही हैं। इनसे भला कौन भाग पाया है!

तब उसे क्या पता था कि वाकई में क्या अर्थ है इन शब्दों का और उस संक्षिप्त सी चैट का भी। वैसे भी दर्शन और सिद्धांत, जीवन डोर के दो छोर ही तो हैं, कभी बेहद सुलझे तो कभी बेहद उलझे-से, बिल्कुल नदी से बहते इस समय की तरह ही, नए किनारे ढूँढते, नए किनारे छूते!

दरवाजे पर धीरा और विशेष लौट आए थे-दुल्हन के लिबास में बेटी बहुत ही प्यारी लग रही थी। दौड़कर लिपट गई सुकन्या –

‘ हमने सोचा आज माँ को खुश कर ही देते हैं। एयरपोर्ट से सीधे रजिस्ट्रार के औफिस, जहाँ हमने शादी कर ली है माँ औरफिर अब तुरंत ही तुम्हारे पास, तुम्हारे आशीर्वाद के लिए। अब आगे तुम जैसा भी चाहो धूम-धड़ाका कर लेना।’

दोनों ही एक साथ उसके पैरों पर छुके खड़े थे।

‘ खुश रहो मेरे बच्चों। पूर्वजों का कर्ज उतर गया सिर से…’

आशीर्वाद पूरा भी हो इससे पहले ही दमकती गर्वीली आवाज गूंज पड़ी विशेष की ,

‘एक खुशखबरी और है मम्मी,-जल्दी ही आप नानी बनने वाली हो। अच्छा सा नाम भी सोच लो।’

साफ और स्पष्ट था सबकुछ आँखों के आगे। कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं कहीं। अब और कायरता या भीरुता नहीं। घर के बन्द दरवाजों के भीतर की बात से बाहर वालों का कोई सरोकार नहीं, न आज और ना ही आनेवाले कल। जीवन नदी नित नए-नए किनारे छूती आगे बढ़ती जाती है, रुकती-थमती नहीं। कबतक किनारे पर खड़ी रहेगी वह बिना भीगे, बिना जिए।

खबर विष्फोटक थी तो क्या, सुकन्या खुश थी इस धमाके से भी। आगे बढ़कर उसने दोनों बच्चों को गले से लगा लिया। इन्ही से उसका भविष्य था, आदर्श या विचारों की परछांइयों के अंधेरों में नहीं। …

शैल अग्रवाल
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