ललितः चंदामामा दूर के-शैल अग्रवाल

कहते हैं कि मा को दो बार दोहराओ तब जाकर मामा बनते हैं; यानी कि मां से भी दुगना लाड-दुलार करने वाले मामा …शायद यही वजह है कि चांद की असलियत जान लेने के बाद भी चंदा मामा बच्चों के आज भी बेहद पास और प्रिय है और किसी न किसी रूप में बच्चों की कहानियों और कविताओं में आ ही जाते हैं। और शायद यही वजह है कि रात के अंधेरे में चंदा मामा का गोरा, दमकता, खिला-खिला चेहरा देखते ही बच्चे उनके पास जाने की या उन्हें अपने पास बुलाने की जिद करने लग जाते हैं;

झांक रहा बादल से चंदा, अम्मा उसे बुला ले तू
तुझको ही वह देख रहा है, अपने पास बुला ले तू।
सुबह उठेंगे एक साथ, फिर मिलकर दोनों खेलेंगे,
जो कुछ भी खाने को दोगी, बांट-बांटकर ले लेंगे।

-शकुन्तला सिरोठिया

पर चंदा मामा तो दूर के हैं;

चंदा मामा दूर के

चंदा मामा दूर के
भरे थाल में कितने अच्छे
लड्डू मोती चूर के।
रख थाली में जला रहे क्यों
तुम ये दिए कपूर के
चंदा मामा दूर के !

-द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

परन्तु बच्चा यह नहीं मानता है उसे तो चंदा चाहिए और तुरंत ही चाहिए-क्योकि कभी तो वह उसे मामा सा लगता है तो कभी रात की कड़ाही में तैरता गरम-गरम पूरी-सा-

पूरी-सा चंदा

रात की कड़ाही में
पूरी-सा चंदा
कितने पास आ बैठा, मां
देखो अब दूरी-का चंदा

प्लेट में दे दे तू मुझको
मैं भी तो अब देखूँ ज़रा
ठंडा है, या गरम बहुत है
छत पर मेरी जो आ लटका है
जाने किस मजबूरी में चंदा !

-शैल अग्रवाल

दिनकर जी की चांद पर लिखी कविता चाँद का कुर्ता तो आज भी बच्चे-बच्चे को सर चढ़े जादू की तरह मोहती है। चांद के घटने-बढ़ने को ही नहीं, सन-सन हवाओं और ठिठुरती सर्दियों में चंदा के एकाकी सफर को मानो इस कविता ने आंखों के आगे साकार कर दिया हो। चांद की फरमाइश और बेबसी दोनों ही मन मोहक हैं-

चाँद का कुर्ता

हठ कर बैठा चांद एक दिन, माता से यह बोला,
” सिलवा दो मां, मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला।

सन-सन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूं,
ठिठुर-ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूं।

आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का,
न हो अगर तो ला दो, कुर्ता ही कोई भाड़े का।”

बच्चे की सुन बात कहा माता ने, ” अरे सलोने,
कुशल करें भगवान, लगें मत तुझको जादू-टोने।

जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूं,
एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूं।

कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा,
बड़ा किसी दिन हो जाता है और किसी दिन छोटा।

घटता बढ़ता रोज, किसी दिन ऐसा भी करता है,
नहीं किसी की आंखों को दिखलाई पड़ता है।

अब तू ही तो बता, नाप तेरा किस रोज लिवायें,
सीं दें एक झिंगोला जो हर दिन बदन में आये।

इसी तरह रामनरेश त्रिपाठी जी की चंदा मामा कविता भी बड़ी ही लुभावनी और रोचक कविता है। कविता क्या है, एक मनभावन सा बेजोड़ किस्सा है। चंदामामा कचहरी गए , तो मामी निशा भला कब तक घर में अकेली सोई रहतीं! वह अकेली घूमने चल दीं और अग-जग की सुंदरता देख उनके पैर खुद ही नाच उठे।

पहले वह सागर पर नाचीं, फिर नाचीं जंगल में
नदियों पर नालों पर नाचीं, पेड़ों की ओझल में
फिर पहाड़ पर चढ़ चुपके से वह चोटी पर नाचीं
चोटी से उस बड़े महल की छत पर चढ़ वह नाचीं।

और बच्चों, मामी निशा इतना नाचीं कि उनका नौलखा हार ही टूट गया। मोती चारो तरफ बिखर गए। मामी बेचारी रोती-रोती वहीं खड़ी रह गईं। और तब,

पाकर हाल दूसरे दिन ही चंदा मामा आए,
कुछ शर्माकर खड़ी हो गई मामी मुंह लटकाए।
चंदा मामा बहुत भले हैं, बोले क्यों है रोती,
दीया लेकर घर से निकले चले बीनने मोती।

कभी-कभी चंदा मामा के उतरे चेहरे और उधार की चमक दमक ने भी बच्चों के मन में कई सवाल उठाए हैं जिसे बालस्वरूप राही जी ने अपनी कविता उधार की चमक-दमक में बड़े ही सहज और बाल सुलभ ढंग से उठाया हैः

चंदा मामा कहो तुम्हारी
शान पुरानी कहां गई
कात रही थी बैठी चरखा
बुढ़िया नानी कहां गई

सूरज से रोशनी चुराकर
चाहे जितनी भी लाओ,
है उधार की चमक-दमक यह
नकली शान निराली है,

समझ गए हम चंदा मामा
रूप तुम्हारा जाली है।

पर बच्चों कोई कुछ भी कहे ये चंदा मामा की चरखा बुनती नानी और चदामामा ही तो है जिनकी वजह से बच्चों की यह लगातार कहानी और कविताओं का सिलसिला आज तक चला आ रहा है। आओ चलते-चलते चंदामामा की एक विशेष कहानी के साथ यह राज भी जान ही लेते हैं;

कहानी की कहानीः शैल अग्रवाल

बच्चों की फरमाइश पूरी करना चंदामामा के लिए असंभव सा होता जा रहा था और यह बात उन्हें बहुत दुख दे रही थी। ठीक भी तो था, वे बच्चों को प्यार भी तो बहुत करते थे, परन्तु कभी राजा-रानी की, तो कभी परियों वाली, कभी शेर-भालू की, तो कभी पिंजरे में बन्द तोते की, रोज-रोज नई कहानियां वे लाते तो लाते भी कहां से, और बच्चों की तो हमेशा बस यही एक जिद थी कि नई कहानी ही सुनेंगे! हारकर पूरे ही चन्द्रलोक में ढिंढोरा पिटवा दिया गया कि जो भी बच्चों को रोज नई कहानी सुनाएगा, उसे न सिर्फ पूरा राजपाट दे दिया जाएगा, बल्कि अपने हृदय से लगाकर…बेहद करीब रखेंगे चंदामामा।

अगले दिन ही कहानी सुनाने वालों की लाइन लग गई, अब भला प्यारे-प्यारे से चंदामामा के पास चंद्र्लोक में कौन नही रहना चाहेगा, जहां चारो तरफ टिमटिम करते सुनहरे-रुपहले तारे हों और परियों का भी साथ हो!

पर चंदामामा की तो एक और शर्त भी थी, जिसका पता चलते ही सभी कहानी सुनाने वालों के पसीने छूटने लगे। अब भगवान के अलावा ऐसी कहानी कौन कह सकता है जो कभी खतम ही न हो–या जहां से खतम हो फिर वहीं से शुरु भी हो जाए! फिर भी कहानी तो सुनानी ही थी, सबसे पहले वह जादूगर आया जिसका चारो तरफ बहुत नाम था और जिसे अपने जादू पर बहुत ज्यादा विश्वास भी था।

चंदामामा के आगे आते ही उसने अपनी कहानियों का पिटारा खोल दिया और सब कहानियां उछलकर तुरंत ही बाहर भी आ गईं। चारो तरफ बिखर गईं। चंदा के सिंहासन पर, रात की छतपर, तारों की खूंटी पर… अब चारो तरफ कहानियां ही कहानियां लटक रही थीं पर उन्हें क्रम से बांचने वाला वहां कोई नही था। कहानियां खुद अपनी-अपनी कहानी कह रही थीं और जादूगर चंदा के पास बैठा-बैठा इस अनहोनी जादूगरी पर खुश हो-होकर मुस्कुरा रहा था। अनियंत्रित इस शोर से चंदा के सर में ही नहीं, वहां उपस्थित सभी प्यारे-प्यारे बच्चों के सर में भी दर्द होने लगा और खुश हो कर सो जाने के बजाय वे सब जोर-जोर से रोने लग गये। अब तो सारे बच्चों की मांएं भी घबरा गईं। किसी ने अपने बच्चे को कंधे से लगाकर थपकी देनी शुरु कर दी तो कोई लोरी गा रही थी। कइयों ने तो झुंझला-झुंझलाकर बच्चों को पीट तक डाला और बच्चों को कभी चंदामामा के पास न भेजने की तुरंत ही धमकी तक दे डाली। अब भला चंदामामा बच्चों से कैसे दूर रह पाते, उसी वक्त जादूगर को आकाश-महल से बाहर भेजने का हुक्म दे दिया गया।

अब आई सुन्दर सी नन्ही परी की बारी, जो जाने कबसे लाइन में खड़ी इन्तजार कर रही थी। जब उसने चंदामामा के महल में घुसते ही अपने जुही की पंखुरियों-से कोमल और सुन्दर पंखों को फड़फड़ाया, तो झरती सुनहरी उस धूल के संग कई-कई कहानियां झिलमिल करती चांदनी में तैरने लगीं, मानो चारो तरफ कहानियों का एक रंग-बिरंगा इन्द्रधनुष निकल आया हो। अब तो खुश-खुश दौड़ते भागते बच्चे मन में आता जिस कहानी को पकड़ते और सुनने लग जाते, औरफिर सुनकर छोड़ भी देते यूँ ही तैरने और इन्द्रधनुष बनाने के लिए। इस तरह से उस हँसी-खुशी के माहौल में आराम से बीसियों साल निकल गए। बच्चे इतने खुश थे कि उन्हें अंधेरी रातों में भी कहानी ढूंढने में आनन्द आता—कहानी मिलती या नहीं, कितनी मिलती, इसतक की परवाह नहीं रह गई थी उन्हें अब तो। फिर एक दिन जब वे छोटे-छोटे बच्चे बड़े हो गए और खुद उनके अपने भी बच्चे हो गए, तो उन्होंने जाना कि उनके बच्चे अभी तक वही कहानियां सुन और सुना रहे हैं जो खुद उन्होंने भी कभी परी से सुनी और सुनाई थीं । असल में परी के पंख में जितनी भी कहानियां थीं, वे पृथ्वी के साथ-साथ ही घूमती रहती थीं और पूरे साल में जाकर चक्कर पूरा कर पाती थीं —हां तुम लोगों ने ठीक समझा परी के पास बस तीन सौ पैंसठ ही कहानियां थीं, साल के हर दिन की एक नई कहानी। पर चन्दा तो हमेशा ही, लगातार एक नई कहानी चाहता था इसलिए यह बात फैलते ही उसकी खोज फिरसे जारी हो गई।

इसबार उसने चंद्गलोक पर ही नहीं, सूर्यलोक, पृथ्वी और नौ ग्रह, सब जगह ही डुगडुगी बजवा दी।

‘ लगातार कहानी कहो और चंद्रलोक के सिंहासन पर बैठो।’

पर लगातार कहानी तो किसी के पास नही थी। कोई भी आगे नही आया। चंदा अब सचमें ही बेहद उदास हो गया —इतना उदास कि उसका पूरा मुंह कुम्हला गया, सारी चमक गायब हो गई। आंखों के नीचे बड़े-बड़े गढ्ढे बन गए…वही गढ्ढे जिन्हें आजकल एस्ट्रोनौट्स ने मून-क्रेटर का नाम दिया हैं। चंदामामा दिन-रात दुबला होता जा रहा था। किसी काम में उसका मन नहीं लग रहा था। उसका यह दुख उसकी मां से, जो अब बेहद बुढ़िया हो चली थी, देखा न गया। अपना सूत कातने का चरखा लेकर वह चांद के पास जा बैठी। चंदा का सर अपनी गोदी में ऱखकर बोली, मेरे चंदा, तू इतना उदास क्यों है, आ मैं सुनाऊंगी तुझे लगातार एक नई कहानी। चंदा को उस सफेद रूखे बालों वाली बुढ़िया मां की बात सुनकर हंसी आ गई। बोला, जाओ मां! यह सब तुम्हारे बस का नहीं। क्यों नहीं? हंसकर बुढ़िया मां फिरसे बोली, आखिर मां हूं तेरी। बचपन से ही तेरी देखभाल करती आई हूँ…और तेरी हर जरूरत, पसंद-नापसंद को भलीभांति से जानती भी हूं। लगातार यह चरखा बुन सकती हूं तो क्या लगातार एक नई कहानी नहीं कह सकती— और फिर तुम और तुम्हारे ये संगी-साथी, ये तारे भी तो हैं ही मेरी मदद के लिए। देखना मिलजुलकर सब काम हो ही जाएगा, परिवार और सहयोग की ताकत बहुत होती है और आपस में प्रेम हो, तो यह ताकत कई-कई गुना बढ़ जाती है।
उस दिन से आजतक चंदा के साथ बैठी बुढ़िया नानी सूत की तरह ही कहानियां बुनती जा रही है। चरखा चलता रहता है, कहानियां निकलती रहती हैं। न चरखे का सूत टूटता है और ना ही कहानियों का क्रम। और अगर कभी सूत टूट भी जाए तो नानी इतनी सफाई से जोड़ देती है कि पास बैठे चंदा तक को पता नही चल पाता। उसकी ये कहानियां कभी-कभी तो चंदामामा को इतना खुश कर देती है कि वह फूलकर कुप्पा हो जाता है तो कभी इतना डरा देती है कि सूखकर कांटा। यही वजह है बच्चों कि तुम रोज ही चंदामामा को घटते बढ़ते देखा करते हो। चरखा बुनती नानी के पास हर रात एक नन्हा तारा अपनी नई कहानी लेकर आता है और रातभर खेलता रह जाता है। एक नए आत्म विश्वास के साथ जगमग- जगमग, जब वह अपनी नयी कहानी कहता है तो नानी उसे बेहद प्यार से देखती है और पृथ्वी पर बैठे बच्चों की तरह ही, कहानी को बहुत ध्यान से सुनती भी है । विश्वास नही तो आज ही रात को देखना, चंदा में बैठी वह बुढ़िया नानी, अभी भी तुम्हें वहीं बैठी दिखाई देगी वैसे ही चरखा चलाती और अगर ध्यान से सुनोगे तो रात के सन्नाटे में नन्हे-नन्हे तारों की नई-नई कहानियां भी चलते चरखे की आवाज के साथ किलक-किलककर वैसे ही गूंज रही होंगीं!


शैल अग्रवाल
बरमिंघम, यू.के