परिचर्चाःहिन्दू-विवाह पद्दति में संस्कारों की महत्ता-गोवर्धन यादव

संसार की प्रत्येक वस्तु, स्वयं को दिव्य, भव्य तथा आकर्षकरुप में प्रस्तुत करने के लिए संस्कार की अपेक्षा रखती है. संस्कार का अर्थ ही-परिमार्जित रुप में प्रस्तुति है. संस्कार वैज्ञानिक अवधारणा के रुप में विकसित भारतीय जीवन-पद्दति की सर्वाधिक स्पृहणीय, सर्वस्वीकृत एवं महत्वपूर्ण आनुष्ठानिक प्रक्रिया है. संस्कारों के द्वारा वस्तु या प्राणी कॊ और अधिक संस्कृत, परिमार्जित एवं उपादेय बना ही इसका मुख्य उद्देश्य है अर्थात संस्कार पात्रता पैदा करते हैं. सभ्यता, संस्कृति एवं प्रज्ञा के विकास के साथ-साथ भारतीय मनीषियों ने मनुष्य-जीवन को अधिकाधिक क्षमतासम्पन्न, संवेदनशील, भावप्रवण एवं उपयोगी बनाने के लिए ही संस्कारों की अनिवार्यता स्वीकार की है.
भौतिक पदार्थों का ही नहीं अपितु समस्त प्राणि-जगत, पशु-पक्षी भी अपनी-अपनी तरह से संस्कार करते हैं. मनुष्य तो स्वयं चैतन्य है. उसका जन्म अपनी जननी की कोख से प्राकृत रुप में हुआ है, पर उसके प्राकृत जीवन को अपेक्षाकृत अधिक परिष्कृत, संवेदनशील एवं लक्ष्योन्मुख बनाने के लिए संस्कारों की मर्यादा निर्धारित है.
संस्कारों का विस्तृत विवेचन धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों के साथ-साथ आयुर्वेद एवं पुराण आदि में भी मिलता है. धर्मशास्त्रों में विशेषतः पारस्कर, सांख्यायन, आश्र्वलायन आदि गृह्यसूत्रों में इनकी संख्या पृथक-पृथक मिलती है. गौतमसूत्र में अडतालिस संस्कारों का उल्लेख है, जबकि सुमन्तु ने पच्चीस संस्करों का उल्लेख किया है. वहीं व्यासस्मृति में सोलह संस्कारों का विवरण है. वे इस प्रकार हैं- (१) गर्भाधारण,(२) पुंसवन, (३)सीमन्तोन्नयन (४)जातकर्म( ५)नामकरण (६) निष्क्रमण( ७) अन्नप्राशन (८) चूडाकरण (९) कर्णवेध (१०) उपनयन (११) वेदारम्भ (१२) केशान्त (१३) समावर्तन (१४) विवाह (१५) वानप्रस्थ (१६) संन्यास एवं अन्तयेष्टि.
इसमें प्रथम तीन-गर्भाधान, पुंसवन एवं सीमन्तोन्नयन प्रसव से पूर्व के हैं, जो मुख्यतः माता-पिता द्वारा किए जाते हैं. अग्रिम छः-जातकर्म से कर्णवेध तक बाल्यावस्था के हैं, जो परिवार—परिजन के सहयोग से सम्पन्न होते हैं. अग्रिम तीन-उपनयन, वेदारम्भ, समावर्तन विध्याध्ययन से सम्बद्ध है, जो मुख्यतः आचार्य के निर्देशानुसर सम्पन्न होते हैं. विवाह, वानप्रस्थ एवं सन्यास-ये तीन संस्कार तीन आश्रमों के प्रवेशद्वार हैं तथा व्यक्ति स्वयं इनका निष्पादन करता है और अन्तयेष्टि जीवन-यात्रा का अन्तिम संस्कार है, जिसे पुत्र-पौत्र आदि पारिवारिक जन तथा इष्ट-मित्रों के सहयोग से किया जाता है.
उपरोक्त सोलह संस्कारों में हम केवल विवाह-संस्कार को लेकर चर्चा करेंगे. जैसा कि हम जानते ही हैं कि आर्यों ने पवित्र, सरल, स्थिर और सुखमय जीवन-यापन के उद्देश्य से मानव और मानवों के लिए अपने जीवन को संयम, सदाचार, त्याग, तप, सेवा, शांति, एवं धर्म आदि अनेक कल्याणकारी-गुणॊं से परिष्कृत करने एवं अविनय, कदाचार तथा विलासिता आदि दुर्गुणॊं से दूर रहने के लिए “विवाह-संस्कार” को आवश्यकतम माना है. उनके विज्ञान में इस पवित्रतम संस्कार के बिना इन आवश्यक कल्याणकारी-गुणॊं का विकास एवं दुर्गुणॊं का उच्छेद दुःशक्य ही नहीं, अपितु असम्भव है.
विवाह एक सांसारिक अव्यवस्थाओं कॊ दूर करने वाला संस्कार है. इससे पुरुष सुसंस्कृत, सभ्य एवं धर्मात्मा बनता है. पुरुष की अपने शरीर में जितनी ममता होती है, उतनी अन्य वस्तुओं में नहीं. विवाह के द्वारा उसकी ममता अपने शरीर से ऊपर उठकर पत्नी में, फ़िर संतान होने पर, वही ममता पुत्र-कन्या आदि में बंट जाती है. वही प्रेम घर की चारदीवरी से प्राम्भ होकर मुहल्ला, गली, ग्राम, नगर, प्रांत, देश फ़िर क्रमशः समस्त विश्व में व्याप्त हो जाता है. गृहस्थ के इस महाविद्द्यालय में त्याग-प्रेम आदि का पूर्ण अभ्यास कर जब पति-पत्नी उसी प्रेमभाव-त्यागभाव का प्रयोग परमेश्वर की दिशा की ओर प्रवृत्त कर देते हैं, तब वे परमेश्वर के निकट पहुँच जाते हैं. यही शास्त्रानुसार उनके जीवन का परम एवं चरम लक्ष्य हुआ करता है.
हिन्दू-विवाह का परम लक्ष्य कामवासना-पूर्ति नहीं है, किंतु यज्ञ में अधिकार-प्राप्ति तथा सात्त्विक प्रेम में प्रवृत्ति और वेदादि शास्त्र में प्रेम उत्पन्न करना है. वेदमन्त्रों से विवाह शरीर और मन पर विशिष्ठ संस्कार उत्पन्न करने वाला होता है. इससे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष तक की प्राप्ति हुआ करती है.यदि विवाह संस्कार न होता तो पुरुष की न तो पत्नि ही होती, न माँ, न बहन और न उसकी कोई लडकी आदि संतान होती. तब पुरुष का न तो घर होता और न ही कोई विद्ध्यालय होता. विवाहरहित राष्ट्र धर्म, शिक्षा संस्कृति, कला, विज्ञान आदि से सर्वथा शून्य एक पशु-राष्ट्र होता. इसी विवाह-संस्कार ने मनुष्य को व्यवस्थित किया, परिवार दिया, प्रेम दिया, घर बसाने की और विद्या पाने की प्रेरणा दी. विवाह से ही सुवर्णमय संसार बस गया.
हिन्दू विवाह में स्त्री केवल कामपूर्ति का यंत्र नहीं बनतीं, किंतु धर्मपत्नी बनती है,. इसी के द्वारा स्त्री में पातिव्रत्य इतना कूटकर भर दिया जाता है कि वह अपने पति के अतिरिक्त पुरुषों को पिता, भ्राता या पुत्र की दृष्टि से देखती है
इसी हिन्दू-विवाह के परिणामस्वरुप भारतवर्ष का पातिव्रत्यधर्म देश-विदेश में सुप्रसिद्ध है. इसमें पति-पत्नी एक द्वार के दो दरवाजे हैं, एक मुख की दो आँखें हैं, एक रथ के दो चक्र हैं. इसी हिन्दू-विवाह से दम्पत्ती एक-दूसरे से अविश्वस्त नहीं रहते, पक्का गठजोड रहता है. इस विवाह विधि में देवताओं की साक्षी होती है. हिन्दू- संस्कृति में इसी सत्य का साक्षात्कार ही मानव-जीवन का लक्ष्य माना गया है.
तेजी से बदलते परिवेश में हम संस्कारविहीन होते जा रहे है. इस संस्कारहीनता का परिणाम संयुक्त परिवारों के टूटने के रुप में हमारे सामने आ रहा है. पिता द्वारा सम्पत्ति के लिए पुत्र की हत्या, तो कहीं पुत्र द्वारा पिता की हत्या किए जाने की घटनाएं सामने आ रही है. जीवन भर साथ निभाने का संकल्प लेने वाली पत्नी मर्यादाहीनता का शिकार बनकर परपुरुषॊं से सम्बन्ध बनाने में नहीं हिचकचा रही है. इतना ही नहीं, समाचार-पत्रों में जब पत्नी ने प्रेमी के साथ ‍षडयन्त्र रचकर पति की हत्या करा डाली, जैसे समाचार प्रकाशित होता है हृदय कांप उठता है. तो कहीं छोटी=छॊटी बातों पर हुआ विवाद तलाक का रुप लेने लगा है. तलाक के अधिकांश आवेदनों में दहेज के नाम पर धन मांगने जैसे आरोप लगाए जा रहे हैं. रही सही कसर दूरदर्शन पर ऎसे-ऎसे धारावाहिक प्रसारित किए जा रहे हैं, जिनमे युवक-युवतियों के विवाहपूर्व सम्बन्ध दिखाए जा रहे हैं. इन अवैध सम्बन्धों को “प्रेम” प्रदर्शित कर युवा पीढी को संस्कारहीन बनाया जा रहा है. ठगी-चोरी तथा भ्रष्टाचार के नए-नए तरीके इन धारावाहिकों में प्रदर्शित करने के कारण युवकों को एक प्रकार से अपराधों का प्रशिक्षण प्राप्त हो रहा है. संस्कारहीनता के इससे घृणित परिणाम और क्या हों सकते हैं ?
शिक्षा पद्दति से आये बदलाव के कारण भी अनेक सामाजिक समस्याएँ पैदा हुईं.. मैकाले के मानस-पुत्रों ने भारतीय संस्कृति, वेदों, पुराणॊं इत्यादि को रुढिवादी, काल्पनिक तथा अवैज्ञानिक कहकर तिरस्कृत किया. उन्होंने यह काम इतनी चालाकी और चतुराई से किया कि हम उनके झांसे में आ गए और अपने आपको पाश्चात्य संस्कृति में डूबो लिया और अपने हाथों अपने पूर्वजॊं द्वारा स्थापित सामाजिक मर्यादाओं का और संस्कारों का ताना-बाना छिन्न-भिन्न करने में पिल पडॆ. परिणाम -भयंकररुप से सामने खडा होकर अट्टहास कर रहा है.
अब भी देर नहीं हुई है. हमें इन सब बातों पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यक्ता है. और अपनी संस्कार-सम्पन्न गौरवमयी सुदीर्घ परम्परा को समझते हुए तदानुसार उसका आचरण करना होगा. तब जाकर हम पुनः अपने खोये हुए गौरव और आदर्शों को प्रतिष्ठित कर सकेंगे.

103, कावेरी नगर,छिन्दवाड़ा (म.प्र.) 480001